Adhyaya 189
Vana ParvaAdhyaya 189152 Verses

Adhyaya 189

कृतयुगवर्णनम् तथा राजधर्मोपदेशः (Kṛtayuga Description and Instruction on Royal Dharma)

Upa-parva: Mārkaṇḍeya–Yuga-Dharma Upadeśa (Prophecy and Royal Ethics Episode)

This chapter continues Mārkaṇḍeya’s account of cyclical time and social restoration. He describes a future re-establishment of order: the protection of the earth for the twice-born, the performance of a great horse-sacrifice, and the installation of auspicious boundaries (maryādā) said to be primordial in origin. The narrative includes a program of security and pacification—suppression of predatory bands and the placement of emblems and weapons in conquered regions as signs of stabilized rule—culminating in the decline of adharma and the increase of dharma when the Kṛta age is attained. Mārkaṇḍeya outlines markers of societal flourishing: ritual activity, public works, thriving agriculture across seasons, and a varṇa-based division of duties presented as normative for that age. The discourse then pivots to direct counsel: Yudhiṣṭhira is urged to resolve dharma-doubt by aligning himself with dharma, practicing compassion, protecting subjects as one’s own children, honoring ancestors and deities, correcting errors through proper giving, and avoiding contempt toward Brahmins. The frame closes with Yudhiṣṭhira’s assent and the listeners’ astonishment at the purāṇic instruction.

Chapter Arc: युधिष्ठिर के समक्ष महर्षि मार्कण्डेय काल-चक्र का द्वार खोलते हैं—चारों युगों की वर्ष-संख्या, ब्रह्मा के दिन-रात का मान, और वह अद्भुत तथ्य कि प्रलय के महाशून्य में भी एक साक्षी बना रहता है। → वर्णाश्रम-धर्म के ढहने का चित्र उभरता है: कलियुग में क्षत्रिय-वैश्य विकर्म में पड़ते हैं, अल्पायु और स्वल्पबल हो जाते हैं; ब्राह्मण बाह्य वेश से मुनि-सा कपट धारण कर जीविका के लिए अधर्म का सहारा लेते हैं। समाज का ताना-बाना उलटता जाता है और नैतिक दिशा धुँधली पड़ती जाती है। → प्रलय का दृश्य: जब लोक देव-दानव-समेत शून्य हो जाते हैं, तब भी मार्कण्डेय का दीर्घजीवी अस्तित्व बना रहता है—और वे उस परम रहस्य के निकट पहुँचते हैं जहाँ ब्रह्मा के दिन-रात में समस्त विश्व का परिवर्तन होता है। इस विराट विनाश के बीच एक दिव्य बालक का दर्शन होता है—लाल-लाल तलवों और कोमल अँगुलियों वाला—जिसे मार्कण्डेय श्रद्धा से मस्तक पर उठाकर प्रणाम करते हैं। → महर्षि काल-मान (युग, सहस्रयुग, ब्राह्म-अहः) का विधान स्थापित करते हैं और कलियुग के लक्षणों द्वारा यह बोध देते हैं कि धर्म का क्षय भी नियति के चक्र में आता है; फिर भी साक्षी-चेतना और परम सत्ता का संकेत प्रलय में भी बना रहता है। → दिव्य बालक का रहस्य—वह कौन है और प्रलय के पार किस सत्य की ओर संकेत करता है—अगले प्रसंग की ओर कथा को धकेल देता है।

Shlokas

Verse 1

हि >> आय न हुक है 7 अष्टा शीर्त्याधिकशततमोब् ध्याय: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको ४ (02०8 कुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान्‌के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना वैशम्पायन उवाच ततः स पुनरेवाथ मार्कण्डेयं यशस्विनम्‌ । पप्रच्छ विनयोपेतो धर्मराजो युधिषिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर विनयशील धर्मराज युधिष्ठिरने यशस्वी मार्कण्डेय मुनिसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया--

Vaiśampāyana berkata: Kemudian, Raja Yudhiṣṭhira—penjaga dharma yang berhati rendah—kembali mengajukan pertanyaan kepada resi Mārkaṇḍeya yang termasyhur.

Verse 2

नैके युगसहस्रान्तास्त्वया दृष्टा महामुने । न चापीह सम: कश्रिदायुष्मान्‌ दृश्यते तव,“महामुने! आपने हजार-हजार युगोंके अन्तमें होनेवाले अनेक महाप्रलयके दृश्य देखे हैं। इस संसारमें आपके समान बड़ी आयुवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं दिखायी देता

Wahai maharsi, engkau telah menyaksikan banyak pralaya besar yang terjadi pada akhir ribuan demi ribuan yuga; dan di dunia ini tak seorang pun tampak menyamai panjang umurmu.

Verse 3

वर्जयित्वा महात्मानं ब्रह्माणं परमेषछ्ठिनम्‌ । न ते$स्ति सदृश: ककश्रिदायुषा ब्रह्मवित्तम,ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! परमेष्ठी महात्मा ब्रह्माजीको छोड़कर दूसरा कोई आपके समान दीर्घायु नहीं है

Wahai yang utama di antara para brahmavid, selain Brahmā sang Parameṣṭhin yang agung, tiada seorang pun yang setara denganmu dalam panjang umur.

Verse 4

अनन्तरिक्षे लोके5स्मिन्‌ देवदानववर्जिते । त्वमेव प्रलये विप्र ब्रह्माणमुपतिष्ठसे,ब्रह्म! जब यह संसार देवता, दानव तथा अन्तरिक्ष आदि लोकोंसे शून्य हो जाता है उस प्रलयकालमें केवल आप ही ब्रह्माजीके पास रहकर उनकी उपासना करते हैं

Wahai brāhmaṇa, pada saat pralaya ketika dunia ini—beserta alam antara—menjadi kosong dari para dewa dan dānava, engkaulah seorang diri yang tetap hadir mendampingi Brahmā dalam bakti dan pelayanan.

Verse 5

प्रलये चापि निर्वत्ति प्रबुद्धे च पितामहे । त्वमेक: सृज्यमानानि भूतानीह प्रपश्यसि,ब्रह्मर्ष! फिर प्रलयकाल व्यतीत होनेपर जब पितामह ब्रह्मा जागते हैं, तब सम्पूर्ण दिशाओंमें वायुको फैलाकर उसके द्वारा समस्त जलराशिको इधर-उधर छितराकर (सूखे स्थानोंमें) ब्रह्माजीके द्वारा जो जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्धिज्ज नामक चार प्रकारके प्राणी रचे जाते हैं, उन्हें एकमात्र आप ही (सबसे पहले) अच्छी तरह देख पाते हैं

Waiśampāyana berkata: “Bahkan pada saat pralaya, dan ketika penciptaan kembali berlanjut—tatkala Pitāmaha Brahmā terjaga—engkau seoranglah, wahai brahmarṣi, yang menyaksikan makhluk-makhluk yang sedang diciptakan di sini.”

Verse 6

चतुर्विधानि विप्रर्षे यथावत्‌ परमेछ्िना । वायुभूता दिश: कृत्वा विक्षिप्यापस्ततस्तत:,ब्रह्मर्ष! फिर प्रलयकाल व्यतीत होनेपर जब पितामह ब्रह्मा जागते हैं, तब सम्पूर्ण दिशाओंमें वायुको फैलाकर उसके द्वारा समस्त जलराशिको इधर-उधर छितराकर (सूखे स्थानोंमें) ब्रह्माजीके द्वारा जो जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्धिज्ज नामक चार प्रकारके प्राणी रचे जाते हैं, उन्हें एकमात्र आप ही (सबसे पहले) अच्छी तरह देख पाते हैं

Waiśampāyana berkata: “Wahai resi Brahmana terbaik, setelah masa pralaya berlalu, Parameṣṭhin—Kakek Brahmā—terjaga; ia memenuhi segala penjuru dengan angin dan, oleh hembusan itu, menghamburkan perairan ke sana-sini hingga tersingkap ruang-ruang kering. Lalu ia menciptakan empat golongan makhluk: yang lahir dari rahim, dari telur, dari peluh/panas-lembap, dan dari tunas. Dari penciptaan mula-mula itu, engkau seoranglah yang dapat menyaksikannya dengan jelas sejak awal.”

