Adhyaya 313
Mantra-shastraAdhyaya 31323 Verses

Adhyaya 313

Tvaritājñānam (Knowledge of Tvaritā, the Swift Goddess) — Agni Purana, Adhyāya 314 (as introduced after 313)

अग्निदेव पूर्व में बताए मंत्र-संग्रह से आगे बढ़कर त्वरिता देवी के तांत्रिक-आचार का क्रम बताते हैं। बीज-समृद्ध त्वरिता-मंत्र, न्यास-पूजा, दो-भुजा और अष्ट-भुजा ध्यान, आधार-शक्ति की स्थापना, कमलासन, सिंहवाहन तथा हृदयादि अंग-न्यास का विधान आता है। दिशाओं में मण्डल-क्रम से गायत्री और विविध स्त्री-शक्तियों की पूजा, मध्य-स्थापनाएँ और द्वारपाल—जया, विजया, किंकर—का निर्देश है। अनन्त, कुलिका, वासुकि, शंखपाल, तक्षक, महापद्म, कर्कोट, पद्म/पद्मा आदि नागराजों को नाम-व्याहृति सहित आहुति दी जाती है। आगे 81 पदों वाले निग्रह-चक्र का लेखन, लिखने की सामग्री और साध्य-नाम रखने का स्थान; फिर उग्र-रक्षा व मारणोन्मुख प्रयोग, काली/कालरात्रि तत्त्व, यम-सीमा की कल्पना, गूढ़ रक्षोच्चार, स्याही-विधि, श्मशान/चौराहे जैसे सीमांत स्थानों में लेखन, तथा कुंभ के नीचे, वल्मीके, विभीतक वृक्ष आदि में स्थापना बताई गई है। शुभ द्रव्यों से अनुग्रह-चक्र, रुद्र/विद्या के वर्ण-क्रम-जाल से प्रत्यङ्गिरा-रूप, और 64 पदों का संयुक्त निग्रह–अनुग्रह चक्र भी वर्णित है। अंत में ‘क्रीं सः हूं’ अमृती/विद्या-बीज, त्रि-ह्रीं आवरण, और ताबीज-धारण व कान में जप जैसे उपायों से शत्रु-निवारण व विषाद-हरण को धर्म-नियम के साथ कहा गया है।

Shlokas

Verse 1

ं फट् स्वाहा इत्य् आग्नेये महापुराणे नानामन्त्रा नाम द्वादशाधिकत्रिशततमो ऽध्यायः अथ त्रयोदशाधिकत्रिशततमो ऽध्यायः त्वरिताज्ञानम् अग्निर् उवाच ॐ ह्रीं हूं खे छे क्षः स्त्रीं ह्रूं क्षे ह्रीं फट् त्वरितायैनमः त्वरितां पूजयेन्न्यस्य द्विभुजाञ्चाष्टवाहुकां आधारशक्तिं पद्मञ्च सिंहे देवीं हृदादिकम्

“...ं फट् स्वाहा”—इस प्रकार अग्नि-महापुराण में ‘नानामन्त्र’ नामक 312+ (अर्थात 313वाँ) अध्याय समाप्त हुआ। अब 313+ (अर्थात 314वाँ) अध्याय ‘त्वरिता-ज्ञान’ आरम्भ होता है। अग्नि बोले—“ॐ ह्रीं हूं खे छे क्षः स्त्रीं ह्रूं क्षे ह्रीं फट्—त्वरिता को नमः।” न्यास करके त्वरिता की पूजा करे—उसे द्विभुजा तथा अष्टबाहु रूप में ध्यान करे; आधार-शक्ति, पद्म और सिंहासन का न्यास कर देवी को हृदय आदि में स्थापित करे।

Verse 2

पूर्वादौ गायत्रीं यजेन्मण्डले वै प्रणीतया हुंकारां खेचरीं चण्डां छेदनीं क्षेपणींस्त्रियाः

पूर्व दिशा से आरम्भ करके, विधिपूर्वक संचालित रीति से मण्डल में गायत्री का पूजन करे; तथा हुंकारा, खेचरी, चण्डा, छेदनी और क्षेपणी नामक स्त्री-शक्तियों का भी पूजन करे।

Verse 3

हुंकारां क्षेमकारीञ्च फट्कारीं मध्यतो यजेत् जयाञ्च विजयां द्वारि किङ्करञ्च तदग्रतः

मध्य में हुंकारा, क्षेमकारी और फट्कारी की पूजा करे। द्वार पर जया और विजया को स्थापित कर पूजे, और उसके आगे किङ्कर को।

Verse 4

लिलैहीमैश् च सर्वाप्त्यै नामव्याहृतिभिस् तथा अनन्ताय नमः स्वाहा कुलिकाय नमः स्वधा

मृदु (मधुर) उच्चारणों तथा ‘हीं’ बीज के साथ, सर्वार्थ-सिद्धि हेतु, नाम-व्याहृतियाँ इस प्रकार बोले— “अनन्ताय नमः स्वाहा”; “कुलिकाय नमः स्वधा।”

