Adhyaya 301
Mantra-shastraAdhyaya 30126 Verses

Adhyaya 301

Chapter 301 — सूर्यार्चनं (Sūryārcana) / Sun-worship (closing colophon only)

यह अंश पूर्व इकाई के समापन-कोलोफ़ोन को सुरक्षित रखता है, जिसमें अध्याय 301 का नाम ‘सूर्यार्चन’ (सूर्य-पूजा) बताया गया है। आग्नेय परंपरा में सूर्य-उपासना ऋत/धर्म और कर्म-सिद्धि के बीच सेतु है; सूर्य को काल-नियन्ता, प्राणशक्ति और विवेक-प्रकाश का दाता मानकर आवाहन किया जाता है। यह संक्रमण साधक को अगले अध्याय के अधिक तकनीकी मन्त्र-प्रयोग, होम आदि के लिए शुद्धि, अधिकार और ऊर्जात्मक समंजन प्रदान करता है; पुराण का संकेत है कि भक्ति और तान्त्रिक कर्म-विज्ञान अलग नहीं, बल्कि भक्ति ही उसका आधार है।

Shlokas

Verse 1

इत्य् आग्नेये महापुराणे सूर्यार्चनं नाम त्रिशततमो ऽध्यायः अथैकाधिकत्रिशततमो ऽध्यायः नानामन्त्राः अग्निर् उवाच वाक्कर्मपार्श्वयुक्शुक्रतोककृते मतो प्लवः हुतान्ता देशवर्णेयं विद्या मुख्या सरस्वती

इस प्रकार आग्नेय महापुराण में ‘सूर्यार्चन’ नामक त्रिशततम अध्याय समाप्त हुआ। अब एकाधिकत्रिशततम (अगला) अध्याय ‘नानामन्त्र’ आरम्भ होता है। अग्नि बोले—वाणी और कर्मों की सिद्धि, उनके सहायक अंगों सहित, तथा शुक्र-तोक (संतति) और प्राणबल के लिए ‘प्लव’ नामक रक्षक मन्त्र-प्रयोग कहा गया है। होम-पर्यन्त वर्णनीय यह विद्या मुख्य है; वही सरस्वती है।

Verse 2

धार्य चेति ख विद्युत्पातविधाविति घ , ज , ञ , ट च अक्षाराशी वर्णलक्षं जपेत् समतिमान् भवेत् अत्रिः सवह्निर्वामाक्षिविन्दुरिन्द्राय हृत्परः

विद्युत्पात-विधि में ‘धार्य’ सहित ‘ख’ तथा ‘घ, ज, ञ, ट’ इन अक्षरों के समूह का जप करे। इस अक्षर-राशि का एक लाख जप करने से मन सम और बुद्धि स्थिर होती है। ऋषि अत्रि, शक्ति अग्नि, लक्षण बाएँ नेत्र पर बिंदु, देवता इन्द्र और विनियोग हृदय में है।

Verse 3

वज्रपद्मधरं शक्रं पीतमावाह्य पूजयेत् नियुतं होमयेदाज्यतिलांस्तेनाभिषेचयेत्

वज्र और पद्म धारण करने वाले पीतवर्ण शक्र (इन्द्र) का आवाहन कर पूजन करे। फिर घृत और तिल से नियुत संख्या में होम करे; उसी से अभिषेक करे।

Verse 4

नृपादिर्भ्रष्टरज्यादीन्राज्यपुत्रादिमाप्नुयात् हृल्लेखा शक्तिदेवाख्या दोषाग्निर्दण्डिदण्डवान्

राज्य से भ्रष्ट हुआ राजा आदि पुनः राज्य, राजपुत्र आदि को प्राप्त कर सकता है। (ये फल) ‘हृल्लेखा, शक्ति, देवाख्या, दोषाग्नि, दण्डिन्/दण्डवान्’ नामक लक्षणों से सूचित हैं।

