Avatara-lila
AvatarasCreationVishnu

Avatara-lila

Incarnations of the Divine

The opening section narrating the divine incarnations (avataras) of Vishnu, cosmic creation myths, and the foundational theology of the Agni Purana.

Adhyayas in Avatara-lila

Adhyaya 1

Granthaprasthāvanā (Preface): Sāra of Knowledge, Twofold Brahman, and the Purpose of Avatāras

अध्याय 1 मङ्गलाचरण से आरम्भ होकर अग्नि-पुराण को प्रमाण, कल्याणकारी और मोक्षदायक ‘विद्या-सार’ के रूप में स्थापित करता है। नैमिषारण्य में शौनक आदि हरिभक्त ऋषि सूत का स्वागत कर ‘सारों का सार’—सर्वज्ञता देने वाला ज्ञान—माँगते हैं। सूत कहते हैं कि वही सार विष्णु हैं, जो सृष्टिकर्ता और जगत्-नियन्ता हैं; उनका ज्ञान परिपक्व होकर ‘अहं ब्रह्मास्मि’ की अनुभूति कराता है। फिर दो ब्रह्म (शब्द-ब्रह्म और पर-ब्रह्म) तथा दो विद्याएँ (अपरा और परा) का विधान होता है। परम्परा बताई जाती है—सूत ने व्यास से, व्यास ने वसिष्ठ से, और वसिष्ठ ने देव-ऋषि-सभा में अग्नि के उपदेश से यह सार पाया। अग्नि स्वयं को विष्णु और कालाग्नि-रुद्र से अभिन्न बताकर पुराण को ऐसा विद्या-सार कहते हैं जो पाठक-श्रोता को भोग और मोक्ष दोनों देता है। अपरा विद्या में वेद, वेदाङ्ग तथा व्याकरण, मीमांसा, धर्मशास्त्र, तर्क, आयुर्वेद, संगीत, धनुर्वेद, अर्थशास्त्र आदि शास्त्र गिने जाते हैं; परा विद्या वह है जिससे ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। अंत में मत्स्य, कूर्म आदि अवतार-लीला को सृष्टि-चक्र, वंशावलियाँ, मन्वन्तर और राजवंश-इतिहास समझाने का माध्यम बताया गया है—निराकार परमात्मा धर्म, कारण और प्रयोजन सिखाने हेतु रूप धारण करते हैं।

18 verses

Adhyaya 2

मत्स्यावतारवर्णनम् (The Description of the Matsya Incarnation)

अध्याय 2 अवतार-लीला का आरम्भ करता है। वसिष्ठ के अनुरोध पर अग्नि विष्णु के अवतारों का कारण और प्रयोजन बताते हैं—दुष्टों का विनाश और सज्जनों की रक्षा। पूर्व कल्प के अंत में नैमित्तिक प्रलय से जब लोक समुद्र में डूब जाते हैं, तब कृतमाला नदी-तट पर तप और जल-तर्पण में लगे वैवस्वत मनु को एक छोटा मत्स्य रक्षा की याचना करता है। मनु उसे क्रमशः घड़े, सरोवर और समुद्र में रखते हैं, और वह मत्स्य अद्भुत रूप से विशाल होकर नारायण के रूप में प्रकट होता है। मत्स्य मनु को नौका बनाने, बीज व आवश्यक वस्तुएँ एकत्र करने, सप्तर्षियों सहित ब्रह्म-रात्रि पार करने और महान सर्प से नौका को मत्स्य के शृंग में बाँधने का उपदेश देता है। अंत में वेदों की रक्षा को अवतार-कार्य का केंद्र बताकर कूर्म-वराह आदि अगले अवतारों की भूमिका बनती है।

17 verses

Adhyaya 3

Kūrma-avatāra-varṇana (The Description of the Tortoise Incarnation) — Samudra Manthana and the Reordering of Cosmic Prosperity

