Adhyaya 159
Vana ParvaAdhyaya 159114 Verses

Adhyaya 159

Kubera’s Fivefold Nīti and Protection of the Pāṇḍavas (वैश्रवणोपदेशः)

Upa-parva: Yakṣa-Guhyaka-Āśraya (Kuberopadeśa) Episode

Vaiśravaṇa (Kubera) addresses Yudhiṣṭhira with a compact framework for sustaining social order: steadiness (dhṛti), competence (dākṣya), discernment of place and time (deśa-kāla), disciplined initiative (parākrama), and proper structuring of public administration (lokatantra-vidhāna). He contrasts this ideal with failure modes—sinful intent, inability to distinguish tasks, lack of timing, and reckless overreach—stating that such dispositions lead to ruin both in this life and after death. Kubera then applies the counsel to the immediate situation by urging Yudhiṣṭhira to restrain Bhīma’s fearless impulsiveness and to reside without grief or fear near the āśrama of the royal sage Ārṣṭiṣeṇa for a specified period. Kubera assigns yakṣas, gandharvas, and allied mountain-dwellers to protect the brothers and arrange provisions. He additionally reports Arjuna’s well-being in the divine realm, describing his honor among divine beings and his acquisition of weapons in Indra’s abode, and conveys greetings associated with ancestral prestige (Śaṃtanu). The narration returns to Vaiśaṃpāyana: Bhīma salutes Kubera with weapons laid aside; Kubera blesses him to be a humbler of enemies and a promoter of friends’ welfare; Kubera departs with attendants; and the Pāṇḍavas spend the night safely, honored and untroubled.

Chapter Arc: जटासुर-वधपर्व के समापन के बाद वन-जीवन की नई धारा खुलती है: युधिष्ठिर द्रौपदी सहित सब भाइयों को एकत्र कर अर्जुन (जय) की स्मृति और उसके संकेतित व्रत-काल का स्मरण कराते हैं। → चार वर्ष के वनवास की गणना और अर्जुन के पूर्व-निर्धारित ‘उद्देश’ (संकेत/प्रतिज्ञा) का उल्लेख पाण्डवों के भीतर प्रतीक्षा, अनिश्चितता और आगे की यात्रा की तीव्रता बढ़ाता है। इसके साथ ही कथा का भूगोल ऊँचाइयों की ओर उठता है—कैलास, किम्पुरुष-आवास और सिद्ध-चारण-सेवित गन्धमादन—जहाँ प्रकृति का वैभव भी है और अज्ञात का भय भी। → गन्धमादन का साक्षात् दर्शन—धातुओं से दीप्त शैल-शृंग, विविध पक्षियों का कलरव, और पर्वतसानुओं पर मोरों का मधुर निर्घोष—कथा का शिखर बनता है; यह दृश्य पाण्डवों के लिए केवल सौन्दर्य नहीं, बल्कि तप, यात्रा और नियति के निकट आने का संकेत है। → पाण्डव गन्धमादन की शोभा से तृप्त नहीं होते, फिर भी आगे बढ़ते हैं और अंततः राजर्षि आर्डिषेण के आश्रम का दर्शन करते हैं—जहाँ वन-यात्रा का बाह्य संघर्ष क्षण भर को आश्रम-शान्ति में रूपान्तरित होता है। → आर्डिषेण-आश्रम में प्रवेश के साथ प्रश्न खुला रह जाता है: ऋषि पाण्डवों को कौन-सा उपदेश/मार्गदर्शन देंगे, और अर्जुन के संकेतित प्रयोजन की पूर्ति की दिशा अब कैसे खुलेगी?

Shlokas

Verse 1

॥। समाप्तं जटासुरवधपर्व ।। #:+-* 7५. (9) #“--* #:+- (यक्षयुद्धपर्व) अष्टपपञज्चाशदधिकशततमो< ध्याय: नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आएिषिणके आश्रमपर जाना वैशम्पायन उवाच निहते राक्षसे तस्मिन्‌ पुनर्नारायणाश्रमम्‌ | अभ्येत्य राजा कौन्तेयो निवासमकरोत्‌ प्रभु:,वैशम्पायनजी कहते हैं--उस राक्षसके मारे जानेपर कुन्तीकुमार शक्तिशाली राजा युधिष्ठिर पुन: नर-नारायण-आश्रममें आकर रहने लगे

Bagian pembunuhan Jaṭāsura berakhir. Vaiśampāyana berkata: Setelah rākṣasa itu terbunuh, Raja Yudhiṣṭhira, putra Kuntī yang perkasa, kembali lagi ke pertapaan Nara dan Nārāyaṇa dan menetap di sana.

Verse 2

स समानीय तानू सर्वान्‌ भ्रातृनित्यब्रवीद्‌ वच: । द्रौपद्या सहितान्‌ काले संस्मरन्‌ भ्रातरं जयम्‌,एक दिन उन्होंने द्रौयदीसहित सब भाइयोंको एकत्र करके अपने प्रियबन्धु अर्जुनका स्मरण करते हुए कहा--

Pada suatu hari ia mengumpulkan semua saudara itu bersama Draupadī, lalu—sambil mengingat saudaranya yang jaya, Arjuna—ia menyampaikan kata-kata kepada mereka.

Verse 3

समाक्षतस्रो5भिगता: शिवेन चरतां वने । कृतोद्देश: स बीभत्सु: पजचमीमभित: समाम्‌,“हमलोगोंको कुशलपूर्वक वनमें विचरते हुए चार वर्ष हो गये। अर्जुनने यह संकेत किया था कि मैं पाँचवें वर्षमें लौट आऊँगा

“Kita telah mengembara di hutan dengan selamat dan sejahtera; kini empat tahun telah berlalu. Bībhatsu (Arjuna), setelah menetapkan tanda dan waktu yang jelas, telah menyatakan bahwa ia akan kembali sekitar tahun kelima.”

Verse 4

प्राप्य पर्वतराजानं श्वेतं शिखरिणां वरम्‌ । पुष्पितैर्टरमषण्डैश्व मत्तकोकिलषट्पदै:,'पर्वतोंमें श्रेष्ठ गेरिगशज कैलासपर आकर अर्जुनसे मिलनेके शुभ अवसरकी प्रतीक्षामें हमने यहाँ डेरा डाला है। (क्योंकि वहीं मिलनेका उनकी ओरसे संकेत प्राप्त हुआ था।) वह शत कैलास-शिखर पुष्पित वृक्षावलियोंसे सुशोभित है। वहाँ मतवाले कोकिलोंकी काकली, भ्रमरोंके गुंजारव तथा मोर और पपीहोंकी मीठी वाणीसे नित्य उत्सव-सा होता रहता है, जो उस पर्वतकी शोभाको बढ़ा देता है। वहाँ व्याप्र, वराह, महिष, गवय, हरिण, हिंसक जन्तु, सर्प तथा रुरुमृग निवास करते हैं। खिले हुए सहस्रदल, शतदल, उत्पल, प्रफुल्ल कमल तथा नीलोत्पल आदिसे उस पर्वतकी रमणीयता और भी बढ़ गयी है। वह परम पुण्यमय और पवित्र है। देवता और असुर दोनों ही उसका सेवन करते हैं

Waiśampāyana berkata: Setelah mencapai Kailāsa, raja gunung yang putih—terutama di antara segala puncak—mereka tiba di suatu tempat yang dihiasi rimbun pepohonan berbunga, bergema oleh kicau kukila yang mabuk madu dan dengung kawanan lebah. Seakan alam sendiri menyiapkan panggung suci dan mujur bagi pertemuan yang telah ditakdirkan.

Verse 5

मयूरैश्वातकैश्वापि नित्योत्सवविभूषितम्‌ । व्याप्रैर्वराहैर्महिषैर्गवयै्हरिणैस्तथा,'पर्वतोंमें श्रेष्ठ गेरिगशज कैलासपर आकर अर्जुनसे मिलनेके शुभ अवसरकी प्रतीक्षामें हमने यहाँ डेरा डाला है। (क्योंकि वहीं मिलनेका उनकी ओरसे संकेत प्राप्त हुआ था।) वह शत कैलास-शिखर पुष्पित वृक्षावलियोंसे सुशोभित है। वहाँ मतवाले कोकिलोंकी काकली, भ्रमरोंके गुंजारव तथा मोर और पपीहोंकी मीठी वाणीसे नित्य उत्सव-सा होता रहता है, जो उस पर्वतकी शोभाको बढ़ा देता है। वहाँ व्याप्र, वराह, महिष, गवय, हरिण, हिंसक जन्तु, सर्प तथा रुरुमृग निवास करते हैं। खिले हुए सहस्रदल, शतदल, उत्पल, प्रफुल्ल कमल तथा नीलोत्पल आदिसे उस पर्वतकी रमणीयता और भी बढ़ गयी है। वह परम पुण्यमय और पवित्र है। देवता और असुर दोनों ही उसका सेवन करते हैं

Waiśampāyana berkata: Daerah itu seolah berhias perayaan yang tak putus—bergema oleh merak dan burung cātaka serta lainnya; dan di sana pun hidup harimau, babi hutan, kerbau, gayal, dan rusa.

Verse 6

श्वापदेव्यालरूपैश्न रुकुभिश्न निषेवितम्‌ । फुल्लै: सहस्रपत्रैश्न शतपत्रैस्तथोत्पलै:,'पर्वतोंमें श्रेष्ठ गेरिगशज कैलासपर आकर अर्जुनसे मिलनेके शुभ अवसरकी प्रतीक्षामें हमने यहाँ डेरा डाला है। (क्योंकि वहीं मिलनेका उनकी ओरसे संकेत प्राप्त हुआ था।) वह शत कैलास-शिखर पुष्पित वृक्षावलियोंसे सुशोभित है। वहाँ मतवाले कोकिलोंकी काकली, भ्रमरोंके गुंजारव तथा मोर और पपीहोंकी मीठी वाणीसे नित्य उत्सव-सा होता रहता है, जो उस पर्वतकी शोभाको बढ़ा देता है। वहाँ व्याप्र, वराह, महिष, गवय, हरिण, हिंसक जन्तु, सर्प तथा रुरुमृग निवास करते हैं। खिले हुए सहस्रदल, शतदल, उत्पल, प्रफुल्ल कमल तथा नीलोत्पल आदिसे उस पर्वतकी रमणीयता और भी बढ़ गयी है। वह परम पुण्यमय और पवित्र है। देवता और असुर दोनों ही उसका सेवन करते हैं

Waiśampāyana berkata: Tempat itu juga didatangi binatang buas, ular-ular yang mengerikan, serta beruang; dan dihiasi teratai yang mekar—seribu kelopak, seratus kelopak—beserta utpala (lili air).

Verse 7

प्रफुल्लै: कमलैश्वैव तथा नीलोत्पलैरपि । महापुण्यं पवित्र॑ च सुरासुरनिषेवितम्‌,'पर्वतोंमें श्रेष्ठ गेरिगशज कैलासपर आकर अर्जुनसे मिलनेके शुभ अवसरकी प्रतीक्षामें हमने यहाँ डेरा डाला है। (क्योंकि वहीं मिलनेका उनकी ओरसे संकेत प्राप्त हुआ था।) वह शत कैलास-शिखर पुष्पित वृक्षावलियोंसे सुशोभित है। वहाँ मतवाले कोकिलोंकी काकली, भ्रमरोंके गुंजारव तथा मोर और पपीहोंकी मीठी वाणीसे नित्य उत्सव-सा होता रहता है, जो उस पर्वतकी शोभाको बढ़ा देता है। वहाँ व्याप्र, वराह, महिष, गवय, हरिण, हिंसक जन्तु, सर्प तथा रुरुमृग निवास करते हैं। खिले हुए सहस्रदल, शतदल, उत्पल, प्रफुल्ल कमल तथा नीलोत्पल आदिसे उस पर्वतकी रमणीयता और भी बढ़ गयी है। वह परम पुण्यमय और पवित्र है। देवता और असुर दोनों ही उसका सेवन करते हैं

Waiśampāyana berkata: Daerah itu dihiasi teratai yang mekar sempurna dan juga nilotpala (lili air biru). Tempat itu amat penuh pahala dan menyucikan—dihormati serta didatangi baik oleh para dewa maupun asura.

Verse 8

तत्रापि च कृतोद्देशः समागमदिदृक्षुभि: । कृतश्न समयस्तेन पार्थेनामिततेजसा

Di sana pula diatur tempat bagi mereka yang ingin menyaksikan pertemuan itu; dan Pārtha yang bercahaya tak terukur menetapkan kesepakatan serta waktu yang pasti.

Verse 9

पज्चवर्षाणि वत्स्यामि विद्यार्थीति पुरा मयि । “अमिततेजस्वी अर्जुनने वहाँ भी अपना आगमन देखनेके लिये उत्सुक हुए हमलोगोंके साथ संकेतपूर्वक यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं अस्त्रविद्याका अध्ययन करनेके लिये पाँच वर्षोतक देवलोकमें निवास करूँगा ।। अत्र गाण्डीवधन्वानमवाप्तास्त्रमरिन्दमम्‌,'शत्रुओंका दमन करनेवाले गाण्डीवधारी अर्जुन अस्त्रविद्या प्राप्त करके पुनः देवलोकसे इस मनुष्यलोकमें आनेवाले हैं। हमलोग शीघ्र ही उनसे मिलेंगे”! ऐसा कहकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने सब ब्राह्मणोंको आमन्त्रित किया

Vaiśampāyana berkata: “Dahulu, di hadapanku, ia memberi isyarat dan bernazar: ‘Selama lima tahun aku akan tinggal sebagai seorang pelajar demi mempelajari ilmu senjata.’ Kini Arjuna, pemegang Gāṇḍīva, penunduk musuh, telah memperoleh ilmu persenjataan dan sedang kembali dari alam para dewa ke dunia manusia; segera kita akan berjumpa dengannya.” Setelah berkata demikian, Yudhiṣṭhira putra Pāṇḍu mengundang semua brāhmaṇa.

