Agneya-vidya
AgniRitualsMantraWorship

Agneya-vidya

The Science of Ritual Worship

Comprehensive instructions on Agni-based rituals, temple worship procedures, mantra recitation, and the sacred science of fire ceremonies.

Adhyayas in Agneya-vidya

Adhyaya 17

Chapter 17 — सृष्टिविषयकवर्णनम् (An Account Concerning Creation)

अग्निदेव वसिष्ठ को अवतार-कथा से हटाकर सृष्टि-वर्णन सुनाते हैं और बताते हैं कि सृष्टि विष्णु की लीला है, जो सगुण भी है और निर्गुण भी। ब्रह्मन् के अव्यक्त से विष्णु का प्रकृति-पुरुष में प्रवेश, फिर महत्, त्रिविध अहंकार और तन्मात्राओं से आकाश से पृथ्वी तक पंचमहाभूतों का क्रम बताया गया है। सात्त्विक अहंकार से मन और अधिष्ठाता देवता, तथा तामस/तैजस से इन्द्रिय-शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं। नारायण-जल की व्युत्पत्ति, हिरण्याण्ड और हिरण्यगर्भ ब्रह्मा द्वारा अण्डे का द्यौ और पृथ्वी में विभाजन, आकाश-दिशा-काल तथा काम, क्रोध, रति आदि मानसिक शक्तियों की स्थापना वर्णित है। आगे मेघादि वायुमण्डलीय सृष्टि, पक्षी, पर्जन्य, यज्ञ हेतु वैदिक छन्द-मन्त्र, और अंत में रुद्र, सनत्कुमार, सात मानस-ब्रह्मर्षि तथा ब्रह्मा के अर्धनारी-विभाजन से प्रजा-उत्पत्ति—इस प्रकार सृष्टि को यज्ञ-व्यवस्था और कर्मफल-प्रभाव से जोड़ा गया है।

16 verses

Adhyaya 18

Svāyambhuva-vaṁśa-varṇanam (Description of the Lineage of Svāyambhuva Manu)

अग्नि सृष्टिकथा से आगे बढ़कर वंशानुक्रम-धर्म का वर्णन करते हैं। स्वायम्भुव मनु की संतति—प्रियव्रत, उत्तानपाद और शतरूपा—से आरम्भ कर ध्रुव के तप और विष्णु-कृपा से ध्रुवलोक/ध्रुवपद (ध्रुवतारा) की स्थापना बताई जाती है। आगे वंश में वेन से पृथु का प्रादुर्भाव राजर्षि-शासन का आदर्श बनता है; वसुधरा का ‘दोहना’ कर अन्न और जीवन-पालन हेतु संसाधनों का धर्मसम्मत उपयोग संकेतित है। फिर प्रचेताओं की तपस्या, मारिषा से विवाह और दक्ष का जन्म आता है; दक्ष अपनी कन्याओं को धर्म, कश्यप, सोम आदि को देकर सृष्टि-विस्तार करते हैं। अंत में विश्वेदेव, साध्य, मरुत, वसु, रुद्र, स्कन्द के नाम और विश्वकर्मा का दैवी शिल्पी-रूप सूचीबद्ध होकर पुराण की सूची-परंपरा को यज्ञ, समाज, शिल्प और भक्ति-ज्ञान से जोड़ती है।

44 verses

Adhyaya 19

Chapter 19 — कश्यपवंशवर्णनम् (Description of Kaśyapa’s Lineage)

इस अध्याय में अग्नि सृष्टिकथा से वंशानुक्रम की ओर बढ़कर कश्यप की संतति का वर्णन करते हैं, जिससे मन्वन्तरों में देव, अर्धदेव और विरोधी कुलों का लोक-विस्तार समझाया जाता है। पहले तुषितों और आदित्यों की सूची (विष्णु/इन्द्र तथा सौर देवता) आती है, फिर दिति के पुत्र हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के द्वारा “युग-युग” में उभरने वाली प्रतिकूल शक्तियों का चक्र बताया जाता है। दानव शाखाओं में प्रह्लाद, बलि, बाण आदि का उल्लेख है और प्रह्लाद की विष्णु-भक्ति से दैत्य वंश में भी नैतिक श्रेणी का संकेत मिलता है। आगे कश्यप की पत्नियाँ—पुलोमा, कालका, विनता, कद्रू, सुरसा, सुरभि आदि—और उनसे उत्पन्न पक्षी, नाग, पशु तथा वनस्पतियों की उत्पत्ति को प्रातिसर्ग (द्वितीय सृष्टि) के रूप में समझाया गया है। अंत में चित्ररथ, वासुकि, तक्षक, गरुड़ आदि तथा दिक्पालों के अधिकारों सहित जगत-प्रशासन की क्रमबद्ध व्यवस्था बताकर यज्ञ-क्रम जैसी धर्म-व्यवस्था का समर्थन किया गया है।

28 verses

Adhyaya 20

Sargaviṣayaka-varṇana — The Topics of Primary Creation (Sarga)

