Adhyaya 323
Mantra-shastraAdhyaya 32313 Verses

Adhyaya 323

Chapter 323 — The Six-Limbed Aghora Astras (षडङ्गान्यघोरस्त्राणि)

यह अध्याय षडङ्गयुक्त अघोरास्त्र-मंत्र का संक्षिप्त, तकनीकी सूत्र देकर समाप्त होता है, जिसका प्रयोग बलपूर्वक रक्षात्मक निराकरण हेतु किया जाता है। आग्नेय मंत्र-शास्त्र परंपरा में ‘अस्त्र’ को विधिपूर्वक जाग्रत किया गया कर्म-साधन माना गया है, जिसकी प्रभावशीलता शुद्ध उच्चारण, संकल्प और अङ्ग/न्यास-रचना में सही विन्यास पर निर्भर है। रुद्र-शांति से ठीक पहले इसका स्थान एक शिक्षात्मक क्रम बनाता है—पहले संकट-निवारक तीक्ष्ण अपोत्प्रासक मंत्र-प्रौद्योगिकी, फिर शांति, पुनर्स्थापन और स्थिरीकरण के कर्म। इस प्रकार अध्याय आक्रामक संरक्षण से सामंजस्यकारी उपचार तक सेतु बनकर, शुद्धि, सुरक्षा और आध्यात्मिक तैयारी की धर्मिक निरंतरता में मंत्र-क्रियाओं का समन्वय दिखाता है।

Shlokas

Verse 1

उरूप चट प्रचट कट वम घातय हूं फट् अघोरास्त्रम् इत्य् आग्नेये महापुराणे षडङ्गान्यघोरस्त्राणि नाम द्वाविंशत्यधिकत्रिशततमो ऽध्यायः अथ त्रयोविंशत्यधिकत्रिशततमो ऽध्यायः रुद्रशान्तिः ईश्वर उवाच शिवशान्तिं प्रवक्ष्यामि कल्पाघोरप्रपूर्वकम् सप्तकोट्यधिपो घोरो ब्रह्महत्याद्यघार्दनः

‘उरूप, चट्, प्रचट्, कट्, वम्, घातय, हूं, फट्’—यह अघोरास्त्र-मन्त्र है। इस प्रकार अग्नि-महापुराण में ‘षडङ्ग-अघोरास्त्र’ नामक 323वाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब 324वाँ अध्याय ‘रुद्रशान्ति’ आरम्भ होता है। ईश्वर बोले: “मैं अघोर-कल्प से पूर्ववर्ती शिव-शान्ति का विधान कहूँगा। सात कोटि गणों के अधिपति, भयानक (अघोर) रुद्र, ब्रह्महत्या आदि पापों का नाशक है।”

Verse 2

उत्तमाधमसिद्धीणामालयो ऽखिलरोगनुत् दिव्यान्तरीक्षभौमानामुत्पातानां विमर्दनः

वह उत्तम और अधम—सभी सिद्धियों का आश्रय है, समस्त रोगों का नाशक है, और दिव्य, आकाशीय तथा भौम—इन तीनों से उत्पन्न उत्पातों का दमन करने वाला है।

Verse 3

विषग्रहपिशाचानां ग्रसनः सर्वकामकृत् प्रायश्चित्तमघौघार्तौ दौर्भाग्यार्तिविनाशनम्

यह विष, ग्रहदोष और पिशाचों को ‘ग्रस’ कर निष्प्रभाव करता है, तथा समस्त कामनाओं को पूर्ण करता है। पापसमूह से पीड़ित होने पर यह प्रायश्चित्त है और दुर्भाग्यजन्य पीड़ा का विनाशक है।

Verse 4

एकवीरन्तु विन्यस्य ध्येयः पञ्चमुखः सदा ब्रह्महर्यादिमर्दन इति ख शान्तिके पौष्टिके शुक्लो रक्तो वश्ये ऽथ पीतकः

एकवीर का न्यास करके सदा पंचमुख देव का ध्यान करे, जिनका नाम “ब्रह्म-हरि आदि का मर्दन करने वाला” है। शान्ति और पौष्टिक कर्म में उन्हें श्वेत, वश्य कर्म में पीत, तथा परम्परा के अनुसार रक्त वर्ण में भी कल्पित करे।

Verse 5

स्तम्भने धूम्र उच्चाटमारणे कृष्णवर्णकः कर्षणः कपिलो मोहे द्वात्रिंशद्वर्णमर्चयेत्

स्तम्भन कर्म में धूम्र (धूसर) वर्ण से, उच्चाटन और मारण कर्म में कृष्ण वर्ण से, कर्षण कर्म में कपिल (ताम्र-भूरा) वर्ण से, और मोह कर्म में बत्तीस वर्णों के समूह द्वारा पूजा करे।

Verse 6

त्रिंशल्लक्षं जपेन्मन्त्रं होमं कुर्याद्दशांशतः गुग्गुलामृतयुक्तेन सिद्धो ऽसिद्धो ऽथ सर्वकृत्

मंत्र का तीस लक्ष जप करे और उसके दशांश के बराबर हवन करे। गुग्गुल और अमृत से युक्त आहुतियों द्वारा साधक सिद्ध हो जाता है; जो पहले असिद्ध था वह भी समर्थ होकर सब कार्य सिद्ध करने वाला बनता है।

Verse 7

अघोरान्नापरो मन्त्रो विद्यते भुक्तिमुक्तिकृत् अब्रह्मचारी ब्रह्मचारी अस्नातः स्नातको भवेत्

