Adhyaya 317
Mantra-shastraAdhyaya 31721 Verses

Adhyaya 317

सकलादिमन्त्रोद्धारः (Sakalādi-mantra-uddhāra) — Chapter Colophon/Transition

यह खंड मुख्यतः उपसंहार-रूप है। यह ‘सकलादि-मन्त्रोद्धार’ नामक पूर्व अध्याय की समाप्ति का संकेत देता है और अग्नि-पुराण के मन्त्र-शास्त्र क्रम में मन्त्र-उद्धार तथा वर्ण/ध्वनि और विधि-विश्लेषण को एक औपचारिक शास्त्रीय अनुशासन के रूप में स्थापित करता है। आगे यह गण-पूजा की ओर संक्रमण कराता है, जहाँ मन्त्र-प्रयोग से रक्षात्मक उपासना और विघ्न-निवारण किया जाता है। व्यापक पुराणीय शिक्षण-परिप्रेक्ष्य में शुद्ध मन्त्र-व्यवहार को धर्मकर्म और सिद्धि-साधना हेतु आवश्यक, पर अंततः सदाचार, साधना और शुद्ध अभिप्राय के अधीन बताया गया है।

Shlokas

Verse 1

इत्य् आग्नेये महापुराणे सकलादिमन्त्रोद्धारो नाम षोडशाधिकत्रिशततमो ऽध्यायः अथ सप्तदशाधिकत्रिशततमो ऽध्यायः गणपूजा इश्वर उवाच विश्वरूपं समुद्धृत्य तेजस्युपरि संस्थितम् नरसिंहं ततो ऽधस्तात् कृतान्तं तदधो न्यसेत्

इस प्रकार अग्नि-महापुराण में ‘सकलादि-मंत्रोद्धार’ नामक तीन सौ सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब तीन सौ अठारहवाँ अध्याय ‘गण-पूजा’ आरम्भ होता है। ईश्वर बोले—‘विश्व-रूप को उठाकर/स्थापित करके तेज के ऊपर स्थापित करो; फिर उसके नीचे नरसिंह का न्यास करो; और उसके भी नीचे कृतान्त (यम/मृत्यु) को स्थापित करो।’

Verse 2

प्रणवं तदधःकृत्वा ऊहकं तदधः पुनः अंशुमान् विश्वमूर्तिस्थं कण्ठोष्ठप्रणवादिकम्

उस (पूर्वस्थापित तत्त्व) के नीचे प्रणव ‘ॐ’ को स्थापित करके, उसके नीचे फिर ‘ऊहक’ को रखे। कण्ठ और ओष्ठ में स्थित प्रणव आदि वर्ण-न्यास सहित, विश्वरूप में स्थित अंशुमान का ध्यान करे।

Verse 3

नमो ऽन्तः स्याच्चतुर्वर्णो विश्वरूपञ्च कारणम् सूर्यमात्राहतं ब्रह्मण्यङ्गानीह तु पूर्ववत्

मन्त्र का अंत ‘नमः’ से हो। वह चार वर्णों/मात्राओं वाला, विश्वरूप और कारणतत्त्व है। सूर्य-मात्रा से अभिहत/विशिष्ट करके, यहाँ ब्रह्म के अंगों का न्यास पूर्ववत् करे।

Verse 4

उद्धरेत् प्रणवं पूर्वं प्रस्फुरद्वयमुच्चरेत् घोरघोरतरं पश्चात् तत्र रूपमतः स्मरेत्

पहले प्रणव ‘ॐ’ का उच्चारण करे। फिर ‘प्रस्फुरत्’ का द्वय उच्चारे। उसके बाद ‘घोर-घोरतर’ का जप करे; और वहाँ उसके अनुरूप रूप का ध्यान करे।

Verse 5

चटशब्दं द्विधा कृत्वा ततः प्रवरमुच्चरेत् दहेति च द्विधा कार्यं वमेति च द्विधा गतम्

‘चट’ शब्द को दो भागों में करके, फिर ‘प्रवर’ का उच्चारण करे। इसी प्रकार ‘दहे’ को भी द्विविध करना है, और ‘वमे’ भी द्विविध रूप से ग्रहण किया गया है।

Verse 6

घातयेति द्विधाकृत्य हूंफडन्तं समुच्चरेत् अघोरास्त्रन्तु नेत्रं स्याद् गायत्री चोच्यते ऽधुना