भगवान अग्नि सृष्टि (सर्ग) का क्रमबद्ध वर्गीकरण बताते हैं। पहले प्राकृत सर्ग—ब्रह्मा की प्रथम सृजन-शक्ति के रूप में महत्, फिर तन्मात्राओं से स्थूल भूतों की उत्पत्ति, और उसके बाद वैकारिक/ऐन्द्रियक चरण में इन्द्रियों तथा उनके कार्यों का विकास। आगे स्थावर, तिर्यक्स्रोतस (पशु-योनियाँ), ऊर्ध्वस्रोतस देव, और वाक्स्रोतस मनुष्य—इन स्तरों का वर्णन कर अंत में ‘अनुग्रह-सर्ग’ द्वारा सत्त्व-तमस के नैतिक-आध्यात्मिक फल को दिखाते हैं। फिर वंश-उदाहरण आता है—दक्ष की कन्याओं और ऋषि-परम्पराओं से देव-ऋषियों की उत्पत्ति, रुद्र का जन्म व नाम, तथा सती का पार्वती रूप में पुनर्जन्म। अंत में नारदादि ऋषियों द्वारा स्नान-पूर्वक, स्वायम्भुव परम्परा में बताई गई पूजा को विष्णु आदि देवताओं की आराधना से भुक्ति और मुक्ति का साधन कहा गया है।

23 verses

Adhyaya 21

Chapter 21 — सामान्यपूजाकथनम् (Teaching on General Worship)

इस अध्याय में विष्णु आदि देवताओं के लिए “सामान्य-पूजा” का मानक ढाँचा बताया गया है। अच्युत को सपरिवार सार्वत्रिक नमस्कार से आरम्भ कर, परिचर देवताओं, मण्डल-विन्यास और रक्षा/शक्ति-वर्धक अंगों का क्रमशः विस्तार होता है। द्वार-श्री, वास्तु आदि स्थल-शक्तियाँ, कूर्म व अनन्त जैसे विश्व-आधार, तथा कमल-प्रतीक में धर्म और उसके विपरीत गुणों का मानचित्रण वर्णित है। आगे विष्णु के आयुध व बीज (श्रीं, ह्रीं, क्लीं), शिव-पूजा की सामान्य विधि (नन्दी व महाकाल से आरम्भ), और सूर्य-पूजा में हृदय/शिर/नेत्र आदि न्यास-सदृश विन्यास, कवच-अंग तथा राहु–केतु सहित ग्रह-समन्वय दिया है। मंत्र-रचना के नियम (प्रणव, बिन्दु, चतुर्थी + नमः) और तिल-घृत से होम द्वारा पुरुषार्थ-फलदायी समापन, तथा पाठान्तरों का उल्लेख भी है।

27 verses

Adhyaya 22

Chapter 22 — स्नानविधिकथनं (Instruction on the Rite of Bathing)

इस अध्याय में स्नान को पूजा का अनिवार्य पूर्वकर्म और शुद्धि-विद्या के रूप में बताया गया है। नृसिंह/सिंह-मंत्र से मृत्तिका लेकर उसका विभाजन किया जाता है; एक भाग से ‘मनः-स्नान’ कर यह प्रतिपादित होता है कि शुद्धि पहले भीतर है। निमज्जन व आचमन के बाद न्यास और सिंह-मंत्र-जप से रक्षा/दिग्बन्ध किया जाता है; त्वरिता या त्रिपुरा के वैकल्पिक रक्षामंत्र भी बताए गए हैं। अष्टाक्षरी मंत्र से हृदय में हरि-ज्ञान की स्थापना, वासुदेव-जप से तीर्थ-जल का संस्कार, वैदिक मंत्रों से देह-शोधन और मूर्ति-पूजन होता है। अघमर्षण, स्वच्छ वस्त्र, कर-जल शुद्धि, नारायण-मंत्र से प्राणायाम, द्वादशाक्षरी से अर्घ्य तथा योगपीठ से दिक्पाल, ऋषि और पितृगण तक आवाहन-जप का विधान है। अंत में सबको स्वस्थान भेजकर अङ्ग-संहार किया जाता है और पूजा-स्थान जाकर मूलमंत्र-आधारित समापन-स्नान से अन्य पूजाओं हेतु पुनः प्रयोज्य क्रम स्थापित होता है।

8 verses

Adhyaya 23

Chapter 23 — पूजाविधिकथनम् (The Account of the Rules of Worship)

इस अध्याय में नारद ब्राह्मणों से अनुशासित वैष्णव-पूजा का क्रम बताते हैं। आरम्भ में पाद-प्रक्षालन, आचमन, मौन और रक्षाकर्म; फिर पूर्वाभिमुख आसन, मुद्रा और बीज-ध्यान—नाभि में ‘यं’ उग्र वायु, हृदय में ‘क्षौं’ तेजस्वी निधि—दिशाओं में अग्नि से मल-दाह, आकाशस्थ चन्द्र-सम अमृतधारा से सूक्ष्मदेह-स्नान तथा सुषुम्ना-नाड़ियों में उसका प्रवाह। इसके बाद कर-शुद्धि, अस्त्रमंत्र व व्यापकल-स्थापन, तथा हृदय-शिरः-शिखा-कवच-अस्त्र-नेत्र आदि में पूर्ण न्यास। वेदी-व्यवस्था (वर्धनी बाएँ, सामग्री दाएँ), मंत्र-प्रोक्षण से संस्कार, और योगपीठ-निर्माण में दिशाओं में गुणों व प्रतिगुणों का विन्यास। पद्म-मण्डल का ध्यान कर हृदय से देवता का आवाहन कर मण्डल में स्थापना; पुण्डरीकाक्ष-विद्या के अनुसार अर्घ्य, पाद्य, आचमन, मधुपर्क, स्नान, वस्त्र, आभूषण, धूप, दीप आदि उपचार। फिर आयुध-चिह्न, परिवार व दिक्पाल-पूजा; जप, प्रदक्षिणा, स्तुति, अर्घ्य से समापन और ‘अहं ब्रह्म; हरिस् त्वम्’ का तादात्म्य-वचन। अंत में एकरूप-पूजा से नव-व्यूह-क्रम में अंगुली व देह-न्यास सहित प्रवेश तथा कुछ पाठभेदों का उल्लेख है।

