Adhyaya 316
Mantra-shastraAdhyaya 31634 Verses

Adhyaya 316

Derivation (Uddhāra) of the Sakalādi Mantra (सकलादिमन्त्रोद्धारः)

इस अध्याय में उद्धृत आरम्भ में ईश्वर-रूप से भगवान अग्नि सकलादि/प्रासाद-मन्त्र-प्रणाली के ‘उद्धार’ और प्रयोग की तान्त्रिक रूपरेखा बताते हैं। अ से क्ष तक वर्ण-श्रृंखला (क-वर्ग आदि) को देव-रूपों और कर्म-उपयोगों से जोड़कर पहले सकल, निष्कल और शून्य—इन तत्त्व-स्थितियों का विवेचन किया गया है। आगे देवता-नाम-गणना, क्ष का नरसिंह-स्वरूप, विश्वरूप की प्रमाण-संगति आदि संकेत देकर ईशान, तत्पुरुष, अघोर/दक्षिण, वामदेव, सद्योजात—पञ्चवक्त्रों के अनुसार न्यास-स्थानों का निर्देश है। हृदय, शिरस्, शिखा, नेत्र, अस्त्र—इन अंग-मन्त्रों तथा उनके अन्त्य-उच्चार ‘नमः, स्वाहा, वौषट्, हूँ, फट्’ का विधान आता है। अंत में ‘सर्व-कर्म-कर’ प्रासाद-मन्त्र को सर्व-रितु-सिद्धिदायक कहा गया है; साथ ही सकल प्रासाद और निष्कल सदाशिव-विन्यास का भेद, शून्य-छाया से आवरण, तथा विद्येश्वर-अष्टक की वर्गीकरण-परम्परा में इन मन्त्र-समूहों का स्थान स्थापित किया गया है।

Shlokas

Verse 1

इत्य् आग्नेये महापुराणे नानामन्त्रा नाम पञ्चदशाधिकत्रिशततमो ऽध्यायः अथ षोडशाधिकत्रिशततमो ऽध्यायः सकलादिमन्त्रोद्धारः ईश्वर उवाच सकलं निष्कलं शून्यं कलाढ्यं स्वमलङ्कृतम् क्षपणं क्षयमन्तस्थं कण्ठोष्ठं चाष्टमंशिवम्

इस प्रकार अग्नि-महापुराण में “नानामन्त्र” नामक तीन सौ पंद्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब तीन सौ सोलहवाँ अध्याय—“सकलादि-मन्त्र का उद्धार” आरम्भ होता है। ईश्वर बोले—यह सकल और निष्कल, शून्य, कलाओं से समृद्ध, अपने ही तेज से अलंकृत है; यह क्षपण करने वाला, क्षय का अंत करने वाला, अंतःस्थ, कण्ठ-ओष्ठ-स्वरूप, तथा अष्टम—शिव है।

Verse 2

प्रासादस्य पराख्यस्य स्मृतं रूपं गुहाष्टधा रिपुदुष्टादि वारयेदिति क , ट च प्रसादस्येति ख स्मृतिरूपमिति ख सदाशिवस्य शब्दस्य रूपस्याखिलसिद्धये

‘परा’ नामक प्रासाद का रूप ‘गुह्य-अष्टधा’ (आठ प्रकार का रहस्य) कहा गया है। ‘यह शत्रु, दुष्ट आदि को रोकता है’—ऐसा क और ट पाठों में है; ख पाठ में ‘प्रासादस्य’ तथा ‘स्मृतिरूपम्’ भी मिलता है। यह ‘सदाशिव’ शब्द के मन्त्र-रूप द्वारा अखिल सिद्धि की प्राप्ति हेतु कहा गया है।

Verse 3

अमृतश्चांशुभांश्चेन्दुश्चेश्वरश्चोग्र ऊहकः एकपादेन ओजाख्य औषधश्चांशुमान् वशी

अमृत, अंशुभान्, इन्दु, ईश्वर, उग्र, ऊहक; एकपाद, ओज नामक, औषध (औषधियों के स्वामी), अंशुमान् और वशी—ये (नाम) हैं।

