Dharma-shastra
DharmaVarnaAshramaEthics

Dharma-shastra

Laws of Righteous Conduct

Exposition of dharma-shastra covering varnadharma, ashrama duties, samskaras, purification rites, and ethical codes for society.

Adhyayas in Dharma-shastra

Adhyaya 150

Chapter 150 — Manvantarāṇi (The Manvantaras) and the Purāṇic Map of Vedic Transmission

भगवान् अग्नि धर्मप्रधान विश्व-व्यवस्था का क्रमबद्ध वर्णन करते हुए मन्वन्तरों की गणना करते हैं—हर मन्वन्तर में मनु, इन्द्र, देवगण, सप्तर्षि और पृथ्वी पर धर्म-व्यवस्था को धारण करने वाली प्रजा का उल्लेख होता है। स्वायम्भुव आदि प्राचीन चक्रों से लेकर वर्तमान श्राद्धदेव/वैवस्वत मनु तथा उनके सप्तर्षियों तक, और आगे सावर्णि आदि भविष्य के मनुओं तक बताते हुए वे कहते हैं कि ब्रह्मा के एक दिन में ऐसे चौदह मन्वधिकार होते हैं। फिर द्वापर-युग के अंत में हरि द्वारा आदिवेद के विभाजन, चारों वेदों में याज्ञिक कर्तव्यों के नियोजन, तथा व्यास के शिष्यों—पैल, वैशम्पायन, जैमिनि, सुमन्तु—और उनकी परम्पराओं व शाखाओं में वेद-परम्परा के प्रवाह का निरूपण करते हैं। इस प्रकार ब्रह्माण्डीय चक्र और शास्त्रीय वंश-परम्परा दोनों यज्ञ, ज्ञान और धर्म की रक्षा करने वाली एक ही सुव्यवस्थित धारा के रूप में दिखते हैं।

31 verses

Adhyaya 151

Duties outside the Varṇa Order (वर्णेतरधर्माः) — Agni Purana, Chapter 151

यह अध्याय परम्परा-प्रवचन से आरम्भ होता है: अग्नि कहते हैं कि वे मनु आदि धर्मशास्त्रकारों द्वारा बताए गए, भुक्ति और मुक्ति देने वाले धर्मों का वर्णन करेंगे, जो वरुण और पुष्कर के माध्यम से परशुराम तक पहुँचे। फिर पुष्कर ‘वर्णाश्रम-एतर’ धर्मों—अर्थात् वर्ण-आश्रम से परे/पूर्व सार्वभौम आचार—का उपदेश देते हैं: अहिंसा, सत्य, दया, अनुग्रह; जीवन को पवित्र करने वाले कर्म—तीर्थ-सेवन, दान, ब्रह्मचर्य, अमात्सर्य; तथा धर्म-संस्कृति के आधार—देव व द्विज-सेवा, गुरु-सेवा, धर्म-श्रवण, पितृ-पूजा। राजा के प्रति नित्य भक्ति, शास्त्रानुसार चलना, क्षमा और आस्तिक्य को भी लोक-धर्म के रूप में मान्य किया गया है। इसके बाद सामान्य वर्णाश्रम-धर्म (यज्ञ, अध्यापन, दान आदि) और फिर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के स्वकर्म बताए जाते हैं। आगे अनुलोम-प्रतिलोम संयोगों से उत्पन्न मिश्र जातियों के नाम, उनकी आजीविका, निषेध, विवाह-नियम और सामाजिक सीमाएँ वर्णित हैं। अंत में कहा है कि संकर स्थिति में जाति का अनुमान दोनों माता-पिता के आचार/कर्म के आधार पर किया जाए—समाज-व्यवस्था को धर्मशास्त्रीय दृष्टि से पुराण में समेटते हुए।

18 verses

Adhyaya 152

The Livelihood of the Householder (गृहस्थवृत्तिः) — Agni Purana, Chapter 152

इस अध्याय में पुष्कर वर्णान्तर-धर्म से आगे बढ़कर गृहस्थ-वृत्ति का धर्मशास्त्रीय विवेचन करते हैं। ब्राह्मण के लिए स्वधर्म से आत्मनिर्वाह प्रधान है; आवश्यकता में क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र-प्रकार के कार्य का आश्रय भी मान्य है, पर शूद्र की दासवत् पराधीनता या शूद्र-जन्मी मुख्य आजीविका निषिद्ध है। द्विजों के लिए कृषि, व्यापार, पशुरक्षा और कुसिद (धन-उधार) आदि अनुमत बताए गए हैं तथा भोग-वाणिज्य में नैतिक मर्यादाएँ भी रखी गई हैं। खेती में पृथ्वी, वनस्पति और कीटों की हिंसा से उत्पन्न दोष स्वीकार कर यज्ञ और देव-पूजा द्वारा शुद्धि/प्रायश्चित्त को धर्मोपाय कहा गया है। हल-प्रयोग के संदर्भ में गो-दण्डों द्वारा क्रमिक दण्ड-व्यवस्था देकर आवश्यकता, क्रूरता और धर्म-हानि का संतुलन दिखाया गया है। अंत में ऋत, अमृत, मृत, प्रमृत—इन आजीविकाओं का क्रम बताकर आपत्काल में सत्य-असत्य मिश्रण तक की छूट कही गई है, पर नीच और अधर्म्य वृत्ति सर्वथा त्याज्य है।