Verse 7

त्वया लोकगुरु: साक्षात्‌ सर्वलोकपितामह: । आराधितो द्विजश्रेष्ठ तत्परेण समाधिना,द्विजश्रेष्ठी आपने तत्परतापूर्वक चित्तवृत्तियोंका निरोध करके सम्पूर्ण लोकोंके पितामह साक्षात्‌ लोकगुरु ब्रह्माजीकी आराधना की है। विप्रवर! आपने अनेक बार इस जगत्‌की प्रारम्भिक सृष्टिको प्रत्यक्ष किया है और घोर तपस्याद्वारा (मरीचि आदि) प्रजापतियोंको भी जीत लिया है

Waiśampāyana berkata: “Wahai brāhmaṇa terbaik, engkau telah memuja Brahmā sendiri—Guru bagi segala dunia dan Kakek bagi semua makhluk—dengan samādhi yang sepenuhnya tertuju kepada-Nya.”

Verse 8

स्वप्रमाणमथो विप्र त्वया कृतमनेकश: । घोरेणाविश्य तपसा वेधसो निर्जितास्त्वया,द्विजश्रेष्ठी आपने तत्परतापूर्वक चित्तवृत्तियोंका निरोध करके सम्पूर्ण लोकोंके पितामह साक्षात्‌ लोकगुरु ब्रह्माजीकी आराधना की है। विप्रवर! आपने अनेक बार इस जगत्‌की प्रारम्भिक सृष्टिको प्रत्यक्ष किया है और घोर तपस्याद्वारा (मरीचि आदि) प्रजापतियोंको भी जीत लिया है

Waiśampāyana berkata: “Wahai brāhmaṇa, engkau sendiri adalah bukti dari apa yang telah engkau capai berulang kali. Dengan memasuki tapa yang dahsyat, engkau menaklukkan bahkan daya-daya pencipta (para Prajāpati) melalui kekuatan tapasmu.”

Verse 9

नारायणाड्कप्रख्यस्त्वं साम्परायेडतिपठ्यसे । भगवाननेकश: कृत्वा त्वया विष्णोश्व विश्वकृत्‌,आप भगवान्‌ नारायणके समीप रहनेवाले भक्तोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। परलोकमें आपकी महिमाका सर्वत्र गान होता है। आपने पहले स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले सर्वव्यापक ब्रह्मकी उपलब्धिके स्थानभूत हृदयकमलकी कर्णिकाका (योगकी कलासे) अलौकिक उद्घाटन कर वैराग्य और अभ्याससे प्राप्त हुई दिव्य दृष्टिद्वारा विश्वरचयिता भगवान्‌का अनेक बार साक्षात्कार किया है

Waiśampāyana berkata: “Engkau termasyhur laksana Nārāyaṇa sendiri, dan di alam seberang kemuliaanmu dilantunkan di mana-mana. Dengan penglihatan ilahi yang lahir dari vairāgya dan latihan yang tekun, engkau telah berulang kali menyaksikan Bhagavān Viṣṇu, Sang Pembentuk jagat, setelah membuka teratai batin di hati melalui daya yoga.”

Verse 10

कर्णिकोद्धरणं दिव्यं ब्रह्यण: कामरूपिण: । रत्नालंकारयोगाशभ्यां दृग्भ्यां दुष्टस्त्वया पुरा,आप भगवान्‌ नारायणके समीप रहनेवाले भक्तोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। परलोकमें आपकी महिमाका सर्वत्र गान होता है। आपने पहले स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले सर्वव्यापक ब्रह्मकी उपलब्धिके स्थानभूत हृदयकमलकी कर्णिकाका (योगकी कलासे) अलौकिक उद्घाटन कर वैराग्य और अभ्याससे प्राप्त हुई दिव्य दृष्टिद्वारा विश्वरचयिता भगवान्‌का अनेक बार साक्षात्कार किया है

Vaiśampāyana berkata: “Dahulu engkau, dengan penglihatan ilahi yang lahir dari latihan tapa-yoga dan pelepasan batin, menyaksikan ‘terbukanya’ perikarp teratai-hati—pengalaman menakjubkan yang menyingkap Brahman Yang Mahameresap, yang berwujud menurut kehendak-Nya, sumber semesta yang berhiaskan kilau laksana ratna. Karena bhakti dan pencapaian yogamu itulah engkau menjadi yang utama di antara para pemuja yang berdiam dekat Nārāyaṇa; dan kemuliaanmu dipuji di alam-alam seberang.”

Verse 11

तस्मात्‌ तवान्तको मृत्युर्जरा वा देहनाशिनी । नत्वां विशति विप्रर्षे प्रसादात्‌ परमेछ्चिन:,इसीलिये सबको मारनेवाली मृत्यु तथा शरीरको जर्जर बना देनेवाली जरा आपका स्पर्श नहीं करती है। ब्रह्मर्ष! इसमें भगवान्‌ परमेष्ठीका कृपाप्रसाद ही कारण है

Karena itu, wahai resi terbaik di antara para Brahmana, Maut—pengakhir segala—dan usia tua yang melapukkan tubuh, keduanya tak dapat menyentuhmu. Kebebasan dari kefanaan ini lahir dari anugerah Parameṣṭhī (Brahmā).

Verse 12

यदा नैवं रविनग्निर्न वायुर्न च चन्द्रमा: । नैवान्तरिक्ष नैवोर्वी शेष भवति किंचन,(महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथ्वी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत्‌ उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं

Vaiśampāyana berkata: “Ketika tiba pralaya agung—tatkala matahari, api, angin, dan bulan tak lagi tersisa; tatkala ruang antara dan bumi pun lenyap, tiada sesuatu pun yang tinggal—maka seluruh yang bergerak dan tak bergerak tenggelam ke dalam satu samudra kosmis dan menghilang dari pandangan. Para dewa dan asura binasa, bahkan para nāga perkasa pun musnah. Pada saat itu, Sang Penguasa segala makhluk, Brahmā yang berjiwa tak terukur, yang bersemayam dan berbaring di kediaman teratai dan utpala, tetap ada; dan engkau seoranglah yang tinggal dekat-Nya, terus memuja.”

Verse 13

तस्मिन्नेकार्णवे लोके नष्टे स्थावरजड़मे । नष्टे देवासुरगणे समुत्सन्नमहोरगे,(महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथ्वी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत्‌ उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं

Vaiśampāyana berkata: “Ketika dunia menjadi satu samudra dan segala yang tetap maupun bergerak telah binasa; ketika bala dewa dan asura musnah, bahkan ular-ular raksasa pun lenyap—dalam pralaya agung itu tak tersisa matahari, api, angin, atau bulan; tak tersisa ruang maupun bumi. Seluruh yang bergerak dan tak bergerak tenggelam ke dalam satu banjir dan menghilang. Pada saat itu Brahmā, yang berjiwa tak terukur, tetap ada; dan yang tersisa hanyalah bhakti-pemujaan kepada-Nya.”

Verse 14

शयानममितात्मानं पद्मोत्पलनिकेतनम्‌ | त्वमेक: सर्वभूतेशं ब्रह्माणमुपतिष्ठसि,(महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथ्वी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत्‌ उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं

Sementara Brahmā, Sang Penguasa segala makhluk, berjiwa tak terukur, berbaring di kediaman teratai dan utpala, engkau seoranglah yang berdiri dekat-Nya, melayani dan memuja.

Verse 15

एतत्‌ प्रत्यक्षत: सर्व पूर्व वृत्तं द्विजोत्तम । तस्मादिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वहेत्वात्मिकां कथाम्‌,द्विजोत्तम! यह सारा पुरातन इतिहास आपका प्रत्यक्ष देखा हुआ है। इसलिये मैं आपके मुखसे सबके हेतुभूत कालका निरूपण करनेवाली कथा सुनना चाहता हूँ

Wahai yang terbaik di antara para dwija, seluruh kisah purba ini engkau ketahui melalui pengalaman langsung. Karena itu aku ingin mendengar dari mulutmu narasi yang menjelaskan sebab-sebab mendasar—waktu dan keadaan—yang menjadi alasan bagi segala sesuatu.

Verse 16

अनुभूतं हि बहुशस्त्वयैकेन द्विजोत्तम | न ते<स्त्यविदितं किंचित्‌ सर्वलोकेषु नित्यदा,विप्रवर! केवल आपने ही अनेक कल्पोंकी श्रेष्ठ रचनाका बहुत बार अनुभव किया है। सम्पूर्ण लोकोंमें कभी कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो'

Wahai dwija-utama, wahai brahmana termulia! Engkau seorang diri telah berulang kali menyaksikan dan mengalami begitu banyak sepanjang banyak zaman. Di seluruh dunia-dunia, pada setiap masa, tiada sesuatu pun yang tidak engkau ketahui.