अग्नि मत्स्यावतार के बाद तुरंत कूर्मावतार की कथा कहते हैं। दुर्वासा के शाप से दुर्बल और श्री (समृद्धि-तेज) से वंचित देव क्षीरसागर में स्थित विष्णु की शरण लेते हैं। विष्णु असुरों से संधि कर समुद्र-मंथन द्वारा अमृत और श्री की पुनःस्थापना का उपाय बताते हैं, पर स्पष्ट करते हैं कि अमरत्व अंततः देवों को ही मिलेगा। मंदराचल मंथन-दंड और वासुकि रस्सी बनते हैं; पर्वत डूबने लगे तो विष्णु कूर्मरूप धारण कर उसे धारण करते हैं। मंथन से हालाहल विष, वारुणी, पारिजात, कौस्तुभ, दिव्य प्राणी और लक्ष्मी प्रकट होकर शुभ व्यवस्था लौटाते हैं। धन्वंतरि अमृत लेकर आते हैं; विष्णु मोहिनी बनकर देवों को अमृत बाँटते हैं, राहु के शिरच्छेद से ग्रहण-कथा और ग्रहण में दान का पुण्य बताया जाता है। अंत में वैष्णव-शैव मोड़ आता है—विष्णु की माया रुद्र को भी मोहित करती है, पर उसे जीतने में केवल शिव समर्थ हैं; देव-विजय और पाठ-फलश्रुति से अध्याय समाप्त होता है।

22 verses

Adhyaya 4

Varāhādy-avatāra-varṇana (Description of Varāha and Other Incarnations)

अग्नि संक्षेप में अवतार-चक्र का वर्णन करते हैं, जहाँ भगवान का अवतरण यज्ञ-व्यवस्था, देव-भाग और पृथ्वी के संतुलन की पुनर्स्थापना हेतु है। पहले हिरण्याक्ष देवों को दबाता है; विष्णु वराह रूप में—यज्ञरूप कहे गए—उसका वध कर धर्म की रक्षा करते हैं। फिर हिरण्यकशिपु यज्ञांश और देवाधिकार छीनता है; विष्णु नरसिंह बनकर देवों को उनके स्थान पर पुनः प्रतिष्ठित करते हैं। पराजित देव शरण लेते हैं; विष्णु वामन बनकर बलि के यज्ञ में आते हैं, जलदान से बंधे दान के अनुसार तीन पग माँगते हैं, त्रिविक्रम होकर तीनों लोक नापते हैं, बलि को सुतल भेजकर इन्द्र को राज्य लौटाते हैं। अंत में परशुराम—जमदग्नि और रेणुका के पुत्र—अहंकारी क्षत्रियों से उत्पन्न पृथ्वी-भार हटाने हेतु कार्त्तवीर्य का वध करते, पिता की हत्या का प्रतिशोध लेते, इक्कीस बार पृथ्वी का शमन कर कश्यप को पृथ्वी दान देते हैं। फलश्रुति में इन अवतारों के श्रवण से स्वर्ग-प्राप्ति और श्रवण-भक्ति का महत्त्व कहा गया है।

20 verses

Adhyaya 5

Śrīrāmāvatāra-varṇanam (Description of the Incarnation of Śrī Rāma)