Verse 5

स्वाहा वासुकिराजाय शङ्खपालाय वौषट् तक्षकाय वषन्नित्यं महापद्माय वै नमः

वासुकि-राज को स्वाहा; शङ्खपाल को वौषट्; तक्षक को नित्य वषट् (आहुति हो); और महापद्म को निश्चय ही नमस्कार।

Verse 6

स्वाहा कर्कोटनागाय फट् पद्माय च वै नमः लिखेन्निग्रहचक्रन्तु एकाशीतिपदैर् नरः

“कर्कोट नागाय स्वाहा; फट्; तथा पद्मा को भी नमः”—इस मंत्र को लिखे। मनुष्य इक्यासी पदों (अक्षर-खण्डों) से निग्रह-चक्र लिखे।

Verse 7

वस्ते पटे तरौ भूर्जे शिलायां यष्टिकासु च मध्ये कोष्ठे साध्यनाम पूर्वादौ पट्टिकासु च

वस्त्र, पट, वृक्ष, भूर्जपत्र, शिला तथा छोटी यष्टियों पर लिखे। यंत्र के मध्य कोष्ठ में साध्य का नाम लिखे, और पूर्व से आरम्भ कर पट्टिकाओं पर भी क्रम से लिखे।

Verse 8

ॐ ह्रीं क्षूं छन्द छन्द चतुरः कण्ठकान् कालरात्रिकां ऐशादावम्बुपादौ च यमराज्यञ्च वाह्यतः कालीनारवमाली कालीनामाक्षमालिनी

ॐ—ह्रीं और क्षूं बीजों सहित—चारों छन्दों का बार-बार आवाहन करे; कण्ठ-रक्षक न्यास करे और कालरात्रिका का स्मरण करे। ईशान दिशा से आरम्भ कर जल-पाद (शुद्धि-आधार) स्थापित करे और बाह्यतः यम-राज्य का आवरण करे। इस प्रकार काली नाद-माला से विभूषित और अक्षर-माला (अक्षमाला) धारण करने वाली होती है।

Verse 9

मामोदेतत्तदोमोमा रक्षत स्वस्व भक्षवा यमपाटटयामय मटमो टट मोटमा

मेरी रक्षा करो—यह मंत्र निष्फल न हो। चारों ओर से मेरी रक्षा करो। हे अपने-अपने भाग के भक्षक, दूर हटो। यम के पथ/दूतों को हटाओ और रोग-पीड़ा को दूर करो—हानिकारक शक्तियाँ प्रतिहत हों।

Verse 10

वामो भूरिविभूमेया टट रीश्व श्वरी टट यमराजाद्वाह्यतो वं तं तोयं मारणात्मकं

यह वामाचार (वाम-क्रिया) है—‘भूरिविभूमेया टट रीश्व श्वरी टट’ तथा ‘वं तं’। इस प्रकार संस्कारित जल यमराज से बाह्यतः निकला हुआ-सा, मारण-स्वभाव वाला हो जाता है।

Verse 11

कज्जलं निम्बनिर्यासमज्जासृग्विषसंयुतम् काकपक्षस्य लेखन्या श्मशाने वा चतुष्पथे

काजल को नीम-निर्यास, मज्जा, रक्त और विष के साथ मिलाकर, कौए के पंख की लेखनी से, श्मशान में या चौराहे (चार-पथ) पर लिखे।

Verse 12

निधापयेत् कुम्भाधस्ताद्वल्मीके वाथ निक्षिपेत् विभीतद्रुमशास्वाधो यन्त्रं सर्वारिमर्दनम्

यंत्र को कुम्भ (कलश) के नीचे स्थापित करे, अथवा वल्मीक (बिल/चींटी-टीला) में रखे; या विभीतक वृक्ष की शाखाओं के नीचे रखे। यह यंत्र ‘सर्व-शत्रु-मर्दन’ कहलाता है।

Verse 13

लिखेच्चानुग्रहञ्चक्रं शुक्लपत्रे ऽथ भूर्जके लाक्षया कुङ्कुमेनाथ स्फटिकाचन्दनेन वा

श्वेत पत्र या भूर्जपत्र पर लाक्षा, केसर अथवा स्फटिक-चन्दन के लेप से ‘अनुग्रह-चक्र’ अंकित करे।

Verse 14

भुवि भित्तौ पूर्वदले नाम मध्यमकोष्ठके खण्डे तु वारिमध्यस्थं ॐ हंसो वापि पट्टिशम्

भूमि या भित्ति पर—पूर्वदल में नाम लिखे और मध्यकोष्ठ में भी; निर्दिष्ट खण्ड में जल-मध्य में ‘ॐ हंसः’ अथवा ‘पट्टिश’ (परशु-चिह्न/नाम) अंकित करे।

Verse 15

लक्ष्मीश्लोकं शिवादौ च राक्षसादिक्रमाल्लिखेत् श्रीःसाममोमा सा श्रीः सानौ याज्ञे ज्ञेया नौसा