5 verses

Adhyaya 153

Chapter 153 — Brahmacarya-āśrama-dharma (The Dharma of the Student Stage)

इस अध्याय में गृहस्थ-आचार के बाद ब्रह्मचर्य-आश्रम का धर्म बताया गया है, जहाँ धर्म को जीवन-क्रम की शिक्षा मानकर समाज-रक्षा और आध्यात्मिक उन्नति का साधन कहा गया है। आरम्भ में ऋतु-रात्रियों के नियम तथा गर्भाधान/गर्भ-सम्बन्धी विधियाँ आती हैं। फिर जन्म-संस्कार—सीमन्त, जातकर्म और नामकर्म—और वर्णानुसार नामकरण की परम्पराएँ वर्णित हैं। आगे चूड़ाकर्म आदि तथा वर्ण और आयु-सीमा के अनुसार उपनयन-काल बताया गया है; विद्यार्थी की मेखला, अजिन, दण्ड, वस्त्र और उपवीत जैसी सामग्री का क्रमबद्ध विधान भी है। आचार्य के कर्तव्य—शौच, सदाचार, अग्नि-कार्य और सन्ध्या-उपासना का प्रशिक्षण—उल्लेखित हैं। भोजन की दिशा-प्रतीकता, नित्य आहुति-सम्बन्धी अनुशासन, तथा भोग-विलास, हिंसा, निन्दा और अश्लीलता के निषेध दिए गए हैं। अंत में वेद-स्वीकार, दक्षिणा और समावर्तन-स्नान के साथ ब्रह्मचर्य को शास्त्र-अध्ययन व नैतिक संयम से युक्त ज्ञान-व्रत के रूप में पूर्ण किया गया है।

17 verses

Adhyaya 154

Chapter 154: विवाहः (Vivāha — Marriage)

यह अध्याय ब्रह्मचर्य के उपदेश से गृहस्थ-धर्म में प्रवेश कर विवाह को धर्म-नियमित संस्था बताता है। वर्णानुसार पत्नियों की संख्या और असवर्णा पत्नी के साथ धर्मकर्म न करने का नियम देकर अंतर्वर्ण-विवाह को कर्मकाण्डीय दृष्टि से वर्जित करता है। कुछ प्रसंगों में कन्या-शुल्क, कन्या को एक से अधिक बार न देने का निषेध तथा अपहरण के दण्ड बताए गए हैं। ब्राह्म, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस, पैशाच आदि विवाह-प्रकारों का वर्णन कर दान, क्रय, परस्पर-स्वीकृति, बल और छल से होने वाले भेद स्पष्ट किए गए हैं। आपत्ति-काल में पुनर्विवाह की छूट, तथा मृत पति के कनिष्ठ भ्राता द्वारा संरक्षण/नियोग-सदृश व्यवस्था भी कही गई है। अंत में विवाह-मुहूर्त के शुभ-अशुभ मास, वार, तिथि, नक्षत्र और ग्रह-स्थितियाँ—विष्णु-शयन काल, दूषित चन्द्र, शुभग्रहों का अस्त, व्यतीपात आदि—और दाम्पत्य-आचरण व काल-निषेध बताए गए हैं।

19 verses

Adhyaya 155

Ācāra (Right Conduct)

यह अध्याय धर्म-शास्त्र की लघु-मार्गदर्शिका की तरह नित्य आचार-विधि बताता है। पुष्कर ब्राह्ममुहूर्त में देव-स्मरण सहित उठने, मल-मूत्र त्याग में दिशा-नियम (दिन में उत्तरमुख, रात में दक्षिणमुख) और अनुचित स्थानों से बचने का विधान करते हैं। शौच का क्रम—मिट्टी से आचमन, दंतधावन और स्नान की प्रधानता—स्पष्ट है; बिना स्नान के किया गया कर्म निष्फल कहा गया है। जलों की श्रेणी दी गई है: भूमिजल, खींचा हुआ जल, झरना, सरोवर, तीर्थ-जल और सर्वाधिक पावन गंगा। स्नान-विधि वैदिक मंत्रों (हिरण्यवर्णाः, शन्नो देवी, आपो हि ष्ठा, इदमापः), जल में जप तथा अघमर्षण, द्रुपदा, युञ्जते मनः, पौरुष सूक्त आदि पाठ-विकल्पों से जुड़ी है; फिर तर्पण, होम और दान का निर्देश है। उत्तरार्ध में सामाजिक-नैतिक संयम—अहिंसा, भारवाही व गर्भवती को मार्ग देना, दृष्टि-वाणी की सावधानी, अशुभ आचरण वर्जन, सार्वजनिक मर्यादा, जल-स्वच्छता, काम-आचरण व सामाजिक शुद्धि की सीमाएँ, वेद-देवता-राजा-ऋषियों का सम्मान तथा कुछ तिथियों में तेल-मालिश से परहेज़—विस्तार से आता है। पाण्डुलिपि-भेदों का उल्लेख करते हुए भी मूल भाव यही है: शुद्धि, संयम और योग-क्षेम हेतु अनुशासित आचार।

