Yoga & Brahma-vidya
YogaBrahmanMeditationLiberation

Yoga & Brahma-vidya

Yoga & the Knowledge of Brahman

The culminating section on yoga practices, meditation, Brahma-vidya (knowledge of the Absolute), and the path to final liberation.

Adhyayas in Yoga & Brahma-vidya

Adhyaya 368

Explanation of the Final Dissolution (Ātyantika Laya) and the Arising of Hiraṇyagarbha — Subtle Body, Post-Death Transit, Rebirth, and Embodied Constituents

भगवान् अग्नि बताते हैं कि ‘आत्यन्तिक लय’ केवल ब्रह्माण्डीय प्रलय नहीं, बल्कि ज्ञान से बन्धन का बुझ जाना है—अन्तःक्लेशों की पहचान से वैराग्य उत्पन्न होकर मुक्ति का मार्ग खुलता है। फिर वे जीव की मरणोत्तर यात्रा बताते हैं: स्थूल भोग-देह का त्याग, आत्यवाहिक (गमन) देह धारण, यममार्ग पर ले जाना, चित्रगुप्त द्वारा धर्म-अधर्म का निर्णय, और सपिण्डीकरण तक श्राद्ध/पिण्ड-दान पर आश्रित रहना जिससे पितृ-क्रम में प्रवेश होता है। शुभ-अशुभ भोग-देहों से कर्मफल-भोग, स्वर्ग से अवतरण और नरक से छूटकर नीची योनियों में जन्म, गर्भ का मासानुसार विकास, गर्भ-पीड़ा और जन्म-आघात का वर्णन है। अंत में देहगत ब्रह्माण्ड-रचना: आकाश-अग्नि-जल-पृथ्वी से इन्द्रियाँ व धातुएँ, गुणों (तमस/रजस/सत्त्व) से मनोवृत्ति व आचरण, तथा आयुर्वेद के दोष-रस-ओज और त्वचा-कलाओं द्वारा जीवन-शक्ति की व्याख्या—योग व ब्रह्मविद्या के सहायक ज्ञान के रूप में।

46 verses

Adhyaya 369

Chapter 369 — शरीरावयवाः (The Limbs/Organs and Constituents of the Body)

भगवान् अग्नि मनुष्य-शरीर को चिकित्सा-ज्ञान और आध्यात्मिक विवेक के लिए सुव्यवस्थित क्षेत्र बताकर उसका वर्णन करते हैं। वे पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ—कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक—और उनके विषय—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध—तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ—गुदा, उपस्थ, हाथ, पाँव, वाणी—और उनके कार्य गिनाते हैं। मन को इन्द्रियों, विषयों और पंचमहाभूतों का अधिपति कहा गया है; फिर सांख्य-क्रम से आत्मा, अव्यक्त प्रकृति, चौबीस तत्त्व और परम पुरुष का निरूपण होता है—मछली और जल की तरह संयुक्त होकर भी भिन्न। आगे आशय, स्रोत/शिराएँ, अंगों की उत्पत्ति, दोष-गुण सम्बन्ध, गर्भाधान में बाधक प्रजनन-स्थितियाँ, कमल-सदृश हृदय में जीव का निवास, तथा अस्थि, सन्धि, स्नायु, मांसपेशी, जाल-कूर्च आदि की संख्याएँ दी गई हैं। द्रवों की अञ्जलि-प्रमाण मात्रा बताकर अंत में शरीर को मल-दोष का पिण्ड जानकर आत्मा में देहाभिमान त्यागने की शिक्षा दी जाती है।

43 verses

Adhyaya 370

Chapter 370: नरकनिरूपणम् (Naraka-nirūpaṇa) — Description of Hell (with the physiology of dying and the subtle transition)