‘शिव’ से आरम्भ होने वाला लक्ष्मी-श्लोक ‘राक्षस’ आदि क्रम से लिखे। इस विधान में ‘श्रीः’ को ‘साम’ समझें; ‘ओमा’ वही ‘श्रीः’ है; और यज्ञ में इसे ‘सानौ’ (अथवा ‘नौसा’) के रूप में जानें।

Verse 16

माया लीला लाली यामा याज्ञे ज्ञेया नौसा माया यत्र ज्ञेया वहिः शीघ्रा दिक्षुरं कलसं वहिः

‘माया, लीला, लाली, यामा’—ये यज्ञ-विधान में समझे जाएँ। ‘नौसा’ माया है; जहाँ इसका ज्ञान/प्रयोग हो, वह बाह्य भाग में है। ‘शीघ्रा’ भी बाह्य है; इसी प्रकार ‘दिक्षुरम्’ और ‘कलसम्’ भी बाह्य माने जाएँ।

Verse 17

पद्मस्थं पद्मचक्रञ्च भृत्युजित् स्वर्गगन्धृतिं शान्तीनां परमा सान्तिः सौभाग्यादिप्रदायकम्

कमलासनस्थ, पद्म-चक्रधारी, दास्य-विजयी, स्वर्ग-सुगन्ध का धारक—यह शान्तियों में परम शान्ति है, जो सौभाग्य आदि शुभ फल प्रदान करता है।

Verse 18

रुद्रे रुद्रसमाः कार्याः कोष्ठकास्तत्र ता लिखेत् ओमाद्याह्रूंफडन्ता च आदिवर्णमथानुतः

रुद्र-पूजन हेतु रुद्र-सदृश कोष्ठक (मन्त्र-कोष्ठ) बनाने चाहिए। उनमें ‘ॐ’ से आरम्भ करके ‘ह्रूं फड्’ पर समाप्त होने वाले अक्षर लिखे जाएँ; फिर क्रम से आद्य वर्णों को आगे लिखे।

Verse 19

विद्यावर्णक्रमेनेव संज्ञाञ्च वषडन्तिकां पूर्वपदे इति ञ अधस्थात् प्रत्यङ्गिरैषा सर्वकामार्थसाधिका

विद्या-मन्त्र के वर्ण-क्रम के अनुसार ही ‘वषट्’ पर समाप्त होने वाली संज्ञा (नाम-चिह्न) भी स्थापित करे; और पूर्वपद में ‘ञ’ अक्षर जोड़े। नीचे के न्यास में यही प्रत्यङ्गिरा है, जो समस्त कामनाओं और अर्थों को सिद्ध करती है।

Verse 20

एकाशीतिपदे सर्वामादिवर्णक्रमेण तु आदिमं यावदन्तं स्याद्वषडन्तञ्च नाम वै

इक्यासीवें पद में सब नामों को आद्य वर्णों के क्रम से स्थापित करे। आरम्भ से अंत तक जो नाम है, वह वास्तव में ‘वषट्’ पर समाप्त होने वाला ही माना जाता है।

Verse 21

एषा प्रत्यङ्गिरा चान्या सर्वकार्यादिसाधनी निग्रहानुग्रहञ्चक्रञ्चतुःषष्टिपदैर् लिखेत्

यह प्रत्यङ्गिरा का एक अन्य रूप है, जो समस्त कार्यों आदि को सिद्ध करने वाली है। ‘निग्रह–अनुग्रह चक्र’ को चौंसठ पदों/कोष्ठकों से लिखे।

Verse 22

अमृती सा च विद्या च क्रीं सः हूं नामाथ मध्यतः फट्काराद्यां पत्रगतां त्रिह्रींकारेण वेष्टयेत्

वह ‘अमृती’ भी है और ‘विद्या’ भी। मध्य में ‘क्रीं’ बीज के साथ ‘सः’ और ‘हूं’ स्थापित करे। ‘फट्’ से आरम्भ होने वाली, पत्र पर लिखी हुई रचना को ‘ह्रीं’ का तीन बार उच्चारण करके चारों ओर से वेष्टित करे।

Verse 23

कुम्भववद्धारिता सर्वशत्रुहृत् सर्वदायिका विषन्नश्येत् कर्णजपादक्षराद्यैश् च दण्डकैः

जब इसे कुम्भ की भाँति दृढ़तापूर्वक धारण किया जाता है, तब यह समस्त शत्रुओं का नाश करने वाली और सब प्रकार के दान-वर देने वाली होती है। कान में जप करने से विषाद नष्ट होता है; अक्षरादि छन्दोमन्त्रों और दण्डक-पाठ से भी यही फल होता है।

Frequently Asked Questions

Precise ritual engineering: dik-krama maṇḍala placements, āvaraṇa-śakti listing, and the construction/inscription rules for multiple cakras (Nigraha 81-pada; Nigraha–Anugraha 64-pada), including substrates, central sādhya-name placement, and bīja-sequence/letter-order grids tied to vidyā-mantras.

It frames tantric efficacy as disciplined sādhana: nyāsa and mantra precision cultivate concentration and sacralize the body-mind, while protective/restraint-and-grace diagrams model dharmic control of forces—channeling worldly aims (bhukti) through regulated rites aligned to spiritual steadiness and ethical containment.