31 verses

Adhyaya 156

Chapter 156 — द्रव्यशुद्धिः (Dravya-śuddhi) / Purification of Substances

यह अध्याय पूर्व आचार-प्रकरण के बाद द्रव्य-शुद्धि का विधान बताता है—अशुद्ध पदार्थ कैसे फिर से कर्मकाण्ड-योग्य बनते हैं। पुष्कर द्रव्य-भेद से शुद्धि के उपाय गिनाते हैं: मिट्टी के बर्तन पुनः आग में तपाकर, ताँबा खट्टे जल से, काँसा और लोहे आदि क्षारीय जल से, मोती जैसे रत्न धोने से शुद्ध होते हैं। बर्तन, पत्थर की वस्तुएँ, जल में उत्पन्न फल-शाक, रस्सी, जड़ें, फल, बाँस/सरकंडे आदि की शुद्धि गृह और यज्ञ—दोनों संदर्भों में कही गई है। यज्ञ-पात्र पोंछने और स्पर्श-नियम से, चिकनी वस्तुएँ गरम पानी से, घर झाड़ू-बुहारी से शुद्ध माना गया है। वस्त्र मिट्टी और जल से, अनेक वस्त्र छिड़काव से, लकड़ी रंदा/छीलन से; ठोस-गुच्छित वस्तु छिड़काव से और द्रव पदार्थ बहा देने से शुद्ध होते हैं। पशुओं के मुख की शुद्धि, भोजन/छींक/नींद/पान/स्नान के बाद के आचार, सार्वजनिक मार्ग में प्रवेश पर आचमन, रजस्वला-शुद्धि की अवधि, मलोत्सर्ग के बाद मिट्टी की गणना, संन्यासियों के विशेष नियम, तथा रेशम, सन और मृग-रोम के लिए अलग शोधन-द्रव्य बताए गए हैं। अंत में पुष्प और फल जल-छिड़काव से शुद्ध कहे गए हैं—बाह्य शौच को यज्ञ-योग्यता और धर्म-व्यवस्था से जोड़ते हुए।

16 verses

Adhyaya 157

Śāva-āśauca and Sūtikā-śauca: Death/Childbirth Impurity, Preta-śuddhi, and Śrāddha Procedure (Chapter 157)

इस अध्याय में मृत्युजन्य शाव-आशौच और प्रसवजन्य सूतिकाशौच के धर्मशास्त्रीय नियम क्रमबद्ध किए गए हैं। सपिण्ड-व्यवस्था के आधार पर वर्ण और परिस्थिति के अनुसार आशौच की अवधि बताई गई है। शिशु, तीन वर्ष से कम/अधिक, छह वर्ष से अधिक आयु के भेद, स्त्रियों में चूड़ा-संस्कार हुआ या नहीं, तथा विवाहिता स्त्री का पितृकुल से संबंध—इन सब पर अपवाद दिए गए हैं। मृत्यु का समाचार देर से मिले तो शेष दिनों की गणना, और यदि दस रातें बीत चुकी हों तो तीन रातों का नियम कहा गया है। आगे प्रेत-शुद्धि और श्राद्ध-प्रयोग का विस्तार है—पिण्ड-दान, पात्रों का विन्यास, गोत्र-नामोच्चार, माप-परिमाण, तथा सोम, अग्नि/वह्नि और यम के लिए तीन अग्नियों का प्रज्वलन और नियत आहुतियाँ। अधिकमास आदि काल-परिस्थितियाँ और बारह दिनों के भीतर पूर्ण करने के विकल्प, फिर वार्षिक श्राद्ध का कर्तव्य और यह सिद्धांत कि श्राद्ध मृतक को उसकी परलोक-स्थिति चाहे जैसी हो, लाभ देता है। अंत में कुछ हिंसक/असामान्य मृत्यु में नाशौच, मैथुन या चिता-धुएँ के बाद तत्काल स्नान, द्विज-शव को कौन संभाले, दाह के बाद अस्थि-संचय का समय और पुनः देह-स्पर्श की अनुमति—ये नियम बताए गए हैं।

42 verses

Adhyaya 158

Srāvādya-śauca (Impurity due to bodily discharge and allied causes)

यह अध्याय शरीर से होने वाले स्रावों (गर्भावस्था का रक्तस्राव/गर्भपात सहित), जन्मजन्य सूतक और मृत्युजन्य मृतक के कारण होने वाले अशौच को व्यवस्थित करता है। वर्ण, संबंध की निकटता (सपिंड, सुकुल्य, गोत्रिन) और अवस्था (दाँत निकलने से पहले, विवाह से पहले, चूड़ाकर्म के बाद) के अनुसार अशौच की अवधि बताई गई है। स्नान-नियम, अस्थि-संचयन, उदक-क्रिया, पिंड-गणना, शिशुओं के लिए दाह बनाम समाधि, भोजन/दान/श्राद्ध पर प्रतिबंध, तथा एकाधिक अशौच होने पर भारी अशौच के प्रधान होने का नियम भी दिया है। वज्रपात/अग्नि से मृत्यु, महामारी, अकाल-युद्ध-आपदा में विशेष प्रावधान, असपिंड शव का व्यवहार और कुछ पतितादि वर्गों के अपवाद भी बताए गए हैं; मनु आदि ऋषियों के वचनानुसार यह शौच-व्यवस्था गृह-व्यवस्था और कर्माधिकार की रक्षा करती है।