Verse 17

मार्कण्डेय उदाच हन्त ते वर्णयिष्यामि नमस्कृत्वा स्वयम्भुवे । पुरुषाय पुराणाय शाश्वतायाव्ययाय च

Mārkaṇḍeya berkata: “Baiklah—dengarkan; akan kuuraikan kepadamu. Setelah terlebih dahulu bersujud hormat kepada Tuhan Yang Ada dengan Sendiri, kepada Purusha Purba—yang kekal dan tak lapuk—aku akan memulai.”

Verse 18

अव्यक्ताय सुसूक्ष्माय निर्गुणाय गुणात्मने । स एष पुरुषव्याघत्र पीतवासा जनार्दन:

Kepada Yang Tak-Termanifest, Yang amat halus, Yang tanpa sifat namun menjadi landasan segala sifat—Dialah Janārdana itu, wahai harimau di antara manusia, yang berbusana kuning.

Verse 19

एष कर्ता विकर्ता च भूतात्मा भूतकृत्‌ प्रभु: । अचिन्त्यं महदाश्चर्य पवित्रमिति चोच्यते

Dialah pelaku dan juga pengatur yang mengubah serta menetapkan hasil; Dialah Ātman di dalam semua makhluk, pencipta makhluk, Sang Penguasa. Ia disebut tak terpikirkan, amat menakjubkan, dan menyucikan.

Verse 20

मार्कण्डेयजी बोले--राजन! मैं स्वयं प्रकट होनेवाले सनातन, अविनाशी, अव्यक्त, सूक्ष्म, निर्गुण एवं गुणस्वरूप पुराणपुरुषको नमस्कार करके तुम्हें वह कथा अभी सुनाता हूँ। पुरुषसिंह! ये जो हमलोगोंके पास बैठे हुए पीताम्बरधारी भगवान्‌ जनार्दन हैं, ये ही संसारकी सृष्टि और संहार करनेवाले हैं। ये ही भगवान्‌ समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी आत्मा और उनके रचयिता हैं। ये पवित्र, अचिन्त्य एवं महान्‌ आश्वर्यमय तत्त्व कहे जाते हैं ।। १७ -7१९ || अनादिनिधनं भूत॑ विश्वमव्ययमक्षयम्‌ | एष कर्ता न क्रियते कारणं चापि पौरुषे,इनका न आदि है, न अन्त। ये सर्वभूतस्वरूप, अव्यय और अक्षय हैं। ये ही सबके कर्ता हैं, इनका कोई कर्ता नहीं है। पुरुषार्थकी प्राप्तिमें भी ये ही कारण हैं

Waiśampāyana berkata: “Ia tanpa awal dan tanpa akhir—Dialah semesta itu sendiri, tak binasa dan tak lapuk. Dialah satu-satunya pelaku; tiada pembuat lain yang menjadikan-Nya. Dan bahkan dalam pencapaian tujuan hidup manusia (puruṣārtha), Dialah sebab yang menentukan.”

Verse 21

यद्येष पुरुषो वेद वेदा अपि न त॑ विदुः । सर्वमाश्नर्यमेवैतन्निवृत्तं राजसत्तम

Waiśampāyana berkata: “Jika orang ini sungguh mengetahui kebenaran, maka bahkan Weda pun tidak ‘mengetahui’ dia—begitu halus dan melampaui jangkauan biasa keadaannya. Semuanya ini sungguh menakjubkan, wahai raja terbaik, sebab ia telah berpaling dari urusan dunia dan berdiri dalam keadaan menarik diri (dari hasrat dan tindakan).”

Verse 22

चत्वार्याहु: सहस्राणि वर्षाणां तत्‌ कृतं युगम्‌

Waiśampāyana berkata: “Mereka menyatakan bahwa empat ribu tahun membentuk Kṛta (Satya) Yuga itu.”

Verse 23

तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशक्ष तथाविध: । चार हजार दिव्य वर्षोका एक सत्ययुग बताया गया है, उतने ही सौ वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके होते हैं (इस प्रकार कुल अड़तालीस सौ दिव्य वर्ष सत्ययुगके हैं) ।। २२३ || त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते

Waiśampāyana berkata: “Masa senja (sandhyā) pada yuga itu berlangsung seratus (tahun ilahi), dan senja penutupnya (sandhyāṃśa) pun sama. Maka empat ribu tahun ilahi dinyatakan sebagai Satya Yuga; dengan tambahan masing-masing seratus tahun ilahi untuk peralihan awal dan akhir, jumlahnya menjadi empat ribu delapan ratus tahun ilahi. Sesudah itu, Tretā Yuga di sini disebut berdurasi tiga ribu tahun ilahi.”

Verse 24

तथा वर्षसहसे द्वे द्वापरं परिमाणत:

Waiśampāyana berkata: “Demikian pula, menurut ukurannya, Dvāpara Yuga berlangsung dua ribu tahun.”

Verse 25

सहस्रमेकं वर्षाणां तत: कलियुगं स्मृतम्‌,तदनन्तर एक हजार दिव्य वर्ष कलियुगका मान कहा गया है, सौ वर्ष उसकी संध्याके और सौ वर्ष संध्यांशके बताये गये हैं (इस प्रकार कलियुग बारह सौ दिव्य वर्षोंका होता है)। संध्या और संध्यांशका मान बराबर-बराबर ही समझो

Waiśampāyana berkata: “Sesudah itu, Kali Yuga dikenang berlangsung seribu tahun ilahi. Setelahnya, seratus tahun dinyatakan sebagai masa senja (sandhyā) dan seratus tahun lagi sebagai senja-akhir (sandhyāṁśa). Dengan demikian Kali Yuga berjumlah seribu dua ratus tahun ilahi; pahamilah bahwa ukuran sandhyā dan sandhyāṁśa adalah sama.”

Verse 26

तस्य वर्षशतं संधि: संध्यांशश्व॒ ततः परम्‌ | संधिसंध्यांशयोस्तुल्यं प्रमाणमुपधारय,तदनन्तर एक हजार दिव्य वर्ष कलियुगका मान कहा गया है, सौ वर्ष उसकी संध्याके और सौ वर्ष संध्यांशके बताये गये हैं (इस प्रकार कलियुग बारह सौ दिव्य वर्षोंका होता है)। संध्या और संध्यांशका मान बराबर-बराबर ही समझो

“Bagi yuga itu, masa peralihan (sandhi) adalah seratus tahun, dan sesudahnya bagian peralihan penutup (sandhyāṁśa) juga seratus tahun. Pahamilah bahwa ukuran sandhi dan sandhyāṁśa adalah sama.”

Verse 27

क्षीणे कलियुगे चैव प्रवर्तेत कृतं युगम्‌ । एषा द्वादशसाहस्त्री युगाख्या परिकीर्तिता,कलियुगके क्षीण हो जानेपर पुनः सत्ययुगका आरम्भ होता है। इस तरह बारह हजार दिव्य वर्षोकी एक चतुर्युगी बतायी गयी है

“Ketika Kali Yuga telah menuntaskan masanya dan lenyap, Kṛta (Satya) Yuga mulai kembali. Demikianlah siklus empat yuga, yang disebut ‘dua belas ribu’ (tahun ilahi), diproklamasikan.”

Verse 28

एतत्‌ सहस्रपर्यन्तमहो ब्राह्ममुदाह्नतम्‌ । विश्व हि ब्रह्मभवने सर्वत: परिवर्त्तते

“Demikianlah uraian agung yang bersangkutan dengan Brahmā ini dinyatakan, meluas hingga seribu (dalam ukuran). Sebab seluruh jagat, di dalam kediaman Brahman, berputar dan bersiklus ke segala arah.”

Verse 29

अल्पावशिष्टे तु तदा चुगान्ते भरतर्षभ

“Namun, wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, ketika pada akhir yuga hanya sedikit waktu yang tersisa,”

Verse 30

सहस्रान्ते नरा: सर्वे प्रायशो5नृतवादिन: । यज्ञप्रतिनिधि: पार्थ दानप्रतिनिधिस्तथा

Waiśampāyana berkata: “Pada penghujung seribu tahun, hampir semua manusia cenderung menjadi pengucap dusta. Pada masa demikian, wahai Pārtha, yajña pun tinggal sebagai pengganti belaka, dan dana (derma) pun hanya menjadi pengganti.”