Verse 10

देवलोकादिमं लोकं द्रक्ष्याम: पुनरागतम्‌ । इत्युक्त्वा ब्राह्म॒ुणान्‌ सर्वानामन्त्रयत पाण्डव:,'शत्रुओंका दमन करनेवाले गाण्डीवधारी अर्जुन अस्त्रविद्या प्राप्त करके पुनः देवलोकसे इस मनुष्यलोकमें आनेवाले हैं। हमलोग शीघ्र ही उनसे मिलेंगे”! ऐसा कहकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने सब ब्राह्मणोंको आमन्त्रित किया

Vaiśampāyana berkata: “Kita akan melihatnya kembali ketika ia pulang dari alam para dewa ke dunia ini.” Setelah berkata demikian, sang Pāṇḍava, Yudhiṣṭhira, memanggil dan mengundang semua brāhmaṇa—yakin bahwa Arjuna, pemegang Gāṇḍīva, penunduk musuh, akan kembali setelah menguasai senjata-senjata surgawi.

Verse 11

कारणं चैव तत्‌ तेषामाचचक्षे तपस्विनाम्‌ । तानुग्रतपस: प्रीतान्‌ कृत्वा पार्था: प्रदक्षिणाम्‌,और उन तपस्वियोंके सामने उन्हें बुला भेजनेका कारण बताया। उन कठोर तपस्वियोंको प्रसन्न करके कुन्तीकुमारोंने उनकी परिक्रमा की

Para Pāṇḍava menjelaskan kepada para pertapa itu alasan mereka dipanggil. Setelah menyenangkan para resi yang menjalani tapa berat, putra-putra Kuntī lalu mengelilingi mereka dengan hormat sebagai tanda bakti.

Verse 12

ब्राह्मणास्ते5न्वमोदन्‍त शिवेन कुशलेन च | सुखोदर्कमिमं क्लेशमचिराद्‌ भरतर्षभ,तब उन ब्राह्मणोंने कुशल-मंगलके साथ उन सबके अभीष्ट मनोरथकी पूर्तिका अनुमोदन किया और कहा--'भरतश्रेष्ठी] आजका यह क्लेश शीघ्र ही सुखद भविष्यके रूपमें परिणत हो जायगा

Para brāhmaṇa itu menyatakan persetujuan sambil mendoakan keberuntungan dan kesejahteraan. Mereka berkata, “Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, kesusahan saat ini akan segera berbuah menjadi kebahagiaan di masa depan.”

Verse 13

क्षत्रधर्मेण धर्मज्ञ तीर्त्वा गां पालयिष्यसि । तत्‌ तु राजा वचस्तेषां प्रतिगृह्य तपस्विनाम्‌,“धर्मज्ञ! तुम क्षत्रियरधर्मके अनुसार इस संकटसे पार होकर सारी पृथ्वीका पालन करोगे।” राजा युधिष्ठिरने उन तपस्वी ब्राह्मणोंका यह आशीर्वाद शिरोधार्य किया और वे परंतप नरेश उन ब्राह्मणों तथा भाइयोंके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए। घटोत्कच आदि राक्षस भी उनकी सेवाके लिये पीछे-पीछे चले। राजा युधिष्ठिर महर्षि लोमशके द्वारा सर्वथा सुरक्षित थे

“Wahai yang mengetahui dharma, dengan menempuh dharma seorang ksatria engkau akan menyeberangi krisis ini dan kemudian melindungi bumi.” Raja Yudhiṣṭhira menerima kata-kata para pertapa itu sebagai berkat; lalu sang penakluk musuh berangkat dari sana bersama para resi brāhmaṇa dan saudara-saudaranya. Para rākṣasa seperti Ghaṭotkaca mengikuti dari belakang untuk melayani. Di bawah bimbingan maharsi Lomaśa, Yudhiṣṭhira terlindungi sepenuhnya.

Verse 14

प्रतस्थे सह विप्रैस्तै््नातृभिश्व॒ परन्तप: । राक्षसैरनुयातो वै लोमशेनाभिरक्षित:,“धर्मज्ञ! तुम क्षत्रियरधर्मके अनुसार इस संकटसे पार होकर सारी पृथ्वीका पालन करोगे।” राजा युधिष्ठिरने उन तपस्वी ब्राह्मणोंका यह आशीर्वाद शिरोधार्य किया और वे परंतप नरेश उन ब्राह्मणों तथा भाइयोंके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए। घटोत्कच आदि राक्षस भी उनकी सेवाके लिये पीछे-पीछे चले। राजा युधिष्ठिर महर्षि लोमशके द्वारा सर्वथा सुरक्षित थे

Waiśampāyana berkata—Kemudian Raja Yudhiṣṭhira, sang penakluk musuh, berangkat dari sana bersama para brāhmaṇa pertapa dan saudara-saudaranya. Para rākṣasa mengikuti dari belakang untuk melayani, sementara sang raja berada sepenuhnya dalam lindungan Mahārṣi Lomaśa.

Verse 15

क्वचित्‌ पद्धयां ततो5गच्छद्‌ राक्षसैरुह्मुते क्वचित्‌ । तत्र तत्र महातेजा भ्रातृभि: सह सुव्रत:,उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वे महातेजस्वी भूपाल कहीं तो भाइयोंसहित पैदल चलते और कहीं राक्षसलोग उन्हें पीठपर बैठाकर ले जाते थे। इस प्रकार वे अनेक स्थानोंमें गये

Raja yang bertekad luhur itu kadang berjalan kaki bersama saudara-saudaranya, dan kadang dibopong oleh para rākṣasa di punggung mereka. Demikianlah mereka menempuh banyak tempat.

Verse 16

ततो युधिष्ठिरो राजा बहून्‌ क्लेशान्‌ विचिन्तयन्‌ । सिंहव्याप्रगजाकीर्णामुदीचीं प्रययौ दिशम्‌,तदनन्तर राजा युधिष्ठिर अनेक क्लेशोंका चिन्तन करते हुए सिंह, व्याप्र और हाथियोंसे भरी हुई उत्तर-दिशाकी ओर चल दिये

Kemudian Raja Yudhiṣṭhira, merenungkan banyak derita yang telah mereka alami, berangkat menuju arah utara yang dipenuhi singa, harimau, dan gajah.

Verse 17

अवेक्षमाण: कैलासं मैनाकं चैव पर्वतम्‌ । गन्धमादनपादांश्व श्वेत चापि शिलोच्चयम्‌,कैलास, मैनाकपर्वत, गन्धमादनकी घाटियों और श्वेत (हिमालय) पर्वतका दर्शन करते हुए उन्होंने पर्वतमालाओंके ऊपर-ऊपर बहुत-सी कल्याणमयी सरिताएँ देखीं तथा सत्रहवें दिन वे हिमालयके एक पावन पृष्ठभागपर जा पहुँचे

Sambil memandang Gunung Kailāsa, gunung Maināka, lereng-lereng Gandhamādana, dan gugusan pegunungan putih, mereka terus melanjutkan perjalanan.

Verse 18

उपर्युपरि शैलस्य बद्दीश्व सरित: शिवा: । पृष्ठ हिमवत: पुण्यं ययौ सप्तदशेडहनि,कैलास, मैनाकपर्वत, गन्धमादनकी घाटियों और श्वेत (हिमालय) पर्वतका दर्शन करते हुए उन्होंने पर्वतमालाओंके ऊपर-ऊपर बहुत-सी कल्याणमयी सरिताएँ देखीं तथा सत्रहवें दिन वे हिमालयके एक पावन पृष्ठभागपर जा पहुँचे

Menyusuri punggung-punggung gunung yang tinggi, mereka menyaksikan banyak sungai yang membawa keberkahan; dan pada hari ketujuh belas mereka mencapai lereng belakang Himavat (Himalaya) yang suci.

Verse 19

ददृशु: पाण्डवा राजन्‌ गन्धमादनमन्तिकात्‌ । पृष्ठे हिमवत: पुण्ये नानाद्रुमलतावृते,राजन! वहाँ पाण्डवोंने गन्धमादन पर्वतका निकटसे दर्शन किया। हिमालयका वह पावन पृष्ठभाग नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे आवृत था। वहाँ जलके आवर्तोंसे सींचकर उत्पन्न हुए फूलवाले वृक्षोंसे घिरा हुआ वृषपर्वाका परम पवित्र आश्रम था। शत्रुदमन पाण्डवोंने उन धर्मात्मा राजर्षि वृषपर्वाके पास जाकर क्लेशरहित हो उन्हें प्रणाम किया

Waiśampāyana berkata: Wahai Raja, para Pāṇḍava memandang Gunung Gandhamādana dari dekat. Lereng utara Himālaya yang suci itu tertutup aneka pepohonan dan sulur merambat.

Verse 20

सलिलावर्तसंजातै: पुष्पितैश्न महीरुहै: । समावृतं पुण्यतममाश्रमं वृषपर्वण:,राजन! वहाँ पाण्डवोंने गन्धमादन पर्वतका निकटसे दर्शन किया। हिमालयका वह पावन पृष्ठभाग नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे आवृत था। वहाँ जलके आवर्तोंसे सींचकर उत्पन्न हुए फूलवाले वृक्षोंसे घिरा हुआ वृषपर्वाका परम पवित्र आश्रम था। शत्रुदमन पाण्डवोंने उन धर्मात्मा राजर्षि वृषपर्वाके पास जाकर क्लेशरहित हो उन्हें प्रणाम किया

Di sana, pertapaan Vṛṣaparvan yang amat suci dilingkupi pepohonan berbunga yang tumbuh subur, tersiram oleh pusaran air.

Verse 21

तमुपागम्य राजर्षि धर्मात्मानमरिन्दमा: । पाण्डवा वृषपर्वाणमवन्दन्त गतक्लमा:,राजन! वहाँ पाण्डवोंने गन्धमादन पर्वतका निकटसे दर्शन किया। हिमालयका वह पावन पृष्ठभाग नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे आवृत था। वहाँ जलके आवर्तोंसे सींचकर उत्पन्न हुए फूलवाले वृक्षोंसे घिरा हुआ वृषपर्वाका परम पवित्र आश्रम था। शत्रुदमन पाण्डवोंने उन धर्मात्मा राजर्षि वृषपर्वाके पास जाकर क्लेशरहित हो उन्हें प्रणाम किया

Mendekati resi-raja Vṛṣaparvan yang berhati dharma, para Pāṇḍava—penakluk musuh—dengan lelah yang sirna, bersujud memberi hormat kepadanya.

Verse 22

अभ्यनन्दत्‌ स राजर्षि: पुत्रवद्‌ भरतर्षभान्‌ । पूजिताश्चावसंस्तत्र सप्तरात्रमरिन्दमा:,उन राजर्षिने भरतकुलभूषण पाण्डवोंका पुत्रके समान अभिनन्दन किया और उनसे सम्मानित होकर वे शत्रुदमन पाण्डव वहाँ सात रात ठहरे रहे

Resi-raja itu menyambut para Pāṇḍava—laksana banteng-banteng keturunan Bharata—seperti menyambut putra-putranya sendiri. Dimuliakan olehnya, para Pāṇḍava penakluk musuh tinggal di sana selama tujuh malam.

Verse 23

अष्टमे5हनि सम्प्राप्ते तमृषिं लोकविश्रुतम्‌ । आमन्त्रय वृषपर्वाणं प्रस्थान प्रत्यरोचयन्‌,आठवें दिन उन विश्वविख्यात राजर्षि वृषपर्वाकी आज्ञा ले उन्होंने वहाँसे प्रस्थान करनेका विचार किया

Ketika hari kedelapan tiba, mereka berpamitan kepada resi-raja Vṛṣaparvan yang termasyhur di dunia, lalu memantapkan niat untuk berangkat dari tempat itu.

Verse 24

एकैकशकश्च तान्‌ विप्रान्‌ निवेद्य वृषपर्वणि । न्यासभूतान्‌ यथाकालं बन्धूनिव सुसत्कृतान्‌,न्यदधुः पाण्डवा राजजन्नाश्रमे वृषपर्वण: । अपने साथ आये हुए ब्राह्मणोंको उन्होंने एक-एक करके वृषपर्वाके यहाँ धरोहरकी भाँति सौंपा। उन सबका पाण्डवोंने समय-समयपर सगे बन्धुकी भाँति सत्कार किया था। ब्राह्मणोंको सौंपनेके पश्चात्‌ पाण्डवोंने अपनी शेष सामग्री भी उन्हीं महामनाको दे दी। तदनन्तर पाण्डुपुत्रोंने वृषपर्वाके ही आश्रममें अपने यज्ञपात्र तथा रत्नमय आभूषण भी रख दिये

Waiśampāyana berkata: Wahai Raja, para Pāṇḍava mempersembahkan para brāhmaṇa itu satu per satu kepada Vṛṣaparvā, menyerahkan mereka kepadanya laksana titipan suci. Setelah memuliakan mereka pada waktunya seperti kaum kerabat sendiri, para Pāṇḍava menempatkan mereka di pertapaan Vṛṣaparvā. Sesudah itu, putra-putra Pāṇḍu pun menyerahkan pula sisa bekal mereka kepada sang mahātmā, dan di sana mereka menitipkan bejana-bejana yajña serta perhiasan bertatah permata.

