Adhyaya 320
Mantra-shastraAdhyaya 32015 Verses

Adhyaya 320

Aghīrāstra-ādi-Śānti-kalpaḥ (Rite for Pacification of Aghora-Astra and Other Weapons)

इस अध्याय में भगवान् अग्नि (ईश्वर) कर्मारम्भ से पहले युद्धात्मक व ब्रह्माण्डीय शक्तियों को विधिपूर्वक समन्वित कर रक्षाविधान बताते हैं। सर्वकर्म-सिद्धिदायक ‘अस्त्र-याग’ में मण्डल के मध्य शिव का अस्त्र स्थापित कर, पूर्व से दिशानुसार वज्र आदि अस्त्रों का विन्यास किया जाता है। इसी प्रकार ग्रह-पूजा में मध्य में सूर्य और पूर्व-स्थान से क्रमशः अन्य ग्रह रखे जाते हैं, जिससे शुभ फल हेतु ग्रह-सामंजस्य बनता है। मुख्य उपदेश अघोर-अस्त्र की जप-होम द्वारा ‘अस्त्र-शान्ति’ है, जो ग्रह-दोष, रोग, मारी, शत्रु-बल तथा विनायक-सम्बन्धी विघ्नों को शांत करती है। लक्ष/अयुत/सहस्र की गणनाएँ और तिल, घृत, गुग्गुलु, दूर्वा, अक्षत, जवा आदि द्रव्य उल्का, भूकम्प, वन-प्रवेश, रक्त-सा वृक्ष-रस, ऋतु-विपरीत फलन, महामारी, हाथियों के विकार, गर्भपात और यात्रा-शकुन जैसे निमित्तों के अनुसार बताए गए हैं। अंत में न्यास और पंचवक्त्र देवता का ध्यान कर विजय व परम सिद्धि प्राप्त होती है।

Shlokas

Verse 1

इत्य् आग्नेये महापुराणे मण्डलानि नामोनविंशत्यधिकत्रिशततमो ऽध्यायः अथ विंशत्यधिकत्रिशततमो ऽध्यायः अघीरास्त्रादिशान्तिकल्पः ईश्वर उवाच अस्त्रयागः पुरा कार्यः सर्वकर्मसु सिद्धिदः मध्ये पूज्यं शिवाद्यस्त्रं वज्रादीन् पूर्वतः क्रमात्

इस प्रकार अग्नि-महापुराण में त्रिशत उन्नीसवाँ अध्याय ‘मण्डल’ नाम से कहा गया। अब त्रिशत बीसवाँ अध्याय—‘अघीरास्त्र आदि की शान्ति-कल्प’ आरम्भ होता है। ईश्वर बोले: पहले अस्त्र-याग करना चाहिए, जो सब कर्मों में सिद्धि देता है। मध्य में शिव आदि के अस्त्रों की पूजा करे, और पूर्व से क्रमशः वज्र आदि की।

Verse 2

पञ्चचक्रं दशकरं रणादौ पूजितं जये ग्रहपूजा रविर्मध्ये पूर्वाद्याः सोमकादयः

पाँच चक्रों वाला, दस करों (भुजाओं/स्पोकों) वाला यह विन्यास, युद्ध के आरम्भ में पूजित होने पर विजय देता है। ग्रह-पूजा में सूर्य मध्य में होता है और पूर्व से क्रमशः चन्द्र आदि ग्रह होते हैं।

Verse 3

सर्व एकादशस्थास्तु ग्रहाः स्युः ग्रहपूजनात् अस्त्रशान्तिं प्रवक्ष्यामि सर्वोत्पातविनाशिनीं

ग्रहों की पूजा से सभी ग्रह ग्यारह स्थानों में शुभ रूप से स्थित हो जाते हैं। अब मैं अस्त्र-शान्ति का विधान बताता हूँ, जो समस्त उत्पातों का नाश करने वाली है।

Verse 4

ग्रहरोगादिशमनीं मारीशत्रुविमर्दनीं विनायकोपतप्तिघ्नमघोरास्त्रं जपेन्नरः

मनुष्य को अघोर-अस्त्र मंत्र का जप करना चाहिए, जो ग्रहदोष-रोग आदि को शांत करता है, मारी जैसे शत्रुओं का दमन करता है और विनायक के अप्रसाद से उत्पन्न ताप का नाश करता है।

Verse 5

लक्षं ग्रहादिनाशः स्यादुत्पाते तिलहोमनम् दिव्ये लक्षं तदर्धेन व्योमजोत्पातनाशनं

लाख (जप/आहुतियों) से ग्रह आदि का दोष नष्ट होता है; उत्पात होने पर तिल-होम करना चाहिए। दिव्य (आकाशीय) उत्पात में लाख (आहुतियाँ) और उसके आधे से आकाश में उत्पन्न उत्पात का नाश होता है।

Verse 6

घृतेन लक्षपातेन उत्पाते भुमिजे हितम् घृतगुग्गुलुहोमे च सर्वोत्पातादिमर्दनम्

भू-जन्य (पार्थिव) उत्पात में घृत से लाख आहुतियाँ देना हितकर है। और घृत तथा गुग्गुलु से किया हुआ होम समस्त उत्पात आदि का मर्दन करने वाला है।