अग्नि बताते हैं कि नारद ने जैसा रामायण वाल्मीकि को सुनाया था, उसी का यह श्रद्धापूर्ण पुनर्कथन है, जो शास्त्ररूप साधन होकर भुक्ति और मुक्ति दोनों देता है। नारद सूर्यवंश की संक्षिप्त वंशावली कहते हैं—ब्रह्मा से मरीचि, कश्यप, सूर्य, वैवस्वत मनु, इक्ष्वाकु, फिर ककुत्स्थ, रघु, अज और दशरथ—और इसी राजधर्म-परंपरा में श्रीरामावतार को स्थापित करते हैं। रावणादि के विनाश हेतु हरि चार रूपों में प्रकट होते हैं; ऋष्यशृंग द्वारा अभिमंत्रित पायस के वितरण से राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म होता है। विश्वामित्र के आग्रह पर वे यज्ञ-विघ्नों का नाश करते हैं—ताड़का-वध, मारीच का पराभव और सुबाहु-वध। फिर मिथिला में जनक के अनुष्ठान में राम शिवधनुष को चढ़ाकर तोड़ते हैं, सीता का पाणिग्रहण करते हैं और भ्राता भी जनक-कुल में विवाह करते हैं। लौटते समय राम जामदग्न्य परशुराम को शांत कर धर्माधीन राजशक्ति का आदर्श पूर्ण करते हैं।

14 verses

Adhyaya 6

Śrīrāmāvatāravarṇanam (Description of Śrī Rāma’s Incarnation) — Ayodhyā Abhiṣeka, Vanavāsa, Daśaratha’s Death, Bharata’s Regency

इस अध्याय में श्रीराम की अवतार-लीला को राजधर्म, सत्य और व्रतबद्ध राजसत्ता की शिक्षा के रूप में बताया गया है। भरत के जाने के बाद दशरथ राम के युवराज-अभिषेक की घोषणा करते हैं और वसिष्ठ तथा मंत्रियों को क्रम से नियुक्त कर रात्रि-भर संयम व नियम-पालन का आदेश देते हैं। मंथरा के उकसावे से कैकेयी को दो वरदान स्मरण होते हैं और अभिषेक की तैयारी राजनीतिक संकट बन जाती है—राम को चौदह वर्ष का वनवास तथा भरत का तत्काल अभिषेक। सत्य-पाश से बँधे दशरथ प्रतिज्ञा के भार से टूट जाते हैं; राम बिना विद्रोह वनवास स्वीकार कर पूजा करते हैं, कौसल्या को निवेदन करते हैं, ब्राह्मणों व दीनों को दान देते हैं और सीता व लक्ष्मण सहित प्रस्थान करते हैं। तमसा, शृंगवेरपुर में गुह, प्रयाग में भारद्वाज और चित्रकूट की यात्रा पवित्र भूगोल में धर्ममय त्याग दिखाती है; काक-प्रसंग से रक्षार्थ अस्त्र-विद्या का संकेत मिलता है। दशरथ यज्ञदत्त-प्रसंग से जुड़े शाप का स्वीकार कर शोक से देह त्यागते हैं। भरत लौटकर अधर्म का कलंक अस्वीकार करते हैं, राम को खोजते हैं और नन्दिग्राम में राम की पादुकाएँ स्थापित कर प्रतिनिधि-राज्य चलाते हैं—आदर्श निष्ठा का प्रतीक।

49 verses

Adhyaya 7

Chapter 7 — रामायणवर्णनं (Description of the Rāmāyaṇa): Śūrpaṇakhā, Khara’s Defeat, and Sītā-haraṇa Prelude

इस अध्याय में अग्निपुराण की अवतार-लीला के अंतर्गत अरण्यकाण्ड की मुख्य घटनाएँ धर्म-केन्द्रित रूप में संक्षेपित हैं। राम वसिष्ठ, अत्रि-अनसूया, शरभंग और सुतीक्ष्ण ऋषियों का सत्कार करते हैं; अगस्त्य की कृपा से दिव्य अस्त्र पाकर दण्डकारण्य में प्रवेश करते हैं—तप और सदुपदेश से संचालित क्षात्रधर्म का संकेत। पंचवटी में शूर्पणखा की कामना और आक्रामकता के कारण राम की आज्ञा से लक्ष्मण उसका नासिका-कर्णच्छेदन करते हैं; इससे खऱ का प्रतिशोधी अभियान उठता है, जिसे राम संहार कर देते हैं। शूर्पणखा रावण को सीताहरण हेतु उकसाती है; रावण मारीच को स्वर्णमृग बनाकर राम को दूर ले जाता है, मारीच की मरण-ध्वनि से सीता लक्ष्मण को भेजती है। तब रावण जटायु का वध कर सीता को लंका की अशोक वाटिका में ले जाता है। राम जटायु का दाह-संस्कार कर कबन्ध का वध करते हैं और सुग्रीव से मैत्री की दिशा पाते हैं—धर्मपरीक्षा, नीति और अवतार-कार्य का संगम।