Verse 25

पारिब्ह च तं शेषं परिदाय महात्मने । ततस्ते यज्ञपात्राणि रत्नान्‍न्याभरणानि च

Mereka pun menyerahkan pula seluruh sisa yang ada dengan lengkap kepada sang mahātmā. Setelah itu, mereka (menyerahkan) bejana-bejana yajña, permata, dan perhiasan lainnya.

Verse 26

अतीतानागते विद्वान्‌ कुशल: सर्वधर्मवित्‌,वृषपर्वा भूत और भविष्यके ज्ञाता, कार्यकुशल और सम्पूर्ण धर्मोके मर्मज्ञ थे। उन धर्मज्ञ नरेशने भरतश्रेष्ठ पाण्डवोंको पुत्रकी भाँति उपदेश दिया। उनकी आज्ञा पाकर महामना पाण्डव उत्तरदिशाकी ओर चले

Waiśampāyana berkata: Vṛṣaparvā mengetahui perkara masa lampau dan masa depan, cakap dalam urusan, serta memahami seluruh dharma. Raja yang saleh itu menasihati para Pāṇḍava—yang terbaik di antara keturunan Bharata—seperti seorang ayah menasihati putra-putranya. Setelah menerima perintahnya, para Pāṇḍava yang berhati luhur berangkat menuju arah utara.

Verse 27

अन्वशासत्‌ स धर्मज्ञ: पुत्रवद्‌ भरतर्षभान्‌ | तेडनुज्ञाता महात्मान: प्रययुर्दिशमुत्तराम्‌,वृषपर्वा भूत और भविष्यके ज्ञाता, कार्यकुशल और सम्पूर्ण धर्मोके मर्मज्ञ थे। उन धर्मज्ञ नरेशने भरतश्रेष्ठ पाण्डवोंको पुत्रकी भाँति उपदेश दिया। उनकी आज्ञा पाकर महामना पाण्डव उत्तरदिशाकी ओर चले

Raja yang mengetahui dharma itu menasihati para pahlawan agung keturunan Bharata—para Pāṇḍava—seperti seorang ayah menasihati putra-putranya. Setelah memperoleh izinnya, para mahātmā itu berangkat menuju arah utara.

Verse 28

तान्‌ प्रस्थितानभ्यगच्छद्‌ वृषपर्वा महीपति: । उपन्यस्य महातेजा विप्रेभ्य: पाण्डवांस्तदा,उस समय उनके प्रस्थान करनेपर महातेजस्वी राजर्षि वृषपर्वाने पाण्डवोंको (उस देशके जानकार अन्य) ब्राह्मणोंके सुपुर्द कर दिया और कुछ दूर पीछे-पीछे जाकर उन कुन्तीकुमारोंको आशीर्वाद देकर प्रसन्न किया। तत्पश्चात्‌ उन्हें रास्ता बताकर वृषपर्वा लौट आये

Waiśampāyana berkata: Ketika para Pāṇḍava telah berangkat, Raja Vṛṣaparvā mendatangi mereka. Penguasa yang bercahaya dan perkasa itu lalu mempercayakan para Pāṇḍava kepada brāhmaṇa-brāhmaṇa terpelajar yang mengenal wilayah tersebut. Ia berjalan mengiringi dari belakang untuk beberapa jarak, memberkahi putra-putra Kuntī dan menggembirakan hati mereka; kemudian, setelah menunjukkan jalan, Vṛṣaparvā pun kembali.

Verse 29

अनुसंसार्य कौन्तेयानाशीर्भिरभिनन्द्य च । वृषपर्वा निववृते पन्थानमुपदिश्य च,उस समय उनके प्रस्थान करनेपर महातेजस्वी राजर्षि वृषपर्वाने पाण्डवोंको (उस देशके जानकार अन्य) ब्राह्मणोंके सुपुर्द कर दिया और कुछ दूर पीछे-पीछे जाकर उन कुन्तीकुमारोंको आशीर्वाद देकर प्रसन्न किया। तत्पश्चात्‌ उन्हें रास्ता बताकर वृषपर्वा लौट आये

Setelah melihat putra-putra Kuntī berangkat dengan selamat, Raja Vṛṣaparvā berjalan mengikuti mereka sejenak. Lalu ia menggembirakan mereka dengan berkat dan kata-kata persetujuan; setelah menunjukkan jalan yang tepat, ia pun berbalik kembali.

Verse 30

नानामृगगणैर्जुष्टं कौन्तेय: सत्यविक्रम: । पदाति भ्रत्िभि: सार्धथ प्रातिछतत युधिछिर:,फिर सत्यपराक्रमी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ पैदल ही (वृषपर्वकि बताये हुए मार्गपर) चले, जो अनेक जातिके मृगोंके झुंडोंसे भरा हुआ था

Kemudian Yudhiṣṭhira, putra Kuntī—teguh dalam kebenaran dan terbukti dalam keberanian—berangkat berjalan kaki bersama saudara-saudaranya, menempuh rute yang ditunjukkan Vṛṣaparvā, melalui wilayah yang dipenuhi kawanan berbagai jenis satwa liar.

Verse 31

नानाद्रुमनिरोधेषु वसन्‍्तः शैलसानुषु । पर्वतं विविशु: श्वेतं चतुर्थेडहनि पाण्डवा:,वे सभी पाण्डव नाना प्रकारके वृक्षोंसे हरे-भरे पर्वतीय शिखरोंपर डेरा डालते हुए चौथे दिन श्वेत (हिमालय) पर्वतपर जा पहुँचे, जो महामेघके समान शोभा पाता था। वह सुन्दर शैल शीतल सलिलराशिसे सम्पन्न था और मणि सुवर्ण, रजत तथा शिलाखण्डोंका समुदायरूप था। हिमालयका वह रमणीय प्रदेश अनेकानेक कन्दराओं और निर्डरोंसे सुशोभित शिलाखण्डोंके कारण दुर्गग तथा लताओं और वृक्षोंसे व्याप्त था। पाण्डव वृषपर्वाके बताये हुए मार्गका आश्रय ले नाना प्रकारके वृक्षोंका अवलोकन करते हुए अपने अभीष्ट स्थानकी ओर अग्रसर हो रहे थे

Dengan singgah di lereng-lereng gunung yang dipenuhi berbagai rimbunan pepohonan, para Pāṇḍava pada hari keempat memasuki Gunung Putih (Himālaya).

Verse 32

महाभ्रघनसंकाशं सलिलोपहितं शुभम्‌ । मणिकाज्चनरूप्यस्य शिलानां च समुच्चयम्‌,वे सभी पाण्डव नाना प्रकारके वृक्षोंसे हरे-भरे पर्वतीय शिखरोंपर डेरा डालते हुए चौथे दिन श्वेत (हिमालय) पर्वतपर जा पहुँचे, जो महामेघके समान शोभा पाता था। वह सुन्दर शैल शीतल सलिलराशिसे सम्पन्न था और मणि सुवर्ण, रजत तथा शिलाखण्डोंका समुदायरूप था। हिमालयका वह रमणीय प्रदेश अनेकानेक कन्दराओं और निर्डरोंसे सुशोभित शिलाखण्डोंके कारण दुर्गग तथा लताओं और वृक्षोंसे व्याप्त था। पाण्डव वृषपर्वाके बताये हुए मार्गका आश्रय ले नाना प्रकारके वृक्षोंका अवलोकन करते हुए अपने अभीष्ट स्थानकी ओर अग्रसर हो रहे थे

Wilayah yang elok itu tampak luas laksana gumpalan awan besar, dihiasi air yang sejuk. Di sana seakan terkumpul permata, emas, perak, serta bongkahan-bongkahan batu yang besar.

Verse 33

(रूपं हिमवतः प्रस्थं बहुकन्दरनिर्सरम्‌ । शिलाविभड्रविकटं लतापादपसंकुलम्‌ ।।) ते समासाद्य पन्थानं यथोक्तं वृषपर्वणा । अनुसखुर्यथोद्देशं पश्यन्तो विविधान्नगान्‌,वे सभी पाण्डव नाना प्रकारके वृक्षोंसे हरे-भरे पर्वतीय शिखरोंपर डेरा डालते हुए चौथे दिन श्वेत (हिमालय) पर्वतपर जा पहुँचे, जो महामेघके समान शोभा पाता था। वह सुन्दर शैल शीतल सलिलराशिसे सम्पन्न था और मणि सुवर्ण, रजत तथा शिलाखण्डोंका समुदायरूप था। हिमालयका वह रमणीय प्रदेश अनेकानेक कन्दराओं और निर्डरोंसे सुशोभित शिलाखण्डोंके कारण दुर्गग तथा लताओं और वृक्षोंसे व्याप्त था। पाण्डव वृषपर्वाके बताये हुए मार्गका आश्रय ले नाना प्रकारके वृक्षोंका अवलोकन करते हुए अपने अभीष्ट स्थानकी ओर अग्रसर हो रहे थे

Mereka mencapai kawasan Himavat yang penuh gua dan mata air yang mengalir, terjal dan menggetarkan karena batu-batu yang tidak rata, serta lebat oleh sulur dan pepohonan. Setelah menemukan rute tepat seperti yang dikatakan Vṛṣaparvā, para Pāṇḍava melanjutkan perjalanan menuju tempat yang ditentukan, sambil memandang beragam puncak dan perbukitan di sepanjang jalan.

Verse 34

उपर्युपरि शैलस्य गुहा: परमदुर्गमा: । सुदुर्गमांस्ते सुबहूनू सुखेनैवाभिचक्रमु:

Di puncak-puncak gunung terdapat gua-gua yang amat sukar dicapai. Namun mereka menempuh banyak jalur berbahaya itu dengan mudah, terus maju tanpa goyah.

Verse 35

धौम्य: कृष्णा च पार्थाश्च॒ लोमशश्न महानृषि: । अगच्छन्‌ सहितास्तत्र न कश्निदवहीयते

Dhaumya, Kṛṣṇā (Draupadī), para Pārtha, dan resi agung Lomasa berjalan bersama ke tempat itu; tak seorang pun tertinggal.

Verse 36

उस पर्वतके ऊपर बहुत-सी अत्यन्त दुर्गम गुफाएँ थीं और अनेक दुर्गम्य प्रदेश थे। पाण्डव उन सबको सुखपूर्वक लाँचकर आगे बढ़ गये। पुरोहित धौम्य, द्रौपदी, चारों पाण्डव तथा महर्षि लोमश--ये सब लोग एक साथ चल रहे थे। कोई पीछे नहीं छूटता था ।। ते मृगद्धिजसंघुष्टं नानाद्रुमलतायुतम्‌ | शाखामृगगणैश्वैव सेवितं सुमनोरमम्‌,आगे बढ़ते हुए वे महाभाग पाण्डव पुण्यमय माल्यवान्‌ नामक महान पर्वतपर जा पहुँचे, जो अनेक प्रकारके वृक्षों और लताओंसे सुशोभित तथा अत्यन्त मनोरम था। वहाँ मृगोंके झुंड विचरते और भाँति-भाँतिके पक्षी कलरव कर रहे थे। बहुत-से वानर भी उस पर्वतका सेवन करते थे। उसके शिखरपर कमलमण्डित सरोवर, छोटे-छोटे जलकुण्ड और विशाल वन थे

Tempat itu riuh oleh kawanan rusa dan kicau burung, dihiasi aneka pepohonan serta sulur, dan semakin elok karena didatangi gerombolan monyet.

Verse 37

पुण्यं पद्मसरोयुक्ते सपल्वलमहावनम्‌ । उपतस्थुर्महाभागा माल्यवन्तं महागिरिम्‌,आगे बढ़ते हुए वे महाभाग पाण्डव पुण्यमय माल्यवान्‌ नामक महान पर्वतपर जा पहुँचे, जो अनेक प्रकारके वृक्षों और लताओंसे सुशोभित तथा अत्यन्त मनोरम था। वहाँ मृगोंके झुंड विचरते और भाँति-भाँतिके पक्षी कलरव कर रहे थे। बहुत-से वानर भी उस पर्वतका सेवन करते थे। उसके शिखरपर कमलमण्डित सरोवर, छोटे-छोटे जलकुण्ड और विशाल वन थे

Terus maju, para Pāṇḍava yang mulia tiba di gunung besar bernama Mālyavān—suci, berhias telaga berpadma, dengan kolam-kolam air dan rimba yang luas.

Verse 38

ततः किम्पुरुषावासं सिद्धचारणसेवितम्‌ । ददृशुर्ह्ष्टरोमाण: पर्वत॑ं गन्धमादनम्‌,वहाँसे उन्हें गन्धमादन पर्वत दिखायी दिया, जो किम्पुरुषोंका निवासस्थान है। सिद्ध और चारण उसका सेवन करते हैं। उसे देखकर पाण्डवोंका रोम-रोम हर्षसे खिल उठा

Kemudian mereka melihat Gunung Gandhamādana—tempat tinggal para Kimpuruṣa, yang sering didatangi para Siddha dan Cāraṇa. Melihatnya, bulu roma para Pāṇḍava berdiri karena sukacita.

Verse 39

विद्याधरानुचरितं किन्नरीभिस्तथैव च । गजसड्घमावासं सिंहव्याप्रगणायुतम्‌,उस पर्वतपर विद्याधर विहार करते थे। किन्नरियाँ क्रीड़ा करती थीं। झुंड-के-झुंड हाथी, सिंह और व्याप्र निवास करते थे

Waiśampāyana berkata: “Gunung itu kerap didatangi para Vidyādhara, dan juga menjadi tempat bermain para Kinnarī. Di sana berdiam kawanan gajah, dan gunung itu penuh oleh rombongan singa serta harimau.”