69 verses

Adhyaya 159

Purification Concerning the Unsanctified (Asaṃskṛta) and Related Cases (असंस्कृतादिशौचम्)

इस अध्याय में संस्कृत (विधिपूर्वक संस्कार-युक्त) और असंस्कृत के परलोक-फल का भेद बताया गया है। कहा गया है कि मृत्यु के समय हरि-स्मरण से स्वर्ग, यहाँ तक कि मोक्ष भी प्राप्त हो सकता है। गङ्गा-संबंधी अन्त्येष्टि की महिमा वर्णित है—अस्थि-क्षेप से प्रेत का उद्धार होता है और अस्थियाँ गङ्गा-जल में जितने समय रहती हैं उतने समय तक स्वर्गवास का कथन है। आत्महत्या करने वालों और पतितों के लिए विधि-निषेध कहा गया, पर करुणा से उनके लिए भी नारायण-बलि को अनुग्रह-रूप उपाय बताया गया। आगे मृत्यु की निष्पक्षता, आसक्तियों की प्रतीक्षा न करना, परलोक-यात्रा में धर्म का ही साथ जाना (यम-पथ में पत्नी का विशेष उल्लेख) कहा गया है। कर्म की अनिवार्यता, सृष्टि-प्रलय का चक्र, वस्त्र बदलने की तरह पुनर्जन्म, और देहधारी आत्मा के असंग होने से शोक-त्याग का उपदेश देकर अध्याय समाप्त होता है।

15 verses

Adhyaya 160

Vānaprastha-āśrama (The Forest-Dweller Stage of Life)

धर्म-शास्त्र की कड़ी में पुष्कर वानप्रस्थ और वन-तपस्वी की नियत जीवन-चर्या बताते हैं, जो गृहस्थ-कर्तव्य और पूर्ण संन्यास के बीच अनुशासित सेतु है। जटा, अग्निहोत्र का पालन, भूमि पर शयन और मृगचर्म धारण जैसे लक्षणों से समाज से हटकर भी वैदिक कर्म की निरंतरता दिखती है। वन-निवास में नियंत्रित आहार (दूध, कंद-मूल, नीवार, फल), दान न लेना, दिन में तीन बार स्नान और ब्रह्मचर्य जैसे नियम मन को शुद्ध कर आश्रय-निर्भरता घटाते हैं। देवपूजन और अतिथि-सत्कार सामाजिक धर्म हैं; यतियों को औषधियों से निर्वाह का निर्देश है। जब गृहस्थ अपने पुत्र-पौत्रों को स्थापित देखे, तब वन में शरण ले। ऋतु-तप व्यवस्थित है—ग्रीष्म में पंचाग्नि, वर्षा में खुले आकाश व वर्षा-सहन, शीत में भीगे वस्त्रों में कठोर साधना; अंत में अनावर्तन का अग्रगमन-व्रत, वैराग्य की अपरिवर्तनीय प्रतिज्ञा का प्रतीक है।

5 verses

Adhyaya 161

Yati-dharma (The Dharma of the Renunciate Ascetic)

इस अध्याय में यति-धर्म को सामाजिक आसक्ति से हटकर मुक्तिदायक ज्ञान की ओर अनुशासित यात्रा के रूप में बताया गया है। वैराग्य उत्पन्न होते ही संन्यास लेने, प्राजापत्य इष्टि करके बाह्य अग्नियों को अंतःस्थ कर लेने से बाह्य कर्मकाण्ड से अंतस्तप की ओर परिवर्तन सूचित होता है। यति के लिए एकान्तवास, अपरिग्रह, अल्पाहार, अहिंसा-सावधानी, सत्य से शुद्ध वाणी और आचरण, तथा भिक्षा के नियम विस्तार से दिए हैं, जिससे गृहस्थों पर भार न पड़े। कुटीरक→बहूदक→हंस→परमहंस—भिक्षुक अवस्थाओं का क्रम बढ़ती अंतर्मुखता दर्शाता है। आगे यम-नियम, आसन, प्राणायाम (गर्भ/अगर्भ; पूरक-कुम्भक-रेचक मात्राओं सहित), प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि को यति-चर्या से जोड़ा गया है। अंत में महावाक्य-शैली के अद्वैत वचन—आत्मा ही ब्रह्म/वासुदेव/हरि—से संन्यास को नैतिक कठोरता और प्रत्यक्ष ज्ञान द्वारा मोक्ष का साधन बताया गया है; षट् प्राणायाम-प्रायश्चित्त और चातुर्मास्य व्रत आदि भी वर्णित हैं।

31 verses

Adhyaya 162

अध्याय १६२ — धर्मशास्त्रकथनम् (Dharmaśāstra Exposition: Authorities, Pravṛtti–Nivṛtti, Upākarman, and Anadhyāya Rules)