अघोर से बढ़कर कोई मंत्र नहीं—यह भुक्ति और मुक्ति देने वाला है। इसके प्रभाव से अब्रह्मचारी भी ब्रह्मचारी हो जाता है और अस्नात भी स्नातक (शुद्ध) के समान हो जाता है।

Verse 8

अघोरास्त्रमघोरन्तु द्वाविमौ मन्त्रराजकौ जपहोमार्चनाद्युद्धे शत्रुसैन्यं विमर्दयेत्

‘अघोरास्त्र’ और ‘अघोर’—ये दोनों मंत्रराज हैं। जप, होम, अर्चन आदि के प्रयोग से, और युद्ध में भी, शत्रु-सैन्य का विनाश/मर्दन किया जा सकता है।

Verse 9

रुद्रशान्तिं प्रवक्ष्यामि शिवां सर्वार्थसाधनीं पुत्रर्थं ग्रहनाशार्थं विषव्याधिविनष्टये

अब मैं रुद्र-शान्ति का वर्णन करता हूँ—जो शिवमयी, मंगलकारी और समस्त प्रयोजनों को सिद्ध करने वाली है; यह पुत्र-प्राप्ति, ग्रहदोष-निवारण तथा विष और रोगों के विनाश हेतु की जाती है।

Verse 10

दुर्भिक्षमारीशान्त्यर्थे दुःस्वप्नहरणाय च बलादिराज्यप्राप्त्यर्थं रिपूणां नाशनाय च

दुर्भिक्ष और महामारी की शान्ति के लिए, तथा दुःस्वप्नों के निवारण हेतु; बल और राज्य-प्राप्ति के लिए, और शत्रुओं के विनाश के लिए भी (यह कर्म किया जाता है)।

Verse 11

अकालफलिते वृक्षे सर्वग्रहविमर्दने पूजने तु नमस्कारः स्वाहान्तो हवने तथा

जब किसी वृक्ष में अकाल फल लगें—जो समस्त ग्रहों के विक्षोभ का सूचक है—तब पूजन में नमस्कार (साष्टाङ्ग प्रणाम) किया जाए; और हवन में आहुति-मन्त्र का अंत ‘स्वाहा’ से किया जाए।

Verse 12

आप्यायने वषट्कारं पुष्टौ वौषन्नियोजयेत् चकारद्वितयस्थाने जातियोगन्तु कारयेत्

आप्यायन (पोषण/तृप्ति) के कर्म में ‘वषट्’ का प्रयोग करे; और पुष्टि (वृद्धि-समृद्धि) के कर्म में ‘वौषट्’ का नियोजन करे। जहाँ ‘च’ का द्वित्व हो, वहाँ उपयुक्त जाति-वर्ण से संधि (जातियोग) कराए।

Verse 13

ॐ रुद्राय च ते ॐ वृषभाय नमः अविमुक्ताय असम्भवाय पुरुषाय च पूज्याय ईशानाय पौरुषाय पञ्च चोत्तरे विश्वरूपाय करालाय विकृतरूपाय अविकृतरूपाय विकृतौ चापरे काले अप्सु माया च नैरृते अ सर्वभूतसुखप्रद वायुपत्रे ऽथ नियतौ पुरुषे चोत्तरेन च सर्वसान्निध्यकर ब्रह्मविष्णुरुद्रपर अनर्चित अस्तुतस्तु च साक्षिन तुरु पतङ्ग पिङ्ग ज्ञान शब्द सूक्ष्म शिव सर्वप्रद ॐ नमःशिवाय ॐ नमो नमः शिवाय ॐ नमो नमः ईशाने प्राकृते तत्त्वे पूजयेज्जुहुयाज्जपेत् ग्रहरोगादिमायार्तिशमनी सर्वसिद्धिकृत्

“ॐ रुद्राय च ते; ॐ वृषभाय नमः। अविमुक्त, असम्भव, पूज्य पुरुष, ईशान, पौरुष—और पाँचोत्तर (नामों सहित); विश्वरूप, कराल, विकृतरूप, अविकृतरूप, तथा जो परकाल में पुनः विकार प्रकट करता है; जलों में स्थित माया, और नैऋत (दक्षिण-पश्चिम) की शक्ति; समस्त भूतों को सुख देने वाला; ‘वायुपत्र’ में, तथा नियत पुरुष में, और उत्तर (दिशा/मुख) में भी; सर्वसान्निध्यकर, ब्रह्मा-विष्णु-रुद्रपर; अनर्चित होकर भी स्तुत्य; साक्षी; तुरु, पतङ्ग, पिङ्ग; ज्ञान, शब्द, सूक्ष्म; शिव, सर्वप्रद। ‘ॐ नमः शिवाय; ॐ नमो नमः शिवाय; ॐ नमो नमः ईशाने।’ ईशान के प्राकृत तत्त्व में इसका पूजन, हवन और जप करे—यह ग्रह, रोग आदि तथा माया-जन्य पीड़ाओं को शान्त कर, समस्त सिद्धियाँ प्रदान करता है।”

Frequently Asked Questions

It presents the Aghorāstra-weapon mantra and frames it within a six-limbed (ṣaḍaṅga) mantra-technology used for protection and forceful neutralization.

By emphasizing disciplined mantra-use for protection and purification, it supports dharmic stability (safer ritual space and mind), which the text treats as a prerequisite for higher sādhana and liberation-oriented practice.