23 verses

Adhyaya 24

Chapter 24 — कुण्डनिर्माणादिविधिः (Procedure for Constructing the Fire-pit and Related Rites)

इस अध्याय में नारद इच्छित सिद्धि देने वाले अग्निकार्य का विधान बताते हैं। होम-कुण्ड के लिए वास्तु-सदृश सूक्ष्म माप—रस्सी से नापना, भूमि-खोदन, मेखला (उठी हुई किनारी) बनाना, योनिचैनल की क्रमिक चौड़ाई, नियत ढाल और दिशा—का वर्णन है। वृत्त, अर्धचन्द्र, पद्माकार आदि वैकल्पिक कुण्ड-रूप तथा शृक्/श्रुवा और स्रुवा-पात्र के अङ्गुल-आधारित अनुपात भी दिए गए हैं। फिर दर्भा की परतें बिछाना, पात्र-स्थापन, प्रणीत जल बनाना, प्रोक्षण, घृत का आज्य-संस्कार और प्रणव को एकत्व-मन्त्र मानकर होम की क्रम-प्रक्रिया आती है। गर्भाधान से समावर्तन तक के संस्कारों को वैष्णव अग्निपूजा में समाहित दिखाया गया है। अंत में बीज-शुद्धि, ब्रह्माण्ड-ध्यान, लिङ्ग-परिवर्तन जैसी आन्तरिक साधना, गुरु-प्रेरित दीक्षा-अंग, विश्वक्सेन को आहुति और निष्कर्ष—भोगी को लौकिक फल, मुमुक्षु को हरि में लय—द्वारा भुक्ति-मुक्ति का समन्वय प्रतिपादित है।

59 verses

Adhyaya 25

Explanation of the Vāsudeva and Related Mantras (वासुदेवादिमन्त्रनिरूपणम्)

इस अध्याय में नारद वासुदेव-मन्त्र-परम्परा तथा चतुर्व्यूह (वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध) से जुड़ी उपासना के लक्षण पूछते हैं। ग्रन्थ प्राणव और ‘नमो’ से मन्त्र-रचना, स्वर-बीज (अ, आ, अं, अः) तथा दीर्घ-ह्रस्व और स्थान-नियमों से अङ्ग–उपाङ्ग का भेद बताता है। फिर षडङ्ग बीज-न्यास और द्वादशाङ्ग मूल-न्यास द्वारा हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र, अस्त्र आदि में मन्त्र-भागों का विन्यास दिया गया है। गरुड/वैनतेय, पाञ्चजन्य शङ्ख, कौस्तुभ, सुदर्शन, श्रीवत्स, वनमाला, अनन्त आदि दिव्य-चिह्नों में बीज-समूहों का विनियोग कर भक्ति और ध्वनि-तत्त्व का समन्वय किया गया है। आगे भूत, वेद, लोक, इन्द्रियाँ, बुद्धि-अहंकार-मन-चित्त तथा 26 तत्त्वों तक व्यूह-क्रम की संगति बताकर, दिशाओं, दिक्पालों और कर्णिका-देवताओं सहित मण्डल-पूजा का विधान आता है। अंत में विश्वरूप और विश्वक्सेन सहित फलप्रद उपासना—स्थैर्य और राज-विजय—का वर्णन है।

50 verses

Adhyaya 26

Explanation of the Characteristics of Mudrās (मुद्रालक्षणकथनं)

पिछले अध्याय में मंत्रों के प्रदर्शन के बाद यहाँ मुद्रा-लक्षण का निरूपण है—वे विधिपूर्वक हस्त-आकार जिनसे देव-सन्निधि और अन्य कर्मफल उत्पन्न होते हैं। नारद हृदय के समीप की गई ‘अंजलि’ को मुख्य नमस्कार-मुद्रा बताकर भक्ति को तकनीकी विधि का प्रवेशद्वार ठहराते हैं। फिर बाएँ हाथ की मुठ्ठी, ऊपर उठा अंगूठा और दाएँ अंगूठे की पकड़ आदि से आरम्भ कर सूक्ष्म देह-चेष्टा का क्रम बताया गया है। यज्ञ-व्यूह में साधारण और असाधारण मुद्राओं का भेद तथा कनिष्ठिका से क्रमशः खोलते हुए आठ मुद्राओं की अनुक्रमणा दी गई है। बीज-प्रयोग, सिद्धि आदि उद्देश्यों में पाठान्तरों का संकेत, वराह-मुद्रा और अङ्गना-मुद्राओं का क्रम भी आता है। अंत में दाहिनी ओर उसी रचना को संकुचित कर प्रतिबिम्बित करने की विधि बताकर कहा गया है कि शुद्ध विन्यास से मुद्रा-सिद्धि होती है।

7 verses

Adhyaya 27

Dīkṣāvidhi-kathana (Explanation of the Rite of Initiation)