इस अध्याय में धर्म को स्मृति-प्रमाणों की परंपरा में स्थापित किया गया है—मनु से पराशर तक तथा आपस्तम्ब, व्यास और बृहस्पति आदि। वैदिक कर्म दो प्रकार का बताया है—प्रवृत्ति (कामना-प्रेरित कर्म) और निवृत्ति (ज्ञान-आधारित विरक्ति)। तप, स्वाध्याय, इन्द्रिय-निग्रह, अहिंसा और गुरु-सेवा को आत्म-ज्ञान तक ले जाने वाली साधनाएँ कहा गया है, जो निःश्रेयस और अमरत्व का परम उपाय हैं। फिर व्यवहार-धर्म में वेद-पाठ के लिए काल-देशानुसार नियम, उपाकर्म और उत्सर्ग विधि तथा अनध्याय (अस्थायी विराम) के अवसरों की विस्तृत सूची दी है—मरणाशौच, ग्रहण, कुछ तिथियाँ, गर्जन-आदि, उल्का/भूकम्प, शव-श्मशान/पतित-संसर्ग, अशुभ ध्वनियाँ और अन्य व्यवधान; कुल मिलाकर 37 अनध्याय बताए गए हैं। इस प्रकार अग्निपुराण आत्म-ज्ञान के लक्ष्य को सूक्ष्म आचार-नियमों द्वारा दैनिक जीवन में उतारता है।

19 verses

Adhyaya 163

Śrāddha-kalpa-kathana (Exposition of the Śrāddha Procedure)

इस अध्याय में श्राद्ध की विधि को ऐसा धर्म-मानचित्र बताया गया है जो भुक्ति और मुक्ति दोनों देता है। पूर्वदिन ब्राह्मणों का निमंत्रण और अपराह्न में सत्कार; आसन-व्यवस्था पूर्वाभिमुख, देवकार्य में सम संख्या और पितृकार्य में विषम संख्या, तथा मातृपक्ष में भी यही नियम। मंत्रों से विश्वेदेवों का आवाहन, पवित्रयुक्त पात्र, अन्नकण बिखेरना, दूध व जौ/तिल मिलाना, अर्घ्य देना और पितृकर्म में अपसव्य होकर परिक्रमा। पितृयज्ञ-शैली से होम, हुतशेष का वितरण, पात्रों का संस्कार और अंगूठे के स्पर्श सहित पाठ से अन्न-शुद्धि। अंत में उच्छिष्ट व जल-दान, दक्षिणमुख पिण्डदान, स्वस्ति व अक्षय्योदक, स्वधा-वाक्यों सहित दक्षिणा, विधिवत विसर्जन और भोजन के बाद के नियम। एकोद्दिष्ट व सपीण्डीकरण का भेद, मृत्यु-दिन/मासिक/वार्षिक श्राद्ध-चक्र, अन्न-दान आदि के फल, गया व शुभकाल, और पितरों को श्राद्ध-देवता मानकर आयु, धन, विद्या, स्वर्ग व मोक्ष-प्रद बतलाया गया है।

42 verses

Adhyaya 164

Chapter 164: नवग्रहहोमः (Navagraha Fire-Offering)

इस अध्याय में पुष्कर द्वारा नवग्रह-होम का धर्मशास्त्रीय, विधि-प्रधान प्रयोग बताया गया है, जो समृद्धि, शान्ति, वर्षा, आयु, पोषण तथा अभिचार आदि उद्देश्यों के लिए भी उपाय माना गया है। सूर्य से केतु तक नौ ग्रह-देवताओं का क्रम देकर उनकी प्रतिमाएँ बनाने की सामग्री-क्रमसूची दी है—ताँबा, स्फटिक, लाल चन्दन, सोना, अर्क-काष्ठ (युगल रूप), चाँदी, लोहा और सीसा। स्वर्ण-लेखन या सुगन्धित मण्डल-रेखांकन, रंगानुसार वस्त्र-पुष्प, गन्ध-द्रव्य, कंगन और गुग्गुल धूप का विधान है। ऋक्/मन्त्रों का क्रम, समिधाओं का क्रम, तथा मधु-घृत-दधि से प्रति ग्रह 128 या 28 आहुतियों की संख्या निश्चित की गई है। नैवेद्य, ग्रह-क्रम से द्विज-भोजन, और दक्षिणा-क्रम—गाय, शंख, बैल, स्वर्ण, वस्त्र, घोड़ा आदि—का निर्देश है। अंत में कहा है कि राजाओं का उत्थान-पतन और लोक-स्थितियाँ ग्रह-शक्तियों से संचालित हैं, इसलिए ग्रह-पूजा अत्यन्त श्रेष्ठ है।

14 verses

Adhyaya 165

Adhyaya 165 — नानाधर्माः (Various Dharmas)