Verse 4

अकारादेः क्षकारश् च ककारादेः क्रमादिमे कामदेवः शिखण्डी च गणेशः कालशङ्करौ

‘अ’ से लेकर ‘क्ष’ तक, और ‘क’ से आरम्भ होने वाली श्रेणी में भी क्रमशः—ये (अक्षर) देवताओं के रूप में निर्दिष्ट हैं: कामदेव, शिखण्डी, गणेश और काल-शंकर।

Verse 5

एकनेत्रो द्विनेत्रश् च त्रिशिखो दीर्घबाहुकः एकपादर्धचन्द्रश् च बलपो योगिनीप्रियः

वह एकनेत्र और द्विनेत्र भी है; त्रिशिख (तीन शिखाओं वाला), दीर्घबाहु है; एकपाद, अर्धचन्द्र धारण करने वाला; बलवान, और योगिनियों का प्रिय है।

Verse 6

शक्तीश्वरो महाग्रन्थिस्तर्पकः स्थाणुदन्तुरौ निधीशो नन्दी पद्मश् च तथान्यः शाकिनीप्रियः

वह शक्ति का ईश्वर है; महाग्रन्थि (महागाँठ वाला); तर्पक (तृप्त करने वाला); स्थाणु (अचल); दन्तुर (दाँतों/दंतों वाला); निधीश (निधियों का स्वामी); नन्दी; पद्म; तथा अन्य (सर्वातीत); और शाकिनियों का प्रिय है।

Verse 7

सुखविम्बो भीषनश् च कृतान्तः प्राणसंज्ञकः तेजस्वी शक्र उदधिः श्रीकण्ठः सिंह एव च

वह सुखविम्ब (आनन्दमय तेज का स्वरूप), भीषण, कृतान्त (मृत्यु/संहारक), प्राणसंज्ञक (प्राण-रूप से प्रसिद्ध), तेजस्वी, शक्र (इन्द्र-सदृश पराक्रमी), उदधि (समुद्र), श्रीकण्ठ (मंगल-कण्ठ), और सिंह है।

Verse 8

शशाङ्को विश्वरूपश् च क्षश् च स्यान्नरसिंहकः सूर्यमात्रासमाक्रान्तं विश्वरूपन्तु कारयेत्

शशाङ्क और विश्वरूप—ये नियत रूप माने जाएँ; तथा ‘क्ष’ वर्ण को नरसिंह के रूप में अंकित किया जाए। विश्वरूप की प्रतिमा सूर्य-मात्रा (सौर परिमाण) के अनुसार बनानी चाहिए।

Verse 9

अंशुमत्संयुतं कृत्वा शशिवीजं विनायुतम् ईशानमोजसाक्रान्तं प्रथमन्तु समुद्धरेत्

‘अंशुमत्’ (दीप्त तत्त्व) से उसे संयुक्त करके, और शशि-बीज (चन्द्र बीजाक्षर) को विनायक के साथ युक्त करके, ओज से अभिभूत ईशान-भाग (मन्त्र/अंश) को पहले उच्चारित/उद्धृत करना चाहिए।

Verse 10

तृतीयं पुरुषं विद्धि दक्षिणं पञ्चमं तथा सप्तमं वामदेवन्तु सद्योजातन्ततःपरं

तीसरे स्थान को तत्पुरुष जानो; पाँचवें को दक्षिण (अघोर, दक्षिणमुख) भी; सातवें को वामदेव; और उसके बाद अगले स्थान पर सद्योजात को जानो।

Verse 11

रसयुक्तन्तु नवमं ब्रह्मपञ्चपञ्चकमीरितम् ओंकाराद्याश् चतुर्थ्यन्ता नमोन्ताः सर्वमन्त्रकाः

नवम (समूह) ‘रसयुक्त’ कहा गया है और उसे ब्रह्म के पाँच-पाँच के पंचक रूप में बताया गया है। सभी मंत्र ओंकार से आरम्भ होकर चतुर्थी-विभक्ति पर समाप्त होते हैं और अंत में ‘नमः’ आते हैं।

Verse 12

सद्योदेवा द्वितीयन्तु हृदयञ्चाङ्गसंयुतम् चतुर्थन्तु शिरो विद्धि ईश्वरन्नामनामतः

दूसरा (मंत्र/रूप) ‘सद्योजात/सद्योडेवा’ है—जो हृदय तथा अंग-न्यास (अंगों) से संयुक्त है। चौथा ‘शिरः’ है—यह ईश्वर (भगवान) के नाम-निर्देश के अनुसार जानो।

