Kubera’s Fivefold Nīti and Protection of the Pāṇḍavas (वैश्रवणोपदेशः)
प्रफुल्लै: कमलैश्वैव तथा नीलोत्पलैरपि । महापुण्यं पवित्र॑ च सुरासुरनिषेवितम्,'पर्वतोंमें श्रेष्ठ गेरिगशज कैलासपर आकर अर्जुनसे मिलनेके शुभ अवसरकी प्रतीक्षामें हमने यहाँ डेरा डाला है। (क्योंकि वहीं मिलनेका उनकी ओरसे संकेत प्राप्त हुआ था।) वह शत कैलास-शिखर पुष्पित वृक्षावलियोंसे सुशोभित है। वहाँ मतवाले कोकिलोंकी काकली, भ्रमरोंके गुंजारव तथा मोर और पपीहोंकी मीठी वाणीसे नित्य उत्सव-सा होता रहता है, जो उस पर्वतकी शोभाको बढ़ा देता है। वहाँ व्याप्र, वराह, महिष, गवय, हरिण, हिंसक जन्तु, सर्प तथा रुरुमृग निवास करते हैं। खिले हुए सहस्रदल, शतदल, उत्पल, प्रफुल्ल कमल तथा नीलोत्पल आदिसे उस पर्वतकी रमणीयता और भी बढ़ गयी है। वह परम पुण्यमय और पवित्र है। देवता और असुर दोनों ही उसका सेवन करते हैं
vaiśampāyana uvāca | praphullaiḥ kamalaiś caiva tathā nīlotpalair api | mahāpuṇyaṃ pavitraṃ ca surāsuranisevitam ||
Waiśampāyana berkata: Daerah itu dihiasi teratai yang mekar sempurna dan juga nilotpala (lili air biru). Tempat itu amat penuh pahala dan menyucikan—dihormati serta didatangi baik oleh para dewa maupun asura.
वैशम्पायन उवाच