अग्नि यममार्ग के वर्णन के बाद मृत्यु-प्रक्रिया और सूक्ष्म-गति का क्रम बताता है। देह की ऊष्मा और वायु के विक्षोभ से दोष रुकते हैं, प्राण-स्थान और मर्म शिथिल होते हैं; वायु निकलने के छिद्र खोजती है। आँख, कान, नासिका, मुख आदि से ‘ऊर्ध्व-निर्गमन’ शुभ कर्म का फल है, गुदा और जननेन्द्रिय से ‘अधो-निर्गमन’ अशुभ कर्म का; योगी का स्वाधीन प्रस्थान मस्तक के ब्रह्मरन्ध्र से होता है। प्राण-अपान के संयोग पर चेतना ढँकती है; नाभि-प्रदेश में स्थित जीव अतीवाहिक सूक्ष्म शरीर धारण करता है, जिसे देव-सिद्ध दिव्य दृष्टि से देखते हैं। फिर यमदूत उसे भयावह यममार्ग से ले जाते हैं; परिजनों के पिण्ड-जल आदि से उसका पोषण होता है और अंत में यम तथा चित्रगुप्त के सामने कर्म का निर्णय होता है। अनेक नरकों, उनके अधिपतियों और कठोर दण्डों का वर्णन है; महापातकों के फलस्वरूप पुनर्जन्म की गतियाँ कही गई हैं। अंत में त्रिविध दुःख (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) दिखाकर ज्ञान-योग, व्रत, दान और विष्णु-पूजा को उपाय बताया गया है।

39 verses

Adhyaya 371

Chapter 371 — Yama-Niyama and Praṇava-Upāsanā (Oṅkāra) as Brahma-vidyā

अग्नि योग को एकचित्तता बताकर चित्तवृत्ति-निरोध को जीव–ब्रह्म संबंध के साक्षात्कार का परम उपाय कहते हैं। अध्याय में पाँच यम—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह—और पाँच नियम—शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-पूजन—को ब्रह्मविद्या की अनिवार्य नींव कहा गया है। अहिंसा को सर्वोच्च धर्म माना गया; सत्य को ‘हितकारी वचन’ के रूप में, ‘सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्’ की मर्यादा से शुद्ध किया गया। ब्रह्मचर्य को विचार से कर्म तक अष्टविध संयम और अपरिग्रह को देह-निर्वाह मात्र तक सीमित बताया। आगे शुद्धि-तप के बाद प्रणव-केन्द्रित स्वाध्याय आता है: ओंकार को अ-उ-म् तथा सूक्ष्म अर्धमात्रा सहित समझाकर उसे वेद, लोक, गुण, चेतना-अवस्थाओं और देव-त्रयों से जोड़ा गया। हृदय-कमल में तुरीय का ध्यान—प्रणव धनुष, आत्मा बाण, ब्रह्म लक्ष्य—उपदेशित है। फिर गायत्री-छन्द, भुक्ति-मुक्ति हेतु विनियोग, कवच/न्यास, विष्णु-पूजा, होम और नियमयुक्त जप से ब्रह्म-प्रकटि तक की विधि कही गई; अंत में ईश्वर में परा-भक्ति और गुरु में सम-श्रद्धा वाले को अर्थ पूर्णतः प्रकट होते हैं।

36 verses

Adhyaya 372

Āsana–Prāṇāyāma–Pratyāhāra (Posture, Breath-control, and Withdrawal of the Senses)

इस अध्याय में भगवान् अग्नि योग का तकनीकी तथा मोक्षदायी उपदेश देते हैं। साधक शुद्ध स्थान में न बहुत ऊँचे न बहुत नीचे आसन पर, वस्त्र‑अजिन‑कुश बिछाकर स्थिर बैठे; धड़‑शिर‑ग्रीवा सीधी रखे और नासाग्र‑दृष्टि से चित्त स्थिर करे। एड़ियों‑हाथों के रक्षक/स्थिरकारी विन्यास बताकर निश्चलता और एकाग्रता को परम तत्त्व के ध्यान की पूर्वशर्त कहा गया है। प्राणायाम को प्राण का नियत विस्तार‑निग्रह मानकर रेचक, पूरक, कुम्भक का वर्णन तथा समय‑माप से कन्यक, मध्यम, उत्तम भेद बताए हैं। लाभ—आरोग्य, बल, स्वर, कान्ति, दोष‑शमन; पर असिद्ध प्राणायाम से रोग बढ़ने की चेतावनी है। जप‑ध्यान को ‘गर्भ’ (अन्तर्बीज‑एकाग्रता) हेतु आवश्यक कहकर इन्द्रिय‑जय का सिद्धान्त दिया—इन्द्रियाँ स्वर्ग‑नरक का कारण; देह रथ, इन्द्रियाँ अश्व, मन सारथि, प्राणायाम कोड़ा। अंत में प्रत्याहार को विषय‑सागर से इन्द्रियों की वापसी बताकर ज्ञान‑वृक्ष की शरण से आत्म‑उद्धार का उपदेश है।

