Adhyaya 314
Mantra-shastraAdhyaya 31414 Verses

Adhyaya 314

Adhyaya 314 — Tvaritājñāna (Immediate/Quick Knowledge) (Colophon/Transition)

यह अध्याय यहाँ केवल अपने समापन-कोलोफ़न के रूप में प्रस्तुत है, जो ‘त्वरिताज्ञान’ नामक विद्या-खण्ड की पूर्णता बताता है। आग्नेय परंपरा में यह कोलोफ़न एक संरचनात्मक संधि है—एक विद्या-मॉड्यूल को बंद कर तुरंत अगले तकनीकी क्रम की ओर ले जाता है। मन्त्र-शास्त्र (तंत्र) काण्ड में ऐसे संक्रमण पाठ्यक्रम-क्रम को सूचित करते हैं; त्वरित ज्ञान आगे चलकर मंत्र-प्रयोग-विधियों में प्रवृत्त करता है। कथानक वही रहता है—भगवान अग्नि उपदेशक और वसिष्ठ ग्रहणकर्ता—जिससे स्पष्ट है कि ‘शीघ्र उपाय’ भी धर्मसम्मत शिक्षण का अंग हैं, स्वतंत्र जादुई नुस्खे नहीं।

Shlokas

Verse 1

इत्य् आग्नेये महापुराणे त्वरिताज्ञानं नाम त्रयोदशाधिकत्रिशततमो ऽध्यायः अथ चतुर्दशाधिकत्रिशततमो ऽध्यायः स्तम्भनादिमन्त्राः अग्निर् उवाच स्तम्भनं मोहनं वश्यं विद्वेषोच्चाटनं वदे विषव्याधिमरोगञ्च मारणं शमनं पुनः

इस प्रकार आग्नेय महापुराण में ‘त्वरिताज्ञान’ नामक तीन सौ चौदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब तीन सौ पंद्रहवाँ अध्याय ‘स्तम्भनादि मन्त्र’ आरम्भ होता है। अग्नि बोले—मैं स्तम्भन, मोहन, वश्य, विद्वेष और उच्चाटन, विष-निवारण, व्याधि-रोग-हरण, तथा मारण और शमन—इन सबका क्रम से वर्णन करूँगा।

Verse 2

भूर्जे कूर्मं समालिख्य ताडनेन षड्ङ्गुलम् मुखपादचतुर्ष्केषु ततो मन्त्रं न्यसेद्द्विजः

भोजपत्र पर कूर्म का चित्र बनाकर, ताड़न द्वारा उसका प्रमाण छः अंगुल (छः उँगली-भर) कर ले। फिर द्विज उसके मुख और चारों पादों के चतुष्क पर मन्त्र का न्यास करे।

Verse 3

चतुष्पादेषु क्रीं कारं ह्रीं कारं मुखमध्यतः गर्भे विद्यां ततो लिख्य साधकं पृष्ठतो लिखेत्

चारों पादों पर ‘क्रीं’कार लिखे और मुख के मध्य में ‘ह्रीं’कार। फिर गर्भ (मध्य-कोर) में विद्या (मन्त्र) लिखकर, पीछे की ओर ‘साधक’ शब्द लिखे।

Verse 4

मालामन्त्रैस्तु संवेष्ट्य इष्टकोपरि सन्न्यमेत् विधाय कूर्मपृष्ठेन करालेनाभिसम्पठेनत्

मालामन्त्रों से उसे लपेटकर (संवेष्टित करके) इष्टका (अभिमन्त्रित ईंट) के ऊपर स्थापित करे। फिर कूर्मपृष्ठ-विन्यास करके ‘कराल’ से विधिपूर्वक अभिसम्पाठ करे।

Verse 5

महाकूर्मं पूजयित्वा पादप्रोक्षन्तु निक्षिपेत् ताडयेद्वामपादेन स्मृत्वा शत्रुञ्च सप्तधा

महाकूर्म का विधिपूर्वक पूजन करके, पादोदक से उसे प्रोक्ष्य (छिड़ककर) उस वस्तु को स्थापित करे। फिर शत्रु का स्मरण करके बाएँ पाँव से सात बार प्रहार करे।

Verse 6

ततः सञ्जायते शत्रोस्तम्भनं मुखरागतः कृत्वा तु भैरवं रूपं मालामन्त्रं समालिखेत्

तत्पश्चात् मुखोच्चारित कर्म से शत्रु का स्तम्भन उत्पन्न होता है। भैरव-रूप बनाकर फिर माला-मन्त्र को लिखे।

Verse 7

ॐ शत्रुसुखस्तम्भनी कामरूपा आलीढकरी ह्रीं फें फेत्कारिणी मम शत्रूणां देवदत्तानां मुखं स्तम्भय मम सर्वविद्वेषिणां मुखस्तम्भनं कुरु ॐ हूं फें फेत्कारिणि स्वाहा फट् हेतुञ्च समालिख्य तज्जपान्तं महाबलं वामेनैव नगं शूलं संलिखेद्दक्षिणे करे

“ॐ। शत्रुओं के सुख को स्तम्भित करने वाली, इच्छानुसार रूप धारण करने वाली, आलीढ-स्थिता, ह्रीं, फें—हे फेत्कारिणी! मेरे शत्रुओं, देवदत्तों के मुख (वाणी) को स्तम्भित कर; मेरे सब द्वेषियों का मुख-स्तम्भन कर। ॐ हूं फें, हे फेत्कारिणी—स्वाहा; फट्।” ‘हेतु’ चिह्न/बीज भी लिखकर, इस मन्त्र का जप पूर्ण करे—यह महाबलशाली होता है। बाएँ से पर्वत और त्रिशूल अंकित करे और दाहिने हाथ पर भी लिखे।