Verse 40

शरभोज्नादसंघुष्टं नानामृगनिषेवितम्‌ | ते गन्धमादनवन तन्नन्दनवनोपमम्‌,शरभोंके सिंहनादसे वह पर्वत गूँजता रहता था। नाना प्रकारके मृग वहाँ निवास करते थे। गन्धमादन पर्वतका वह वन नन्दनवनके समान मन और हृदयको आनन्द देनेवाला था। वे वीर पाण्डुकुमार बड़े प्रसन्न होकर क्रमश: उस सुन्दर काननमें प्रविष्ट हुए, जो सबको शरण देनेवाला था

Waiśampāyana berkata: “Hutan di Gandhamādana itu bergema oleh raungan śarabha dan didatangi banyak jenis satwa liar. Rimba itu laksana Nandana sendiri—membahagiakan pikiran dan hati.”

Verse 41

मुदिता: पाण्डुतनया मनोहृददयनन्दनम्‌ | विविशु: क्रमशो वीरा: शरण्यं शुभकाननम्‌,शरभोंके सिंहनादसे वह पर्वत गूँजता रहता था। नाना प्रकारके मृग वहाँ निवास करते थे। गन्धमादन पर्वतका वह वन नन्दनवनके समान मन और हृदयको आनन्द देनेवाला था। वे वीर पाण्डुकुमार बड़े प्रसन्न होकर क्रमश: उस सुन्दर काननमें प्रविष्ट हुए, जो सबको शरण देनेवाला था

Waiśampāyana berkata: “Putra-putra Pāṇḍu yang bersukacita itu, para kesatria, memasuki sedikit demi sedikit hutan suci—tempat perlindungan bagi semua—yang menyenangkan pikiran dan hati.”

Verse 42

द्रौोपदीसहिता वीरास्तैश्न विप्रैर्महात्मभि: । शृण्वन्त: प्रीतिजननान्‌ वल्गूनू मदकलाउछुभान्‌

Waiśampāyana berkata: “Para kesatria itu, bersama Draupadī dan ditemani para brāhmaṇa berhati agung, mendengarkan kata-kata yang menimbulkan sukacita—indah, manis nadanya, dan membawa pertanda baik—diucapkan dengan irama lembut yang menyejukkan batin.”

Verse 43

श्रोत्ररम्यान्‌ सुमधुराज्छब्दान्‌ खगमुखेरितान्‌ । सर्वर्तुफलभाराब्यान्‌ सर्वर्तुकुसुमोज्ज्वलान्‌

Waiśampāyana berkata: “Terdengar bunyi-bunyi yang menyejukkan telinga—nada-nada amat manis—yang keluar dari paruh burung-burung. Tempat itu sarat oleh beban buah pada setiap musim, dan cemerlang oleh bunga-bunga pada setiap musim.”

Verse 44

पश्यन्त: पादपांश्वापि फलभारावनामितान्‌ | आग्रानाम्रातकान्‌ भव्यान्‌ नारिकेलान्‌ सतिन्दुकान्‌

Waiśampāyana berkata— Ketika mereka melanjutkan perjalanan, mereka melihat pepohonan pun merunduk karena berat buahnya—di bagian depan tampak pohon-pohon āmrātaka yang elok, dan juga pohon kelapa bersama pohon tinduka.

Verse 45

मुञज्जातकांस्तथाञ्जीरान्‌ दाडिमान्‌ बीजपूरकान्‌ । पनसॉल्लकुचान्‌ मोचान्‌ खर्जूरानम्लवेतसान्‌

Waiśampāyana berkata— Di sana terdapat aneka buah dan hasil hutan—tunas muda muñja, buah ara, delima, buah bījapūraka (serupa sitrun/mātuluṅga), nangka, buah lakuca kecil, pisang, kurma, serta buah vetasa yang masam.

Verse 46

पारावतांस्तथा क्षौद्रान्‌ नीपांश्वापि मनोरमान्‌ । बिल्वान्‌ कपित्थाज्जम्बूंश्व काश्मरीर्बदरीस्तथा

Waiśampāyana berkata— Di sana ada pula pohon pārvata dan pohon kṣaudra, juga pohon nīpa yang menawan; ada bilva, kapittha, jambū, serta pohon kāśmarī dan badarī.

Verse 47

प्लक्षानुदुम्बरबटानश्वत्थान्‌ क्षीरिकांस्तथा । भल्लातकानामलकी्हरीतकबिभीतकान्‌

Waiśampāyana berkata— Di sana ada pohon plakṣa, ara udumbara, beringin, aśvattha (pohon ara suci), dan juga kṣīrikā yang bergetah susu; demikian pula pohon bhallātaka, āmalakī, harītaka, dan bibhītaka.

Verse 48

इड्गुदान्‌ करमर्दाश्व तिन्दुकांश्व महाफलान्‌ | एतानन्यांश्व विविधान्‌ गन्धमादनसानुषु

Waiśampāyana berkata— Di lereng-lereng Gandhamādana terdapat pohon iḍguda, semak karamarda, tumbuhan berbuah yang disebut aśva, pohon tinduka, serta berbagai jenis lain yang berbuah besar.

Verse 49

फलैरमृतकल्पैस्तानाचितान्‌ स्वादुभिस्तरून्‌ | तथैव चम्पकाशोकान्‌ केतकान्‌ बकुलांस्तथा

Waiśampāyana berkata: Di sana pepohonan sarat oleh buah-buah manis, seakan-akan nektar; demikian pula tampak pohon campaka dan aśoka, tanaman ketaka, serta pohon bakula—semuanya menambah harum dan keberkahan rimba yang teduh itu.

Verse 50

पुन्नागान्‌ सप्तपर्णाश्व॒ कर्णिकारान्‌ सकेतकान्‌ | पाटलान्‌ कुटजानू्‌ रम्यान्‌ मन्दारेन्दीवरांस्तथा

Waiśampāyana berkata: “Di sana ada pohon punnāga, saptaparṇa, karṇikāra, dan ketaka; juga pāṭala dan kuṭaja yang elok, serta mandāra dan indīvara—teratai biru.”

Verse 51

पारिजातान्‌ कोविदारान्‌ देवदारुद्रुमांस्तथा | शालांस्तालांस्तमालांश्व पिप्पलान्‌ हिड्डुकांस्तथा

Waiśampāyana berkata: “Mereka melihat pohon pārijāta, kovidāra, dan deodara; juga śāla, palmyra (tāla), tamāla, pippala, serta hiḍḍuka.”

Verse 52

शाल्मली: किंशुकाशोकाञछिंशपा: सरलांस्तथा । उनके साथ द्रौपदी तथा पूर्वोक्त महामना ब्राह्मण भी थे। वे सब लोग विहंगोंके मुखसे निकले हुए अत्यन्त मधुर सुन्दर, श्रवण-सुखद मादक एवं मोदजनक शुभ शब्द सुनते हुए तथा सभी ऋतुओंके पुष्पों और फलोंसे सुशोभित एवं उनके भारसे झुके वृक्षोंको देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। आम, आमड़ा, भव्य नारियल, तेंदू, मुंजातक, अंजीर, अनार, नीबू, कटहल, लकुच (बड़हर), मोच (केला), खजूर, अम्लवेंत, पारावत, क्षौद्र, सुन्दर कदम्ब, बेल, कैथ, जामुन, गम्भारी, बेर, पाकड़, गूलर, बरगद, पीपल, पिंड खजूर, भिलावा, आँवला, हरे, बहेड़ा, इंगुद, करौंदा तथा बड़े-बड़े फलवाले तिंदुक--ये और दूसरे भी नाना प्रकारके वृक्ष गन्धमादनके शिखरोंपर लहलहा रहे थे, जो अमृतके समान स्वादिष्ट फलोंसे लदे हुए थे। (इन सबको देखते हुए पाण्डवलोग आगे बढ़ने लगे।) इसी प्रकार चम्पा, अशोक, केतकी, बकुल (मौलशिरी), पुन्नाग (सुल्ताना चंपा), सप्तपर्ण (छितवन), कनेर, केवड़ा, पाटल (पाड़रि या गुलाब), कुटज, सुन्दर मन्दार, इन्दीवर (नीलकमल), पारिजात, कोविदार, देवदारु, शाल, ताल, तमाल, पिप्पल, हिंगुक (हींगका वृक्ष), सेमल, पलाश, अशोक, शीशम तथा सरल आदि वृक्षोंको देखते हुए पाण्डवलोग अग्रसर हो रहे थे ।। ४२ --५२३ || चकोरै: शतपन्रैश्व भुड़राजैस्तथा शुकै:,इन वृक्षोंपर निवास करनेवाले चकोर, मोर, भूृंगराज, तोते, कोयल, कलविंक (गौरैया- चिड़िया), हारीत (हारिल), चकवा, प्रियक, चातक तथा दूसरे नाना प्रकारके पक्षी, श्रवणसुखद मधुर शब्द बोल रहे थे। वहाँ चारों ओर जलचर जन्तुओंसे भरे हुए मनोहर सरोवर दृष्टिगोचर होते थे। जिनमें कुमुद, पुण्डरीक, कोकनद, उत्पल, कह्लार और कमल सब ओर व्याप्त थे। कादम्ब, चक्रवाक, कुरर, जलकुक्कुट, कारण्डव, प्लव, हंस, बक, मदगु तथा अन्य कितने ही जलचर पक्षी कमलोंके मकरन्दका पान करके मदसे मतवाले और हर्षसे मुग्ध हुए उन सरोवरोंमें सब ओर फैले थे

Waiśampāyana berkata: Mereka melangkah maju, memandang śālmalī, kiṁśuka, aśoka, chiṁśapā, dan sarala yang menjulang. Bersama mereka ada Draupadī dan brāhmaṇa berhati luhur yang telah disebutkan. Sambil mendengarkan kicau burung yang amat manis, menyejukkan telinga, memabukkan dan membangkitkan sukacita, mereka menatap pepohonan yang berhias bunga dan buah di segala musim, merunduk oleh bebannya, di lereng-lereng Gandhamādana yang subur oleh aneka pohon berbuah laksana nektar.

Verse 53

कोकिलै: कलविड्कैश्न हारितैर्जीवजीविकै: । प्रियकैश्ातकैश्वैव तथान्यैरविविधै: खगै:,इन वृक्षोंपर निवास करनेवाले चकोर, मोर, भूृंगराज, तोते, कोयल, कलविंक (गौरैया- चिड़िया), हारीत (हारिल), चकवा, प्रियक, चातक तथा दूसरे नाना प्रकारके पक्षी, श्रवणसुखद मधुर शब्द बोल रहे थे। वहाँ चारों ओर जलचर जन्तुओंसे भरे हुए मनोहर सरोवर दृष्टिगोचर होते थे। जिनमें कुमुद, पुण्डरीक, कोकनद, उत्पल, कह्लार और कमल सब ओर व्याप्त थे। कादम्ब, चक्रवाक, कुरर, जलकुक्कुट, कारण्डव, प्लव, हंस, बक, मदगु तथा अन्य कितने ही जलचर पक्षी कमलोंके मकरन्दका पान करके मदसे मतवाले और हर्षसे मुग्ध हुए उन सरोवरोंमें सब ओर फैले थे

Waiśampāyana berkata: “Di sana ada burung kukuk (kokila), kalaviṅka, hārita, jīvajīvika, priyaka, cātaka, dan banyak jenis burung lainnya; bertengger di pepohonan, mereka memenuhi tempat itu dengan suara yang manis dan menyejukkan telinga.”

Verse 54

श्रोत्ररम्यं सुमधुरं कूजद्धिश्चात्यधिष्ठितान्‌ । सरांसि च मनोज्ञानि समन्ताज्जलचारिभि:,इन वृक्षोंपर निवास करनेवाले चकोर, मोर, भूृंगराज, तोते, कोयल, कलविंक (गौरैया- चिड़िया), हारीत (हारिल), चकवा, प्रियक, चातक तथा दूसरे नाना प्रकारके पक्षी, श्रवणसुखद मधुर शब्द बोल रहे थे। वहाँ चारों ओर जलचर जन्तुओंसे भरे हुए मनोहर सरोवर दृष्टिगोचर होते थे। जिनमें कुमुद, पुण्डरीक, कोकनद, उत्पल, कह्लार और कमल सब ओर व्याप्त थे। कादम्ब, चक्रवाक, कुरर, जलकुक्कुट, कारण्डव, प्लव, हंस, बक, मदगु तथा अन्य कितने ही जलचर पक्षी कमलोंके मकरन्दका पान करके मदसे मतवाले और हर्षसे मुग्ध हुए उन सरोवरोंमें सब ओर फैले थे

Vaiśampāyana berkata: “Di sekeliling, burung-burung—yang menetap di tempat tinggal pilihan mereka—memenuhi udara dengan kicau yang menyejukkan telinga dan amat manis. Dan tampaklah danau-danau elok di segala arah, sesak oleh makhluk yang bergerak di perairan.”

Verse 55

कुमुदै: पुण्डरीकैश्न तथा कोकनदोत्पलै: । कह्लारै:ः कमलैश्वैव आचितानि समन्तत:ः,इन वृक्षोंपर निवास करनेवाले चकोर, मोर, भूृंगराज, तोते, कोयल, कलविंक (गौरैया- चिड़िया), हारीत (हारिल), चकवा, प्रियक, चातक तथा दूसरे नाना प्रकारके पक्षी, श्रवणसुखद मधुर शब्द बोल रहे थे। वहाँ चारों ओर जलचर जन्तुओंसे भरे हुए मनोहर सरोवर दृष्टिगोचर होते थे। जिनमें कुमुद, पुण्डरीक, कोकनद, उत्पल, कह्लार और कमल सब ओर व्याप्त थे। कादम्ब, चक्रवाक, कुरर, जलकुक्कुट, कारण्डव, प्लव, हंस, बक, मदगु तथा अन्य कितने ही जलचर पक्षी कमलोंके मकरन्दका पान करके मदसे मतवाले और हर्षसे मुग्ध हुए उन सरोवरोंमें सब ओर फैले थे

Vaiśampāyana berkata: Danau-danau elok itu tampak di segala arah, rapat terhampar oleh teratai dan bunga air—kumuda, puṇḍarīka, kokanada, utpala, kahlāra, dan kamala—menyelimuti permukaan dari segala sisi.