‘घातय’ को दो भागों में करके, ‘हूँ फट्’ से अंतयुक्त उसका उच्चारण करे। यही अघोरास्त्र है; यह ‘नेत्र’ (रक्षक-निग्रह) मन्त्र होता है। अब गायत्री भी कही जा रही है।

Verse 7

तन्महेशाय विद्महे महादेवाय धीमहि अप्_३१७*१अब्तत्रः शिवः प्रचोदयात् गायत्री सर्वसाधनी अप्_३१७*१च्द्यात्रायां विजयादौ च यजेत् पूर्वङ्गणं श्रिये तुर्यांशे तु पुरा क्षेत्रे समन्तादर्कभाजिते

हम महेश को जानते हैं, महादेव का ध्यान करते हैं—शिव हमारी बुद्धि को प्रेरित करें। यह गायत्री सर्वसाधनी है। यात्रा के आरम्भ और विजय-याग के प्रारम्भ में, समृद्धि हेतु प्रथम प्रांगण में पूर्वाङ्ग-पूजा करे; और चतुर्थ भाग में, सूर्य-प्रकाश से सर्वतः दीप्त प्राचीन क्षेत्र/देवालय-परिसर में यजन करे।

Verse 8

चतुष्पदं त्रिकोणे तु त्रिदलं कमलं लिखेत् सर्वत इति ख द्विधाकृतमिति ख तत्पृष्ठे पदिकाविथीभागि त्रिदलमश्वयुक्

त्रिकोण के भीतर चतुष्पद (चार-आधार) आकृति बनाए, फिर त्रिदल कमल अंकित करे। ‘सर्वतः’ के लिए ‘ख’ अक्षर चिह्नित करे और पुनः ‘द्विधाकृत’ के लिए भी ‘ख’ लिखे। उसके पीछे, पदिका-वीथी (छोटे चरणों की पगडंडी) से विभक्त त्रिदल आकृति, अश्वयुग (घोड़े के जुए) के चिह्न से संयुक्त बनाये।

Verse 9

वसुदेवसुतैः साब्जैस्तिदलैः पादपट्टिका तदूर्ध्वे वेदिका देया भगमात्रप्रमाणतः

पादपट्टिका वसुदेव-पुत्रों के चिह्नों सहित तथा त्रिदल कमल (साब्ज) के साथ बनानी चाहिए। उसके ऊपर, ‘भग’ मात्र के प्रमाण के अनुसार वेदिका (वेदी-मंच) देनी चाहिए।

Verse 10

द्वारं पद्ममितं कोष्ठादुपद्वारं विवर्णितम् द्वारोपद्वाररचितं मण्डलं विघ्नसूदनम्

द्वार का माप ‘पद्म’ प्रमाण से करना चाहिए; कोष्ठ (कक्ष) से उपद्वार का विधान बताया गया है। द्वार और उपद्वार की रचना से बना मण्डल ‘विघ्नसूदन’—विघ्न-नाशक—कहलाता है।

Verse 11

आरक्तं कमलं मध्ये वाह्यपद्मानि तद्वहिः सिता तु वीथिका कार्या द्वाराणि तु यथेच्छया

मध्य में रक्ताभ (आरक्त) कमल बनाए; उसके बाहर बाह्य पद्म (बाहरी कमल-पत्र) विन्यस्त करे। श्वेत वीथिका (मार्ग) बनानी चाहिए, और द्वार अपनी इच्छा के अनुसार स्थापित किए जा सकते हैं।

Verse 12

कर्णिका पीतवर्णा स्यात् केशराणि तथा पुनः मण्डलं विघ्नमर्दाख्यं मध्ये गणपतिं यजेत्

कर्णिका पीले वर्ण की हो और केसर भी पुनः पीले हों। यह मण्डल ‘विघ्नमर्द’ कहलाता है; इसके मध्य में गणपति की पूजा करनी चाहिए।

Verse 13

नामाद्यं सवराकं स्याद्देवाच्छक्रसमन्वितम् शिरो हतं तत्पुरुषेण ओमाद्यञ्च नमो ऽन्तकम्

मन्त्र ‘न’ अक्षर से, स्वर सहित, आरम्भ हो। वह ‘देव’ शब्द से संयुक्त और ‘शक्र’ तत्त्व/अक्षर से समन्वित हो। ‘शिरः’ भाग का न्यास तत्पुरुष-मन्त्र से किया जाए; वह ‘ॐ’ से आरम्भ होकर ‘नमः’ पर समाप्त हो।