Verse 7

दूर्वाक्षताज्यहोमेन व्याधयो ऽथ घृतेन च सहस्रेण तु दुःखस्वप्ना विनशन्ति न संशयः

दूर्वा, अक्षत और घृत से किए हुए होम से व्याधियाँ शांत होती हैं; और घृत की सहस्र आहुतियों से दुःखद स्वप्न नष्ट हो जाते हैं—इसमें संशय नहीं।

Verse 8

अयुताद् ग्रहदोषघ्नो जवाघृतविमिश्रितात् विनायकार्तिशमनमयुतेन घृतस्य च

दस हज़ार की मात्रा में जपा (जवाकुसुम) और घृत मिलाकर आहुति देने से ग्रहदोषजन्य पीड़ाएँ नष्ट होती हैं; और घृत की दस हज़ार आहुतियों से विनायकजन्य विघ्न-पीड़ा का शमन होता है।

Verse 9

भूतवेदालशान्तिस्तु गुग्गुलोरयुतेन च महावृक्षस्य भङ्गेतु व्यालकङ्के गृहे स्थिते

भूत-वेताल की शान्ति के लिए गुग्गुलु की दस हज़ार मात्रा से भी शान्तिकर्म किया जाए; इसी प्रकार यदि कोई महान वृक्ष अशुभ रूप से टूटे, या घर में सर्प अथवा बगुला (कङ्क) जैसे अपशकुनकारी जीव का वास हो, तो भी वही शान्ति-विधि करनी चाहिए।

Verse 10

आरण्यानां प्रवेशे दूर्वाज्याक्षतहावनात् उल्कापाते भूमिकम्पे तिलाज्येनाहुताच्छिवम्

वन में प्रवेश करते समय दूर्वा, घृत और अक्षत से हवन करना चाहिए; और उल्का-पात या भूमिकम्प होने पर तिल और घृत की आहुतियों से कल्याण प्राप्त होता है।

Verse 11

रक्तस्रावे तु वृक्षाणामयुताद् गुग्गुलोः शिवं अकाले फलपुष्पाणां राष्ट्रभङ्गे च मारणे

यदि वृक्षों से रक्तस्राव के समान रस निकले, तो गुग्गुलु की दस हज़ार मात्रा से शान्ति कर कल्याण होता है; परन्तु यदि अकाल में फल-फूल प्रकट हों, तो वह राष्ट्रभंग और मृत्यु का सूचक है।

Verse 12

द्विपदादेर्यदा मारि लक्षार्धाच्च तिलाज्यतः हस्तिमारीप्रशान्त्यर्थं करिणीदन्तवर्धने

जब द्विपद आदि प्राणियों में महामारी (मारी) उत्पन्न हो, तब तिल और घृत सहित आधा लक्ष की मात्रा से उपचार/प्रयोग करना चाहिए—यह हस्ति-मारी की शान्ति तथा करिणी (हथिनी) के दाँतों की वृद्धि-बल के लिए है।

Verse 13

हस्तिन्यां मददृष्टौ च अयुताच्छान्तिरिष्यते अकाले गर्भपाते तु जातं यत्र विनश्यति

हथिनी में मदोन्मत्त दृष्टि दिखाई दे तो दस हज़ार-मूल्य (अयुत) की महाशान्ति विधि कही गई है। और ऋतु के बाहर गर्भपात होने पर वहाँ जो जन्म लेता है, वह नष्ट हो जाता है।

Verse 14

विकृता यत्र जायन्ते यात्राकाले ऽयुतं हुनेत् तिलाज्यलक्षहोमन्तु उत्तमासिद्धिसाधने

जहाँ अशुभ विकृतियाँ उत्पन्न हों, यात्रा के समय अयुत (हज़ार/निर्दिष्ट संख्या) आहुतियाँ देनी चाहिए। परन्तु उत्तम सिद्धि की साधना में तिल और घृत से लक्ष (एक लाख) होम करना चाहिए।

Verse 15

मध्यमायां तदर्धेन तत्पादादधमासु च यथा जपस् तथा होमः संग्रामे विजयो भवेत् अघोरास्त्रं जपेन्न्यस्य ध्यात्वा पञ्चास्यमूर्जितम्

मध्यम विधि में उसका आधा, और अधम विधि में उसका चौथाई लेकर—जितना जप हो उतना ही होम करना चाहिए; तब संग्राम में विजय होती है। न्यास करके, शक्तिशाली पंचास्य (देव) का ध्यान कर अघोरास्त्र का जप करे।

Frequently Asked Questions

A precise ritual-architecture of protection: mandala placement (center and directional order), graded japa/homa counts (lakṣa, ayuta, sahasra; with middle/low reductions), and substance-specific offerings (tila, ghṛta, guggulu, dūrvā, akṣata, javā) mapped to distinct omens and afflictions.

It frames protective and martial efficacy as dharmically regulated power: by nyāsa, mantra-japa, and śānti rites, the practitioner disciplines fear and violence through devotion and cosmic alignment, converting worldly success (bhukti) into a purified support for steadiness in dharma and eventual liberation (mukti).

Weapons are treated as presiding energies requiring propitiation (astra-yāga), while planets are stabilized through graha-pūjā in an ordered mandala; together they establish a harmonized field in which astra-śānti and battle-oriented rites can succeed without omen-driven obstruction.