Verse 56

कायम्बैश्वक्रवाकैश्व कुररैर्जलकुक्कुटै: । कारण्डवै: प्लवै्सैर्बकैर्मद्गुभिरेव च,इन वृक्षोंपर निवास करनेवाले चकोर, मोर, भूृंगराज, तोते, कोयल, कलविंक (गौरैया- चिड़िया), हारीत (हारिल), चकवा, प्रियक, चातक तथा दूसरे नाना प्रकारके पक्षी, श्रवणसुखद मधुर शब्द बोल रहे थे। वहाँ चारों ओर जलचर जन्तुओंसे भरे हुए मनोहर सरोवर दृष्टिगोचर होते थे। जिनमें कुमुद, पुण्डरीक, कोकनद, उत्पल, कह्लार और कमल सब ओर व्याप्त थे। कादम्ब, चक्रवाक, कुरर, जलकुक्कुट, कारण्डव, प्लव, हंस, बक, मदगु तथा अन्य कितने ही जलचर पक्षी कमलोंके मकरन्दका पान करके मदसे मतवाले और हर्षसे मुग्ध हुए उन सरोवरोंमें सब ओर फैले थे

Vaiśampāyana berkata: “Di sana ada burung kāyamba, cakravāka, kurara, unggas air, kāraṇḍava, plava, kuntul, dan madgu pula. Bertebaran di danau-danau elok itu, mabuk oleh sari madu teratai dan bersukacita di hati, beraneka burung air memenuhi pemandangan.”

Verse 57

एतैश्नान्यैश्न कीर्णानि समनन्‍्ताज्जलचारिभि: । हृष्टैसतथा तामरसरसासवमदालसै:,इन वृक्षोंपर निवास करनेवाले चकोर, मोर, भूृंगराज, तोते, कोयल, कलविंक (गौरैया- चिड़िया), हारीत (हारिल), चकवा, प्रियक, चातक तथा दूसरे नाना प्रकारके पक्षी, श्रवणसुखद मधुर शब्द बोल रहे थे। वहाँ चारों ओर जलचर जन्तुओंसे भरे हुए मनोहर सरोवर दृष्टिगोचर होते थे। जिनमें कुमुद, पुण्डरीक, कोकनद, उत्पल, कह्लार और कमल सब ओर व्याप्त थे। कादम्ब, चक्रवाक, कुरर, जलकुक्कुट, कारण्डव, प्लव, हंस, बक, मदगु तथा अन्य कितने ही जलचर पक्षी कमलोंके मकरन्दका पान करके मदसे मतवाले और हर्षसे मुग्ध हुए उन सरोवरोंमें सब ओर फैले थे

Vaiśaṃpāyana berkata: Danau-danau elok itu penuh di segala sisi oleh burung-burung air ini dan banyak yang lain. Bergembira, dan dibuat lemah-lentur oleh mabuk sari manis laksana madu dari teratai, mereka menyebar di seluruh permukaan air.

Verse 58

पद्मोदरच्युतरज:किंजल्कारुणरज्जितै: । मज्जुस्वरैर्मधुकरैविरुतान्‌ कमलाकरान्‌,कमलोंसे भरे हुए तालाबोंमें मीठे स्वरसे बोलनेवाले भ्रमरोंके शब्द गूँज रहे थे। वे भ्रमर कमलके भीतरसे निकली हुई रज तथा केसरोंसे लाल रंगमें रँगे-से जान पड़ते थे

Vaiśampāyana berkata: Kolam-kolam teratai itu bergema oleh dengung lebah yang bersuara manis. Lebah-lebah itu tampak kemerah-merahan, terbedaki serbuk sari dan serat halus laksana kunyit-safron yang gugur dari dalam hati bunga teratai.

Verse 59

अपश्यंस्ते नरव्यापत्रा गन्धमादनसानुषु । तथैव पद्मषण्डैश्वू मण्डितांश्ष समन्‍ततः,इस प्रकार वे नरश्रेष्ठ गन्थमादनके शिखरोंपर पद्मषण्डमण्डित तालाबोंको सब ओर देखते हुए आगे बढ़ रहे थे

Waiśampāyana berkata: Para lelaki laksana harimau itu, ketika melangkah maju, memandang lereng dan puncak Gandhamādana; dan di segala penjuru mereka melihat telaga serta perairan yang berhias gugusan teratai.

Verse 60

शिखण्डिनीभि: सहिताँललतामण्डलकेषु च । मेघतूर्यरवोद्दाममदनाकुलितान्‌ भृूशम्‌,वहाँ लता-मण्डपोंमें मोरिनियोंके साथ नाचते हुए मोर दिखायी देते थे। जो मेघोंकी मृदंगतुल्य गम्भीर गर्जना सुनकर उद्दाम कामसे अत्यन्त उन्मत्त हो रहे थे। वे अपनी मधुर केकाध्वनिका विस्तार करके मीठे स्वरमें संगीतकी रचना करते थे और अपनी विचित्र पाँखें फैलाकर विलासयुक्त मदालसभावसे वनविहारके लिये उत्सुक हो प्रसन्नताके साथ नाच रहे थे। कुछ मोर लतावल्लरियोंसे व्याप्त कुटजवृक्षोंके कुज्जोंमें स्थित हो अपनी प्यारी मोरिनियोंके साथ रमण करते थे और कुछ कुटजोंकी डालियोंपर मदमत्त होकर बैठे थे तथा अपनी सुन्दर पाँखोंके घटाटोपसे युक्त हो मुकुटके समान जान पड़ते थे। कितने ही सुन्दर मोर वृक्षोंके कोटरोंमें बैठे थे। पाण्डवोंने उन सबको देखा

Waiśampāyana berkata: Di para-para sulur yang anggun, tampak merak menari bersama merak betina—sangat gelisah oleh gelora hasrat yang bangkit ketika mereka mendengar gemuruh awan yang dalam, laksana tabuh genderang. Mereka memanjangkan panggilan “kekā” yang manis, seakan merangkai nyanyian dalam nada lembut; dan, mengembangkan kipas ekor yang beraneka warna, mereka menari dengan keluwesan yang manja dan mabuk bahagia, rindu akan permainan rimba. Sebagian berkelakar dengan pasangan tercinta di rimbun kuṭaja yang diselubungi sulur; sebagian lagi, mabuk musim, bertengger di dahan kuṭaja, bulu lebat nan indahnya tampak bagai mahkota; dan banyak merak elok duduk di rongga-rongga pohon. Para Pāṇḍava menyaksikan semuanya.

Verse 61

कृत्वैव केकामधुरं संगीतं मधुरस्वरम्‌ । चित्रान्‌ कलापान्‌ विस्तीर्य सविलासान्‌ मदालसान्‌,वहाँ लता-मण्डपोंमें मोरिनियोंके साथ नाचते हुए मोर दिखायी देते थे। जो मेघोंकी मृदंगतुल्य गम्भीर गर्जना सुनकर उद्दाम कामसे अत्यन्त उन्मत्त हो रहे थे। वे अपनी मधुर केकाध्वनिका विस्तार करके मीठे स्वरमें संगीतकी रचना करते थे और अपनी विचित्र पाँखें फैलाकर विलासयुक्त मदालसभावसे वनविहारके लिये उत्सुक हो प्रसन्नताके साथ नाच रहे थे। कुछ मोर लतावल्लरियोंसे व्याप्त कुटजवृक्षोंके कुज्जोंमें स्थित हो अपनी प्यारी मोरिनियोंके साथ रमण करते थे और कुछ कुटजोंकी डालियोंपर मदमत्त होकर बैठे थे तथा अपनी सुन्दर पाँखोंके घटाटोपसे युक्त हो मुकुटके समान जान पड़ते थे। कितने ही सुन्दर मोर वृक्षोंके कोटरोंमें बैठे थे। पाण्डवोंने उन सबको देखा

Waiśampāyana berkata: Mendengar gemuruh awan yang dalam, laksana tabuh genderang, para merak menjadi mabuk oleh hasrat. Mereka memanjangkan panggilan “kekā” yang manis dan, dalam nada lembut, seakan merangkai nyanyian; lalu mengembangkan kipas ekor yang beraneka warna, menari dengan keluwesan yang manja dan bahagia di para-para sulur. Sebagian bermain dengan merak betina kesayangan di rimbun kuṭaja yang terselubung sulur; sebagian lagi bertengger dalam ekstase di dahan, tampak seolah dimahkotai oleh lebatnya bulu indah. Para Pāṇḍava menyaksikan pemandangan itu.

Verse 62

मयूरान्‌ ददृशुर्ह्वशन्‌ नृत्यतो वनलालसान्‌ । कांश्षित्‌ प्रियाभि:सहितान्‌ रममाणान्‌ कलापिन:,वहाँ लता-मण्डपोंमें मोरिनियोंके साथ नाचते हुए मोर दिखायी देते थे। जो मेघोंकी मृदंगतुल्य गम्भीर गर्जना सुनकर उद्दाम कामसे अत्यन्त उन्मत्त हो रहे थे। वे अपनी मधुर केकाध्वनिका विस्तार करके मीठे स्वरमें संगीतकी रचना करते थे और अपनी विचित्र पाँखें फैलाकर विलासयुक्त मदालसभावसे वनविहारके लिये उत्सुक हो प्रसन्नताके साथ नाच रहे थे। कुछ मोर लतावल्लरियोंसे व्याप्त कुटजवृक्षोंके कुज्जोंमें स्थित हो अपनी प्यारी मोरिनियोंके साथ रमण करते थे और कुछ कुटजोंकी डालियोंपर मदमत्त होकर बैठे थे तथा अपनी सुन्दर पाँखोंके घटाटोपसे युक्त हो मुकुटके समान जान पड़ते थे। कितने ही सुन्दर मोर वृक्षोंके कोटरोंमें बैठे थे। पाण्डवोंने उन सबको देखा

Waiśampāyana berkata: Mereka melihat merak-merak yang bersukacita, menari dan merindukan kenikmatan rimba; dan sebagian burung berjambul itu tampak bermain bersama merak betina kesayangan mereka.

Verse 63

वल्लीलतासंकटेषु कुटजेषु स्थितांस्तथा । कांश्चिच्च कुटजानां तु विटपेषूत्कटानिव,वहाँ लता-मण्डपोंमें मोरिनियोंके साथ नाचते हुए मोर दिखायी देते थे। जो मेघोंकी मृदंगतुल्य गम्भीर गर्जना सुनकर उद्दाम कामसे अत्यन्त उन्मत्त हो रहे थे। वे अपनी मधुर केकाध्वनिका विस्तार करके मीठे स्वरमें संगीतकी रचना करते थे और अपनी विचित्र पाँखें फैलाकर विलासयुक्त मदालसभावसे वनविहारके लिये उत्सुक हो प्रसन्नताके साथ नाच रहे थे। कुछ मोर लतावल्लरियोंसे व्याप्त कुटजवृक्षोंके कुज्जोंमें स्थित हो अपनी प्यारी मोरिनियोंके साथ रमण करते थे और कुछ कुटजोंकी डालियोंपर मदमत्त होकर बैठे थे तथा अपनी सुन्दर पाँखोंके घटाटोपसे युक्त हो मुकुटके समान जान पड़ते थे। कितने ही सुन्दर मोर वृक्षोंके कोटरोंमें बैठे थे। पाण्डवोंने उन सबको देखा

Waiśampāyana berkata: Di antara pohon-pohon kuṭaja yang sesak oleh sulur dan belukar, tampak sebagian merak bertengger; dan sebagian lagi terlihat duduk di dahan-dahan kuṭaja yang tinggi, seolah menjulang dalam kemegahan.

Verse 64

कलापरुचिराटोपनिचितान्‌ मुकुटानिव । विवरेषु तरूणां च रुचिरान्‌ ददृशुश्ष ते,वहाँ लता-मण्डपोंमें मोरिनियोंके साथ नाचते हुए मोर दिखायी देते थे। जो मेघोंकी मृदंगतुल्य गम्भीर गर्जना सुनकर उद्दाम कामसे अत्यन्त उन्मत्त हो रहे थे। वे अपनी मधुर केकाध्वनिका विस्तार करके मीठे स्वरमें संगीतकी रचना करते थे और अपनी विचित्र पाँखें फैलाकर विलासयुक्त मदालसभावसे वनविहारके लिये उत्सुक हो प्रसन्नताके साथ नाच रहे थे। कुछ मोर लतावल्लरियोंसे व्याप्त कुटजवृक्षोंके कुज्जोंमें स्थित हो अपनी प्यारी मोरिनियोंके साथ रमण करते थे और कुछ कुटजोंकी डालियोंपर मदमत्त होकर बैठे थे तथा अपनी सुन्दर पाँखोंके घटाटोपसे युक्त हो मुकुटके समान जान पड़ते थे। कितने ही सुन्दर मोर वृक्षोंके कोटरोंमें बैठे थे। पाण्डवोंने उन सबको देखा

Waiśampāyana berkata: Para Pāṇḍava melihat merak-merak elok bertengger di rongga dan celah-celah pepohonan, laksana mahkota-mahkota yang ditumpuk dalam peragaan indah nan terampil.