22 verses

Adhyaya 8

Śrīrāmāvatāra-kathana (Account of the Rāma Incarnation) — Kiṣkindhā Alliance and the Search for Sītā

इस अध्याय में किष्किन्धा प्रसंग के द्वारा श्रीराम की अवतार-लीला आगे बढ़ती है। शोकाकुल राम पम्पा पहुँचकर हनुमान के मार्गदर्शन से सुग्रीव से मित्रता करते हैं। विश्वास हेतु वे एक बाण से सात ताल-वृक्षों को भेदते हैं और दुन्दुभि के शव को दूर फेंकते हैं; फिर वालि का वध कर भ्रातृ-वैर शांत करके सुग्रीव को राज्य दिलाते हैं। सुग्रीव के विलम्ब पर राम माल्यवत पर्वत पर चातुर्मास्य करते हैं; लक्ष्मण की फटकार से सुग्रीव पश्चात्ताप कर समय-नियम सहित खोज-दल भेजता है और दक्षिण दिशा के लिए हनुमान को राम की मुद्रिका देता है। दक्षिण दल के निराश होने पर सम्पाति लंका की अशोक-वाटिका में सीता का पता बताता है, जिससे आगे की योजना का निर्णायक संकेत मिलता है।

16 verses

Adhyaya 9

Chapter 9 — श्रीरामावतारकथनम् (Śrī Rāmāvatāra-kathanam) | Hanumān’s Ocean-Crossing, Sītā-Darśana, and the Setu Plan

इस अध्याय में रामायण-खंड की अवतार-लीला आगे बढ़ती है और हनुमान को श्रीराम के धर्म-कार्य का प्रमुख साधन बताया गया है। सम्पाती के परामर्श के बाद वानर-सेना के सामने समुद्र पार करने की समस्या आती है; दल की रक्षा और रामकार्य की सिद्धि हेतु केवल हनुमान ही महासागर को लाँघते हैं। मार्ग में वे मैनाक के आतिथ्य-प्रस्ताव और सिंहिका के आक्रमण जैसे विघ्नों को जीतते हैं, लंका के प्रासादों आदि का निरीक्षण कर अशोक-वाटिका में सीता को पाते हैं। संवाद में पहचान, निष्ठा और प्रमाण स्थापित होते हैं—राम की मुद्रिका देकर वे प्रत्यभिज्ञान कराते हैं, और सीता आभूषण व संदेश देकर कहती हैं कि उद्धार स्वयं राम ही करें। फिर हनुमान युक्त बल अपनाकर वाटिका का विध्वंस करते हैं, स्वयं को राम-दूत घोषित कर रावण को निश्चित पराजय की चेतावनी देते हैं। लंका-दहन के बाद सीता को आश्वस्त कर वे लौटकर अमृत-तुल्य समाचार से राम का शोक शांत करते हैं। अंत में विभीषण की शरणागति, उसका अभिषेक, तथा समुद्र के उपदेश से नल द्वारा सेतु-निर्माण की योजना बताई गई है, जिससे धर्मयुद्ध आगे बढ़ता है।

31 verses

Adhyaya 10

Chapter 10 — श्रीरामावतारवर्णनम् (Description of the Incarnation-Deeds of Śrī Rāma)