21 verses

Adhyaya 373

Chapter 373 — ध्यानम् (Dhyāna / Meditation)

भगवान् अग्नि ध्यान को निरन्तर, अविच्छिन्न और निर्विघ्न चिन्तन बताते हैं—बार-बार मन को विष्णु/हरि में स्थिर करना और चरम अवस्था में ब्रह्म में लीन करना। यह एकधारा ‘प्रत्यय’ है जिसमें बीच-बीच में अन्य विचार नहीं आते; यह किसी भी स्थान और हर समय—चलते, खड़े, सोते, जागते—सम्भव है। साधना की चार रचना कही गई है: ध्याता, ध्यान, ध्येय और प्रयोजन; योगाभ्यास से मुक्ति तथा अणिमा आदि अष्ट-ऐश्वर्य भी प्राप्त होते हैं। ‘ध्यान-यज्ञ’ को श्रेष्ठ आन्तरिक, शुद्ध और अहिंसक यज्ञ कहा गया है, जो बाह्य कर्मकाण्ड से बढ़कर मन को पवित्र कर अपवर्ग देता है। क्रमिक कल्पना में गुणत्रय का विन्यास, तीन रंगों के मण्डल, हृदय-कमल के प्रतीक (पंखुड़ियाँ सिद्धियाँ; नाल/कर्णिका ज्ञान-वैराग्य) तथा अँगूठे-भर ओंकार या प्रधाना-पुरुषातीत तेजोमय कमलासनस्थ प्रभु का ध्यान बताया गया है। अंत में वैष्णव मूर्ति-चिन्तन, ‘मैं ब्रह्म हूँ… मैं वासुदेव हूँ’ का निश्चय जप सहित; जप-यज्ञ को रक्षा, समृद्धि, मोक्ष और मृत्यु-जय के लिए अनुपम कहा गया है।

34 verses

Adhyaya 374

Chapter 374 — ध्यान (Dhyāna) — Colophon & Transition to Dhāraṇā

यह खंड ध्यान-विषयक पूर्व उपदेश का उपसंहार है और स्पष्ट रूप से अगले, अधिक तकनीकी योगांग—धारणा—की ओर संक्रमण कराता है। अध्यायांत कोलोफ़न साधना के मोक्षलक्ष्य—हरि (विष्णु) की प्राप्ति और अनुशासित चिंतन के ‘फल’—को रेखांकित करता है, साथ ही जीवित परंपरा को दर्शाने वाले भिन्न पाण्डुलिपि-पाठों का संकेत भी देता है। ध्यान से मन को दीर्घकालीन एकाग्र अभिमुखता में प्रशिक्षित कर, फिर धारणा द्वारा चुने हुए स्थानों और तत्त्वों पर सूक्ष्म स्थिरीकरण कराया जाता है—यह क्रमबद्ध योग-शिक्षा यहाँ प्रकट होती है। अग्नि द्वारा वसिष्ठ के हितार्थ दिए गए दिव्य निर्देश में, पुराण अंतःयोग-विधि को शास्त्रीय विज्ञान की तरह परिभाषाओं, सीमाओं और प्रगति-क्रम सहित रखता है, जिससे साधक चित्त-प्रसाद और मुक्ति की ओर बढ़ें।

22 verses

Adhyaya 375

Adhyāya 375 — समाधिः (Samādhi)