Verse 65

सिन्धुवारांस्तथोदारान्‌ मन्मथस्येव तोमरान्‌ । सुवर्णवर्णकुसुमान्‌ गिरीणां शिखरेषु च,पर्वतवोंके शिखरोंपर अधिकाधिक संख्यामें सुनहरे कुसुमोंसे सुशोभित सुन्दर शेफालिकाके- “पौधे दिखायी देते थे, जो कामदेवके तोमर नामक बाण-से प्रतीत होते थे

Waiśampāyana berkata: Mereka juga melihat tanaman sindhuvāra (shephālika) yang mulia dan rimbun; bunga-bunganya berwarna keemasan menghiasi puncak-puncak gunung, seakan-akan tombak (tomara) milik Manmatha.

Verse 66

कर्णिकारान्‌ विकसितान्‌ कर्णपूरानिवोत्तमान्‌ | तथापश्यन्‌ कुरबकान्‌ वनराजिषु पुष्यितान्‌,खिले हुए कनेरके फूल उत्तम कर्णपूरके समान प्रतीत होते थे। इसी प्रकार वन- श्रेणियोंमें विकसित कुरबक नामक वृक्ष भी उन्होंने देखे, जो कामासक्त पुरुषोंको उत्कण्ठित करनेवाले कामदेवके बाणसमूहोंके समान जान पड़ते थे। इसी प्रकार उन्हें तिलकके वृक्ष दृष्टिगोचर हुए, जो वनश्रेणियोंके ललाटमें रचित सुन्दर तिलकके समान शोभा पा रहे थे। कहीं मनोहर मंजरियोंसे विभूषित मनोरम आम्रवृक्ष दीख पड़ते थे, जो कामदेवके बाणोंकी-सी आकृति धारण करते थे। उनकी डालियोंपर भौंरोंकी भीड़ गूँजती रहती थी। उन पर्वतोंके शिखरोंपर कितने ही ऐसे वृक्ष थे, जिनमें सुवर्णके समान सुन्दर पुष्प खिले थे। कुछ वक्षोंके पुष्प देखनेमें दावानलका भ्रम उत्पन्न करते थे। किन्हीं वृक्षोंके फूल लाल, काले तथा वैदूर्यमणिके सदृश धूमिल थे। इस प्रकार पर्वतीय शिखरोंपर विभिन्न प्रकारके पुष्पोंसे विभूषित वृक्ष बड़ी शोभा पा रहे थे

Waiśampāyana berkata: Mereka melihat pohon karṇikāra yang sedang mekar, bunganya tampak laksana perhiasan telinga yang utama; demikian pula mereka menyaksikan pohon kurabaka yang berbunga di sepanjang punggung-punggung rimba.

Verse 67

कामवश्यौत्सुक्यकतन्‌ कामस्येव शरोत्करान्‌ | तथैव वनराजीनामुदारान्‌ रचितानिव,खिले हुए कनेरके फूल उत्तम कर्णपूरके समान प्रतीत होते थे। इसी प्रकार वन- श्रेणियोंमें विकसित कुरबक नामक वृक्ष भी उन्होंने देखे, जो कामासक्त पुरुषोंको उत्कण्ठित करनेवाले कामदेवके बाणसमूहोंके समान जान पड़ते थे। इसी प्रकार उन्हें तिलकके वृक्ष दृष्टिगोचर हुए, जो वनश्रेणियोंके ललाटमें रचित सुन्दर तिलकके समान शोभा पा रहे थे। कहीं मनोहर मंजरियोंसे विभूषित मनोरम आम्रवृक्ष दीख पड़ते थे, जो कामदेवके बाणोंकी-सी आकृति धारण करते थे। उनकी डालियोंपर भौंरोंकी भीड़ गूँजती रहती थी। उन पर्वतोंके शिखरोंपर कितने ही ऐसे वृक्ष थे, जिनमें सुवर्णके समान सुन्दर पुष्प खिले थे। कुछ वक्षोंके पुष्प देखनेमें दावानलका भ्रम उत्पन्न करते थे। किन्हीं वृक्षोंके फूल लाल, काले तथा वैदूर्यमणिके सदृश धूमिल थे। इस प्रकार पर्वतीय शिखरोंपर विभिन्न प्रकारके पुष्पोंसे विभूषित वृक्ष बड़ी शोभा पा रहे थे

Waiśampāyana berkata: Deretan rimba yang megah itu—yang menimbulkan gelora rindu pada hati yang telah dikuasai hasrat—tampak bagaikan gugusan anak panah Kāma sendiri, seolah disusun dengan sengaja.

Verse 68

विराजमानांस्ते5पश्यंस्तिलकांस्तिलकानिव । तथानड्रशराकारान्‌ सहकारान्‌ मनोरमान्‌,खिले हुए कनेरके फूल उत्तम कर्णपूरके समान प्रतीत होते थे। इसी प्रकार वन- श्रेणियोंमें विकसित कुरबक नामक वृक्ष भी उन्होंने देखे, जो कामासक्त पुरुषोंको उत्कण्ठित करनेवाले कामदेवके बाणसमूहोंके समान जान पड़ते थे। इसी प्रकार उन्हें तिलकके वृक्ष दृष्टिगोचर हुए, जो वनश्रेणियोंके ललाटमें रचित सुन्दर तिलकके समान शोभा पा रहे थे। कहीं मनोहर मंजरियोंसे विभूषित मनोरम आम्रवृक्ष दीख पड़ते थे, जो कामदेवके बाणोंकी-सी आकृति धारण करते थे। उनकी डालियोंपर भौंरोंकी भीड़ गूँजती रहती थी। उन पर्वतोंके शिखरोंपर कितने ही ऐसे वृक्ष थे, जिनमें सुवर्णके समान सुन्दर पुष्प खिले थे। कुछ वक्षोंके पुष्प देखनेमें दावानलका भ्रम उत्पन्न करते थे। किन्हीं वृक्षोंके फूल लाल, काले तथा वैदूर्यमणिके सदृश धूमिल थे। इस प्रकार पर्वतीय शिखरोंपर विभिन्न प्रकारके पुष्पोंसे विभूषित वृक्ष बड़ी शोभा पा रहे थे

Waiśampāyana berkata: Mereka melihat pohon tilaka berkilau cemerlang, seakan-akan tilaka yang terlukis pada dahi rimba; dan mereka pun melihat pohon mangga (sahakāra) yang elok, bentuknya menyerupai gugusan anak panah.

Verse 69

अपश्यन्‌ भ्रमरारावान्‌ मगज्जरीभिरविराजितान्‌ | हिरण्यसदृशैः पुष्पैर्दावाग्निसदृशैरपि,खिले हुए कनेरके फूल उत्तम कर्णपूरके समान प्रतीत होते थे। इसी प्रकार वन- श्रेणियोंमें विकसित कुरबक नामक वृक्ष भी उन्होंने देखे, जो कामासक्त पुरुषोंको उत्कण्ठित करनेवाले कामदेवके बाणसमूहोंके समान जान पड़ते थे। इसी प्रकार उन्हें तिलकके वृक्ष दृष्टिगोचर हुए, जो वनश्रेणियोंके ललाटमें रचित सुन्दर तिलकके समान शोभा पा रहे थे। कहीं मनोहर मंजरियोंसे विभूषित मनोरम आम्रवृक्ष दीख पड़ते थे, जो कामदेवके बाणोंकी-सी आकृति धारण करते थे। उनकी डालियोंपर भौंरोंकी भीड़ गूँजती रहती थी। उन पर्वतोंके शिखरोंपर कितने ही ऐसे वृक्ष थे, जिनमें सुवर्णके समान सुन्दर पुष्प खिले थे। कुछ वक्षोंके पुष्प देखनेमें दावानलका भ्रम उत्पन्न करते थे। किन्हीं वृक्षोंके फूल लाल, काले तथा वैदूर्यमणिके सदृश धूमिल थे। इस प्रकार पर्वतीय शिखरोंपर विभिन्न प्रकारके पुष्पोंसे विभूषित वृक्ष बड़ी शोभा पा रहे थे

Waiśampāyana berkata: Mereka melihat pepohonan dan belukar yang hidup oleh dengung lebah, semarak oleh gugusan bunga—sebagian berkilau laksana emas, sebagian lagi menyala begitu garang hingga tampak seperti kobaran kebakaran hutan. Demikianlah puncak-puncak gunung dihiasi aneka pohon berbunga; dan ketika mereka melintasi rimba sunyi, rasa takjub para pengembara itu kian bertambah oleh kelimpahan alam.

Verse 70

लोहितैरज्जनाभैश्ष वैदूर्यसदृशैरपि । अतीव वृक्षा राजन्ते पुष्पिता: शैलसानुषु,खिले हुए कनेरके फूल उत्तम कर्णपूरके समान प्रतीत होते थे। इसी प्रकार वन- श्रेणियोंमें विकसित कुरबक नामक वृक्ष भी उन्होंने देखे, जो कामासक्त पुरुषोंको उत्कण्ठित करनेवाले कामदेवके बाणसमूहोंके समान जान पड़ते थे। इसी प्रकार उन्हें तिलकके वृक्ष दृष्टिगोचर हुए, जो वनश्रेणियोंके ललाटमें रचित सुन्दर तिलकके समान शोभा पा रहे थे। कहीं मनोहर मंजरियोंसे विभूषित मनोरम आम्रवृक्ष दीख पड़ते थे, जो कामदेवके बाणोंकी-सी आकृति धारण करते थे। उनकी डालियोंपर भौंरोंकी भीड़ गूँजती रहती थी। उन पर्वतोंके शिखरोंपर कितने ही ऐसे वृक्ष थे, जिनमें सुवर्णके समान सुन्दर पुष्प खिले थे। कुछ वक्षोंके पुष्प देखनेमें दावानलका भ्रम उत्पन्न करते थे। किन्हीं वृक्षोंके फूल लाल, काले तथा वैदूर्यमणिके सदृश धूमिल थे। इस प्रकार पर्वतीय शिखरोंपर विभिन्न प्रकारके पुष्पोंसे विभूषित वृक्ष बड़ी शोभा पा रहे थे

Waiśampāyana berkata: Di lereng-lereng gunung, pepohonan yang sedang berbunga tampak amat cemerlang—sebagian merah menyala, sebagian gelap seperti celak, dan sebagian berkilau redup seperti permata vaidūrya. Keragaman warna itu menegaskan kemegahan rimba pegunungan; para Pāṇḍava pun memandangnya dengan takjub.

Verse 71

तथा शालांस्तमालांश्व पाटलान्‌ बकुलानपि । माला इव समासक्ता: शैलानां शिखरेषु च,इसी तरह शाल, तमाल, पाटल और बकुल आदि वृक्ष उन शैलशिखरोंपर धारण की हुई मालाकी भाँति शोभा पा रहे थे

Waiśampāyana berkata: Demikian pula pohon śāla, tamāla, pāṭala, dan bakula melekat pada puncak-puncak gunung, menghiasinya laksana untaian karangan bunga.

Verse 72

विमलस्फाटिकाभानि पाण्डुरच्छदनैर्दधिजै: । कलहंसैरुपेतानि सारसाभिरुतानि च,पाण्डवोंने पर्वतीय शिखरोंपर बहुत-से ऐसे सरोवर देखे, जो निर्मल स्फटिकमणिके समान सुशोभित थे। उनमें सफेद पाँखवाले पक्षी कलहंस आदि विचरते तथा सारस कलरव करते थे। कमल और उत्पल-पुष्पोंसे संयुक्त उन सरोवरोंमें सुखद एवं शीतल जल भरा था

Waiśampāyana berkata: Para Pāṇḍava melihat banyak telaga di puncak gunung, berkilau laksana kristal yang bening. Di sana burung-burung bersayap putih seperti kalahamsa berkeliaran, dan suara sārasa (bangau) bergema. Dihiasi teratai dan utpala (teratai biru), telaga-telaga itu penuh air yang sejuk dan menenteramkan.

Verse 73

सरांसि बहुशः पार्था: पश्यन्त: शैलसानुषु । पद्मोत्पलविमिश्राणि सुखशीतजलानि च,पाण्डवोंने पर्वतीय शिखरोंपर बहुत-से ऐसे सरोवर देखे, जो निर्मल स्फटिकमणिके समान सुशोभित थे। उनमें सफेद पाँखवाले पक्षी कलहंस आदि विचरते तथा सारस कलरव करते थे। कमल और उत्पल-पुष्पोंसे संयुक्त उन सरोवरोंमें सुखद एवं शीतल जल भरा था

Waiśampāyana berkata: Menyusuri lereng-lereng gunung, para Pārtha (Pāṇḍava) berulang kali melihat banyak telaga, dihiasi teratai dan utpala, serta dipenuhi air yang sejuk dan menyejukkan hati.

Verse 74

एवं क्रमेण ते वीरा वीक्षमाणा: समन्ततः । गन्धवन्त्यथ माल्यानि रसवन्ति फलानि च,इस प्रकार वे वीर पाण्डव चारों ओर सुगन्धित पुष्पमालाएँ, सरस फल, मनोहर सरोवर और मनोरम वृक्षावलियोंको क्रमश: देखते हुए गन्धमादन पर्वतके वनमें प्रविष्ट हुए। वहाँ पहुँचनेपर उन सबकी आँखें आश्वर्यसे खिल उठीं

Demikianlah para Pāṇḍawa yang gagah itu, memandang ke segala arah, menyaksikan rangkaian bunga yang harum dan buah-buah yang manis serta berair. Dengan langkah demi langkah mereka memasuki rimba Gunung Gandhamādana; dan setibanya di sana, mata mereka terbelalak oleh keajaiban yang tampak.