इस अध्याय में मुद्राप्रदर्शन के बाद दीक्षा-विधि का क्रमबद्ध वर्णन आता है। नारद वैष्णव दीक्षा में पद्माकार मण्डल में हरि-पूजन, रक्षा-उपाय (नरसिंह-न्यास, ‘फट्’ सहित मंत्र से सरसों का छिड़काव) और प्रासाद-रूप में शक्ति-प्रतिष्ठा बताते हैं। औषधि, पंचगव्य, कुशा-प्रोक्षण तथा नारायणान्त मंत्रों से संस्कार, कुम्भ-पूजा और अग्नि-पूजा होती है; वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध—इन व्यूह-नामों से पका हुआ हवि अर्पित किया जाता है। फिर देशिक सृष्टि-क्रम से प्रकृति से पृथ्वी तक तत्त्वों का शिष्य पर न्यास करता है और संहार-क्रम में होम द्वारा उनका प्रत्याहार/शोधन कर पूर्णाहुति तक ले जाकर बन्धन-मोक्ष का लक्ष्य बताता है। मंत्रों व क्रियाओं के अनेक पाठभेद सुरक्षित हैं; अंत में गृहस्थ, साधक, निर्धन/तपस्वी/बालक आदि की पात्रता और शक्तिदीक्षा की संभावना कही गई है।

76 verses

Adhyaya 28

Abhiṣeka-vidhāna (The Procedure for Consecratory Bathing)

इस अध्याय में दीक्षा-वर्णन के बाद नारद अभिषेक-विधान का विस्तार से निरूपण करते हैं। अभिषेक आचार्य और साधक-शिष्य को सिद्धि देने वाला तथा रोग-शमन करने वाला उपचारात्मक कर्म कहा गया है। रत्नों से अलंकृत, प्रतिमायुक्त कुम्भों को मध्य से आरम्भ कर पूर्व आदि दिशाओं में क्रमबद्ध रखा जाता है, जिससे ब्रह्माण्डीय विन्यास प्रकट हो। कर्म की तीव्रता हेतु सहस्रावृत्ति, अथवा सामर्थ्य अनुसार शतावृत्ति बताई गई है। मण्डप-मण्डल में विष्णु को पीठ पर पूर्व व ईशानाभिमुख प्रतिष्ठित कर वास्तु-तर्क से जोड़ा गया है। आचार्यगण और पुत्रक की तैयारी, अभिषेक-देवता का पूजन, तथा गीत/पाठ जैसे मङ्गल-ध्वनियों के साथ विधि सम्पन्न होती है। अंत में योगपीठ-संबंधी सामग्री का प्रदान, गुरु द्वारा समय-व्रतों की घोषणा, तथा गोपनीयता व अनुशासन से शिष्य को परम्परा के पूर्ण अधिकार का पात्र बताया गया है।

5 verses

Adhyaya 29

The Description of the Sarvatobhadra Maṇḍala (सर्वतोभद्रमण्डलकथनम्)

इस अध्याय में मन्त्र-साधना हेतु पवित्र क्षेत्र के रूप में सर्वतोभद्र मण्डल के निर्माण और प्रतिष्ठा का कठोर विधान बताया गया है। शुद्ध भूमि और पूर्वपूजा के बाद वर्गाकार जाल को कमल-आधारित आवरणों—पीठ, वीथिका, द्वार—में बाँटकर दिशाओं के देवता और वैदिक विभाग नियत किए जाते हैं; तत्त्व, इन्द्रियाँ और अन्तःकरण के बहु-स्तरीय विन्यास भी दिए हैं। आगे रंग-नियम, रंगद्रव्य, शोधन-चिह्नांकन क्रम, अङ्गुल-हस्त-कर माप, तथा बीज/मन्त्र/विद्या-जप और पुरश्चरण की मर्यादा बताई जाती है। फिर मण्डल को योग-शरीर के रूप में—नाड़ियाँ, हृदय-कमल, बीज-शक्ति की किरणें—समझाकर स्थूल शब्दमूर्ति, सूक्ष्म प्रकाशमय हृदय-रूप और चिन्तातीत परम पद तक क्रमिक ध्यान कहा गया है। अंत में 9, 25, 26 आदि विस्तृत व्यूह-विन्यास, द्वार-आभूषण नियम और शुभ मर्त्येष्ट्य मण्डल का वर्णन कर दिखाया गया है कि पवित्र रचना से पूजा और अनुभूति दोनों सुव्यवस्थित होते हैं।

50 verses

Adhyaya 30

Chapter 30: मण्डलविधिः (Maṇḍala-vidhi) — Procedure for the Maṇḍala

यह अध्याय मण्डल-लक्षणों की पूर्व चर्चा को समेटकर विधिपरक उपासना-क्रम बताता है। नारद कमल-आधारित मण्डल में पूजा की प्रक्रिया कहते हैं—मध्य पद्म में ब्रह्मा को उनके अङ्गों सहित स्थापित कर पूजन करें, ताकि मण्डल केवल रेखाचित्र नहीं, सजीव देव-क्षेत्र बने। पूर्व दिशा के पद्म-खण्ड में पद्मनाभ विष्णु का नियोजन कर दिशाओं/पंखुड़ियों में देवताओं का क्रमबद्ध विन्यास दिखाया गया है। यह अग्नेय-विद्या का स्वरूप है: पवित्र ज्यामिति, मन्त्र-आधारित पूजा और धर्म-व्यवस्था एक ही विधि में जुड़ते हैं, जिससे भक्ति के साथ सुव्यवस्थित, दोहराने योग्य साधना स्थापित होती है।