Verse 13

ऊहकन्तु शिखा ज्ञेया विश्वरूपसमन्विता त्रिशिखी चोर्ध्ववाहुक इति ख , छ च तन्मन्त्रमष्टमं ख्यातं नेत्रन्तु दशमं मतम्

शिखा-न्यास को ‘ऊहका’ समझना चाहिए, जो विश्वरूप से युक्त है—‘त्रिशिखी’ और ‘ऊर्ध्ववाहुक’ (ऊपर उठी भुजाओं वाला) रूप में; यह ‘ख’ और ‘छ’ अक्षरों से सूचित है। वही आठवाँ मंत्र प्रसिद्ध है; नेत्र (रक्षा) मंत्र दसवाँ माना गया है।

Verse 14

अस्त्रं शशी समाख्यातं शिवसंज्ञं शिखिध्यजः नमः स्वाहा तथा वौषत् हूं च फत्कक्रमेण तु

‘शशी’ नामक अस्त्र (लौकिक-रक्षा मंत्र) ऐसा कहा गया है। हे शिखिध्वज, इसका नाम ‘शिव’ है। इसे क्रम से ‘नमः’, ‘स्वाहा’, ‘वौषट्’, ‘हूं’ और ‘फट्’—इन मंत्र-पदों के साथ प्रयोग करना चाहिए।

Verse 15

जातिफट्कं हृदादीनां प्रासादं मन्त्रमावदे ईशानाद्रुद्रसंख्यातं प्रोद्धरेच्चांशुरञ्जितम्

हृदय आदि (न्यास-अंगों) के लिए ‘जाति-फट्क’ का जप करना चाहिए और ‘प्रासाद’ मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। ईशान से आरम्भ करके रुद्र-संख्या के अनुसार उसका उद्धार/विन्यास करे, जो कि अंशुओं (किरणों) से दीप्त हो।

Verse 16

औषधाक्रान्तशिरसमूहकस्योपरिस्थितं अर्धचन्द्रोर्धनादश् च विन्दुद्वितयमध्यगं

औषध आदि शिरो-अक्षरों के समूह के ऊपर अर्धचन्द्र और अर्धनाद स्थापित किया जाता है; वह दो बिंदुओं (बिंदु-द्वय) के मध्य स्थित होता है।

Verse 17

तदन्ते विश्वरूपन्तु कुटिलन्तु त्रिधा ततः एवं प्रासादमन्त्रश् च सर्वकर्मकरो मनुः

इसके अंत में ‘विश्वरूप’ विन्यास किया जाए; फिर ‘कुटिल’ रूप को तीन प्रकार से बनाया जाए। इस प्रकार प्रासाद-मंत्र, जो सर्वकर्म-सिद्धि देने वाला मनु है, कहा गया।

Verse 18

शिखावीजं समुद्धृत्य फट्कारान्तन्तु चैव फट् अर्धचन्द्रासनं ज्ञेयं कामदेवं ससर्पकम्

शिखा-बीज को ग्रहण करके, अंत में ‘फट्’ का उच्चारण जोड़ना चाहिए—अर्थात ‘फट्’। इसे कामदेव-संबद्ध, सर्प-युक्त ‘अर्धचन्द्र-आसन’ समझना चाहिए।

Verse 19

महापाशुपतास्त्रन्तु सर्वदुष्टप्रमर्दनम् प्रासादः सकलः प्रोक्तो निष्कलः प्रोच्यते ऽधुना

महापाशुपत अस्त्र को समस्त दुष्टों का मर्दन करने वाला कहा गया है। सकल (साकार) प्रासाद का वर्णन हो चुका; अब निष्कल (निराकार) का कथन किया जाता है।

Verse 20

औषधं विश्वरूपन्तु रुद्राख्यं सूर्यमण्डलम् चन्द्रार्धं नादसंयोगं विसंज्ञं कुटिलन्ततः

