Adhyaya 318
Mantra-shastraAdhyaya 31810 Verses

Adhyaya 318

वागीश्वरीपूजा (Worship of Vāgīśvarī)

अग्नि देव मंत्र-शास्त्र के उपदेश-क्रम में वसिष्ठ को वागीश्वरी (सरस्वती-रूप) की पूजा सिखाते हैं—उसका मण्डल, ध्यान-विधि, समय, मंत्र-रचना और वर्ण-वर्गों का विधान सहित। आरम्भ में स्थिर, प्रकाशमय ध्यान से ईश्वर की अंतःप्रतिष्ठा और पवित्र अक्षरों का गोपनीय, सुरक्षित संप्रेषण बताया गया है। वागीश्वरी को पचास वर्णों की वर्णमाला-माला से विभूषित, त्रिनेत्री, वर-अभय-मुद्रा सहित, जपमाला और पुस्तक धारण किए हुए ध्याया जाता है। मुख्य साधना वर्णमाला-जप है—‘अ’ से ‘क्ष’ तक अक्षरों को शिरोभाग से कंधों तक उतरते और देह में मानवाकार ध्वनि-धारा की तरह प्रवेश करते हुए कल्पना कर एक लाख जप। दीक्षा में गुरु कमल-मण्डल बनाकर सूर्य-चन्द्र-स्थापन, मार्ग, द्वार, कोने की पट्टियाँ और रंग-नियम निर्धारित करता है; कमल-खंडों में देवियाँ/शक्तियाँ स्थापित होती हैं—मध्य में सरस्वती, साथ में वागीशी, हृल्लेखा, चित्रवागीशी, गायत्री, शांकरी, मति, धृति तथा ह्रीं-बीज रूप। घृताहुतियों से साधक को संस्कृत-प्राकृत काव्य-प्रभुत्व, काव्यशास्त्र और संबद्ध विद्याओं में दक्षता प्राप्त होती है—यह अध्याय साधना और सांस्कृतिक-बौद्धिक सिद्धि का संगम दिखाता है।

Shlokas

Verse 1

इत्य् आग्नेये महापुराणे गणपूजा नाम सप्तदशाधिकत्रिशततमो ऽध्यायः अथाष्टादशाधिकत्रिशततमो ऽध्यायः वागीश्वरीपूजा ईश्वर उवाच वागीश्वरीपूजनञ्च प्रवदामि समण्डलम् ऊहकं कालसंयुक्तं मनुं वर्णसमायुतम्

इस प्रकार श्री आग्नेय महापुराण में ‘गणपूजा’ नामक तीन सौ सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब तीन सौ अठारहवाँ अध्याय—‘वागीश्वरीपूजा’ आरम्भ होता है। ईश्वर बोले—मैं वागीश्वरी की पूजा मण्डल सहित बताऊँगा—उसकी ध्यान-प्रक्रिया, काल-योग, मन्त्र (मनु) तथा वर्ण-सम्बन्धी विन्यास सहित।

Verse 2

निषाद ईश्वरं कार्यं मनुना चन्द्रसूर्यवत् अक्षरन्न हि देयं स्यात् ध्यायेत् कुन्देन्दुसन्निभां

मन से चन्द्र और सूर्य के समान स्थिर-दीप्त रूप में ईश्वर को भीतर प्रतिष्ठित करना चाहिए। अक्षरों को (गुप्त संकेतों को) किसी को देना/प्रकट नहीं करना चाहिए; कुन्द-पुष्प और चन्द्रमा के समान उज्ज्वल रूप का ध्यान करे।

Verse 3

पञ्चाशद्वर्णमालान्तु मुक्तास्रग्दामभूषिताम् वरदाभयाक्षसूत्रपुस्तकाढ्यां त्रिलोचनां

वह पचास वर्णों की माला से बनी हार से सुशोभित है, और मोतियों की लड़ियों तथा पुष्पमालाओं से अलंकृत है। वह वरद और अभय-मुद्रा धारण करती है, जपमाला और पुस्तक लिए रहती है, तथा त्रिनेत्री है।

Verse 4

लक्षं जपेन्मस्तकान्तं स्कन्धान्तं वर्णमालिकां अकारादिक्षकारान्तां विशन्तीं मानवत् स्मरेत्