1 verses

Adhyaya 31

Chapter 31 — मार्जनविधानं (The Procedure of Mārjana / Purificatory Sprinkling)

भगवान् अग्नि ‘मार्जन’ नामक रक्षाविधान बताते हैं—स्वयं की रक्षा और दूसरों की सुरक्षा हेतु शुद्धिकर छिड़काव/प्रोक्षण। आरम्भ में परमात्मा को नमस्कार तथा विष्णु के अवतारों (वराह, नरसिंह, वामन, त्रिविक्रम, राम, वैकुण्ठ, नर) की वन्दना है, जिससे यह सिद्ध होता है कि सत्य, स्मृति और मन्त्र-शक्ति से संरक्षण होता है। आगे यह विधि दुःख, पाप, शत्रुजन्य अभिचार, विविध रोग (दोष/सन्निपात-भेद), अनेक स्रोतों के विष तथा ग्रह-प्रेत-डाकिनी-वेताल-पिशाच-यक्ष-राक्षस आदि उपद्रवों का शमन-नाश करती है। सुदर्शन और नरसिंह को दिशाओं के रक्षक रूप में आवाहन कर ‘काटो-काटो’ जैसे प्रयोगों से पीड़ा व रोगों का छेदन बताया गया है। अंत में कुश को विष्णु/हरि-स्वरूप और अपामार्जनक को रोग-निवारक ‘अस्त्र’ मानकर, मन्त्र-जप, द्रव्य और भक्ति-तत्त्व से संयुक्त अग्नेय-विद्या की समग्र रक्षात्मक तकनीक प्रतिपादित होती है।

48 verses

Adhyaya 32

Saṃskāra-kathana (Account of the Saṃskāras)

अग्नेय-विद्या के क्रम में भगवान अग्नि इस अध्याय में निर्वाण-दीक्षा आदि दीक्षाओं के संदर्भ में संस्कारों का स्थान बताकर अड़तालीस संस्कारों का विधान करते हैं, जो साधक को ‘दैवी’ जीवन-रीति की ओर उठाते हैं। वे गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म और नामकरण जैसे जीवन-संस्कारों का वर्णन करते हैं, फिर गृह्य और श्रौत क्षेत्र में पाका-यज्ञ, आवर्त श्राद्ध, ऋतु-कर्म तथा हविर्यज्ञ—आधान, अग्निहोत्र, दर्श और पौर्णमास—का विस्तार करते हैं। अंत में सोमयाग-प्रणालियों में अग्निष्टोम और उसके विस्तारों का नाम लेकर, अश्वमेध को ‘हिरण्य’ विशेषणों तथा दया, क्षान्ति, आर्जव, शौच आदि आठ सद्गुणों से जोड़ते हैं, जिससे यज्ञ-शक्ति का संबंध नैतिक परिष्कार से स्थापित होता है। उपसंहार में जप, होम, पूजा और ध्यान को संस्कार-समापन की साधना बताकर भुक्ति-मुक्ति, रोग-रहित और दोष-रहित देवतुल्य जीवन की प्राप्ति कही गई है।

12 verses

Adhyaya 33

Chapter 33 — पवित्रारोहणविधानं (The Procedure for Pavitrārohaṇa / Installing the Sacred Thread or Consecratory Amulet)

अग्निदेव बताते हैं कि पवित्रारोहण हरि की वार्षिक उपासना-ऋतु है—आषाढ़ से कार्तिक तक, प्रतिपदा श्रेष्ठ तिथि; अन्य देवताओं की तिथियाँ अपने क्रम से (जैसे शिव/ब्रह्मा द्वितीया से) मानी जाती हैं। फिर पवित्र-सूत्र के चयन व निर्माण (ब्राह्मणी काता हुआ श्रेष्ठ, अन्यथा शुद्ध किया हुआ), तीन/नौ गुना तंतु, ग्रन्थि-गणना (१२-ग्रन्थि आदि), मूर्ति पर स्थापना-स्थान (घुटने/कटि/नाभि से ऊपर तक) तथा माला-प्रमाण (१०८/१००८, अँगुल-मान) का विधान आता है। वस्त्वपसारण, क्षेत्रपाल व द्वार-पूजन, बलि, और भूत-शुद्धि में मंत्रोद्घात द्वारा तन्मात्रा-तत्त्वों का लय (पृथ्वी→जल→अग्नि→वायु→आकाश), फिर देह-शुद्धि, दिव्य-देह-ध्यान और हृदय-कमल में मानस-याग बताया गया है। अंत में न्यास, कवच/अस्त्र-रक्षा, वैष्णव व्यूह-आवरणों की प्रतिष्ठा, रक्षा-सूत्र बाँधना और व्रत-नियम (उपवास, काम-क्रोध संयम) से लौकिक पूर्णता व आध्यात्मिक फल की प्राप्ति कही गई है।

53 verses

Adhyaya 34

Chapter 34 — होमादिविधिः (The Procedure for Homa and Related Rites)