अग्नि–वसिष्ठ संवाद में यह अध्याय धर्म को ध्यान के आधार पर रखता है—हृदयस्थ प्रभु का मन, बुद्धि, स्मृति और इन्द्रियों को एकाग्र करके ध्यान करना चाहिए। फिर श्राद्ध, दान और भोजन-नियम; ग्रहण-संधि में दान व पितृकर्म की विशेष सिद्धि; तथा अग्नि न होने पर वैश्वदेव की उचित विधि बताई गई है। स्त्रियों, बलात्/दबाव और अशौच से जुड़े शुद्धि-विचारों के साथ अद्वैत का सुधार भी है—जो आत्मा से परे ‘दूसरा’ नहीं देखता, उसके लिए विरोध-भेद ढीले पड़ते हैं। योग-खंड में चित्तवृत्ति-निरोध को परम योग, क्षेत्रज्ञ का परमात्मा/ब्रह्म में लय, तथा प्राणायाम और सावित्री (गायत्री) को सर्वोच्च पवित्रक कहा गया है। आगे प्रायश्चित्त की सीमाएँ और कर्मफल (नीच योनियाँ, दीर्घ काल) बताकर निष्कर्ष है कि पाप-नाश में योग ही अनुत्तर है—बाह्य धर्म और अंतःसाक्षात्कार का समन्वय।

29 verses

Adhyaya 166

Chapter 166: वर्णधर्मादिकथनं (Exposition of Varṇa-Dharma and Related Topics)

इस अध्याय में धर्म को वेद–स्मृति-आधारित और “पाँच प्रकार” का बताकर, कर्माधिकार को वर्ण-परिचय से तथा आश्रम-धर्म को जीवन-चरणानुसार विशेष व्रत-नियमों से जोड़ा गया है। चारों आश्रमों (ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, यति) में लागू नैमित्तिक कर्म—विशेषतः प्रायश्चित्त—और कर्मों के प्रयोजन: अदृष्टार्थ (मंत्र, यज्ञ), दृष्टार्थ तथा मिश्रार्थ (व्यवहार और दण्ड) का वर्गीकरण किया गया है। श्रुति–स्मृति-सामंजस्य, अनुवाद (गुणार्थ, परिसंख्यार्थ) और अर्थवाद (प्रशंसात्मक/व्याख्यात्मक) की व्याख्या आती है। आगे 48 संस्कार, पञ्चयज्ञ, पाकयज्ञ–हविर्यज्ञ तथा सोमयाग के भेद, और अंत में सद्गुण, नित्याचार (वाणी, स्नान-भोजन संयम), दाह/दशाह में गैर-स्वजनों की भी पात्रता, पंक्ति-दोष के शमन तथा पाँच प्राणाहुतियों का वर्णन है।

22 verses

Adhyaya 167

Ayuta–Lakṣa–Koṭi Fire-offerings (अयुतलक्षकोटिहोमाः) — Graha-yajña Vidhi

भगवान् अग्नि धर्मशास्त्रीय ‘ग्रह-यज्ञ’ की विधि का पुनः उपदेश करते हैं, जो समृद्धि, शान्ति और विजय के लिए है। वे होम के तीन मान—अयुत (10,000), लक्ष (100,000) और कोटि (10,000,000)—बताकर अग्निकुण्ड से ग्रहों का आवाहन कर मण्डल में निश्चित खण्डों में स्थापना करते हैं, मध्य में सूर्य को रखते हैं। अधिदेवता व प्रत्यधिदेवताओं की सूचियाँ, काष्ठ-समिधा-हविष्य-मिश्रण, 108 आहुतियाँ और 108 कुम्भ, तथा अन्त में पूर्णाहुति, वसोधारा, दक्षिणा और अभिषेक-मन्त्र—महादेवों, नवग्रहों और रक्षक शक्तियों का आह्वान करते हैं। दान (स्वर्ण, गौ, भूमि, रत्न, वस्त्र, शय्या) से फल-सिद्धि जोड़ी गई है; युद्ध-विजय, विवाह, उत्सव और प्रतिष्ठा आदि प्रसंगों में इसका प्रयोग बताया है। लक्ष/कोटि-होम के लिए कुण्ड-मान, पुरोहित-संख्या, मन्त्र-विकल्प, तथा त्रिकोण कुण्ड में प्रतिमा-कर्म सहित अभिचार/विद्वेषण की पृथक विधि भी दी है, जिससे पुराण की कर्म-और-धर्म की समन्वित दृष्टि प्रकट होती है।

44 verses

Adhyaya 168

Chapter 168 — महापातकादिकथनम् (Exposition of Great Sins and Related Topics)

इस अध्याय में पुष्कर का विधि-निर्देश है कि जो व्यक्ति नियत प्रायश्चित्त स्वीकार न करे, राजा उसे दण्ड दे; और जान-बूझकर या अनजाने हुए पापों के लिए भी प्रायश्चित्त करना चाहिए। फिर आहार और संसर्ग से होने वाली अशौचता का विधान आता है—महापातकी, रजस्वला स्त्री, पतित, बहिष्कृत/अन्त्यज समूह, निन्दित वृत्ति वाले आदि जिनका अन्न या स्पर्श अपवित्र करता है, तथा किन अवसरों पर उनका परिहार अनिवार्य है। इसके बाद कृत्स्न, तप्तकृत्स्न, प्राजापत्य और चान्द्रायण जैसे क्रमिक प्रायश्चित्त निषिद्ध भोजन, उच्छिष्ट, अपवित्र द्रव्यों के सेवन आदि दोषों पर नियोजित किए गए हैं। आगे चार महापातक—ब्रह्महत्या, सुरापान, स्तेय और गुरुतल्पगमन—की परिभाषा, उनके तुल्य माने गए कर्म, उपपातक तथा जातिभ्रंशक कर्मों का वर्गीकरण दिया गया है। समग्रतः राजधर्म, शौच-नियम और धर्मशास्त्रीय व्यवस्था को जोड़कर अग्नेय धर्म में सामाजिक अनुशासन और कर्म-शुद्धि को परस्पर पूरक बताया गया है।