Verse 14

गजाख्यं गजशीर्षञ्च गाङ्गेयं गणनायकम् त्रिरावर्तङ्गगनगङ्गोपतिं पूर्वपङ्क्तिगम्

उसे ‘गजाख्य’ और ‘गजशीर्ष’, ‘गाङ्गेय’ तथा ‘गणनायक’ के रूप में; और ‘त्रिरावर्त’, ‘गगनगङ्गोपति’ तथा ‘पूर्वपङ्क्तिग’ नामों से भी आवाहन करना चाहिए।

Verse 15

विचित्रांशं महाकायं लम्बोष्ठं लम्बकर्णकम् लम्बोदरं महाभागं विकृतं पार्वतीप्रियम्

उसका ध्यान विचित्र रूप वाले, महाकाय, लम्बे ओष्ठ और लम्बे कानों वाले; लम्बोदर, महाभाग, विलक्षण आकृति वाले तथा पार्वती-प्रिय के रूप में करना चाहिए।

Verse 16

भयावहञ्च भद्रञ्च भगणं भयसूदनम् द्वादशैते दशपङ्क्तौ देवत्रासञ्च पश्चिमे

‘भयावह’ और ‘भद्र’, ‘भगण’ और ‘भयसूदन’—ये बारह नाम दस की पंक्ति में विन्यस्त किए जाएँ; और ‘देवत्रास’ को पश्चिम दिशा में स्थापित किया जाए।

Verse 17

महानादम्भास्वरञ्च विघ्नराजं गणाधिपम् उद्भटस्वानभश् चण्डौ महाशुण्डञ्च भीमकम्

मैं गणपति की स्तुति करता हूँ—जिनका नाद महान गर्जना-सा है, जो विघ्नों के राजा और गणों के अधिपति हैं; जिनकी वाणी आकाश को भर देने वाली, उग्र, महाशुण्ड और भीषण है।

Verse 18

मन्मथं मधुसूदञ्च सुन्दरं भावपुष्टकम् सौम्ये ब्रह्मेश्वरं ब्राह्मं मनोवृत्तिञ्च संलयम्

इनका ध्यान और जप करना चाहिए—मन्मथ, मधुसूदन, सुन्दर, भाव-पुष्टक (भक्ति-पोषक), सौम्य, ब्रह्मेश्वर, ब्राह्म (परब्रह्म-स्वरूप), मनोवृत्ति तथा संलय (लय/समाधि)।

Verse 19

लयं दूत्यप्रियं लौल्यं विकर्णं वत्सलं तथा कृतान्तं कालदडण्च यजेत् कुम्भञ्च पूर्ववत्

लय, दूत्यप्रिय, लौल्य, विकर्ण और वत्सल—इनकी तथा कृतान्त और कालदण्ड की भी पूजा करे; और कुम्भ (कलश) की पूजा भी पूर्ववत् विधि से करे।

Verse 20

श्रयुतञ्च जपेन्मन्त्रं होमयेत्तु दशांशतः शेषाणान्तु दशाहुत्या जपाद्धोमन्तु कारयेत्

मन्त्र का जप एक लाख (श्रयुत) तक करे, और फिर जप का दशांश लेकर होम करे। जो शेष रह जाए, उसे दस आहुतियों से पूर्ण करे; इस प्रकार जप के अनुसार होम कराए।

Verse 21

पूर्णां दत्वाभिषेकन्तु कुर्यात्सर्वन्तु सिध्यति भूगो ऽश्वगजवस्त्राद्यैर् गुरुपूजाञ्चरेन्नरः

पूर्णा (पूर्ण-दक्षिणा/पूर्णाहुति) देकर फिर अभिषेक करे; तब निश्चय ही सब सिद्ध होता है। मनुष्य भूमि, गौ, अश्व, गज, वस्त्र आदि दानों से गुरु-पूजा का आचरण करे।

Frequently Asked Questions

The chapter is essentially a colophon: it emphasizes the formal closure of a mantra-derivation unit (uddhāra), highlighting that mantra parsing and extraction are treated as a codified śāstric procedure.

By framing mantra-derivation as disciplined knowledge, it reinforces that correct method (vidhi) and textual fidelity support purity of practice, preparing the practitioner for applied worship aimed at removing obstacles and stabilizing sādhana.