अकार से क्षकार तक की वर्णमाला-रूप माला का, मस्तक से स्कन्ध (कंधों) तक, एक लाख जप करना चाहिए। उसे मानवरूप की भाँति (देह में) प्रवेश करती हुई स्मरण/कल्पना करे।

Verse 5

कुर्याद् गुरुश् च दीक्षार्थं मन्त्रग्राहे तु मण्डलम् सूर्याग्रमिन्दुभक्तन्तु भागाभ्यां कमलं हितं

दीक्षा के लिए गुरु को मन्त्र-ग्रहण के समय मण्डल बनाना चाहिए। विभाजित भागों के अनुसार कमल-रचना उत्तम है—जिसमें अग्रभाग में सूर्य और नियत भाग में चन्द्र का विन्यास किया जाए।

Verse 6

चन्द्रमसायुतमिति ञ कृतमिति ख वीथिका पदिका कर्या पद्मान्यष्टौ चतुष्पदे वीथिका पदिका वाह्ये द्वाराणि द्विपदानि तु

(योजना-समूह) अक्षर-चिह्नों से बताए गए हैं— ‘ञ’ का अर्थ ‘चन्द्रमा से युक्त’ और ‘ख’ का अर्थ ‘कृत/निर्मित’ है। चतुष्पद विन्यास में वीथिका और पदिका को आठ ‘पद्म’ विभागों सहित बनाना चाहिए। बाहर, वीथिका–पदिका पट्टी पर द्वार द्विपद-मान के अनुसार स्थापित हों।

Verse 7

उपद्वाराणित द्वच्च कोणबान्धं द्विपट्टिकम् सिदानि नव पद्मानि कर्णिका कनकप्रभा

उपद्वार होने चाहिए और द्विविध व्यवस्था भी। कोनों को कोण-बन्ध (तिरछे बन्धन) से दृढ़ किया जाए तथा द्विपट्टिक (दो पल्लों) वाले द्वार बनाए जाएँ। नौ सिद्ध ‘पद्म’ अंकित/स्थापित हों, जिनकी कर्णिका स्वर्ण-प्रभा से दीप्त हो।

Verse 8

केशराणि विचित्राणि कोणान्रक्तेन पूरयेत् व्योमरेखान्तरं कृष्णं द्वाराणीन्द्रेभमानतः

केसरों को विविध रूपों में शोभायमान चित्रित करे और कोनों को लाल रंग से भरे। ‘व्योम-रेखा’ के बीच के अंतराल को काला रंग दे। द्वारों का विन्यास इन्द्रेभ-मान (निर्धारित माप) के अनुसार करे।

Verse 9

मध्ये सरस्वतीं पद्मे वागीशी पूर्वपद्मके हृल्लेखा चित्रवागीशी गायत्री विश्वरूपया

पद्म के मध्य में सरस्वती को स्थापित/चिन्तित करे; पूर्व-पद्म में वागीशी को। फिर हृल्लेखा, फिर चित्रवागीशी, और फिर विश्वरूपा गायत्री का ध्यान करे।

Verse 10

शाङ्करी मतिर्धृतिश् च पूर्वाद्या ह्रीं स्ववीजकाः ध्येया सरस्वतीवच्च कपिलाज्येन होमकः संस्कृतप्राकृतकविः काव्यशास्त्रादिविद्भवेत्

शाङ्करी, मति और धृति— तथा पूर्वोक्त (पहले कही गई) शक्तियों के साथ— और ‘ह्रीं’ को उनके-उनके बीजाक्षरों सहित सरस्वती-स्वरूप मानकर ध्यान करे। कपिला-गाय के घी से हवन करने पर वह संस्कृत और प्राकृत का कवि तथा काव्यशास्त्र आदि का ज्ञाता बनता है।

Frequently Asked Questions

The chapter emphasizes precise mantra-phonemic methodology (varṇamālā from ‘a’ to ‘kṣa’ with a 100,000-japa target) and exact maṇḍala engineering—lotus divisions, pathways (vīthikā/padikā), door and corner-band construction, and specific color placements—linking ritual efficacy to correct design and sequence.

It disciplines speech and cognition by sacralizing sound (akṣara/varṇa) as a contemplative current entering the body, while placing learning and artistry under dharmic ritual control (dīkṣā, secrecy, homa). The promised fruit—poetic and śāstric mastery—functions as bhukti aligned with mukti through regulated practice, purity, and devotion to Sarasvatī-śakti.