Verse 31

व्रतप्रतिनिधिश्वैव तस्मिन्‌ काले प्रवर्तते । भरतश्रेष्ठ सहस्र युगकी समाप्तिमें जब थोड़ा-सा ही समय शेष रह जाता है, उस समय कलियुगके अन्तिम भागमें प्राय: सभी मनुष्य मिथ्यावादी हो जाते हैं। पार्थ! उस समय यज्ञ, दान और व्रतके प्रतिनिधि कर्म चालू हो जाते हैं अर्थात्‌ यज्ञ, दान, तप मुख्य विधिसे न होकर गौण विधिसे नाममात्र होने लगते हैं || २९-३० $ ।। ब्राह्मणा: शूद्रकर्माणस्तथा शूद्रा धनार्जका:

Waiśampāyana berkata: “Pada masa itu, yang berlaku hanyalah pengganti-pengganti dari laku tapa (vrata). Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, para brāhmaṇa menekuni pekerjaan śūdra, dan para śūdra pun hanya berhasrat mengumpulkan kekayaan.”

Verse 32

निवृत्तयज्ञस्वाध्याया दण्डाजिनविवर्जिता:,(सहस्र चतुर्युगके अन्तिम) कलियुगके अन्तिम भागमें ब्राह्मण यज्ञ, स्वाध्याय, दण्ड और मृगचर्मका त्याग कर देंगे और (भनक्ष्याभक्ष्यका विचार छोड़कर) सब कुछ खाने- पीनेवाले हो जायँगे। तात! ब्राह्मण तो जपसे दूर भागेंगे और शूद्र वैदिक मन्त्रोंके जपमें संलग्न होंगे

Waiśampāyana berkata: “Pada bagian akhir Kali-yuga, para brāhmaṇa akan berhenti dari yajña dan svādhyāya; mereka meninggalkan tongkat dan kulit kijang, tanda hidup berdisiplin. Tanpa lagi membedakan yang layak dan tak layak dimakan, mereka menjadi serba-makan dan serba-minum. Wahai anakku, para brāhmaṇa menjauh dari japa, sedangkan para śūdra tekun melafalkan mantra-mantra Weda.”

Verse 33

ब्राह्मणा: सर्वभक्षाश्न॒ भविष्यन्ति कलौ युगे । अजपा ब्राह्मणास्तात शूद्रा जपपरायणा:,(सहस्र चतुर्युगके अन्तिम) कलियुगके अन्तिम भागमें ब्राह्मण यज्ञ, स्वाध्याय, दण्ड और मृगचर्मका त्याग कर देंगे और (भनक्ष्याभक्ष्यका विचार छोड़कर) सब कुछ खाने- पीनेवाले हो जायँगे। तात! ब्राह्मण तो जपसे दूर भागेंगे और शूद्र वैदिक मन्त्रोंके जपमें संलग्न होंगे

Waiśampāyana berkata: “Dalam Kali-yuga, para brāhmaṇa akan menjadi serba-makan, memakan apa pun yang tersedia. Wahai anakku, para brāhmaṇa akan tanpa japa, sedangkan para śūdra akan bersungguh-sungguh dalam japa.”

Verse 34

विपरीते तदा लोके पूर्वरूपं क्षयस्य तत्‌ । बहवो म्लेच्छराजान: पृथिव्यां मनुजाधिप,नरेश्वर! इस प्रकार जब लोगोंके विचार और व्यवहार विपरीत हो जाते हैं, तब प्रलयका पूर्वरूप आरम्भ हो जाता है। उस समय इस पृथ्वीपर बहुत-से म्लेच्छ राजा राज्य करने लगते हैं

Waiśampāyana berkata: “Ketika pandangan dan perilaku dunia menjadi terbalik—ketika tatanan benar ditinggalkan—itulah pertanda awal kehancuran. Wahai penguasa manusia, pada masa itu banyak raja mleccha akan memerintah di bumi.”

Verse 35

मृषानुशासिन: पापा मृषावादपरायणा: । आन्ध्रा: शका: पुलिन्दाश्न यवनाश्न नराधिपा:,छलसे शासन करनेवाले, पापी और असत्यवादी आन्ध्र, शक, पुलिन्द, यवन, काम्बोज, बाह्लीक तथा शौर्यसम्पन्न आभीर इस देशके राजा होंगे। नरश्रेष्ठी उस समय कोई ब्राह्मण अपने धर्मके अनुसार जीविका चलानेवाला न होगा

Waiśampāyana berkata: “Akan bangkit para penguasa berdosa yang memerintah dengan tipu daya, bersandar pada kebohongan. Raja-raja itu ialah bangsa Andhra, Śaka, Pulinda, dan Yavana.”

Verse 36

काम्बोजा बाह्लिका: शूरास्तथा5<5भीरा नरोत्तम | न तदा ब्राह्मण: कश्रनित्‌ स्वधर्ममुपजीवति,छलसे शासन करनेवाले, पापी और असत्यवादी आन्ध्र, शक, पुलिन्द, यवन, काम्बोज, बाह्लीक तथा शौर्यसम्पन्न आभीर इस देशके राजा होंगे। नरश्रेष्ठी उस समय कोई ब्राह्मण अपने धर्मके अनुसार जीविका चलानेवाला न होगा

Waiśampāyana berkata: “Wahai insan terbaik, pada masa itu kaum Kāmboja dan Bāhlīka, demikian pula Ābhīra yang gagah, akan memegang kekuasaan. Saat itu tak seorang brāhmaṇa pun dapat menghidupi diri menurut dharmanya sendiri.”

Verse 37

क्षत्रियाश्षापि वैश्याश्ष विकर्मस्था नराधिप । अल्पायुष: स्वल्पबला: स्वल्पवीर्यपराक्रमा:,नरेश्वर! क्षत्रिय और वैश्य भी अपना-अपना धर्म छोड़कर दूसरे वर्णोके कर्म करने लगेंगे। सबकी आयु कम होगी, सबके बल, वीर्य और पराक्रम घट जायँगे

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja, bahkan para kṣatriya dan vaiśya akan meninggalkan kewajiban yang ditetapkan bagi mereka dan menekuni pekerjaan golongan lain. Akibatnya manusia menjadi berumur pendek; kekuatan mereka menyusut, dan daya hidup serta kegagahan mereka merosot.”

Verse 38

अल्पसाराल्पदेहाश्व॒ तथा सत्याल्पभाषिण: । बहुशून्या जनपदा मृगव्यालावृता दिश:,मनुष्य नाटे कदके होंगे। उनकी शरीरिक शक्ति बहुत कम हो जायगी और उनकी बातोंमें सत्यका अंश बहुत कम होगा। बहुधा सारे जनपद जनशून्य होंगे। सम्पूर्ण दिशाएँ पशुओं और सर्पोसे भरी होंगी। युगान्तकाल उपस्थित होनेपर अधिकांश मनुष्य (अनुभव न होते हुए भी) वृथा ही ब्रह्मज्ञानकी बातें कहेंगे। शूद्र द्विजातियोंको भो (ऐ) कहकर पुकारेंगे और ब्राह्मणलोग शूट्रोंको आर्य अर्थात्‌ आप कहकर सम्बोधन करेंगे

Waiśampāyana berkata: “Manusia akan menjadi hampa nilainya dan bertubuh lemah, dan dalam ucapan mereka hanya tersisa sedikit kebenaran. Banyak negeri akan hampir kosong, dan segala penjuru akan dipenuhi binatang liar serta pemangsa buas.”

Verse 39

युगान्ते समनुप्राप्ते वृथा च ब्रह्मवादिन: । भोवादिनस्तथा शाद्रा ब्राह्मणाश्चार्यवादिन:,मनुष्य नाटे कदके होंगे। उनकी शरीरिक शक्ति बहुत कम हो जायगी और उनकी बातोंमें सत्यका अंश बहुत कम होगा। बहुधा सारे जनपद जनशून्य होंगे। सम्पूर्ण दिशाएँ पशुओं और सर्पोसे भरी होंगी। युगान्तकाल उपस्थित होनेपर अधिकांश मनुष्य (अनुभव न होते हुए भी) वृथा ही ब्रह्मज्ञानकी बातें कहेंगे। शूद्र द्विजातियोंको भो (ऐ) कहकर पुकारेंगे और ब्राह्मणलोग शूट्रोंको आर्य अर्थात्‌ आप कहकर सम्बोधन करेंगे

Waiśampāyana berkata: “Ketika akhir zaman mendekat, banyak orang akan berbicara tentang Brahman dengan sia-sia—sekadar kata tanpa realisasi. Para śūdra akan menyapa kaum dwija dengan ‘bho!’ yang kasar, dan para brāhmaṇa pun akan menyapa śūdra dengan sebutan hormat ‘ārya’ (‘tuan’).”