41 verses

Adhyaya 169

Mahāpātaka-ādi-kathana (Account of the Great Sins) — concluding note incl. ‘Mārjāra-vadha’ (killing of a cat)

यह अध्याय धर्म-शास्त्र खंड का उपसंहार करता है, जिसमें महापातक आदि पापों का वर्गीकरण करके अंत में ‘मार्जार-वध’ (बिल्ली की हत्या) का स्पष्ट उल्लेख संक्रमण-सूचना के रूप में आता है। अग्नेय शिक्षण-क्रम में पापों की सूची केवल नैतिक लेबल नहीं, बल्कि उचित प्रायश्चित्त बताने का आधार-मानचित्र है। यह निष्कर्ष एक कड़ी की तरह काम करता है—पाप की पहचान से शुद्धि-प्रक्रिया, अर्थात् प्रायश्चित्त, की ओर ग्रंथ को मोड़ देता है। अग्नि पुराण की विश्वकोशीय शैली में जैसे वास्तु या राजधर्म में पहले श्रेणियाँ और माप, फिर विधियाँ दी जाती हैं, वैसे ही यहाँ भी। इस प्रकार धर्म के अंतर्गत सामाजिक व्यवस्था और अंतःकरण-शुद्धि दोनों का समन्वय बना रहता है।

41 verses

Adhyaya 170

प्रायश्चित्तानि (Expiations) — Association-Impurity, Purification Rites, and Graded Penance

इस अध्याय (अग्नि पुराण 170) में प्रायश्चित्त को धर्म-प्रणाली के रूप में व्यवस्थित किया गया है, विशेषकर संसर्ग और कर्मकाण्ड में भागीदारी से उत्पन्न अशौच की शुद्धि हेतु। पुष्कर कहते हैं कि पतित के साथ दीर्घ संगति एक वर्ष में पतन का कारण बन सकती है; पर दोषयुक्त “संग” केवल पुरोहित-सेवा, उपदेश या मैथुन से होता है, केवल साथ यात्रा, भोजन या आसन से नहीं। फिर शुद्धि-विधि बताई है—पतित के समान व्रत, सपिण्डों के साथ जल-दान, प्रेतवत् घट उलटने का संकेत, दिन-रात का नियम और नियंत्रित सामाजिक व्यवहार। आगे कृच्छ्र, तप्त-कृच्छ्र, चान्द्रायण, पराक, शान्तपन आदि क्रमिक प्रायश्चित्त चाण्डाल-स्पर्श, उच्छिष्ट, शव-संपर्क, रजस्वला-अशौच, अनुचित दान, निषिद्ध वृत्ति, यज्ञ-लोप आदि दोषों के अनुसार नियत किए गए हैं। अनुताप को होम, जप, उपवास, पञ्चगव्य, स्नान और उपनयन/संस्कार-पुनर्स्थापन से जोड़कर वर्णाश्रम-व्यवस्था और यज्ञाधिकार की पुनःप्राप्ति का विधान किया गया है।

46 verses

Adhyaya 171

Chapter 171 — प्रायश्चित्तानि (Prāyaścittāni / Expiations)

इस अध्याय में धर्म-शास्त्र की शुद्धि-विधि का आरम्भ होकर, पाण्डुलिपि-भेदों को सँभालते हुए प्रायश्चित्तों का क्रमबद्ध संग्रह दिया गया है। पुष्कर कहते हैं कि मंत्र-जप और नियमों से पाप नष्ट होता है—एक मास तक पौरुषसूक्त का पाठ, अघमर्षण सूक्त का तीन बार जप, वेदाध्ययन, वायु और यम से सम्बन्धित अनुशासन, तथा गायत्री-व्रत। आगे कृतच्छ्र आदि तपस्याएँ देह-आहार के सूक्ष्म नियमों सहित बताई गई हैं—मुंडन, स्नान, होम, हरि-पूजन, दिन में खड़े रहना और रात में वीरासन में बैठना। यति- और शिशु-रूप चान्द्रायण, ग्रास/पिण्ड की गणना सहित; ताप्तकृतच्छ्र और शीतकृतच्छ्र के चक्र; तथा पञ्चगव्यादि से युक्त कठोर अतिकृतच्छ्र। शान्तपन, महा/अतिशान्तपन, बारह दिन का पराक उपवास, और प्राजापत्य क्रम ‘पाद’ रूप में आते हैं। अंत में फल, पत्ते, जल, मूल, तिल और ब्रह्मकूर्च-आधारित विशेष कृतच्छ्र, तथा देव-पूजा से संयुक्त तप द्वारा समृद्धि, बल, स्वर्ग और पाप-नाश का फल कहा गया है।