Verse 75

सरांसि च मनोज्ञानि वृक्षांश्रवातिमनोरमान्‌ । विविशु: पाण्डवा: सर्वे विस्मयोत्फुल्ललोचना:,इस प्रकार वे वीर पाण्डव चारों ओर सुगन्धित पुष्पमालाएँ, सरस फल, मनोहर सरोवर और मनोरम वृक्षावलियोंको क्रमश: देखते हुए गन्धमादन पर्वतके वनमें प्रविष्ट हुए। वहाँ पहुँचनेपर उन सबकी आँखें आश्वर्यसे खिल उठीं

Vaiśaṃpāyana berkata: Semua Pāṇḍawa memasuki wilayah itu sambil memandang danau-danau yang menawan serta pepohonan yang amat elok. Ketika mereka melangkah ke rimba Gandhamādana, mata mereka terbuka lebar karena takjub.

Verse 76

कमलोत्पलकटछ्लारपुण्डरीकसुगन्धिना । सेव्यमाना वने तस्मिन्‌ सुखस्पर्शेन वायुना,उस समय कमल, उत्पल, कह्नलार और पुण्डरीककी सुन्दर गन्ध लिये मन्द मधुर वायु उस वनमें मानो उन्हें व्यजन डुलाती थी

Vaiśampāyana berkata: Di rimba itu, semilir angin yang lembut—nyaman disentuh dan semerbak oleh harum teratai, teratai biru, teratai merah, dan teratai putih—seakan melayani mereka laksana kipas, memberi sejuk di tengah kehidupan pengasingan.

Verse 77

ततो युधिष्ठटिरो भीममाहेदं प्रीतिमद्‌ वच: । अहो श्रीमदिदं भीम गन्धमादनकाननम्‌,तदनन्तर युधिष्छिरने भीमसेनसे प्रसन्नतापूर्ण यह बात कही--“भीम! यह गन्धमादन- कानन कितना सुन्दर और कैसा अद्भुत है?

Lalu Yudhiṣṭhira berkata kepada Bhīma dengan penuh kasih: “Ah, Bhīma—betapa mulia dan eloknya rimba Gandhamādana ini!”

Verse 78

वने हास्मिन्‌ मनोरम्ये दिव्या: काननजा द्रुमा: । लताश्न विविधाकारा: पत्रपुष्पफलोपगा:,“इस मनोरम वनके वृक्ष और नाना प्रकारकी लताएँ दिव्य हैं। इन सबमें पत्र, पुष्प और फलोंकी बहुतायत है

“Di rimba yang menawan ini, pepohonan hutan tampak laksana anugerah surgawi; dan sulur-sulur pun beraneka rupa—penuh daun, bunga, dan buah.”

Verse 79

भान्त्येते पुष्पविकचा: पुंस्कोकिलकुलाकुला: । नात्र कण्टकिन: केचिन्न च विद्यन्त्यपुष्पिता:,'ये सभी वृक्ष फूलोंसे लदे हैं। कोकिल-कुलसे अलंकृत हैं। इस वनमें कोई भी वृक्ष ऐसे नहीं हैं, जिनमें काँटे हों और जो खिले न हों

Waiśampāyana berkata: “Di sini pepohonan berkilau dengan bunga-bunga yang mekar sempurna, dan dipenuhi kawanan burung koil jantan. Di rimba ini tak ada pohon berduri, dan tak pula ditemukan pohon yang tanpa bunga.”

Verse 80

स्निग्धपत्रफला वृक्षा गन्धमादनसानुषु । भ्रमरारावमधुरा नलिनी: फुल्लपड़कजा:,गन्धमादनके शिखरोंपर जितने वृक्ष हैं, उन सबके पत्र और फल चिकने हैं। सभी भ्रमरोंके मधुर गुंजारवसे मनोहर जान पड़ते हैं। यहाँके सरोवरोंमें कमल खिले हुए हैं

Waiśampāyana berkata: “Di lereng Gandhamādana berdiri pepohonan dengan daun dan buah yang halus serta berkilau. Tempat itu terasa menawan oleh dengung manis lebah, dan danau-danaunya dihiasi teratai yang mekar sempurna.”

Verse 81

विलोड्यमाना: पश्येमा: करिभि: सकरेणुभि: । पश्येमां नलिनीं चान्यां कमलोत्पलमालिनीम्‌,“देखो, हथिनियोंसहित हाथी इन तालाबोंमें घुसकर इन्हें मथे डालते हैं और इस दूसरी पुष्करिणीपर दृष्टिपात करो, जो कमल और उत्पलकी मालाओंसे अलंकृत है। यह कमलमालाधारिणी साक्षात्‌ दूसरी लक्ष्मीके समान मानो साकार विग्रह धारण करके प्रकट हुई है। गन्धमादनके इस उत्तम वनमें नाना प्रकारके कुसुमोंकी सुगन्धसे सुवासित ये छोटी- छोटी वनश्रेणियाँ भ्रमरोंके गीतोंसे मुखरित हो कैसी शोभा पा रही हैं? भीमसेन! देखो, यहाँके सुन्दर प्रदेशोंमें चारों ओर देवताओंकी क्रीडास्थली है

Waiśampāyana berkata: “Lihat—kolam-kolam teratai ini diaduk-aduk laksana dikocok oleh gajah-gajah, bersama debu dan percikan airnya. Dan lihat pula telaga yang lain itu, berhias untaian teratai dan teratai biru. Di rimba utama Gandhamādana ini, udara harum oleh wangi aneka bunga; punggung-punggung kecil hutan bergema oleh nyanyian lebah dan tampak kian elok. Bhīmasena, pandanglah: di segenap penjuru, wilayah indah ini laksana taman permainan para dewa.”

Verse 82

स्रग्धरां विग्रहवतीं साक्षाच्छियमिवापराम्‌ । नानाकुसुमगन्धाढ्यास्तस्येमा: काननोत्तमे,“देखो, हथिनियोंसहित हाथी इन तालाबोंमें घुसकर इन्हें मथे डालते हैं और इस दूसरी पुष्करिणीपर दृष्टिपात करो, जो कमल और उत्पलकी मालाओंसे अलंकृत है। यह कमलमालाधारिणी साक्षात्‌ दूसरी लक्ष्मीके समान मानो साकार विग्रह धारण करके प्रकट हुई है। गन्धमादनके इस उत्तम वनमें नाना प्रकारके कुसुमोंकी सुगन्धसे सुवासित ये छोटी- छोटी वनश्रेणियाँ भ्रमरोंके गीतोंसे मुखरित हो कैसी शोभा पा रही हैं? भीमसेन! देखो, यहाँके सुन्दर प्रदेशोंमें चारों ओर देवताओंकी क्रीडास्थली है

Waiśampāyana berkata: “Di rimba yang paling utama itu, hamparan-hamparan hutan ini kaya oleh wangi aneka bunga—seakan sosok berkalung, berwujud nyata, laksana Lakṣmī yang lain menampakkan diri.”

Verse 83

उपगीयमाना भ्रमरै राजन्ते वनराजय: । पश्य भीम शुभान्‌ देशान्‌ देवाक्रीडान्‌ समन्‍्ततः,“देखो, हथिनियोंसहित हाथी इन तालाबोंमें घुसकर इन्हें मथे डालते हैं और इस दूसरी पुष्करिणीपर दृष्टिपात करो, जो कमल और उत्पलकी मालाओंसे अलंकृत है। यह कमलमालाधारिणी साक्षात्‌ दूसरी लक्ष्मीके समान मानो साकार विग्रह धारण करके प्रकट हुई है। गन्धमादनके इस उत्तम वनमें नाना प्रकारके कुसुमोंकी सुगन्धसे सुवासित ये छोटी- छोटी वनश्रेणियाँ भ्रमरोंके गीतोंसे मुखरित हो कैसी शोभा पा रही हैं? भीमसेन! देखो, यहाँके सुन्दर प्रदेशोंमें चारों ओर देवताओंकी क्रीडास्थली है

Waiśampāyana berkata: “Dinyanyikan oleh kawanan lebah, rimbunan hutan yang laksana raja ini tampak bersinar. Lihatlah, Bhīma—wilayah-wilayah yang mujur ini, di segala penjuru, bagaikan taman permainan para dewa.”

Verse 84

अमानुषगतिं प्राप्ता: संसिद्धा: सम वृकोदर । लताभि: पुष्पिताग्राभि: पुष्पिता: पादपोत्तमा:

Waiśampāyana berkata: “Wahai Vṛkodara, pepohonan unggul itu seakan telah mencapai keadaan yang bukan dunia manusia, laksana telah sempurna. Dihiasi sulur-sulur merambat yang ujungnya sedang berbunga, mereka sendiri pun berdiri sarat oleh bunga.”

Verse 85

शिखण्डिनीभि श्षचरतां सहितानां शिखण्डिनाम्‌

Mereka bergerak beriringan: śikhaṇḍinī—merak betina—bersama śikhaṇḍin—merak jantan—dalam kebersamaan yang serasi di rimba.

Verse 86

चकोरा: शतपत्राशक्ष मत्तकोकिलसारिका:

Di sana ada burung cakora, burung śatapatra, serta kukuk dan myna yang riang seakan mabuk oleh sukacita.

Verse 87

रक्तपीतारुणा: पार्थ पादपाग्रगता: खगा:

Wahai Pārtha, burung-burung berwarna merah darah dan kuning kemerahan tampak bertengger pada pucuk-pucuk pepohonan.

Verse 88

हरितारुणवर्णानां शाद्धलानां समीपत:

Di dekat pohon-pohon śāddhala yang berwarna paduan hijau segar dan kemerahan keemasan, rimba tampak hening dan elok.

Verse 89

वदन्ति मधुरा वाच: सर्वभूतमनोरमा:

Vaiśampāyana berkata: “Konon kata-kata manis—yang menyenangkan hati semua makhluk—memiliki daya istimewa: menumbuhkan niat baik dan menenteramkan pikiran.”

Verse 90

चतुर्विषाणा: पद्माभा: कुड्जरा: सकरेणव:

Vaiśampāyana berkata: “Tampaklah gajah-gajah bertaring empat, berwarna laksana teratai, dan berjalan bersama gajah betina.”

Verse 91

बहुतालसमुत्सेधा: शैलशृज्गभपरिच्युता:

Vaiśampāyana berkata: “Mereka menjulang setinggi banyak pohon tāla, seakan-akan terhempas jatuh dari puncak-puncak gunung.”

Verse 92

नानाप्रस्रवणेभ्यश्ष वारिधारा: पतन्ति च । “अनेक झरनोंसे जलकी धाराएँ गिर रही हैं। जिनकी ऊँचाई कई ताड़के बराबर है और ये पर्वतके सर्वोच्च शिखरसे नीचे गिरती हैं ।। ९१ ह ।। भास्कराभा: प्रभाभिश्न शारदाभ्रघनोपमा:,“नाना प्रकारके रजतमय धातु इस महान्‌ पर्वतकी शोभा बढ़ा रहे हैं। इनमेंसे कुछ तो अपनी प्रभाओंसे भगवान्‌ भास्करके समान प्रकाशित होते हैं और कुछ शरद्‌-ऋतुके श्वेत बादलोंके समान सुशोभित हो रहे हैं। कहीं काजलके समान काले और सुवर्णके समान पीले रंगके धातु दीख पड़ते हैं

Vaiśampāyana berkata: “Dari banyak mata air, aliran-aliran air terjun jatuh ke bawah. Dan tampak pula urat-urat mineral yang menghiasi gunung besar itu—sebagian menyala oleh cahayanya sendiri laksana matahari, sebagian elok bagaikan gumpalan awan putih pekat di musim gugur.”

Verse 93

शोभयन्ति महाशैलं नानारजतधातव: । क्वचिदगञ्जनवर्णा भा: क्वचित्‌ काउचनसन्निभा:,“नाना प्रकारके रजतमय धातु इस महान्‌ पर्वतकी शोभा बढ़ा रहे हैं। इनमेंसे कुछ तो अपनी प्रभाओंसे भगवान्‌ भास्करके समान प्रकाशित होते हैं और कुछ शरद्‌-ऋतुके श्वेत बादलोंके समान सुशोभित हो रहे हैं। कहीं काजलके समान काले और सुवर्णके समान पीले रंगके धातु दीख पड़ते हैं

Vaiśampāyana berkata: “Urat-urat mineral beraneka ragam, laksana perak, menambah kemegahan gunung besar itu. Di beberapa tempat sinarnya tampak gelap seperti celak, di tempat lain berkilau bagaikan emas.”

Verse 94

धातवो हरितालस्य क्वचिद्धिड्गुलकस्य च । मन:शिलागुहाश्रैव सन्ध्या भ्रनिकरोपमा:,“कहीं हरितालसम्बन्धी धातु हैं और कहीं हिंगुलसम्बन्धी। कहीं मैनसिलकी गुफाएँ हैं, जो संध्याकालीन लाल बादलोंके समान जान पड़ती हैं

Waiśampāyana berkata: “Di wilayah itu, di beberapa tempat terdapat endapan mineral haritāla (orpiment), dan di tempat lain endapan hiṅgula (cinnabar). Di tempat lain lagi ada gua-gua manahśilā (oker merah) yang tampak laksana gugusan awan merah senja.”

Verse 95

शशलोहितवर्णाभा: क्वचिद्गैरिकधातव: । सितासिताभ्रप्रतिमा बालसूर्यसमप्र भा:,“कहीं गेरु नामक धातु हैं, जिनकी कान्ति लाल खरगोशके समान दिखायी देती है। कोई धातु श्वेत बादलोंके समान हैं, तो कोई काले मेघोंके समान। कोई प्रातःकालके सूर्यकी भाँति लाल रंगके हैं

Waiśampāyana berkata: “Di beberapa tempat ada bijih gairika (oker merah) yang berkilau seperti rona kemerahan seekor kelinci. Ada yang menyerupai awan putih, ada yang laksana awan hujan yang gelap; dan ada pula yang memancar dengan kemerahan cemerlang seperti matahari muda di pagi hari.”