Verse 40

युगान्ते मनुजव्याप्र भवन्ति बहुजन्तवः । न तथा घ्राणयुक्ताश्न सर्वगन्धा विशाम्पते,पुरुषसिंह राजन! युगान्तकालमें बहुतसे जीव-जन्तु उत्पन्न हो जायँगे। सब प्रकारके सुगन्धित पदार्थ नासिकाको उतने गन्धयुक्त नहीं प्रतीत होंगे

Waiśampāyana berkata: “Wahai harimau di antara manusia! Pada akhir suatu yuga, banyak jenis makhluk hidup akan muncul. Wahai pelindung rakyat, wahai singa di antara manusia, wahai raja—pada masa itu bahkan mereka yang memiliki indra penciuman tidak lagi menangkap wewangian sebagaimana adanya; daya semua aroma pun meredup.”

Verse 41

रसाश्च मनुजव्यात्र न तथा स्वादुयोगिन: । बहुप्रजा हस्वदेहा: शीलाचारविवर्जिता: । मुखे भगा: स्त्रियो राजन्‌ भविष्यन्ति युगक्षये,नरव्याप्र! इसी प्रकार रसीले पदार्थभी जैसे चाहिये वैसे स्वादिष्ट नहीं होंगे। राजन्‌! उस समयकी स्त्रियाँ नाटे कदकी और बहुत संतान (बच्चा) पैदा करनेवाली होंगी। उनमें शील और सदाचारका अभाव होगा। युगान्तकालमें स्त्रियाँ मुखसे भगसम्बन्धी यानी व्यभिचारकी ही बातें करनेवाली होंगी। राजन! युगान्त-कालमें हर देशके लोग अन्न बेचनेवाले होंगे। ब्राह्मण वेद बेचनेवाले तथा (प्रायः) स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिको अपनानेवाली होंगी-

Waiśampāyana berkata: “Wahai harimau di antara manusia! Makanan dan sari-rasanya pun tidak lagi memiliki kemanisan dan kelezatan yang semestinya. Wahai raja! Pada akhir yuga, para perempuan akan bertubuh pendek dan melahirkan banyak anak, namun kehilangan kesopanan serta tata laku yang baik; dan mereka akan terus-menerus membicarakan perkara nafsu dan perselingkuhan.”

Verse 42

अट्टशूला जनपदा: शिवशूलाश्षतुष्पथा: । केशशूला: स्त्रियो राजन्‌ भविष्यन्ति युगक्षये,नरव्याप्र! इसी प्रकार रसीले पदार्थभी जैसे चाहिये वैसे स्वादिष्ट नहीं होंगे। राजन्‌! उस समयकी स्त्रियाँ नाटे कदकी और बहुत संतान (बच्चा) पैदा करनेवाली होंगी। उनमें शील और सदाचारका अभाव होगा। युगान्तकालमें स्त्रियाँ मुखसे भगसम्बन्धी यानी व्यभिचारकी ही बातें करनेवाली होंगी। राजन! युगान्त-कालमें हर देशके लोग अन्न बेचनेवाले होंगे। ब्राह्मण वेद बेचनेवाले तथा (प्रायः) स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिको अपनानेवाली होंगी-

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja! Pada akhir yuga, negeri-negeri akan seakan tertusuk pasak-pasak tajam; persimpangan jalan dipenuhi tanda-tanda sial laksana ‘tombak Śiva’; dan para perempuan pun akan tersiksa oleh ‘kesa-śūla’, derita yang menusuk hingga ke rambut. Inilah pertanda getir runtuhnya zaman.”

Verse 43

अल्पक्षीरास्तथा गावो भविष्यन्ति जनाधिप । अल्पपुष्पफलाश्चापि पादपा बहुवायसा:,जनेश्वर! युगान्तकालमें गायोंके थनोंमें बहुत कम दूध होगा। वृक्षपर फल और फूल बहुत कम होंगे और उनपर (अच्छे पक्षियोंकी अपेक्षा) कौए ही अधिक बसेरे लेंगे। भूपाल! ब्राह्मणगलोग (लोभवश) ब्रह्महत्या-जैसे पापोंसे लिप्त और मिथ्यावादी नरेशोंसे ही दान- दक्षिणा लेंगे

Waiśampāyana berkata: “Wahai penguasa manusia! Pada akhir yuga, sapi-sapi hanya menghasilkan sedikit susu. Pepohonan pun berbungakan dan berbuah sedikit, dan lebih banyak dikerumuni gagak daripada burung-burung pertanda baik. Demikianlah kemakmuran dan kesucian menyusut, sementara yang sial dan rendah menjadi dominan.”

Verse 44

ब्रह्मवध्यानुलिप्तानां तथा मिथ्याभिशंसिनाम्‌ । नृपाणां पृथिवीपाल प्रतिगृह्नन्ति वै द्विजा:,जनेश्वर! युगान्तकालमें गायोंके थनोंमें बहुत कम दूध होगा। वृक्षपर फल और फूल बहुत कम होंगे और उनपर (अच्छे पक्षियोंकी अपेक्षा) कौए ही अधिक बसेरे लेंगे। भूपाल! ब्राह्मणगलोग (लोभवश) ब्रह्महत्या-जैसे पापोंसे लिप्त और मिथ्यावादी नरेशोंसे ही दान- दक्षिणा लेंगे

Waiśampāyana berkata: “Wahai pelindung bumi! Para brahmana pun menerima pemberian dari raja-raja yang ternoda oleh dosa brahma-hatyā dan yang gemar memfitnah dengan dusta. Inilah tanda merosotnya dharma: karena loba, bahkan para pemangku dharma ikut tergelincir.”

Verse 45

लोभमोहपरीताश्च मिथ्याधर्मध्वजावृता: । भिक्षार्थ पृथिवीपाल चज्चूर्यन्ते द्विजैर्दिश:,राजन! वे ब्राह्मण लोभ और मोहमें फँसकर झूठे धर्मका ढोंग रचनेवाले होंगे, इतना ही नहीं, वे भिक्षाके लिये सारी दिशाओंके लोगोंको पीड़ित करते रहेंगे

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja, para brahmana yang dikuasai loba dan delusi, berselubung panji dharma palsu, tidak hanya akan meminta sedekah; atas nama mencari sedekah mereka akan mengganggu dan menindas orang-orang ke segala penjuru.”

Verse 46

करभारभयाद्‌ भीता गृहस्था: परिमोषका: | मुनिच्छञाकृतिच्छन्ना वाणिज्यमुपजीविन:

Waiśampāyana berkata: Karena takut harus memikul beban berat, para perampok itu hidup dengan tampak luar sebagai kepala rumah tangga. Bersembunyi di balik rupa pertapa, mereka menjadikan perdagangan sebagai mata pencaharian—dan memakai peran terhormat itu sebagai kedok untuk mencuri.

Verse 47

अर्थलोभान्नरव्याप्र तथा च ब्रह्म॒चारिण:

Waiśampāyana berkata: Karena loba akan harta, manusia menjadi gelisah dan sibuk mengejar urusan dunia; demikian pula, bahkan para brahmacārin yang bersumpah hidup suci dapat terseret ke dalam kesibukan yang tak tenang itu.

Verse 48

आश्रमेषु वृथाचारा: पानपा गुरुतल्पगा: । इह लौकिकमीहन्ते मांसशोणितवर्धनम्‌

Waiśampāyana berkata: “Bahkan di pertapaan akan ada orang-orang yang perilakunya hampa—peminum dan pelanggar ranjang sang guru. Di sini mereka mengejar semata tujuan duniawi, menginginkan pertambahan daging dan darah.”

Verse 49

नरश्रेष्ठल धनके लोभसे ब्रह्मचारी भी आश्रमोंमें दम्भपूर्ण आचारको अपनायेंगे और मद्यपान करके गुरुपत्नीगमन करेंगे। लोग अपने शरीरके मांस और रक्त बढ़ानेवाले इहलौकिक कर्मांमें ही लगे रहेंगे ।। बहुपाषण्डसंकीर्णा: परान्नगुणवादिन: । आश्रमा मनुजव्यात्र भविष्यन्ति युगक्षये,नरश्रेष्ठ) युगान्तकालमें सभी आश्रम अनेक प्रकारके पाखण्डोंसे व्याप्त और दूसरोंसे मिले हुए भोजनका ही गुणगान करनेवाले होंगे

Waiśampāyana berkata: “Wahai harimau di antara manusia, pada akhir zaman semua āśrama akan dipenuhi berbagai macam kepalsuan dan kesesatan. Orang-orang akan memuji dan mengejar makanan yang diperoleh dari orang lain; inti dharma āśrama akan mengering, sehingga tanda lahiriah menggantikan pengendalian batin, dan dharma merosot menjadi nafsu makan serta kemunafikan.”

