
Trailokya-mohinī Śrī-Lakṣmī-ādi-pūjā and Durgā-yoga (Protective and Siddhi Rites)
भगवान अग्नि वसिष्ठ को त्रैलोक्य-मोहिनी श्री (लक्ष्मी) के समृद्धि-प्रयोगों के साथ दुर्गा-योग के रक्षात्मक व विजय-साधन बतलाते हैं। आरम्भ में लक्ष्मी-मंत्र-श्रृंखला और नौ अङ्ग-मंत्रों का न्यास, कमल-बीज की माला से एक से तीन लाख जप का विधान है। फिर श्री/विष्णु-मन्दिर में धन-प्रद पूजा, खदिर-अग्नि में घृत-युक्त चावल का होम, बिल्व-आधारित आहुतियाँ, तथा ग्रह-शान्ति और राज-अनुग्रह/वश्यता हेतु सरसों-जल अभिषेक आदि शान्ति-प्रायश्चित्त बताए गए हैं। आगे शक्र के चार-द्वार वाले भवन का ध्यान, द्वार-रक्षिका श्री-दूतियाँ, और अष्टदल कमल पर चार व्यूह (वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध) का विन्यास, अंत में कमल-कर्णिका में लक्ष्मी का रूप-ध्यान आता है। आहार व तिथि-नियम, तथा बिल्व, घी, कमल, पायस आदि अर्पण-सामग्री दी गई है। तत्पश्चात दुर्गा का ‘हृदय’ मंत्र साङ्ग, पत्र-आधारित पूजा, आयुध-देवताओं को अर्पण, और वशीकरण, जय, शान्ति, काम, पुष्टि हेतु होम-विकल्प; अंत में रणभूमि में विजय-आवाहन का विधान है।
Verse 1
इत्य् आग्नेये महापुराणे त्रैलोक्यमोहनमन्त्रो नाम षष्ठाधिकत्रिशततमो ऽध्यायः अथ सप्ताधिकत्रिशततमो ऽध्यायः त्रैलोक्यमोहनीलक्ष्म्यादिपूजा अग्निर् उवाच वक्षः सवह्निर्यामाक्षौ दण्डीः श्रीः सर्वसिद्धिदा महाश्रिये महासिद्धे महाविद्युत्प्रभे नमः
इस प्रकार अग्नि-महापुराण में ‘त्रैलोक्य-मोहन मन्त्र’ नामक तीन सौ सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब तीन सौ आठवाँ अध्याय—‘त्रैलोक्य-मोहिनी लक्ष्मी आदि की पूजा’—आरम्भ होता है। अग्नि बोले: वक्षः-रूपा, वह्नि-सहिता, याम-नेत्रा, दण्डी तथा सर्वसिद्धि-प्रदा महाश्री को नमस्कार; महासिद्धा, महाविद्युत्-प्रभा को नमः।
Verse 2
श्रिये देवि विजये नमः गौरि महाबले बन्ध नमः हूं महाकाये पद्महस्ते हूं फट् श्रियै नमः श्रियै फट् श्रियै नमः श्रियै फट् श्रीं नमः श्रिये श्रीद नमः स्वाहा स्वाहा श्रीफट् अस्याङ्गानि नवोक्तानि तेष्वेकञ्च समाश्रयेत् त्रिलक्षमेकलक्षं वा जप्त्वाक्षाब्जैश् च भूतिदः
“श्री, देवी, विजय-रूपा को नमः; गौरी, महाबला को नमः—बन्ध (बाँधो/नियंत्रित करो)!” “हूँ—महाकाया को नमः; पद्महस्ता को—हूँ फट्!” “श्री को नमः; श्री को फट्; श्री को नमः; श्री को फट्; श्रीं—श्री को नमः; श्रीदायिनी श्री को नमः; स्वाहा, स्वाहा—श्रीफट्।” ये नौ अङ्ग-मन्त्र कहे गए हैं; प्रत्येक में न्यास करना चाहिए। कमल-बीजों की माला से गिनकर तीन लाख या एक लाख जप करने से समृद्धि/कल्याण प्राप्त होता है।
Verse 3
श्रीगेहे विष्णुगेहे वा श्रियं पूज्य धनं लभेत् आज्याक्तैस्तण्डुलैर् लक्षं जुहुयात् खादिरानले