Verse 5

शिवमिष्ट्वा जपेच्छक्तिमष्टम्यादिचतुर्दशीं चक्रपाशाङ्कुशधरां साभयां वरदायिकां

पहले शिव की पूजा करके अष्टमी और चतुर्दशी को शक्ति का जप करे; उन्हें चक्र, पाश और अंकुश धारण करने वाली, अभय देने वाली और वर प्रदान करने वाली रूप में ध्याए।

Verse 6

होमादिना च सौभाग्यं कवित्वं पुरवान् भवेत् ॐ ह्रीं ॐ नमः कामाय सर्वजनहिताय सर्वजनमोहनाय प्रज्वलिताय सर्वजनहृदयं ममात्मगतं कुरु ॐ एतज्जपादिना मन्त्रओ वशयेत् सकलं जगत्

होम आदि कर्मों से सौभाग्य प्राप्त होता है; कवित्व आता है और पुर-सम्पदा (नगर-समृद्धि) भी मिलती है। मंत्र: “ॐ ह्रीं। ॐ नमः कामाय—सर्वजनहिताय, सर्वजनमोहनाय, प्रज्वलिताय; सर्वजनहृदयं मम आत्मगतं कुरु। ॐ।” इस मंत्र के जप आदि से समस्त जगत् को वशीभूत किया जा सकता है।

Verse 7

ॐ ह्रीं चामुण्डे अमुकन्दह पच मम वशमानय ठ वशीकरणकृन्मन्त्रश्चामुण्डायाः प्रकीर्तितः फलत्रयकषायेण वराङ्गं क्षालयेद्वशे

ॐ ह्रीं—हे चामुण्डे! ‘अमुक’ को दह, पच, मेरे वश में ला—‘ठ’! यह चामुण्डा का वशीकरण-मंत्र कहा गया है। वशीकरण हेतु त्रिफला के कषाय से श्रेष्ठ अंग/देह को धोए।

Verse 8

अश्वगन्धायवैः स्त्री तु निशाकर्पूरकादिना पिप्पलीतण्डुलान्यष्टौ मरिचानि च विंशतिः

स्त्री के लिए अश्वगंधा और यव के साथ, निशा (हल्दी) तथा कर्पूर आदि मिलाकर प्रयोग करें; पिप्पली के आठ दाने और मरिच (काली मिर्च) के बीस दाने मिलाए जाएँ।

Verse 9

वृहतीरसलेपश् च वशे स्यान्मरणान्तिकं कटीरमूलत्रिकटुक्षौद्रलेपस् तथा भवेत्

वृहती और रस से बना लेप वशीकरण करता है, यहाँ तक कि मरण-सीमा तक। इसी प्रकार कटीर-मूल, त्रिकटु और क्षौद्र (मधु) से बना लेप भी कहा गया है।

Verse 10

हिमं कपित्थकरभं मागधी मधुकं मधु तेषां लेपः प्रयुक्तस्तु दम्पत्योः स्वस्तिमावहेत्

हिम, कपित्थ, करभ, मागधी, मधुक और मधु—इनसे बना लेप जब लगाया जाए, तो दम्पति के लिए कल्याण और शुभता लाता है।

Verse 11

सशर्करयोनिलेपात् कदम्बरसको मधु सहदेवी महालक्ष्मीः पुत्रजीवी कृताञ्जलिः

सशर्करा-योनि-लेप, कदम्ब-रसक, मधु, सहदेवी, महालक्ष्मी, पुत्रजीवी और कृताञ्जलि—ये यहाँ औषधि-नाम/द्रव्य के रूप में उल्लिखित हैं।

Verse 12

एतच्चूर्णं शिरःक्षिप्तं लिकस्य वशमुत्तमम् त्रिफलाचन्दनक्वाथप्रस्था द्विकुडवम् पृथक्