Verse 50

यर्थर्तुवर्षी भगवान्‌ न तथा पाकशासन: । न चापि सर्वबीजानि सम्यगू रोहन्ति भारत,भगवान्‌ इन्द्र भी ठीक वर्षाऋतुके समय जलकी वर्षा नहीं करेंगे। भारत! भूमिमें बोये हुए सभी बीज ठीकसे नहीं जमेंगे

Sebagaimana Tuhan Yang Mulia menurunkan hujan pada musim yang semestinya, demikian pula Pākaśāsana (Indra) wajib menunaikan tugasnya menurut waktu. Wahai Bhārata! Jika ia tidak mencurahkan air pada saat yang tepat, maka benih-benih yang ditabur di bumi pun tidak akan bertunas dengan baik.

Verse 51

हिंसाभिरामश्न जनस्तथा सम्पद्यते5शुचि: । अधर्मफलमत्यर्थ तदा भवति चानघ,कलियुगमें सब लोग हिंसामें ही सुख माननेवाले तथा अपवित्र रहेंगे। निष्पाप! उस समय अधर्मका फल बहुत अधिक मात्रामें मिलेगा

Pada zaman Kali, manusia akan bersenang dalam kekerasan dan karenanya menjadi najis dalam laku. Wahai yang tanpa noda! Pada masa itu buah adharma akan membesar luar biasa—melimpah dan menindih segalanya.

Verse 52

तदा च पृथिवीपाल यो भवेद्‌ धर्मसंयुतः । अल्पायु: स हि मन्तव्यो न हि धर्मो5स्ति कश्नन,भूपाल! उस समय जो भी धर्ममें तत्पर रहेगा, उसकी आयु बहुत थोड़ी देखनेमें आयेगी; क्योंकि उस समय कोई भी धर्म टिक नहीं सकेगा

Dan pada masa itu, wahai raja, penguasa yang tetap berpaut pada dharma akan dianggap berumur pendek; sebab pada zaman itu tak ada dharma yang sanggup bertahan.

Verse 53

भूयिष्ठं कूटमानैश्व पण्यं विक्रीणते जना: । वणिजकश्न नरव्यात्र बहुमाया भवन्त्युत,लोग बाजारमें झूठे माप-तौल बनाकर बहुत-सा माल बेचते रहेंगे। नरश्रेष्ठीी उस समयके बनिये भी बहुत माया जाननेवाले (धूर्त) होंगे

Pada masa itu, kebanyakan orang akan menjual barang dagangan dengan timbangan dan takaran palsu. Wahai harimau di antara manusia! Para pedagang pun akan menjadi penuh tipu daya—mahir dalam banyak siasat penipuan.

Verse 54

धर्मिष्ठा: परिहीयन्ते पापीयान्‌ वर्धते जन: । धर्मस्य बलहानि: स्यादधर्मश्ष बली तथा,धर्मात्मा पुरुष हानि उठाते दीखेंगे और बड़े-बड़े पापी लौकिक दृष्टिसे उन्नतिशील होंगे। धर्मका बल घटेगा और अधर्म बलवान्‌ होगा

Orang-orang yang teguh dalam dharma akan tersisih dan merosot, sedangkan mereka yang lebih berdosa akan maju dan bertambah. Kekuatan dharma akan menyusut, dan adharma justru menjadi perkasa.

Verse 55

अल्पायुषो दरिद्राश्न॒ धर्मिष्ठा मानवास्तथा । दीर्घायुष: समृद्धाश्व विधर्माणो युगक्षये,युगान्तकालमें धर्मिष्ठ मानव अल्पायु तथा दरिद्र देखे जायँगे और अधर्मी मनुष्य दीर्घायु तथा समृद्धिशाली देखे जायँगे

Vaiśampāyana berkata: Pada akhir zaman (yuga), bahkan orang-orang yang teguh dalam dharma akan tampak berumur pendek dan miskin; sedangkan mereka yang menyimpang dari dharma akan tampak panjang umur dan makmur.

Verse 56

नगराणां विहारेषु विधर्माणो युगक्षये । अधर्मिष्ठिरुपायैश्व प्रजा व्यवहरन्त्युत,युगान्तके समय नगरोंके उद्यानोंमें पापी पुरुष अड्डा जमायेंगे और पापपूर्ण उपायोंद्वारा प्रजाके साथ दुर्व्यवहार करेंगे

Vaiśampāyana berkata: Pada akhir zaman, di taman-taman kesenangan kota, orang-orang yang menyimpang dari dharma akan berkumpul dan menjadikannya tempat berdiam; dan dengan siasat yang sepenuhnya adharma mereka akan menindas rakyat.

Verse 57

संचयेन तथाल्पेन भवन्त्याब्यमदान्विता: । धनं विश्वासतो न्यस्तं मिथो भूयिष्ठशो नरा:,राजन! थोड़ेसे धनका संग्रह हो जानेपर लोग धनाढ्यताके मदसे उन्मत्त हो उठेंगे। यदि किसीने विश्वास करके अपने धनको धरोहरके रूपमें रख दिया तो अधिकांश पापाचारी और निर्लज मनुष्य उस धरोहरको हड़प लेनेकी चेष्टा करेंगे और उससे साफ कह देंगे कि हमारे यहाँ तुम्हारा कुछ भी नहीं है

Vaiśampāyana berkata: Wahai Raja, bahkan sedikit timbunan harta membuat orang mabuk oleh kesombongan kemakmuran. Dan bila uang dititipkan dengan kepercayaan sebagai simpanan (deposit), banyak orang bersekongkol untuk merampasnya, lalu dengan muka tebal berkata, “Di sini engkau tidak punya apa-apa.”

Verse 58

हर्तु व्यवसिता राजन्‌ पापाचारसमन्विता: । नैतदस्तीति मनुजा वर्तन्ते निरपत्रपा:,राजन! थोड़ेसे धनका संग्रह हो जानेपर लोग धनाढ्यताके मदसे उन्मत्त हो उठेंगे। यदि किसीने विश्वास करके अपने धनको धरोहरके रूपमें रख दिया तो अधिकांश पापाचारी और निर्लज मनुष्य उस धरोहरको हड़प लेनेकी चेष्टा करेंगे और उससे साफ कह देंगे कि हमारे यहाँ तुम्हारा कुछ भी नहीं है

Vaiśampāyana berkata: Wahai Raja, orang-orang tak tahu malu—yang telah bertekad merampasnya dan tenggelam dalam laku dosa—bahkan akan berkata, “Itu sama sekali tidak ada di sini.”

Verse 59

पुरुषादानि सत्त्वानि पक्षिणो5थ मृगास्तथा । नगराणां विहारेषु चैत्येष्वपि च शेरते,मनुष्यका मांस खानेवाले हिंसक जीव तथा पशु-पक्षी नागरिकोंके बगीचों और देवालयोंमें भी शयन करेंगे

Vaiśampāyana berkata: Makhluk pemangsa manusia—burung maupun binatang buas—akan berbaring bahkan di taman-taman kota dan di tempat-tempat suci (caitya).

Verse 60

सप्तवर्षष्टवर्षाश्च स्त्रियों गर्भधरा नूप । दशद्वादशवर्षाणां पुंसां पुत्र: प्रजायते,राजन! युगान्तकालमें सात-आठ वर्षकी स्त्रियाँ गर्भ धारण करेंगी और दस-बारह वर्षकी अवस्थावाले पुरुषोंके भी पुत्र होंगे

Vaiśampāyana berkata: “Wahai raja, pada masa kemerosotan di akhir yuga itu, bahkan gadis berusia tujuh atau delapan tahun akan mengandung; dan bahkan laki-laki berusia sepuluh atau dua belas tahun akan memperanakkan putra.”

Verse 61

भवन्ति षोडशे वर्षे नरा: पलितिनस्तथा । आयु:क्षयो मनुष्याणां क्षिप्रमेव प्रपद्यते,सोलहवें वर्षमें मनुष्योंक बाल पक जायँगे और उनकी आयु शीघ्र ही समाप्त हो जायगी

Vaiśampāyana berkata: “Pada usia enam belas tahun, manusia akan sudah beruban; dan umur manusia akan cepat menyusut dan segera berakhir.”

Verse 62

क्षीणायुषो महाराज तरुणा वृद्धशीलिन: । तरुणानां च यच्छीलं तद्‌ वृद्धेषु प्रजायते,महाराज! उस समयके तरुणोंकी आयु क्षीण होगी और उनका शील-स्वभाव बूढ़ोंका- सा हो जायगा और तरुणोंका जो शील-स्वभाव होना चाहिये, वह बूढ़ोंमें प्रकट होगा

Vaiśampāyana berkata: “Wahai maharaja, pada masa itu kaum muda akan berumur pendek dan berperilaku seperti orang tua; sedangkan perilaku yang semestinya ada pada kaum muda justru akan tampak pada kaum tua.”