औषध द्रव्य विश्वरूप है; उसे ‘रुद्र’ कहा गया है और वह सूर्य-मंडल के समान है। वह अर्धचन्द्र धारण करता है, नाद से संयुक्त होता है, (मानो) विसंज्ञ हो जाता है, और फिर कुटिल (कुंडलित) रूप धारण करता है।

Verse 21

निष्कलो भुक्तिमुक्तौ स्यात्पञ्चाङ्गो ऽयं सदाशिवः अंशुमान् विश्वरूपञ्च आवृतं शून्यरञ्जितम्

अपने निष्कल स्वरूप में वह भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करता है। यह सदाशिव पंचाङ्ग रूप से प्रकट है—किरणमय, विश्वरूप, और शून्य से आवृत-सा, मानो शून्यता से रंजित प्रतीत होता है।

Verse 22

ब्रह्माङ्गरहितः शून्यस्तस्य मूर्तिरसस्तरुः विघ्ननाशाय भवति पूजितो बालबालिशैः

ब्रह्म के अंगों/लक्षणों से रहित होने के कारण वह शून्य है; उसकी मूर्ति मानो असत् ‘वृक्ष’ के समान है। फिर भी बालक-सदृश अज्ञ जन जब उसकी पूजा करते हैं, तो वह विघ्न-नाश का साधन माना जाता है।

Verse 23

अंशुमान् विश्वरूपाख्यमूहकस्योपरि स्थितम् कलाढ्यं सकलस्यैव पूजाङ्गादि च सर्वतः

‘अंशुमान्’ को ‘विश्वरूप’ नामक रूप में ‘मूहक’ के ऊपर स्थापित करना चाहिए। वह समस्त कलाओं से युक्त, पूर्ण, और चारों ओर पूजाङ्ग आदि समग्र उपस्करों से संपन्न है।

Verse 24

नरसिंहं कृतान्तस्थं तेजस्विप्राणमूर्धगम् मन्त्रमादरेदिति ञ चन्द्रार्धनादसंयुक्तमिति ख अंशुमानूहकाक्रान्तमधोर्धं स्वसलङ्घृतम्

‘ञ’ अक्षर को नरसिंह-मन्त्र रूप में आदरपूर्वक मानना चाहिए—वह कृतान्त-प्रदेश में स्थित, तेजस्वी है और प्राण के साथ ऊपर उठकर शिरोमूर्धा की ओर जाता है। ‘ख’ अक्षर को चन्द्रार्ध-चिह्न तथा नाद से संयुक्त कहा गया है। वह किरणों से व्याप्त, ऊहक से आक्रान्त, और अपने ही चिह्न/रेखा से उसके अधोर्ध भाग में क्रान्त है।

Verse 25

चन्द्रार्धनादनादान्तं ब्रह्मविष्णुविभूशित उदधिं नरसिंहञ्च सूर्यमात्राविभेदितम्

मैं उस रूप का ध्यान करता हूँ जो चन्द्रार्ध-नाद से आरम्भ होकर अनादि-अनन्त है; जो ब्रह्मा और विष्णु से विभूषित है; जो समुद्र के समान विशाल है; और जो नरसिंह है—सूर्य की मात्रा/प्रभा से विशिष्ट।

Verse 26

यदा कृतं तदा तस्य ब्रह्माण्यङ्गानि पूर्ववत् ओजाख्यमंशुमद्युक्तं प्रथमं वर्णमुद्धरेत्

जब यह कर्म सम्पन्न हो जाए, तब पूर्ववत् ब्रह्माङ्गों की पुनः स्थापना करके, अंशुमत् से युक्त ‘ओजस्’ नामक प्रथम वर्ण का उच्चारण/उद्धारण करे।

Verse 27

अशुमच्चांशुनाक्रान्तं द्वितीयं वर्णनायकम् अंशुमानीश्वरन्तद्वत् तृतीयं मुक्तिदायकम्

द्वितीय (नाम) ‘अशुमत्’ और ‘अंशुनाक्रान्त’ है, जो वर्णों का नायक है। इसी प्रकार तृतीय ‘अंशुमान् ईश्वर’ है, जो मुक्ति प्रदान करता है।