भगवान अग्नि समाधि को ऐसी ध्यानावस्था बताते हैं जिसमें केवल आत्मा ही प्रकाशित रहती है—अचल समुद्र और निर्वात दीपक की भाँति—जहाँ इन्द्रियों की क्रियाएँ और मन के विकल्प रुक जाते हैं। योगी बाह्य विषयों में जड़-सा प्रतीत होता है, ईश्वर में लीन होता है, और कुछ शकुन-सदृश लक्षण व प्रलोभन आते हैं—दिव्य भोग, राजकीय दान, स्वतः विद्या, काव्य-प्रतिभा, औषधि, रसायन, कलाएँ—जिन्हें विष्णु-कृपा हेतु तिनके की तरह त्यागने को कहा गया है। आगे ब्रह्मविद्या में शुद्धि को आत्मज्ञान की पूर्वशर्त बताया गया; एक आत्मा घटाकाश या जल में सूर्य-प्रतिबिम्ब की तरह अनेक-सा दिखता है; बुद्धि, अहंकार, तन्मात्रा, भूत और गुणों से सृष्टि-क्रम; कर्म और कामना से बन्धन, ज्ञान से मुक्ति। अर्चिरादि ‘उज्ज्वल मार्ग’ से परम गति और धूमादि मार्ग से पुनरावृत्ति का वर्णन है। अंत में सत्य, न्यायोपार्जित धन, अतिथि-सत्कार, श्राद्ध और तत्त्वज्ञान से धर्मनिष्ठ गृहस्थ की भी मुक्ति प्रतिपादित है।

44 verses

Adhyaya 376

Chapter 376 — ब्रह्मज्ञानम् (Knowledge of Brahman)

भगवान अग्नि ब्रह्म-ज्ञान का उपदेश आरम्भ करते हैं—संसारजन्य अज्ञान की सीधी औषधि ‘अयम् आत्मा परं ब्रह्म—अहम् अस्मि’ की मुक्तिदायक पहचान है। विवेक से देह को दृश्य-वस्तु होने के कारण अनात्मा कहा जाता है; इन्द्रियाँ, मन और प्राण भी उपकरण हैं, साक्षी नहीं। आत्मा सभी हृदयों में अन्धकार में दीपक-सा प्रकाशमान अन्तर्ज्योति, द्रष्टा-भोक्ता रूप में प्रतिष्ठित है। फिर समाधि-प्रवेश का ध्यान—ब्रह्म से तत्त्वों की सृष्टि-क्रमानुसरण और लय द्वारा स्थूल का ब्रह्म में विलय; विराट (स्थूल समष्टि), लिङ्ग/हिरण्यगर्भ (सत्रह तत्त्वों वाला सूक्ष्म देह), तथा जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति और उनके विश्व-तैजस-प्राज्ञ सम्बन्ध बताए जाते हैं। तत्त्व अनिर्वचनीय है, ‘नेति-नेति’ से जाना जाता है; कर्म से नहीं, साक्षात् ज्ञान से प्राप्त होता है। अंत में महावाक्य-शैली के साक्षी-चैतन्य के घोष और फल—ब्रह्मज्ञानी मुक्त होकर ब्रह्म ही हो जाता है।

24 verses

Adhyaya 377

Brahma-jñāna (Knowledge of Brahman)

इस योग–ब्रह्मविद्या खण्ड में अग्निदेव अद्वैत का संक्षिप्त उपदेश देते हैं—“मैं ब्रह्म हूँ, परम प्रकाश।” वे अपवाद-क्रम से सभी उपाधियों का निषेध करते हैं: पृथ्वी, अग्नि, वायु, आकाश जैसे स्थूल तत्त्वों से लेकर विराट्, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति, तैजस-प्राज्ञ आदि अभिमानों तक; कर्मेन्द्रिय-ज्ञानेन्द्रिय, मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार तथा प्राण और उसके विभागों का भी निरसन करते हैं। मान-मेय, कारण-कार्य, सत्-असत्, भेद-अभेद और ‘साक्षीभाव’ जैसी धारणाएँ भी त्याज्य बताकर ब्रह्म को तुरीय—तीनों अवस्थाओं से परे—रूप में स्थापित करते हैं। अंत में ब्रह्म का स्वरूप नित्य शुद्धता, चैतन्य, स्वातंत्र्य, सत्य, आनंद और अद्वैत कहा गया है तथा इस साक्षात्कार को परम समाधि द्वारा मोक्ष का प्रत्यक्ष दाता बताया गया है।

22 verses

Adhyaya 378

Chapter 378: Brahma-jñāna (Knowledge of Brahman)