Verse 63

विपरीतास्तदा नार्यो वज्चयित्वारहत: पतीन्‌ | व्युच्चरन्त्यपि दुःशीला दासै: पशुभिरेव च,उस समयकी विपरीत स्वभाववाली स्त्रियाँ अपने योग्य पतियोंको भी धोखा देकर बुरे शील-स्वभावकी हो जायँगी और सेवकों तथा पशुओंके साथ भी व्यभिचार करेंगी

Vaiśampāyana berkata: “Pada masa itu, para perempuan yang tabiatnya terbalik akan menipu suami-suami yang patut bagi mereka; mereka menjadi berperilaku buruk, bahkan berzina dengan para hamba dan juga dengan hewan.”

Verse 64

वीरपत्न्यस्तथा नार्य: संश्रयन्ति नरान्‌ नृप । भर्तारमपि जीवन्तमन्यान्‌ व्यभिचरन्त्युत,राजन! वीर पुरुषोंकी पत्नियाँ भी परपुरुषोंका आश्रय लेंगी और पतिके जीते हुए भी दूसरोंसे व्यभिचार करेंगी

Vaiśampāyana berkata: “Wahai raja, bahkan istri-istri para kesatria pun akan mencari perlindungan pada laki-laki lain; dan meski suami mereka masih hidup, mereka akan berzina dengan orang lain.”

Verse 65

तस्मिन्‌ युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते चायुष: क्षये । अनावृष्टिर्महाराज जायते बहुवार्षिकी,महाराज! इस प्रकार आयुको क्षीण करनेवाले सहस्र युगोंके अन्तिम भागकी समाप्ति होनेपर बहुत वर्षोतक वृष्टि बंद हो जाती है

Wahai Raja Agung! Ketika penutup seribu yuga tiba dan usia kehidupan merosot menuju akhirnya, terjadilah kemarau panjang—hujan berhenti selama bertahun-tahun.

Verse 66

ततस्तान्यल्पसाराणि सत्त्वानि क्षुधितानि वै । प्रलयं यान्ति भूयिष्ठं पृथिव्यां पृथिवीपते,पृथ्वीपते! इससे भूतलके थोड़ी शक्तिवाले अधिकांश प्राणी भूखसे व्याकुल होकर मर जाते हैं

Kemudian, wahai penguasa bumi, makhluk-makhluk yang lemah itu—didera kelaparan—kebanyakan menemui kebinasaan di muka bumi.

Verse 67

ततो दिनकरेदीप्तै: सप्तभिर्मनुजाधिप । पीयते सलिल ॑ सर्व समुद्रेषु सरित्सु च,नरेश्वर! तदनन्तर प्रचण्ड तेजवाले सात सूर्य उदित होकर सरिताओं और समुद्रोंका सारा जल सोख लेते हैं

Sesudah itu, wahai penguasa manusia, oleh sinar menyala tujuh matahari, seluruh air—di samudra maupun di sungai-sungai—terhisap habis.

Verse 68

यच्च काष्ठ॑ तृणं चापि शुष्कं चार्द्र च भारत । सर्व तद्‌ भस्मसाद्‌ भूत॑ दृश्यते भरतर्षभ,भरतकुलभूषण! उस समय जो भी तृण-काष्ठ अथवा सूखे-गीले पदार्थ होते हैं, वे सभी भस्मीभूत दिखायी देने लगते हैं

Wahai Bhārata, apa pun yang ada—kayu dan rumput, kering ataupun basah—semuanya tampak menjadi abu, wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata.

Verse 69

तत: संवर्तको वह्निवायुना सह भारत | लोकमाविशते पूर्वमादित्यैरुपशोषितम्‌,भारत! इसके बाद '“संवर्तक” नामकी प्रलयकालीन अग्नि वायुके साथ उन सम्पूर्ण लोकोंमें फैल जाती है, जहाँका जल पहले सात सूर्योंद्वारा सोख लिया गया है

Kemudian, wahai Bhārata, api Saṁvartaka pada masa pralaya—bersama angin—merasuk dan menyebar ke seluruh dunia, setelah airnya lebih dahulu dikeringkan oleh matahari-matahari itu.

Verse 70

ततः स पृथिवीं भिनत्त्वा प्रविश्य च रसातलम्‌ । देवदानवयक्षाणां भयं जनयते महत्‌,तत्पश्चात्‌ पृथ्वीका भेदन कर वह अग्नि रसातलतक पहुँच जाती है तथा देवता, दानव और यक्षोंके लिये महान्‌ भय उपस्थित कर देती है

Kemudian ia membelah bumi dan memasuki Rasātala, menimbulkan ketakutan besar di antara para dewa, Dānava, dan Yakṣa.

Verse 71

निर्दहन्‌ नागलोकं च यच्च किज्चित्‌ क्षिताविह । अधस्तात्‌ पृथिवीपाल सर्व नाशयते क्षणात्‌,राजन्‌! वह नागलोकको जलाती हुई इस पृथ्वीके नीचे जो कुछ भी है, उस सबको क्षणभरमें नष्ट कर देती है

Wahai raja! Sambil membakar alam para Nāga, api itu memusnahkan seketika segala yang ada di bumi ini dan juga apa pun yang berada di bawahnya.

Verse 72

ततो योजनविंशानां सहस्राणि शतानि च । निर्दहत्यशिवो वायु: स च संवर्तकोडनल:,इसके बाद वह अमंगलकारी प्रचण्ड वायु और वह संवर्तक अग्नि बाईस हजार योजन तकके लोगोंको भस्म कर डालती है

Sesudah itu bangkitlah angin dahsyat yang membawa pertanda celaka, dan bersamanya menyala api Saṁvartaka; keduanya bersama-sama membakar dan menghanguskan hingga dua puluh dua ribu yojana luasnya.

Verse 73

सदेवासुरगन्धर्व सयक्षोरगराक्षसम्‌ । ततो दहति दीप्त: स सर्वमेव जगद्‌ विभु:,इस प्रकार सर्वत्र फैली हुई वह प्रज्वलित अग्नि देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण विश्वको भस्म कर डालती है

Lalu api yang menyala-nyala dan merata ke segala penjuru itu membakar seluruh jagat—beserta para dewa dan asura, gandharva, yakṣa, nāga, dan rākṣasa.

Verse 74

ततो गजकुलप्रख्यास्तडिन्मालाविभूषिता: । उत्तिष्ठन्ति महामेघा नभस्यद्भुतदर्शना:,इसके बाद आकाशमें महान्‌ मेघोंकी घोर घटा घिर आती है, जो अद्भुत दिखायी देता है। उनमेंसे प्रत्येक मेघ-समूह हाथियोंके झुंडकी भाँति विशालकाय और श्यामवर्ण तथा बिजलीकी मालाओंसे विभूषित होता है

Kemudian tampak pemandangan menakjubkan di langit: awan-awan raksasa bangkit, sebesar kawanan gajah, gelap pekat, dan berhias untaian kilat.

Verse 75

केचिन्नीलोत्पलश्यामा: केचित्‌ कुमुदसंनि भा: । केचित्‌ किज्जल्कसंकाशा: केचित्‌ पीता: पयोधरा:,कुछ बादल नील कमलक समान श्याम और कुछ कुमुद-कुसुमके समान सफेद होते हैं। कुछ जलधरोंकी कान्ति केसरोंके समान दिखायी देती है। कुछ मेघ हल्दीके सदृश पीले और कुछ कारण्डव पक्षीके समान दृष्टिगोचर होते हैं। कोई-कोई कमलदलके समान और कुछ हिंगुल-जैसे जान पड़ते हैं

Vaiśaṃpāyana berkata: “Sebagian awan tampak gelap laksana teratai biru; sebagian putih seperti bunga kumuda. Ada yang menyerupai warna serbuk sari, dan ada pula—para pembawa air itu—yang tampak kuning seperti kunyit.”

Verse 76

केचिद्धारिद्रसंकाशा: कारण्डवनिभास्तथा । केचित्‌ कमलपत्राभा: केचिद्धिड्डुलसप्रभा:,कुछ बादल नील कमलक समान श्याम और कुछ कुमुद-कुसुमके समान सफेद होते हैं। कुछ जलधरोंकी कान्ति केसरोंके समान दिखायी देती है। कुछ मेघ हल्दीके सदृश पीले और कुछ कारण्डव पक्षीके समान दृष्टिगोचर होते हैं। कोई-कोई कमलदलके समान और कुछ हिंगुल-जैसे जान पड़ते हैं

Vaiśaṃpāyana berkata: “Sebagian tampak kuning seperti kunyit; sebagian menyerupai burung kāraṇḍava. Sebagian berkilau laksana daun teratai, dan sebagian memancarkan merah menyala seperti hiṅgula (sindur).”