अग्नि देव क्रमबद्ध होम-विधि बताते हैं—स्थान व साधक की शुद्धि से लेकर अग्नि-प्रतिष्ठा, आहुतियाँ और मोक्ष से जोड़ने वाले ध्यान तक। पहले याग-स्थान को प्रोक्षण-मंत्रों से पवित्र कर वेद-देह रूप मण्डल अंकित किया जाता है; फिर तोरण-पूजा, दिशास्थापन, द्वारपाल-वन्दन और अस्त्र-मंत्र से पुष्प डालकर विघ्न-निवारण होता है। भूत-शुद्धि, न्यास और मुद्राओं के बाद रक्षा-विधान—सरसों का क्षेप, पंचगव्य की तैयारी, अनेक कलशों की स्थापना; लोकपालों हेतु दस कलश तथा ईशान कोण में वर्धनी सहित कुम्भ में हरि और अस्त्र की प्रतिष्ठा। आगे होम-यंत्रणा—श्रुक-श्रुव, परिधि, इध्म आदि का विन्यास, प्रणीता/प्रोक्षणी जल, चरु-पाक, रेखाएँ खींचना, योनि-मुद्रा दिखाना और कुण्ड में अग्नि-स्थापन। कुण्ड-लक्ष्मी (त्रिगुणात्मिका प्रकृति) का अग्नि-मध्य में ध्यान, और अग्नि को प्राणियों व मंत्रों की योनि तथा मुक्ति-दाता कहा गया है। अंत में समिधा व आहुतियों की नियत संख्या (108 सहित) अर्पित कर सप्त-जिह्वा वैष्णव अग्नि को असंख्य सूर्यों-सा तेजस्वी मानकर ध्यान किया जाता है।

41 verses

Adhyaya 35

Chapter 35: पवित्राधिवासनादिविधिः (Method of Consecrating the Pavitra and Related Rites)

भगवान अग्नि वसिष्ठ को पवित्रों के अधिवासन (प्रतिष्ठापन) तथा उससे जुड़े रक्षात्मक और पूर्वतैयारी कर्म सिखाते हैं। क्रम में पहले सम्पात से प्रोक्षण, फिर नरसिंह-मंत्र से मंत्र-शक्ति, और अस्त्र-मंत्र से गोपन/रक्षा होती है। पात्रों को वस्त्र से लपेटकर स्थान पर रखकर बिल्व-मिश्रित जल से छिड़कते हैं और पुनः जप से सशक्त करते हैं। कुम्भ के पास रक्षाविधान, उपकरणों का दिशाओं में न्यास और व्यूह-संबंध (संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध) बताया गया है; भस्म-तिल, गोबर और स्वस्ति-मुद्रा से चिह्नित मिट्टी आदि शुद्धिकारक रखे जाते हैं। हृदय/शिर/शिखा मंत्रों से दर्भ-जल, धूप और दिक्-आहुतियों का विन्यास; पुटिका में चंदन, जल, अक्षत, दही, दूर्वा। घर को त्रिसूत्र से घेरकर सरसों बिखेरते, द्वारों की पूजा करते हैं; विष्णु-कुम्भ से ‘विष्णु-तेज’ उत्पन्न होकर पाप नष्ट करता है। पवित्र को गंध-पुष्प-अक्षत सहित पहले गुरु व परिवार को, फिर मूल-मंत्र से हरि को अर्पित कर प्रार्थना, बलि, कुम्भ-सज्जा, मंडल-तैयारी, रात्रि-जागरण व पुराण-पाठ होता है; कुछ पात्रों हेतु नियम-छूट हैं, पर गंध-पवित्रक कभी न छोड़ा जाए।

18 verses

Adhyaya 36

Pavitrāropaṇa-vidhāna (The Procedure for Installing the Pavitra)

भगवान अग्नि वसिष्ठ को पवित्र (पवित्रक) के आरोपण का वार्षिक प्रायश्चित्त‑शुद्धि‑विधान बताते हैं, जो नित्यपूजा में हुई त्रुटियों का परिहार करता है। प्रातःस्नान, द्वारपाल‑पूजन और एकान्त स्थान में तैयारी के बाद पुराने संस्कार‑द्रव्य व बासी नैवेद्य हटाकर देवता की पुनःप्रतिष्ठा की जाती है। पंचामृत, कषाय‑काढ़े और सुगन्धित जल से स्नापन, हवन तथा नैमित्तिक पूजा होती है; विष्णु‑कुम्भ का आवाहन, हरि से प्रार्थना और हृदादि‑मंत्रों से संस्कार किया जाता है। फिर पवित्र धारण/स्थापित कर देवता को अर्पित किया जाता है तथा द्वारपाल, आसन, गुरु और परिचारकों को भी समर्पण होता है। पूर्णाहुति से प्रायश्चित्त पूर्ण होता है; 108 की गणना और पुष्प‑माल्य की समृद्ध भेंट पूर्णता दर्शाती है। अंत में क्षमा‑याचना, बलि‑दक्षिणा, ब्राह्मण‑सत्कार और पवित्र का विष्णुलोक हेतु विसर्जन; प्रयुक्त पवित्र ब्राह्मण को दान करने से तंतु‑संख्या के अनुसार पुण्य, वंशोन्नति और अंततः मोक्ष मिलता है।

22 verses

Adhyaya 37

Chapter 37 — सर्वदेवपवित्रारोहणविधिः (Procedure for Installing the Pavitra for All Deities)