श्री (लक्ष्मी) के मंदिर या विष्णु-मंदिर में श्री की विधिपूर्वक पूजा करने से धन-समृद्धि प्राप्त होती है। घृत से अभिषिक्त चावल के दानों की एक लाख आहुतियाँ खदिर-काष्ठ की अग्नि में देनी चाहिए।
Verse 4
राजा वश्यो भवेद्वृद्धिः श्रीश् च स्यादुत्तरोत्तरं सर्षपाम्भोभिषेकेण नश्यन्ते सकला ग्रहाः
सरसों से युक्त जल के अभिषेक से राजा वशीभूत (अनुकूल) होता है, वृद्धि/समृद्धि उत्पन्न होती है, श्री (भाग्य) उत्तरोत्तर बढ़ती है और समस्त ग्रह-दोष नष्ट हो जाते हैं।
Verse 5
बिल्वलक्षहुता लक्ष्मीर्वित्तवृद्धिश् च जायते शक्रवेश्म चतुर्द्वारं हृदये चिन्तयेदथ
बिल्व से एक लाख आहुतियाँ देने पर लक्ष्मी प्रकट होती है और धन-वृद्धि होती है। तत्पश्चात् हृदय में चार द्वारों वाले शक्र (इन्द्र) के भवन का ध्यान करना चाहिए।
Verse 6
बलाकां वामनां श्यामां श्वेतपङ्कजधारिणीम् ऊर्ध्ववाहुद्वयं ध्यायेत्क्रीडन्तीं द्वारि पूर्ववत्
पूर्ववत् द्वार पर क्रीडारत—बलाका (बगुला) के समान सुगठित, वामन (छोटी कद) श्यामवर्णा, श्वेत कमल धारण करने वाली, दोनों भुजाएँ ऊपर उठाए हुए—ऐसी देवी का ध्यान करना चाहिए।
Verse 7
उर्ध्वीकृतेन हस्तेन रक्तपङ्कजधारिणीं श्वेताङ्गीं दक्षिणे द्वारि चिन्तयेद्वनमालिनीम्
हाथ ऊपर उठाए हुए, रक्त कमल धारण करने वाली, श्वेताङ्गी, वनमाला से विभूषित देवी को दक्षिण द्वार पर स्थित मानकर ध्यान करना चाहिए।
Verse 8
हरितां दोर्द्वयेनोर्धमुद्वहन्तीं सिताम्बुजम् ध्यायेद्विभीषिकां नाम श्रीदूतीं द्वारि पश्चिमे
पश्चिम द्वार पर श्रीदूती ‘विभीषिका’ का ध्यान करे—हरितवर्णा, जो दोनों भुजाओं से श्वेत कमल को ऊँचा धारण करती है।
Verse 9
शाङ्करीमुक्क्तरे द्वारि तन्मध्ये ऽष्टदलपङ्कजं वासुदेवः सङ्कर्षणः प्रद्युम्नश्चानिरुद्धकः
शाङ्करी (शैव) द्वार पर मुक्त-तर (मोती-सा श्वेत) चिह्न है; और उसके मध्य में अष्टदल कमल है, जिसमें वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध का विन्यास किया जाए।
Verse 10
ध्येयास्ते पद्मपत्रेषु शङ्खचक्रगदाधराः अञ्जनक्षीरकाश्मीरहेमाभास्ते सुवाससः
उनका ध्यान कमल-पत्रों पर स्थित, शंख-चक्र-गदा धारण करने वाले रूप में किया जाए; उनकी प्रभा क्रमशः अंजन-श्याम, क्षीर-श्वेत, कश्मीर (केसर)-वर्ण और हेम-दीप्त है, तथा वे सुन्दर वस्त्रों से विभूषित हैं।
Verse 11
आग्नेयादिषु पत्रेषु गुग्गुलुश् च कुरुण्टकः दमकः सलिलश्चेति हस्तिनी रजतप्रभाः
आग्नेया आदि पत्र-समूह में गुग्गुलु, कुरुण्टक, दमक और सलिल—ये भी हैं; और इन्हें ‘हस्तिनी’ तथा ‘रजतप्रभा’ नामों से भी कहा जाता है।
Verse 12
हेमकुम्भधराश् चैते कर्णिकायां श्रियं स्मरेत् चतुर्भुजां सुवर्णाभां सपद्मोर्ध्वभुजद्वयां
ये (परिचर) स्वर्ण-कलश धारण करने वाले हैं। कमल की कर्णिका में श्री (लक्ष्मी) का स्मरण करे—चतुर्भुजा, सुवर्ण-प्रभा से दीप्त, और अपनी दोनों ऊर्ध्व भुजाओं में कमल धारण किए हुए।