भगवान अग्नि साधनों की क्रमिक उपलब्धियाँ बताते हैं—यज्ञ से दिव्य/लोकिक पद, तप से ब्रह्मा का स्थान, वैराग्ययुक्त संन्यास से प्रकृति-लय, और ज्ञान से कैवल्य। ज्ञान को चेतन-अचेतन का विवेक कहा गया है; परमात्मा सर्वाधार हैं, विष्णु और यज्ञेश्वर के रूप में स्तुत, जिन्हें प्रवृत्ति-मार्गी कर्मकाण्डी पूजते हैं और निवृत्ति-मार्गी ज्ञानयोगी साक्षात् करते हैं। शाब्द-ब्रह्म वेद/आगम-आधारित है, पर-ब्रह्म विवेक से अनुभूत; ‘भगवान’ शब्द की व्युत्पत्ति और छह भग—ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य—समझाए गए हैं। बन्धन का कारण अविद्या है—आत्मा पर अनात्मा का अध्यास; जल-अग्नि-घट के दृष्टान्त से आत्मा को प्रकृति के अधर्म से पृथक दिखाया गया है। साधना में विषयों से मन हटाकर हरि को ब्रह्मरूप स्मरण, और यम-नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, समाधि से ब्रह्म में मन का योग स्थिर करना कहा गया है। निराकार कठिन होने से पहले साकार ध्यान, अंत में अभेद-बोध; भेद अज्ञानजन्य है।

32 verses

Adhyaya 379

Adhyāya 379 — अद्वैतब्रह्मविज्ञानम् (Advaita-brahma-vijñāna)

अग्नि अद्वैत-ब्रह्मविज्ञान का संक्षिप्त, केंद्रित उपदेश करते हैं—शालग्राम में तप और वासुदेव-पूजा से साधक की भूमिका, फिर आसक्ति से पुनर्जन्म का संकेत (मृग-आसक्ति का दृष्टान्त), और योग द्वारा अपने सत्य स्वरूप की पुनः प्राप्ति। आगे एक सामाजिक प्रसंग में अवधूत-सदृश ज्ञानी को पालकी ढोने के लिए बाध्य किया जाता है; वह राजा को कर्तृत्व और अहंकार का विश्लेषण करके समझाता है कि ‘वाहक’, ‘वह्य’ और ‘पालकी’ देह-अवयवों, भूत-तत्त्वों और लोक-व्यवहार के नाम मात्र हैं; ‘मैं-तुम’ गुण-प्रवाह पर भाषा का आरोप है, जो अविद्या से संचित कर्म से चलता है, जबकि आत्मा शुद्ध, निर्गुण और प्रकृति से परे है। फिर निदाघ–ऋतु संवाद में भूख-तृप्ति से देह की सीमाएँ दिखाकर आत्मा को आकाशवत् सर्वव्यापी, न आने-जाने वाला बताया जाता है। अंत में अखण्ड विश्व को वासुदेव का ही स्वरूप मानकर ज्ञानजन्य मोक्ष को संसार-अविद्या-वृक्ष को गिराने वाला ‘शत्रु’ कहा गया है।

66 verses

Adhyaya 380

अध्याय ३८० — गीतासारः (The Essence of the Gītā)

इस अध्याय में पूर्ववर्ती अद्वैत-ब्रह्मविज्ञान से आगे बढ़कर अग्नि ‘गीतासार’ के रूप में कृष्ण के अर्जुन-उपदेश का संक्षिप्त, सारगर्भित निरूपण करते हैं, जो भुक्ति और मुक्ति दोनों का फल देता है। अजन्मा आत्मतत्त्व से शोक-निवृत्ति, तथा बंधन की मनोवैज्ञानिक शृंखला—इन्द्रिय-संपर्क से आसक्ति, फिर काम, क्रोध, मोह और अंततः विनाश—बताकर सत्संग और काम-त्याग को स्थिर बुद्धि का आधार कहा गया है। ब्रह्म में कर्म अर्पित कर आसक्ति छोड़ते हुए कर्मयोग, और सभी प्राणियों में आत्मदर्शन स्थापित किया गया है। भक्ति और प्रभु-शरणागति से माया-तरण, अध्यात्म/अधिभूत/अधिदैवत/अधियज्ञ की परिभाषाएँ, तथा मृत्यु के समय ओंकार-स्मरण द्वारा परमगति का सिद्धान्त भी आता है। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ, ज्ञान के साधन (अमानित्व, अहिंसा, शौच, वैराग्य आदि), ब्रह्म की सर्वव्यापकता, और गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, तप, दान, आहार का वर्गीकरण वर्णित है। अंत में स्वधर्म को विष्णु-पूजा रूप मानकर कर्तव्य को आध्यात्मिक सिद्धि से जोड़ा गया है।