भगवान अग्नि, विष्णु के पवित्र-आरोपण के बाद, सभी देवताओं के लिए सामान्य ‘सर्वदेव-पवित्रारोपण’ विधि बताते हैं। पवित्र को शुभ-लक्षणयुक्त पावन उपकरण कहा गया है, जिसे शुद्ध द्रव्य, ठीक मंत्र-ध्वनि और संस्कारित अग्नि/होम के साथ जोड़ा जाता है—जहाँ पदार्थ-शुद्धि, ध्वनि-शुद्धि और होम-शक्ति एक साथ फल देती हैं। देवता को जगत् की योनि/स्रोत और सृष्टिकर्ता कहकर परिवार सहित आवाहन किया जाता है और प्रातःकाल पवित्रक अर्पित होता है। इस कर्म का नाम स्पष्टतः ‘पवित्रारोपण’ है; यह वर्षभर की पूजा का फल देने वाला, पूर्व अर्पणों को सील कर पूर्ण करने वाला वार्षिक शुद्धि-लेखा (ऑडिट) है। शिव, सूर्य, वाणेश्वर और शक्तिदेव आदि के लिए विशेष स्वीकार-मंत्र दिए गए हैं। सूत्र (यज्ञोपवीत) का अर्थ नारायण, अनिरुद्ध, संकर्षण, कामदेव और वासुदेव से व्याप्त बताकर रक्षा, समृद्धि, आरोग्य, विद्या, संतान और चारों पुरुषार्थों से जोड़ा गया है। अंत में पवित्रक का दिव्यलोक को प्रेषण/विसर्जन होता है; साथ ही पाठभेदों का उल्लेख अध्याय की परंपरा दर्शाता है।

14 verses

Adhyaya 38

Chapter 38 — देवालयनिर्माणफलं (The Merit of Constructing a Temple)

अग्नि कहते हैं कि देवालय, विशेषकर वासुदेव का मंदिर, स्थापित करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट होते हैं; जो केवल आनंदित होकर सहयोग करे, उसे भी पुण्य मिलता है। निर्माण, संरक्षण, पलस्तर, झाड़ू, ईंट-आपूर्ति और बालक्रीड़ा में रेत का मंदिर बनाना भी धर्मकर्म है, जिससे विष्णुलोक और वंश-उन्नति होती है। कपट या दिखावे से स्वर्गफल नहीं मिलता। एक, तीन, पाँच, आठ और सोलह भागों वाले प्रासाद-रूपों के अनुसार लोक-फल बताए गए हैं; उच्चतर मंदिरों से भुक्ति-मुक्ति और परम वैष्णवायतन से मोक्ष। धन क्षणभंगुर है; उसे मंदिर-निर्माण, द्विजों को दान, कीर्तन और स्तुति में लगाना श्रेष्ठ है। विष्णु सर्वकारण और सर्वव्यापी हैं; उनके धाम की स्थापना पुनर्जन्म-निवृत्ति का कारण है। प्रतिमा-निर्माण व प्रतिष्ठा के फल की तुलना, पदार्थ-भेद और प्रतिष्ठा में अनंत फल कहा गया है। यम की आज्ञा से मंदिर-निर्माता और प्रतिमा-पूजक नरक-ग्रहण से मुक्त बताए गए हैं; अंत में हयग्रीव द्वारा ब्रह्मा व देवों हेतु प्रतिष्ठा-विधि की भूमिका आती है।

50 verses

Adhyaya 39

Chapter 39 — भूपरिग्रहविधानम् (Bhū-parigraha-vidhāna: Procedure for Acquiring and Ritually Securing Land)

हयग्रीव प्रतिष्ठा-विधान के पूर्वांग के रूप में भूमि के विधिपूर्वक ग्रहण और शुद्धि का क्रम बताते हैं। पहले हयशीर्ष-तंत्र आदि तंत्रों का उल्लेख कर पाञ्चरात्र/तांत्रिक परंपरा की प्रामाणिकता स्थापित होती है, फिर कौन प्रतिष्ठा कर सकता है, मिथ्या आचार्य के लक्षण, और बाह्य चिह्नों से नहीं बल्कि तंत्र-निपुणता से सच्चे गुरु की पहचान बताई जाती है। आगे वास्तु-योजना में देवताओं का बस्ती की ओर मुख, तथा दिशानुसार स्थापना—अग्नि, यम, चण्डिका, वरुण, वायु, नाग, कुबेर/गुह, ईशान-क्षेत्र के देव—निर्दिष्ट हैं। अनुपात व सीमा-नियमों के बाद भूमि-शोधन, भूत-बलि, अष्ट दिशाओं में अष्टाक्षर मंत्र से सत्तू का छिड़काव, फिर हल चलाना और गो-चरण से स्थल को स्थिर करने का विधान है। अंत में त्रसरेणु से पद्महस्त तक माप-श्रृंखला देकर शुद्धि को निर्माण-विज्ञान से जोड़ा गया है।

21 verses

Adhyaya 40

Chapter 40 — भूपरिग्रहो नाम (Bhū-parigraha) / अर्घ्यदानविधानम् (Arghya-dāna-vidhāna)