Verse 13
दक्षिणाभयहस्ताभां वामहस्तवरप्रदां श्वेतगन्धांशुकामेकरौम्यमालास्त्रधारिणीं
उसके दाहिने हाथ अभय-मुद्रा धारण किए हैं और बाएँ हाथ वरदान देने वाले हैं। वह श्वेत, सुगन्धित वस्त्रों से विभूषित है तथा एक शुभ माला और शस्त्र धारण करती है।
Verse 14
ध्यात्वा सपरिवारान्तामभ्यर्च्य सकलं लभेत् द्रोणाब्जपुष्पश्रीवृक्षपर्णं मूर्ध्नि न धारयेत्
देवी को उनके परिवार सहित ध्यान करके और विधिपूर्वक पूजन करने से समस्त सिद्धि प्राप्त होती है। परंतु द्रोण-कमल का पुष्प अथवा श्री-वृक्ष (बिल्व) का पत्ता सिर पर नहीं रखना चाहिए।
Verse 15
लवणामलकं वर्ज्यं नागादित्यतिथौ क्रमात् पायसाशी जपेत् सूक्तं श्रियस्तेनाभिषेचयेत्
नाग और आदित्य तिथि के क्रम में नमक और आँवला त्यागना चाहिए। पायस का आहार करके सूक्त का जप करे और उसी से श्री (लक्ष्मी) का अभिषेक करे।
Verse 16
आवाहादिविसर्गान्तां मूर्ध्नि ध्यात्वार्चयेत् श्रियम् विल्वाज्याब्जपायसेन पृथक् योगः श्रिये भवेत्
आवाहन से लेकर विसर्जन तक, मस्तक पर श्री (लक्ष्मी) का ध्यान करके उनकी पूजा करे। बिल्वपत्र, घृत, कमल-समर्पण और पायस—इनको पृथक्-पृथक् अर्पित करने से श्री का विशेष योग सिद्ध होता है।
Verse 17
विषं महिषकान्ताग्निरुद्रिज्योतिर्वकद्वयम् ॐ ह्रीं महामहिषमर्दिनि ठ ठ मूलमन्त्रं भहिषहिंसके नमः महिषशत्रुं भ्रामय हूं फट् ठ ठ महिषं हेषय हूं महिषं हन२ देवि हूं महिषनिसूदनि फट् दुर्गाहृदयमित्युक्तं साङ्गं सर्वार्थसाधकम्
“विष; महिषकान्ताग्नि; उद्रि-ज्योति; तथा बीजाक्षरों का द्वय”—ये पूर्वाङ्ग हैं। “ॐ ह्रीं महामहिषमर्दिनि ठ ठ”—यह मूलमन्त्र कहा गया है; साथ में “महिषहिंसके नमः”। प्रयोग हेतु—“महिषशत्रुं भ्रामय हूं फट् ठ ठ”; “महिषं हेषय हूं”; “महिषं हन हन देवि हूं”; “महिषनिसूदनि फट्”। यह ‘दुर्गा-हृदय’ कहलाता है; अङ्गों सहित सर्वार्थसाधक है।
Verse 18
यजेद्यथोक्तं तां देवीं पीठञ्चैवाङ्गमध्यगम् ॐ ह्रीं दुर्गे रक्षणि स्वाहा चेति दुर्गायै नमः वरवर्ण्यै नमः आर्यायै कनकप्रभायै कृत्तिकायै अभयप्रदायै कन्यकायै सुरूपायै पत्रस्थाः पूजयेदेता मूर्तीराद्यैः स्वरैः क्रमात्
विधि के अनुसार उस देवी का पूजन करे और अंगों के मध्य स्थित पीठ का भी (न्यास द्वारा देह में) स्थापन कर पूजे। “ॐ ह्रीं दुर्गे रक्षणि स्वाहा” का जप करके—“दुर्गा को नमस्कार, श्रेष्ठ वर्णवाली को नमस्कार, स्वर्ण-प्रभा वाली आर्या को नमस्कार, कृत्तिका को नमस्कार, अभय देने वाली को नमस्कार, कन्या-स्वरूपा को नमस्कार, सुन्दर रूपवती को नमस्कार”—ऐसे प्रणाम करे। पत्तों पर स्थापित इन मूर्तियों का ‘अ’ आदि स्वरक्रम से पूजन करे।
Verse 19