Verse 8

लिखेन्मन्त्रमघोरस्य संग्रामे स्तम्भयेदरीन् ॐ नमो भगवत्यै भगमालिनि विस्फुर स्पन्द नित्यक्लिन्ने द्रव हूं सः क्रीं काराक्षरे स्वाहा एतेन रोचनाद्यैस्तु तिलकाम्मोहयेज्जगत्

अघोर का मन्त्र लिखे; कहा गया है कि युद्ध में इससे शत्रु स्तम्भित होते हैं—“ॐ नमो भगवत्यै भगमालिनि, विस्फुर, स्पन्द; नित्यक्लिन्ने, द्रव; हूं सः क्रीं, काराक्षरे, स्वाहा।” इस मन्त्र से रोचना आदि रंगद्रव्यों द्वारा तिलक बनाकर जगत् को मोहित करे।

Verse 9

ॐ फें हूं फट् फेत्कारिणि ह्रीं ज्वल त्रैलोक्यं मोहय गुह्यकालिके स्वाहा अनेन तिलकं कृत्वा राजादीनां वशीकरं गर्धभस्य रजो गृह्य कुसुमं सूतकस्य च

“ॐ फें हूं फट्—हे फेत्कारिणी! ह्रीं! ज्वल; त्रैलोक्य को मोहित कर; हे गुह्यकालिके—स्वाहा।” इस मन्त्र से तिलक बनाकर राजाओं आदि का वशीकरण होता है। (इस कर्म हेतु) गधे की धूल तथा सूतक पौधे का पुष्प ग्रहण करे।

Verse 10

नारीरजः क्षिपेद्रात्रौ शय्यादौ द्वेषकृद्भवेत् गोखुरञ्च तथा शृङ्गमश्वस्य च खुरं तथा

रात्रि में शय्या आदि पर स्त्री का रजः (मासिक रक्त) पड़ जाए तो वह द्वेष/घृणा उत्पन्न करने वाला, अपवित्र माना जाता है। उसे हटाने हेतु गो-खुर, शृंग तथा अश्व-खुर से खुरचकर शुद्धि की जाती है।

Verse 11

शिरः सर्पस्य संक्षिप्तं हृहेषूच्चाटनं भवेत् करवीरशिफा पीता ससिद्धार्था च मरणे

सर्प का सिर बाँधकर/दबाकर रखने से घरों में उच्चाटन (भगाने) का प्रभाव होता है, ऐसा कहा गया है। पीली करवीर की कली तथा सिद्धार्थ (श्वेत सरसों) मरण (घातक) कर्म में विहित हैं।

Verse 12

व्यालछुच्छुन्दरीरक्तं करवीरं तदर्थकृत् सरटं षट्पदञ्चापि तथा कर्कटवृश्चिकम्

उसी प्रयोजन (प्रतिविधान/उपचार) के लिए छुछुन्दरी (मूषक) का रक्त, करवीर, सरट (रेंगने वाला कीट), षट्पद (मधुमक्खी) तथा कर्कट और वृश्चिक से सम्बन्धित द्रव्य प्रयोग में लाए जाएँ।

Verse 13

चूर्णीकृत्य क्षिपेत्तैले तदभ्यङ्गश् च कुष्ठकृत् ॐ नवरहाय सर्वशत्रून् मम साधय मारय ॐ सों मं वुं चुं ॐ शं वां कें ॐ स्वहा अनेनार्कशतैर् अर्च्य श्मशाने तु निधापयेत्

इसे चूर्ण करके तेल में डालें; उस तेल का अभ्यंग करने से कुष्ठ उत्पन्न होता है, ऐसा कहा गया है। (मंत्र:) “ॐ नवरहाय सर्वशत्रून् मम साधय मारय। ॐ सों मं वुं चुं; ॐ शं वां कें; ॐ स्वाहा।” इस मंत्र से सौ बार अर्क-पूजन करके, उसे श्मशान में गाड़ दें।

Verse 14

भूर्जे वा प्रतिमायां वा मारणाय रिपोर्ग्रहाः ॐ कुञ्जरी ब्रह्माणी ॐ मञ्जरी माहेश्वरी ॐ वेताली कौमारी ॐ काली वैष्णवी ॐ अघोरा वाराहि ॐ वेताली इन्त्राणी उर्वशी ॐ जयानी यक्षिणी नवमातरो हे मम शत्रुं गृह्णत भूर्जे नाम रिपोर्लिख्य श्मशाने पूजिते म्रियेत्

शत्रु के मरण हेतु भूर्जपत्र या प्रतिमा पर इन ग्रह-शक्तियों का प्रयोग करें—“ॐ कुञ्जरी ब्रह्माणी, ॐ मञ्जरी माहेश्वरी, ॐ वेताली कौमारी, ॐ काली वैष्णवी, ॐ अघोरा वाराहि, ॐ वेताली इन्द्राणी, ॐ उर्वशी, ॐ जयानी यक्षिणी। हे नवमातृगण, मेरे शत्रु को ग्रहण करो।” भूर्जपत्र पर शत्रु का नाम लिखकर श्मशान में पूजन करने से वह मरता है, ऐसा कहा गया है।

Frequently Asked Questions

It emphasizes textual closure and curricular continuity—ending Tvaritājñāna and preparing the reader for the next applied mantra section without breaking the Agni–Vasiṣṭha revelation frame.

By placing rapid techniques within a structured dharmic curriculum, it implies that speed or efficacy must remain accountable to right order, restraint, and the broader puruṣārtha framework.