इस अध्याय में अग्नि पुराण की रामावतार-लीला के अंतर्गत लंका-युद्ध का निर्णायक प्रसंग संक्षेप में धर्म और नीति के क्रम से कहा गया है। नारद बताते हैं कि राम के दूत अंगद ने रावण को अंतिम संदेश दिया—सीता को लौटा दे, अन्यथा धर्मयुक्त विनाश होगा—यही युद्ध की नैतिक शर्त है। फिर वानर और राक्षस वीरों की सूची, सेनानायकों की संगठित युद्ध-व्यवस्था (धनुर्वेद-संदर्भ) और भीषण संग्राम का वर्णन आता है। प्रमुख मोड़ हैं—सेनापतियों का वध, इंद्रजीत की माया और बंधनास्त्र, गरुड़-संबंधी मुक्ति, तथा हनुमान द्वारा औषधि-पर्वत लाकर उपचार। अंत में राम पैतामहास्त्र से विजय पाते हैं; विभीषण द्वारा अंत्येष्टि, सीता की अग्नि-शुद्धि, इंद्र के अमृत से वानरों का पुनर्जीवन, राज्याभिषेक की व्यवस्था और रामराज्य के आदर्श—समृद्धि, समय पर मृत्यु, दुष्टों का अनुशासित दंड—राजधर्म रूप में प्रतिपादित हैं।

34 verses

Adhyaya 11

Śrīrāmāvatāra-varṇana (Description of the Incarnation of Sri Rama)

इस अध्याय में युद्धकाण्ड के बाद श्रीराम के धर्ममय राज्य और उसके फल का संक्षिप्त वर्णन है। नारद अगस्त्य आदि ऋषियों सहित अयोध्या में राम से मिलकर इन्द्रजित के वध से चिह्नित दिव्य विजय की स्तुति करते हैं। फिर पुलस्त्य से विश्रवा, कुबेर का जन्म, ब्रह्मा के वर से रावण का उत्कर्ष, इन्द्रजित की पहचान और देवताओं की रक्षा हेतु लक्ष्मण द्वारा उसका वध—यह राक्षस वंश का संक्षेप आता है। ऋषियों के प्रस्थान के बाद शासन-व्यवस्था और सीमाओं का शमन बताया गया है: देवताओं के आग्रह पर शत्रुघ्न लवण का वध करने भेजे जाते हैं; भरत शैलूष से जुड़े विशाल दुष्टबल का नाश कर तक्ष और पुष्कर को प्रदेशाधिपति बनाते हैं—दुष्ट-निग्रह के बाद शिष्ट-रक्षा ही राजधर्म है। वाल्मीकि-आश्रम में कुश-लव का जन्म और आगे चलकर उनकी पहचान का उल्लेख है। अभिषिक्त राजत्व के साथ ‘मैं ब्रह्म हूँ’ के दीर्घ चिंतन द्वारा मोक्ष-मार्ग भी जोड़ा गया है। अंत में राम का यज्ञमय शासन, सबके साथ स्वर्गारोहण, और अग्नि का कथन कि नारद के वृत्तांत से वाल्मीकि ने रामायण रची; उसका श्रवण स्वर्ग-प्राप्ति कराता है।

13 verses

Adhyaya 12

Chapter 12 — श्रीहरिवंशवर्णनं (Śrī-Harivaṃśa-varṇana) | The Description of the Sacred Harivaṃśa