58 verses

Adhyaya 381

Chapter 381 — यमगीता (Yama-gītā)

अग्नि यमगीता का परिचय देते हैं—यह नचिकेता को पूर्व में कहा गया मोक्षोपदेश है; इसके पाठ और श्रवण से भुक्ति और मुक्ति दोनों का फल बताया गया है। यम मनुष्य के मोह को उजागर करते हैं कि अनित्य जीव स्थायी संपत्ति और भोग चाहता है। फिर वे श्रेयस के प्रमाणरूप “गीत” जोड़ते हैं—कपिल का इन्द्रियनिग्रह व आत्मचिन्तन, पञ्चशिख का समदर्शन व अपरिग्रह, गङ्गा–विष्णु का आश्रम-विवेक, और जनक के दुःख-निवारण उपाय। आगे उपदेश वेदान्तमय होता है—अभेद परमात्मा में भेद-कल्पना शांत करनी चाहिए; काम-त्याग से साक्षात् ज्ञान होता है (सनक)। विष्णु को ही ब्रह्म कहा गया है—परात्पर और अन्तर्यामी, अनेक दिव्य नामों से ज्ञेय। ध्यान, व्रत, पूजा, धर्म-श्रवण, दान और तीर्थ-सेवा साधन हैं। नचिकेता-शैली रथ-दृष्टान्त से मन-बुद्धि द्वारा इन्द्रियों पर विजय और पुरुष तक तत्त्व-क्रम बताया गया है। अंत में योग के अंग—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि—कहकर निष्कर्ष दिया कि अज्ञान-निवृत्ति से जीव ब्रह्मरूप, अद्वैत हो जाता है।

37 verses

Adhyaya 382

Āgneya-Purāṇa-māhātmya (The Greatness and Self-Testimony of the Agni Purāṇa)

अध्याय पूर्ववर्ती “यम-गीता” का उपसंहार कर तुरंत अग्नि-पुराण को ब्रह्मरूप और महान बताता है, जो सप्रपंच (व्यवहार-जगत) और निष्प्रपंच (परमार्थ) दोनों प्रकार की विद्या का उपदेश देता है। अग्नि इसके विश्वकोशीय विषयों का वर्णन करते हैं—वेद व वेदांग, धर्मशास्त्र, न्याय–मीमांसा, आयुर्वेद, राजधर्म-नीति, धनुर्वेद, नाट्य-गीतादि कलाएँ—और अपराविद्या (शास्त्रीय ज्ञान) तथा पराविद्या (परम अक्षर का साक्षात्कार) का भेद स्पष्ट करते हैं। फिर विष्णु-भक्ति को सार कहा गया है—गोविंद/केशव का ध्यान, भक्ति, कथा और कर्म पापहर, कलिदोष-शामक और सच्चे ध्यान के लक्षण हैं। माहात्म्य-भाग में श्रवण, पाठ, लेखन, पूजन, दान तथा घर में ग्रंथ रखने तक के रक्षात्मक-पावन फल, ऋतु/मासानुसार पुण्य, और पुराण-पाठकों के विधिवत सम्मान का विधान आता है। अग्नि→वसिष्ठ→व्यास→सूत परंपरा से इसकी वेदानुकूलता, प्रवृत्ति-निवृत्ति धर्म का समन्वय, तथा भुक्ति-मुक्ति का वचन पुनः दृढ़ होता है और उपनिषद्-वाक्य से निष्कर्ष—“सब कुछ ब्रह्म है, ऐसा जानो।”

71 verses