यह चूर्ण सिर पर छिड़कने से प्रिय को वश में करने का उत्तम उपाय है। त्रिफला और चन्दन का काढ़ा बनाना चाहिए—प्रस्थ प्रमाण में, और दोनों को अलग-अलग दो कुडव मात्रा में लेना चाहिए।

Verse 13

भृङ्गहेमरसन्दोषातावती चुञ्चुकं मधु घृतैः पक्वा निशा छाया शुष्का लिप्या तु रञ्जनी

भृङ्ग, हेम-रस और सन्दोषा के साथ तावती और चुञ्चुक मिलाकर, मधु और घृत में पकाकर एक योग बनता है। इसी प्रकार निशा और छाया को सुखाकर लेप बनाकर रंजन (रंग/डाई) के लिए लगाना चाहिए।

Verse 14

विदारीं सोच्चटामाषचूर्णीभ्ह्तां सशर्करां गथितां यः विपेत् क्षीरैर् नित्यं स्त्रीशतकं व्रजेत्

जो विदारी को उच्छटा सहित, माष (उड़द) के चूर्ण और शर्करा के साथ मिलाकर गोली/पिण्ड बनाकर, उसे दूध के साथ नित्य पीता है, वह सौ स्त्रियों तक जाने की सामर्थ्य (अत्यधिक वीर्य) प्राप्त करता है।

Verse 15

गुल्ममाषतिलव्रीहिचूर्णक्षीरसितान्वितं अश्वत्थवंशदर्भाणां मूलं वै वैष्णवीश्नियोः

गुल्म (उदर-गाँठ/गाठ) में माष, तिल और व्रीहि के चूर्ण को दूध और शर्करा के साथ मिलाकर प्रयोग करना चाहिए। साथ ही अश्वत्थ, वंश (बाँस) और दर्भ के मूल, तथा वैष्णवी और श्नी नामक औषधियों का भी उपयोग करना चाहिए।

Verse 16

मूलं दूर्वाश्वगन्धोत्थं पिवेत् क्षीरैः सुतार्थिनी कौन्तीलक्ष्म्याः शिफा धात्री वज्रं लोघ्नं वटाङ्कुरम्

पुत्रार्थिनी स्त्री दूर्वा और अश्वगन्धा के मूल को दूध के साथ पीए। साथ ही कौन्ती-लक्ष्मी की शिफा (कलगी/शिखा), धात्री (आँवला), वज्र, लोघ्न और वट (बरगद) का अंकुर—इन औषधियों का भी सेवन करे।

Verse 17

आज्यक्षीरमृतौ पेयं पुत्रार्थं त्रिदिवं स्त्रिया पुत्रार्थिनी पिवेत् क्षीरं श्रीमूलं सवटाङ्कुरम्

पुत्र-प्राप्ति के लिए स्त्री को ऋतु (उर्वर काल) की तीन रात्रियों में घी और दूध का मिश्रण पीना चाहिए। पुत्रार्थिनी को श्रीमूल तथा वट के अंकुरों से संस्कारित दूध पीना चाहिए।

Verse 18

श्रीवडाङ्कुरदेवीनां रसं नस्ये विपेच्च सा श्रीपद्ममूलमुत्क्षीरमश्वत्थोत्तरमूलयुक्

वह श्रीवडाङ्कुर-देवी वनस्पतियों का निचोड़ा हुआ रस नस्य के रूप में नासिका में डाले। यह रस श्रीपद्म (कमल) की जड़, दूध तथा अश्वत्थ (पीपल) की ऊपरी जड़ के साथ संयुक्त हो।

Verse 19

तरलं पयसा युक्तं कार्पासफलपल्ल्वं अपामार्गस्य पुष्पाग्रं नवं समहिषीपयः

उस योग को दूध से पतला करके, कपास-फल के कोमल पल्लव तथा अपामार्ग के ताजे पुष्प-शिखर, और साथ में ताजा भैंस का दूध मिलाए।

Verse 20

पुत्रार्थञ्चार्धषट्शाकैर् योगाश् चत्वार ईरिताः शर्करोत्पलपुष्पाक्षलोध्रचन्दनसारिवाः