17 verses

Adhyaya 172

Chapter 172 — “Expiations beginning with the Secret (Rites)” (Rahasya-ādi-prāyaścitta)

यह अध्याय प्रायश्चित्त-क्रम का उपसंहार है, जिससे अग्नि-पुराण के धर्म-शास्त्र भाग में प्रायश्चित्त को क्रमिक, सोपान-रूप व्यवस्था के रूप में दिखाया गया है। ‘रहस्य-आदि’ गुप्त/आन्तरिक प्रायश्चित्तों द्वारा संकेत मिलता है कि शुद्धि केवल बाह्य दण्ड नहीं, बल्कि संकल्प के अनुरूप आत्म-अनुशासन और सूक्ष्म दोषों के लिए भीतर की साधना भी है। अग्नेय विद्या के प्रवाह में, जहाँ भगवान अग्नि लौकिक व्यवस्था और आध्यात्मिक उन्नति का समन्वय कराते हैं, यह अध्याय पूर्व प्रायश्चित्त-विधियों का शिखर बनकर अगले अध्याय की सार्वभौम औषधि—स्तोत्र-जप—की ओर संक्रमण कराता है। यह मोड़ बताता है कि धर्म विधि-कर्म और अंतःसम्यक् पुनर्संयोजन दोनों से टिकता है, ताकि साधक भुक्ति और मुक्ति—दोनों—की ओर बढ़े।

22 verses

Adhyaya 173

Prāyaścitta — Definitions of Killing, Brahmahatyā, and Graded Expiations

भगवान् अग्नि धर्म-शास्त्र में प्रायश्चित्त का उपदेश आरम्भ करते हैं और बताते हैं कि यह व्यवस्था ब्रह्मा से प्रवृत्त है। ‘वध’ की परिभाषा प्राण-वियोग (मृत्यु) कराने वाले कर्म के रूप में दी गई है। दोष केवल प्रत्यक्ष हत्या तक सीमित नहीं—किसी से करवाना, संयुक्त शस्त्र-कार्य में समूह-सहभाग, तथा परोक्ष कारण बनना (जैसे अपमान/दबाव से प्रेरित आत्महत्या) भी, विशेषतः ब्रह्महत्या, महापातक माने गए हैं। फिर देश, काल, सामर्थ्य और अपराध-स्वभाव के अनुसार प्रायश्चित्त-निर्णय के सिद्धान्त बताए जाते हैं। ब्राह्मण-वध के लिए महाप्रायश्चित्त—आत्मत्याग, दीर्घ तप, विशेष चिह्न धारण कर भिक्षा-जीवन, तथा आचरण-आधारित शिथिलीकरण—गिनाए गए हैं। आगे वर्ण और दुर्बलता (वृद्ध, स्त्री, बालक, रोगी) के अनुसार दण्ड-क्रम, गोवध, चोट, औजार से आकस्मिक मृत्यु आदि के प्रायश्चित्त, शौच-भोजन-दूषण, मद्यादि निषिद्ध सेवन, चोरी में प्रतिदान/राजदण्ड का तर्क, और गुरुतल्पादि काम-दोषों के लिए मृत्यु-प्रायश्चित्त या बहुमासिक चान्द्रायण बताए गए हैं। समग्रतः प्रायश्चित्त को न्यायिक माप और आत्मशुद्धि की औषधि—दोनों रूपों में स्थापित किया गया है।

54 verses

Adhyaya 174

Chapter 174 — प्रायश्चित्तानि (Expiations)

अग्नि देव बताते हैं कि पूजा, आश्रम-धर्म या होम में लोप/विघ्न होने पर कर्म-शुद्धि हेतु प्रायश्चित्त कैसे किया जाए। छूटी हुई पूजा के लिए आठ सौ जप और दुगुनी पूजा; देवता-संबंधी अशौच में पञ्चोपनिषद्-मंत्र, होम और ब्राह्मण-भोजन से शान्ति। दूषित होम-द्रव्य, टूटी आहुति/उपहार, मंत्र-द्रव्य की गड़बड़ी में केवल दूषित अंश त्याग, प्रोक्षण से शुद्धि और मूल-मंत्र का पुनर्जप। प्रतिमा गिरने, टूटने या खोने पर उपवास और सौ आहुतियाँ। आगे अध्याय बताता है कि सच्चा पश्चात्ताप परम प्रायश्चित्त—हरि-स्मरण—में पूर्ण होता है। चान्द्रायण, पराक, प्राजापत्य; गायत्री, प्रणव-स्तोत्र, सूर्य/ईश/शक्ति/श्रीश मंत्र-जप; तीर्थ-प्रभाव, दान व महादान, तथा ‘मैं ब्रह्म, परम प्रकाश’ की अद्वैत-भावना पाप-नाशक हैं। अंत में हरि को समस्त विद्याओं-शास्त्रों का मूल और परम पावन स्रोत कहकर अग्नि-पुराण की विश्वकोशीयता प्रतिपादित होती है।

24 verses