अग्नि विष्णु के नाभि-कमल से उत्पन्न वंश-परंपरा का हरिवंश-क्रम बताता है—ब्रह्मा→अत्रि→सोम→पुरूरवा→आयु→नहुष→ययाति—और शाखाओं के विस्तार से यदुवंश में वसुदेव को प्रधान ठहराता है। फिर कृष्णावतार-लीला को क्रमबद्ध रूप में संक्षेप करता है—गर्भ-परिवर्तन (बलराम सहित), मध्यरात्रि में कृष्ण का प्राकट्य, यशोदा के यहाँ शिशु-विनिमय और कंस की क्रूरता। आकाशवाणी-रूपा देवी कंस-वध की भविष्यवाणी करती है; दुर्गा के नामों से स्तुति और त्रिसंध्या-पाठ का फल कहा जाता है। व्रज-लीलाएँ—पूतना-वध, यमलार्जुन-उद्धार, शकट-भंजन, कालिय-दमन, धेनुक-केशी-अरिष्ट-वध, गोवर्धन-धारण—के बाद मथुरा प्रसंग आता है: कुवलयापीड़-निग्रह, चाणूर-मुष्टिक-मर्दन और कंस-वध। आगे जरासंध के आक्रमण, द्वारका-स्थापना, नरकासुर-वध, पारिजात-हरण, तथा प्रद्युम्न–अनिरुद्ध–उषा कथा में हरि–शंकर संग्राम और अभेद-तत्त्व का प्रतिपादन है। अंत में यदुवंश-वृद्धि और हरिवंश-पाठ से अभीष्ट-सिद्धि व हरि-प्राप्ति का वचन दिया गया है।

55 verses

Adhyaya 13

Chapter 13 — कुरुपाण्डवोत्पत्त्यादिकथनं (Narration of the Origin of the Kurus and the Pāṇḍavas, and Related Matters)

अग्नि भारत-कथा को कृष्ण-माहात्म्य से युक्त बताते हैं—महाभारत विष्णु की योजना है जिससे पृथ्वी का भार मनुष्यों, विशेषतः पाण्डवों, के द्वारा उतरे। विष्णु→ब्रह्मा→अत्रि→सोम→बुध→पुरूरवा से लेकर ययाति, पुरु, भरत और कुरु तक वंश-परंपरा संक्षेप में कही गई है। फिर शान्तनु-वंश: भीष्म का संरक्षण, चित्राङ्गद का निधन, काशी की राजकन्याएँ, विचित्रवीर्य की मृत्यु, व्यास के नियोग से धृतराष्ट्र और पाण्डु का जन्म; धृतराष्ट्र से दुर्योधन आदि कौरव। पाण्डु के शाप से देव-जन्य पाण्डव, कर्ण का जन्म और दुर्योधन से उसकी मैत्री वैर को बढ़ाती है। आगे लाक्षागृह-षड्यंत्र, एकचक्रा में वक-वध, द्रौपदी-स्वयंवर, गाण्डीव व अग्नि का रथ, खाण्डव-दाह, राजसूय, द्यूत से वनवास, विराट में अज्ञातवास (कुछ पाठ-भेद सहित), पहचान-प्रकटन, अभिमन्यु-विवाह, युद्ध-उद्यम, कृष्ण-दूतत्व, दुर्योधन का अस्वीकार और कृष्ण का विश्वरूप—युद्ध की नैतिक व दैवी अनिवार्यता स्थापित करते हैं।

29 verses

Adhyaya 14

कुरुपाण्डवसङ्ग्रामवर्णनम् (Description of the War between the Kurus and the Pāṇḍavas)

अग्नि कुरुक्षेत्र के महाभारत-युद्ध का संक्षिप्त वर्णन करके धर्म, अनित्यता और शासन-नीति का सार प्रकट करते हैं। भीष्म-द्रोण जैसे पूज्य जनों को देखकर अर्जुन शोकाकुल होता है; तब श्रीकृष्ण देह की नश्वरता और आत्मा की अविनाशिता समझाकर, जय-पराजय में समत्व रखते हुए राजधर्म/क्षात्रधर्म की रक्षा का उपदेश देते हैं। फिर सेनापति-परिवर्तन (भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य) और निर्णायक घटनाएँ आती हैं—भीष्म का शरशय्या पर पतन और उत्तरायण की प्रतीक्षा में विष्णु-चिन्तन; “अश्वत्थामा मारा गया” समाचार से द्रोण का शस्त्र-त्याग; अर्जुन द्वारा कर्ण-वध; युधिष्ठिर के हाथों शल्य-वध; तथा भीम-दुर्योधन का अंतिम गदा-युद्ध। इसके बाद अश्वत्थामा की रात्रि-हत्या में पाञ्चाल और द्रौपदी के पुत्र मारे जाते हैं; अर्जुन उसे रोककर उसका मणि ले लेता है। हरि उत्तराः के गर्भ की रक्षा कर परीक्षित की वंश-परम्परा सुनिश्चित करते हैं। बचे हुए योद्धाओं की गणना, अन्त्येष्टि, भीष्म द्वारा शान्ति-दायक धर्मोपदेश (राजधर्म, मोक्षधर्म, दान), युधिष्ठिर का अश्वमेध, परीक्षित की स्थापना और अंत में स्वर्गारोहण का वर्णन है।