Verse 28

ऊहकञ्चांशुनाक्रान्तं वरुणप्रानतैजसम् पञ्चमन्तु समाख्यातं कृतान्तन्तु ततः परम्

‘ऊहक’ और ‘अंशुनाक्रान्त’, तथा ‘वरुण’ और ‘प्रानत-तैजस’—ये पाँचवें (समूह) के नाम कहे गए हैं; इसके बाद ‘कृतान्त’ आदि आता है।

Verse 29

अंशुमानुदकप्राणः सप्तमं वर्णमुद्धृतम् पद्ममिन्दुसमाक्रान्तं नन्दीशमेकपादधृक्

सप्तम वर्ण को अंशुमान्, उदक-प्राण और स्वयं प्राणस्वरूप मानकर उद्धृत करे; (ध्यान में) उसे चन्द्राक्रान्त पद्मरूप, तथा एकपादधारी नन्दीश के रूप में देखे।

Verse 30

प्रथमञ्चान्ततो योज्यं क्षपणं दशवीजकम् अस्यार्धं तृतीयञ्चैव पञ्चमं सप्तमं तथा

प्रथम वर्ण को अंत में जोड़े; फिर ‘क्षपण’ नामक दश-बीजक का योग करे। इसी सूत्र का आधा भाग तृतीय, पंचम और सप्तम में भी उसी प्रकार विनियोजित करे।

Verse 31

सद्योजातन्तु नवमं द्वितीयाद्धृदयादिकम् दशार्णप्रणवं यत्तु फडन्तञ्चास्त्रमुद्धरेत्

नवाँ मंत्र ‘सद्योजात’ है। दूसरे से आगे हृदय-मंत्र आदि अंग-मंत्रों का ग्रहण करे। जो दस अक्षरों वाला प्रणव ‘फट्’ से अंत होता है, उसे अस्त्र-मंत्र रूप में उच्चारे/उद्धृत करे।

Verse 32

नमस्कारयुतान्यत्र ब्रह्माङ्गानि तु नान्यथा द्वितीयादष्टौ यावदष्टौ विद्येश्वरा मताः

यहाँ ब्रह्मा के अंगों का न्यास नमस्कार सहित ही करना चाहिए, अन्यथा नहीं। दूसरे से लेकर आठवें तक उन्हें ‘विद्येश्वर’ माना गया है।

Verse 33

अनन्तेशश् च सूक्ष्मश् च तृतीयश् च शिवोक्तमः एकमूर्च्येकरूपस्तु त्रिमूर्तिरपरस् तथा

‘अनन्तेश’ और ‘सूक्ष्म’ (ये रूप हैं); तीसरा शिव-शास्त्र में कहा गया परम शिव है। एक की एक ही मूर्ति और एक ही रूप है; दूसरा उसी प्रकार त्रिमूर्ति (तीन रूपों वाला) है।

Verse 34

श्रीकण्ठश् च शिखण्डी च अष्टौविद्येश्वराःस्मृताः शिखण्डिनो ऽप्यनन्तान्तं मन्त्रान्तं मूर्तिरीरिता

श्रीकण्ठ और शिखण्डी आठ विद्येश्वरों में स्मरण किए गए हैं। शिखण्डिन की मूर्ति के लिए भी विधान यह है कि उसका अंत ‘अनन्त’ से हो; और उसका मंत्र भी ‘अनन्त’ पर ही समाप्त हो।

Frequently Asked Questions

The chapter emphasizes mantra-uddhāra as a rule-based system: phoneme-series (a–kṣa; ka-series) mapped to deities and ritual roles, structured into pañcabrahma placements and completed through nyāsa aṅgas (hṛdaya, śiras, śikhā, netra, astra) with specified terminal utterances (namaḥ, svāhā, vauṣaṭ, hūṃ, phaṭ).

By presenting sakala (operative, rite-accomplishing) and niṣkala (liberation-linked) configurations of Sadāśiva within one mantra-system, it frames ritual efficacy (sarva-karman) as disciplined sādhana that can yield both worldly attainments and liberation when aligned with correct nyāsa, visualization, and theological orientation.

Key forms include Sadāśiva and the pañcabrahma faces, Viśvarūpa as a prescribed all-formed configuration, Narasiṃha associated with the syllable kṣa, and weaponized forms such as the Mahāpāśupata-astra and Śaśī-astra.