पुत्र-प्राप्ति हेतु अर्ध-षट्-शाक (छः शाक-मात्रा का आधा) प्रमाण से चार योग बताए गए हैं। उनमें शर्करा, उत्पल (नील-कमल), पुष्पाक्ष, लोध्र, चन्दन और सारिवा का प्रयोग होता है।

Verse 21

स्रवमाणे स्त्रिया गर्भे दातव्यास्तण्डुलाम्भसा लाजा यष्टिसिताद्राक्षाक्षौद्रसर्पींषि वा लिहेत्

स्त्री के गर्भ में स्राव (रक्त/रस) होने पर उसे तण्डुल-जल (चावल का माड़) के साथ लाजा (भुना धान) देना चाहिए। अथवा वह यष्टिमधु, शर्करा, द्राक्षा, मधु और घी का मिश्रण चाटे।

Verse 22

अटरुषकलाङ्गुल्यः काकमाच्याः शिफा पृथक् नाभेरधः समालिप्य प्रसूते प्रमदा सुखम्

अटरुष, कलाङ्गुली और काकमाची के फल/शिफा का अलग-अलग लेप बनाकर नाभि के नीचे लगाने से स्त्री सुखपूर्वक प्रसव करती है।

Verse 23

रक्तं शुक्लं जावापुष्पं रक्तशुक्लस्त्रुतौ पिवेत् केशरं वृहतीमूलं गोपीयष्टितृणोत्पलम्

रक्त या श्वेत स्राव होने पर लाल और सफेद—दोनों प्रकार के जावा-पुष्प का काढ़ा, केसर, वृहती-मूल, गोपी-यष्टि, तृण (औषधीय घास) और उत्पल के साथ पीना चाहिए।

Verse 24

साजक्षीरं सतैलं तद्भक्षणं रोमजन्मकृत् शीर्यमाणेषु केशेषु स्थापनञ्च भवेदिदम्

बकरी के दूध और तेल के साथ इसका सेवन करने से शरीर के रोम उगते हैं; और झड़ते हुए केशों में यह उन्हें स्थिर कर पुनः स्थापित करता है।

Verse 25

धात्रीभृङ्गरसप्रस्थतैलञ्च क्षिरमाढकम् ॐ नमो भगवते त्र्यम्बकाय उपशमय चुलु मिलि भिद गोमानिनि चक्रिणि ह्रूं फट् अस्मिन् ग्रामे गोकुलस्य रक्षां कुरु शान्तिं कुरु घण्डाकर्णो महासेनो वीरः प्रोक्तो महाबलः

धात्री (आँवला) और भृङ्गराज के रस से युक्त एक प्रस्थ तेल तथा एक आढक दूध लेकर विधि से तैयार करे। फिर जपे—“ॐ नमो भगवते त्र्यम्बकाय, उपशमय; चुलु मिलि भिद; हे गोमानिनि, हे चक्रिणि; ह्रूं फट्; इस ग्राम में गोकुल की रक्षा करो, शान्ति करो।” घण्डाकर्ण, महासेन—महाबलवान वीर—की भी आवाहना है।

Verse 26

मारीनिर्नाशनकरः स मां पातु जगत्पतिः श्लोकौ चैव न्यसेदेतौ मन्त्रौ गोरक्षकौ पृथक्

जो मारी (महामारी) का नाश करने वाले जगत्पति हैं, वे मेरी रक्षा करें। इन दोनों श्लोकों का पृथक् न्यास करे—ये गौ-रक्षा के दो अलग मंत्र हैं।

Frequently Asked Questions

Sūrya symbolizes regulated time, vitality, and clarity; Sun-worship frames the practitioner’s discipline before entering specialized mantra and homa procedures.

It reinforces devotion and alignment with cosmic order, making worldly ritual aims subordinate to dharma and supportive of inner purification.