Verse 96

एते बहुविधा: शैलं शोभयन्ति महाप्रभा: । गन्धर्वा: सह कान्ताभिर्यथोक्त वृषपर्वणा

Waiśampāyana berkata: “Makhluk-makhluk bercahaya yang beraneka ragam ini menghiasi gunung itu—para Gandharva bersama para kekasih pendamping mereka—sebagaimana telah dikisahkan oleh Vṛṣaparvan.”

Verse 97

गीतानां समतालानां तथा साम्नां च नि:ःस्वन:

Waiśampāyana berkata: “Terdengarlah bunyi yang bergema—irama terukur dari nyanyian, dan juga gaung berat lantunan kidung Sāman.”

Verse 98

श्रूयते बहुधा भीम सर्वभूतमनोहर: । महागज्जामुदीक्षस्व पुण्यां देवनदीं शुभाम्‌

Waiśampāyana berkata: “Wahai Bhīma, tentang sungai ini tersiar luas dalam banyak cara bahwa ia menyenangkan hati semua makhluk. Pandanglah sungai para dewa ini—suci dan mujur—yang mengalir dengan gemuruh laksana gajah agung.”

Verse 99

'भीमसेन! यहाँ सम तालसे गाते हुए गीतों तथा साममन्त्रोंका विविध स्वर सुनायी पड़ता है, जो सम्पूर्ण भूतोंके चित्तको आकर्षित करनेवाला है। यह परम पवित्र एवं कल्याणमयी देवनदी महागंगा हैं, इनका दर्शन करो ।। कलहंसगणैर्जुष्टामृषिकिन्नरसेविताम्‌ । धातुभिश्न सरिद्धिश्न किन्नरैर्मुगपक्षिभि:

Waiśampāyana berkata: “Wahai Bhīmasena! Di sini terdengar beragam nada—nyanyian yang dilagukan dalam irama yang seimbang serta berbagai lengkung suara kidung Sāman; kemerduannya memikat batin semua makhluk. Pandanglah sungai ilahi Mahāgaṅgā ini—teramat suci dan membawa keberkahan; lakukan darśana kepadanya. Ia didatangi kawanan angsa liar, dilayani para resi dan Kinnara, berhias rona mineral, termulia di antara sungai-sungai, serta semarak oleh Kinnara bersama rusa dan burung-burung.”

Verse 100

गन्धर्वैरप्सरोभिश्व काननैश्ष मनोरमै: । व्यालैश्व विविधाकारै: शतशीर्षै: समनन्‍तत:ः

Di segala penjuru tempat itu dipenuhi Gandharva dan Apsaras, rimbun oleh hutan-grove yang memesona, serta dikepung makhluk-makhluk melata buas beraneka rupa—sebagian termasyhur sebagai ‘seratus kepala’—mengitari semuanya dari sekeliling.

Verse 101

उपेतं पश्य कौन्तेय शैलराजमरिन्दम । “यहाँ हंसोंके समुदाय निवास करते हैं तथा ऋषि एवं किन्नरगण सदा इन (गंगाजी)-का सेवन करते हैं। शत्रुदमन भीम! भाँति-भाँतिके धातुओं, नदियों, किन्नरों, मृगों, पक्षियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, मनोरम काननों तथा सौ मस्तकवाले भाँति-भाँतिके सर्पोसे सम्पन्न इस पर्वतराजका दर्शन करो” ।। ९९-१०० $ || वैशग्पायन उवाच ते प्रीतमनस: शूरा: प्राप्ता गतिमनुत्तमाम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--इस प्रकार वे शूरवीर पाण्डव हर्षपूर्ण हृदयसे अपने परम उत्तम लक्ष्य स्थानको पहुँच गये

“Mari, wahai putra Kuntī, penakluk musuh—pandanglah raja gunung ini. Di sini kawanan angsa berdiam; para resi dan Kinnara senantiasa meneguk air Gaṅgā. Wahai Bhīma, penjinak musuh, lihatlah penguasa gunung ini—kaya oleh rona mineral yang beraneka, sungai-sungai, Kinnara, rusa, burung, Gandharva, Apsaras, rimba yang menawan, serta ular-ular berbagai jenis, termasuk yang termasyhur sebagai ‘seratus kepala’.”

Verse 102

नातृप्यन्‌ पर्वतेन्द्रस्य दर्शनेन परन्तपा: । उपेतमथ माल्यैश्व फलवद्धिश्न पादपै:

Para pahlawan, pembakar musuh, belum puas hanya dengan memandang sang raja gunung. Lalu mereka mendekat lagi; tampak ia berhias untaian bunga dan pepohonan yang sarat buah.

Verse 103

ततस्ते तिग्मतपसं कृशं धमनिसंततम्‌ | पारगं सर्वधर्माणामार्टिषिणमुपागमन्‌,फिर वे कठोर तपस्वी दुर्बलकाय तथा नस-नाड़ियोंसे ही व्याप्त राजर्षि आर्टिषेणके समीप गये, जो सम्पूर्ण धर्मोके पारंगत विद्वान थे

Kemudian mereka mendatangi Ārtiṣiṇa, sang resi-raja—keras dalam tapa yang tajam, tubuhnya kurus dengan urat-urat menonjol, dan mahir menyeberangi seluruh ajaran dharma.

Verse 158

इति श्रीमहाभारते आरण्यके पर्वणि यक्षयुद्धपर्वणि गन्धमादनप्रवेशे अष्टपपञज्चाशदधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत यक्षयुद्धपर्वमें गन्‍्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ अद्वावनवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata pada Vana Parva bagian Āraṇyaka, dalam subkisah pertempuran melawan para Yakṣa, berakhirlah adhyāya tentang memasuki Gandhamādana. Kolofon ini menandai peralihan alur—bahwa di rimba, perjumpaan dengan makhluk non-manusia menguji pengendalian diri, keberanian, dan keteguhan pada dharma.

Verse 253

न्यदधुः पाण्डवा राजजन्नाश्रमे वृषपर्वण: । अपने साथ आये हुए ब्राह्मणोंको उन्होंने एक-एक करके वृषपर्वाके यहाँ धरोहरकी भाँति सौंपा। उन सबका पाण्डवोंने समय-समयपर सगे बन्धुकी भाँति सत्कार किया था। ब्राह्मणोंको सौंपनेके पश्चात्‌ पाण्डवोंने अपनी शेष सामग्री भी उन्हीं महामनाको दे दी। तदनन्तर पाण्डुपुत्रोंने वृषपर्वाके ही आश्रममें अपने यज्ञपात्र तथा रत्नमय आभूषण भी रख दिये

Vaiśampāyana berkata: Wahai Raja, para Pāṇḍava menetap di pertapaan Vṛṣaparvan. Para brāhmaṇa yang datang bersama mereka diserahkan satu per satu kepada Vṛṣaparvan, laksana menitipkan amanat yang berharga. Pada waktu-waktu yang patut, para Pāṇḍava telah memuliakan mereka seperti sanak keluarga sendiri. Setelah menyerahkan para brāhmaṇa itu, para Pāṇḍava pun memberikan sisa perbekalan mereka kepada sang mahatma. Kemudian, putra-putra Pāṇḍu menaruh di pertapaan Vṛṣaparvan juga bejana-bejana yajña serta perhiasan mereka yang bertatahkan permata.

Verse 843

संश्लिष्टा: पार्थ शोभन्ते गन्धमादनसानुषु । “वृकोदर! हमलोग ऐसे स्थानपर आ गये हैं, जो मानवोंके लिये अगम्य है। जान पड़ता है हम सिद्ध हो गये हैं। कुन्तीनन्दन! गन्धमादनके शिखरोंपर ये फ़ूलोंसे भरे हुए उत्तम वृक्ष इन पुष्पित लताओंसे अलंकृत होकर कैसी शोभा पा रहे हैं?

O Pārtha, di lereng-lereng Gandhamādana mereka tampak elok, saling berdekatan. Wahai Vṛkodara, kita telah tiba di tempat yang tak terjangkau bagi manusia; seakan-akan kita telah menjadi para siddha. Wahai putra Kuntī, di puncak-puncak Gandhamādana, betapa indahnya pohon-pohon unggul yang sarat bunga ini, berhias sulur-sulur yang sedang mekar!

Verse 863

पत्रिण: पुष्पितानेतान्‌ संपतन्ति महाद्रुमान्‌ । “ये चकोर, शतपत्र, मदोन्मत्त कोकिल और सारिका आदि पक्षी इन पुष्पमण्डित विशाल वृक्षोंकी ओर कैसे उड़े जा रहे हैं?

Vaiśampāyana berkata: “Burung-burung bersayap ini sedang menukik turun ke pohon-pohon besar yang tengah berbunga.” Burung cakorā, śatapatra, kukila yang mabuk keriangan, serta sārika dan lainnya, melesat menuju pepohonan raksasa yang berhias bunga itu.

Verse 873

परस्परमुदी क्षन्ते बहवो जीवजीवका: । 'पार्थ! वृक्षोंकी ऊँची शिखाओंपर बैठे हुए लाल, गुलाबी और पीले रंगके चकोर पक्षी एक-दूसरेकी ओर देख रहे हैं

Vaiśampāyana berkata: “Banyak makhluk saling memandang.” Wahai Pārtha, bertengger di pucuk-pucuk pohon yang tinggi, burung-burung cakorā berwarna merah, merah muda, dan kuning saling menatap satu sama lain.

Verse 886

सारसा: प्रतिदृश्यन्ते शैलप्रस्रवणेष्वपि । उधर हरी और लाल घासोंके समीप पर्वतीय झरनोंके पास सारस दिखायी देते हैं

Bahkan di dekat mata air pegunungan pun tampak burung sāras (bangau).

Verse 893

भूज़राजोपचक्राश्व लोहपृष्ठा: पतत्त्रिण: । 'भृंगराज, उपचक्र (चक्रवाक) और लोहपृष्ठ (कंक) नामक पक्षी ऐसी मीठी बोली बोलते हैं, जो समस्त प्राणियोंके मनको मोह लेती है

Burung-burung seperti bhṛṅgarāja, upacakra (cakravāka), dan lohapṛṣṭha melantunkan suara yang manis, memikat, dan memesona hati semua makhluk.

Verse 906

एते वैदूर्यवर्णाभं क्षोभयन्ति महत्‌ सर: । “इधर देखो, ये कमलके समान कान्तिवाले गजराज, जिनके चार दाँत शोभा पा रहे हैं, हथिनियोंके साथ आकर वैदूर्यमणिके समान सुशोभित इस महान्‌ सरोवरको मथे डालते हैं

Lihatlah—gajah-gajah agung ini, bercahaya laksana teratai dan berkilau seperti vaidūrya, datang bersama betina-betina gajah lalu mengaduk dan mengguncang danau yang luas ini.

Verse 963

दृश्यन्ते शैलशड्रेषु पार्थ किम्पुरुषै: सह । 'ये नाना प्रकारकी परम कान्तिमान्‌ धातु समूचे शैलकी शोभा बढाती हैं। पार्थ! जिस प्रकार वृषपर्वाने कहा था उसी प्रकार इन पर्वतीय शिखरोंपर अपनी प्रेयसी अप्सराओं तथा किम्पुरुषोंके साथ गन्धर्व दृष्टिगोचर होते हैं

Wahai Pārtha, di puncak-puncak gunung tampak para gandharwa bersama kaum kimpuruṣa; dan beraneka ragam mineral yang amat berkilau menambah semarak seluruh pegunungan—sebagaimana dikatakan Vṛṣaparvā.

Verse 1023

आर्डिषेणस्य राजर्षेराश्रमं ददृशुस्तदा | गिरिराज गन्धमादनका दर्शन करनेसे उन्हें तृप्ति नहीं होती थी। तदनन्तर परंतप पाण्डवोंने पुष्पमालाओं तथा फलवान्‌ वृक्षोंसे सम्पन्न राजर्षि आर्दिषेणका आश्रम देखा

Saat itu mereka melihat pertapaan raja resi Ārdiṣeṇa. Meskipun memandang raja gunung, Gandhamādana, berulang kali, mereka tetap tidak merasa puas. Kemudian para Pāṇḍawa, penakluk musuh, menyaksikan pertapaan raja resi Ārdiṣeṇa yang kaya akan rangkaian bunga serta pepohonan sarat buah.

Verse 8536

नदतां शृणु निर्घोषं भीम पर्वतसानुषु । 'भीम! इन पर्वतशिखरोंपर मोरिनियोंके साथ विचरते बोलते हुए मोरोंका यह मधुर केकारव तो सुनो

Vaiśaṃpāyana berkata: “Wahai Bhīma, dengarkan gema panggilan yang mengguntur di lereng-lereng gunung ini—kekarawa merak yang manis dan nyaring, saat mereka berkeliaran di puncak-puncak bersama merak betina.”

Frequently Asked Questions

The chapter highlights the risk of ‘sāhasa’ (reckless overreach) and adharma-driven action—especially when a powerful agent lacks task-discrimination and timing—posing a leadership problem of restraining force with discernment.

Effective rulership and personal success depend on a coordinated set of virtues: steadiness, competence, contextual judgment of time and place, disciplined initiative, and orderly public administration; their absence results in social and personal collapse.

While not framed as a formal phalaśruti, the text explicitly states outcomes: one who acts accordingly gains fame in the world and a ‘sadgati’ after death, whereas those who act with sinful intent, poor discernment, and mistimed recklessness ‘perish’ here and hereafter.