चक्राय शङ्खाय गदायै खड्गाय धनुषे वाणाय अष्टम्याद्यैर् इमां दुर्गां लोकेशान्तां यजेदिति दुर्गायोगः समायुःश्रीस्वामिरक्ताजयादिकृत्
चक्र को, शंख को, गदा को, खड्ग को, धनुष को और बाण को नमस्कार करके; अष्टमी आदि तिथियों में लोकों को शांति देने वाली इस दुर्गा का पूजन करे। यही दुर्गा-योग (अनुष्ठान-विधि) है; यह आयु, श्री, स्वामित्व, शत्रु-वशीकरण, विजय आदि फल देता है।
Verse 20
समाध्येशानमन्त्रेण तिलहोमो वशीकरः जयः पद्मैस्तु दुर्वाभिः शान्तिः कामः पलाशजैः
समाधि-ईशान मन्त्र से तिल का होम वशीकरण करता है। कमल-फूलों से (होम करने पर) जय मिलती है; दूर्वा से शांति; और पलाश के पुष्पों से कामना-सिद्धि होती है।
Verse 21
पुष्टिः स्यात् काकपक्षेण मृतिद्वेषादिकं भवेत् ब्रह्मक्षुद्रभयापत्तिं सर्वमेव मनुर्हरेत्
काकपक्ष-चिह्न (सम्बन्धी मन्त्र-क्रिया) से पुष्टि और पोषण होता है; (विपरीत होने पर) मृत्यु, द्वेष आदि भी हो सकते हैं। परन्तु मन्त्र ब्रह्म-बलों से, क्षुद्र/दुष्ट प्राणियों से, भय और आपत्ति से उत्पन्न समस्त संकट को हर लेता है।
Verse 22
ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षणि स्वाहा रक्षाकरीयमुदिता जयदुर्गाङ्गसंयुता श्यामां त्रिलिचनां देवीं ध्यात्वात्मानं चतुर्भुजम्
“ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षणि स्वाहा” —यह रक्षाकर्म कहा गया है। जयदुर्गा के अंग-शक्ति से संयुक्त, श्यामवर्ण, त्रिनेत्री देवी का ध्यान करके, फिर अपने को चतुर्भुज रूप में भावित करे।
Verse 23
शङ्खचक्राब्जशूलादित्रिशूलां रौद्ररूपिणीं युद्धादौ सञ्जयेदेतां यजेत् खड्गादिके जये
युद्ध के आरम्भ में शंख, चक्र, कमल, शूल आदि तथा त्रिशूल धारण करने वाली रौद्र-रूपिणी देवी का मन से आवाहन कर उसे सशक्त करे। खड्ग आदि आयुधों में विजय हेतु उसकी विधिपूर्वक पूजा करे।
Precise ritual engineering: navāṅga (nine limb-mantras) with nyāsa, fixed japa targets (1–3 lakhs) using lotus-seed counting, and outcome-specific homa materials (khadira fire, ghee-rice, bilva, sesame, lotus, durvā, palāśa).
It frames prosperity and protection as dharmic stabilizers—through disciplined mantra, homa, and visualization—so the practitioner gains order (śānti), capacity (siddhi), and ethical sovereignty over fear and adversity, supporting higher sādhana.
Śrī (Lakṣmī) in the lotus pericarp, with a mandala-like structure: four gates, attendant Śrī-dūtīs at doorways, and an eight-petalled lotus assigned to the four Vyūhas—Vāsudeva, Saṅkarṣaṇa, Pradyumna, and Aniruddha.
Longevity and prosperity, mastery/authority, subjugation of enemies, victory, peace, and protective removal of dangers including fear and calamity.