भगवान अग्नि इस अध्याय में भूमि-पूजन को वास्तु-पुरुष की पौराणिक-वैदिक सत्ता से जोड़ते हैं—देवताओं द्वारा वश में किया गया वह पुरुष पृथ्वी पर लिटाया गया, इसलिए स्थल स्वयं पवित्र देह बनता है। साधक 64-पद (मंडल) में पदों व अर्ध-पदों पर देवताओं/शक्तियों का विन्यास कर घी, अक्षत, पुष्प, धान्य, मांस, मधु, दुग्ध-विकार तथा रंगीन द्रव्यों से हवन-बलि देता है, जिससे शुभ शक्तियाँ पुष्ट हों और आसुरी विघ्न, पाप व रोग शांत हों। निर्माण से पहले राक्षस, मातृगण, पिशाच, पितृ और क्षेत्रपाल आदि को बलि देना अनिवार्य बताया गया है, ताकि स्थल-सामंजस्य पूर्ण हो। आगे प्रतिष्ठा-विधि में कुम्भ-स्थापन (महीश्वर/वास्तु-रूप व वर्धनी सहित), ब्रह्मा व दिक्पाल-कुम्भ, पूर्णाहुति, मंडल-प्रदक्षिणा, सूत्र-जल से रेखांकन, खाई/खनन, मध्य-कूप की तैयारी, चतुर्भुज विष्णु को अर्घ्य, तथा श्वेत पुष्प, दक्षिणावर्त शंख, बीज और मिट्टी आदि शुभ-निक्षेप बताए गए हैं। अंत में वास्तु-शास्त्रीय चेतावनी है—जल-स्तर तक खुदाई कर शल्य (छिपी बाधक वस्तु) खोजकर हटाएँ; संकेतों से उसका ज्ञान होता है, और न हटाने पर दीवारों का विकार व गृहस्वामी का कष्ट आदि दोष होते हैं—इस प्रकार आध्यात्मिक शुद्धि और अभियान्त्रिक सावधानी दोनों का समन्वय किया गया है।

31 verses

Adhyaya 41

Chapter 41 — शिलाविन्यासविधानं (The Procedure for Laying the Stones / Foundation Setting)

भगवान् अग्नि शिला-विन्यास और पाद-प्रतिष्ठा का उपदेश देते हैं और बताते हैं कि मंदिर-निर्माण केवल इंजीनियरिंग नहीं, बल्कि संस्कार-रूप अभिषेक-क्रिया है। क्रम से मण्डप की तैयारी व अनुष्ठान-सज्जा, फिर कुम्भ-न्यास और इष्टका-न्यास; द्वार-स्तम्भों के प्रमाण; खुदाई को आंशिक भरकर समतल भूमि पर वास्तु-पूजन। अच्छी तरह पकी ईंटों के अङ्गुल-मान निर्दिष्ट हैं; शिला-आधारित विकल्प में अनेक कुम्भों सहित स्थापना कही गई है। पञ्च-कषाय, सर्वौषधि-जल, गन्ध-तोय से शिलाओं का संधान/स्थिरीकरण तथा ‘आपो हि ष्ठा’, ‘शं नो देवी’, पवमानी, वरुण-सूक्त और श्रीसूक्त का प्रयोग। इसके बाद अग्निहोत्र—आघार, आज्य-भाग, व्याहृति-आहुतियाँ और प्रायश्चित्त-विधान। आचार्य ईंटों व दिशाओं पर देवता-शक्तियों का न्यास कर मध्य में गर्भाधान करते हैं; धातु, रत्न, आयुध आदि सहित गर्भ-कलश स्थापित करते हैं; ताम्र-पद्म-पात्र में पृथ्वी का आवाहन कर कूप-क्रियाएँ पूर्ण करते हैं—गोमूत्र-प्रोक्षण, रात्रि-गर्भाधान और दान। अंत में पीठ-बन्ध के प्रमाण, निर्माणोपरान्त पुनः वास्तु-यज्ञ, मंदिर-संकल्प व निर्माण के पुण्य की प्रशंसा तथा ग्राम-द्वारों के दिक्-नियम बताए गए हैं।

36 verses

Adhyaya 42

Chapter 42 — प्रासादलक्षणकथनं (Prāsāda-lakṣaṇa-kathana: Characteristics of the Temple/Prāsāda)

इस अध्याय में हयग्रीव प्रासाद-निर्माण का सामान्य विधान बताते हैं—वर्गाकार भूमि को सोलह भागों में बाँटकर गर्भन्यास, दीवारों का विभाजन और अनुपातानुसार ऊँचाई निर्धारित की जाती है। फिर प्रतिमा और उसकी पिण्डिका को आधार बनाकर मापन-प्रणाली दी जाती है, गर्भगृह व भित्ति-मान निकाले जाते हैं और शिखर को भित्ति-ऊँचाई का दुगुना कहा गया है। प्रदक्षिणा-पथ की परिधि, रथक-प्रक्षेप, शिखर व शुकनास का सूत्र (डोरी) से विन्यास तथा सिंह-चिह्न, वेदी, कलश आदि अलंकरणों का स्थान बताया गया है। द्वार की रचना मानकीकृत है—ऊँचाई चौड़ाई की दुगुनी—और उदुम्बर आदि शुभ काष्ठ, तथा चण्ड–प्रचण्ड, विश्वक्सेन, श्री आदि द्वारपाल देवताओं का विधान है। प्राकार की ऊँचाई प्रासाद की चौथाई, गोपुर उससे कुछ कम; वराह, नरसिंह, श्रीधर, हयग्रीव, जामदग्न्य आदि की दिशानुसार प्रतिष्ठा से क्षेत्र पवित्र होता है। कुछ पाण्डुलिपियों में भिन्न भिन्न अंश-मानों का उल्लेख कर शास्त्रीय सूक्ष्मता और धर्ममंगलता पर बल दिया गया है।

25 verses