27 verses

Adhyaya 15

पाण्डवचरितवर्णनम् (The Account of the Pāṇḍavas)

अग्निदेव अवतार-लीला के प्रसंग में महाभारत के युद्धोत्तर वृत्तान्त को धर्मप्रधान रूप में संक्षेप से कहते हैं। युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के बाद धृतराष्ट्र, गांधारी और पृथा वन को प्रस्थान करते हैं, जिससे राजधर्म से वैराग्य की ओर संक्रमण दिखता है। विदुर अग्नि-संबंधी अंत द्वारा स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। विष्णु का प्रयोजन बताया गया है—पाण्डवों को निमित्त बनाकर पृथ्वी का भारहरण तथा शाप-व्याज से मौषल में यादवों का विनाश। प्रभास में हरि देह त्यागते हैं और बाद में द्वारका समुद्र में डूब जाती है, अनित्यता का बोध कराती हुई। अर्जुन श्राद्ध करता है, पर कृष्ण-वियोग से उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है; व्यास उसे सांत्वना देकर हस्तिनापुर भेजते हैं। युधिष्ठिर परीक्षित को गद्दी पर बैठाकर भाइयों और द्रौपदी सहित हरिनाम जपते हुए महाप्रस्थान करते हैं; मार्ग में साथी गिरते जाते हैं और अंत में युधिष्ठिर इन्द्र के रथ से स्वर्गारोहण करते हैं। फलश्रुति में पाठ से स्वर्ग-प्राप्ति कही गई है।

14 verses

Adhyaya 16

Chapter 16 — बुद्धाद्यवतारकथनम् (Narration of Buddha and Other Incarnations)

अग्नि सोलहवें अध्याय में बुद्धावतार की कथा को श्रवण‑पाठ से फलदायी बताकर आरम्भ करते हैं। देव‑असुर संग्राम में देव पराजित होकर भगवान की शरण लेते हैं; विष्णु माया‑मोह रूप धारण कर शुद्धोदन के पुत्र बनते हैं और दैत्यों को वेदधर्म से विमुख कर देते हैं। इससे वेद‑विहीन मत, आर्हत आदि धाराएँ और पाषण्ड प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होकर नरकगामी कर्मों की ओर ले जाती हैं। फिर कलियुग का निदान—धर्म‑पतन, म्लेच्छ‑वेषी लुटेरे राजा, तथा वेद‑शाखाओं की संख्या/परम्परा में विकार—वर्णित है। अंत में याज्ञवल्क्य को पुरोहित बनाकर शस्त्रधारी कल्कि म्लेच्छों का संहार कर वर्णाश्रम मर्यादा पुनः स्थापित करते हैं और कृतयुग की वापसी कराते हैं। उपसंहार में कहा है कि यह क्रम कल्प‑मन्वन्तरों में होता रहता है, अवतार अनगिनत हैं; दशावतार का श्रवण‑पाठ स्वर्गदायक है, और हरि ही धर्म‑अधर्म के नियन्ता तथा सृष्टि‑प्रलय के कारण हैं।

13 verses