Verse 77

केचित्‌ पुरवराकारा: केचिद्‌ गजकुलोपमा: । केचिदञ्जनसंकाशा: केचिन्मकरसंनिभा:,कुछ श्रेष्ठ नगरोंके समान, कुछ हाथियोंके झुंड-जैसे, कुछ काजलके रंगवाले और कुछ मगरोंकी-सी आकृतिवाले होते हैं

Vaiśaṃpāyana berkata: “Sebagian tampak berbentuk laksana kota-kota mulia; sebagian seperti kawanan gajah. Sebagian hitam pekat seperti anjana (celak), dan sebagian menyerupai makara (buaya) dalam rupa.”

Verse 78

विद्युन्मालापिनद्धाड: समुत्तिष्ठन्ति वै घना: । घोररूपा महाराज घोरस्वननिनादिता: । ततो जलधरा: सर्वे व्याप्रुवन्ति नभस्तलम्‌,वे सभी बादल विद्युन्मालाओंसे अलंकृत होकर घिर आते हैं। महाराज! भयंकर गर्जना करनेके कारण उनका स्वरूप बड़ा भयानक जान पढ़ता है। धीरे-धीरे वे सभी जलधर समूचे आकाशमण्डलको ढक लेते हैं

Vaiśaṃpāyana berkata: “Wahai raja agung, awan-awan bangkit, berkalungkan untaian kilat. Rupa mereka mengerikan, kian menakutkan oleh gelegar guruh. Lalu semua awan pembawa hujan itu menghampar dan menutupi seluruh bentang langit.”

Verse 79

तैरियं पृथिवी सर्वा सपर्वतवनाकरा । आपूर्यते महाराज सलिलौघपरिप्लुता,महाराज! उनके वर्षा करनेपर पर्वत, वन और खानोंसहित यह सारी पृथ्वी अगाध जलराशिमें ड्ूबकर सब ओरसे भर जाती है

Vaiśaṃpāyana berkata: “Wahai raja agung, ketika mereka menurunkan hujan, seluruh bumi ini—beserta gunung, rimba, dan tambangnya—tergenang oleh gelombang-gelombang air yang meluap dan terisi dari segala penjuru.”

Verse 80

ततस्ते जलदा घोरा राविण: पुरुषर्षभ । सर्वतः प्लावयन्त्याशु चोदिता: परमेछ्िना,पुरुषरत्न! तदनन्तर विधातासे प्रेरित हो गर्जन-तर्जन करनेवाले वे भयंकर मेघ शीघ्र सब ओर वर्षा करके सबको जलसे आप्लावित कर देते हैं

Kemudian, wahai insan termulia, awan-awan hujan yang mengerikan dan menggelegar—digerakkan oleh Sang Pencipta—segera menumpahkan hujan ke segala penjuru dan menenggelamkan segalanya.

Verse 81

वर्षमाणा महत्‌ तोयं पूरयन्तो वसुंधराम्‌ । सुघोरमशिवं रौद्रं नाशयन्ति च पावकम्‌,महान्‌ जल-समूहकी वर्षा करके वसुन्धराको जलमें डुबोनेवाले वे समस्त मेघ उस अत्यन्त घोर, अमंगलकारी और भयानक अग्निको बुझा देते हैं

Dengan menurunkan curahan air yang amat besar hingga membanjiri bumi, awan-awan itu memadamkan api yang teramat dahsyat—ganas dan membawa pertanda buruk.

Verse 82

ततो द्वादशवर्षाणि पयोदास्त उपप्लवे । धाराभि: पूरयन्तो वै चोद्यमाना महात्मना,तदनन्तर प्रलयकालके वे पयोधर महात्मा ब्रह्माजीकी प्रेरणा पाकर पृथ्वीको परिपूर्ण करनेके लिये बारह वर्षोतक धारावाहिक वृष्टि करते हैं

Lalu, pada masa pralaya, awan-awan pembawa hujan itu—didorong oleh Sang Mahātmā—mencurahkan aliran yang tak putus-putus selama dua belas tahun, hingga bumi terisi di segala penjuru.

Verse 83

ततः समुद्र: स्वां वेलामतिक्रामति भारत । पर्वताश्च विदीर्यन्ते मही चाप्सु निमज्जति,भारत! तदनन्तर समुद्र अपनी सीमाको लाँघ जाता है, पर्वत फट जाते और पृथ्वी पानीमें डूब जाती है

Kemudian, wahai Bhārata, samudra melampaui batas pantainya sendiri; gunung-gunung terbelah, dan bumi pun tenggelam ke dalam air.

Verse 84

सर्वतः सहसा भ्रान्तास्ते पयोदा नभस्तलम्‌ । संवेष्टयित्वा नश्यन्ति वायुवेगपराहता:,तत्पश्चात्‌ समस्त आकाशको घेरकर सब ओर फैले हुए वे मेघ वायुके प्रचण्ड वेगसे छिन्न-भिन्न होकर सहसा अदृश्य हो जाते हैं

Sesudah itu, awan-awan itu mendadak kacau dan menyelubungi seluruh bentangan langit; namun dihantam deru angin yang ganas, mereka tercerai-berai dan seketika lenyap dari pandangan.

Verse 85

ततस्तं मारुतं घोरं स्वयम्भूमनुजाधिप । आदि: पद्मालयो देव: पीत्वा स्वपिति भारत,नरेश्वरर इसके बाद कमलमें निवास करनेवाले आदिदेव स्वयं ब्रह्माजी उस भयंकर वायुको पीकर सो जाते हैं

Kemudian, wahai penguasa manusia, angin yang mengerikan itu ditelan oleh Yang Lahir-Sendiri—dewa purba yang bersemayam di teratai. Setelah meminumnya, Brahmā pun terlelap, wahai Bhārata.

Verse 86

तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजड्रमे । नष्टे देवासुरगणे यक्षराक्षसवर्जिते,इस प्रकार चराचर प्राणियों, देवताओं तथा असुर आदिके नष्ट हो जानेपर यक्ष, राक्षस, मनुष्य, हिंसक जीव, वृक्ष तथा अन्तरिक्षसे शून्य उस घोर एकार्णवमय जगतमें मैं अकेला ही इधर-उधर मारा-मारा फिरता हूँ

Di samudra tunggal yang mengerikan itu, ketika segala yang bergerak dan tak bergerak telah binasa, ketika bala para dewa dan asura lenyap, dan ketika yakṣa serta rākṣasa pun tiada—maka hamparan yang menakutkan itu tinggal kosong belaka.

Verse 87

निर्मनुष्ये महीपाल निःश्वापदमहीरुहे । अनन्तरिक्षे लोके5स्मिन्‌ भ्रमाम्पेकोडहमाहत:,इस प्रकार चराचर प्राणियों, देवताओं तथा असुर आदिके नष्ट हो जानेपर यक्ष, राक्षस, मनुष्य, हिंसक जीव, वृक्ष तथा अन्तरिक्षसे शून्य उस घोर एकार्णवमय जगतमें मैं अकेला ही इधर-उधर मारा-मारा फिरता हूँ

Wahai raja, di dunia ini tiada manusia, tiada makhluk dan pepohonan, bahkan penghuni alam antara pun lenyap; maka aku, seorang diri dan terpukul, mengembara tanpa arah ke sana kemari.

Verse 88

एकार्णवे जले घोरे विचरन्‌ पार्थिवोत्तम | अपश्यन्‌ सर्वभूतानि वैक्लव्यमगमं तत:,नृपश्रेष्ठी एकार्णवके उस भयंकर जलमें विचरते हुए जब मैंने किसी भी प्राणीको नहीं देखा, तब मुझे बड़ी व्याकुलता हुई

Wahai yang terbaik di antara raja-raja, ketika aku mengembara di air samudra tunggal yang mengerikan itu dan tidak melihat satu pun makhluk hidup, hatiku pun diliputi kegelisahan yang dalam.

Verse 89

ततः सुदीर्घ गत्वाहं प्लवमानो नराधिप । श्रान्त: क्वचिन्न शरणं लभाम्यहमतन्द्रित:,नरेश्वरर उस समय आलस्यशून्य होकर सुदीर्घकाल-तक तैरता हुआ मैं दूर जाकर बहुत थक गया। परंतु कहीं भी मुझे कोई आश्रय नहीं मिला

Lalu, wahai raja, tanpa mengendur aku berenang menempuh jarak yang sangat jauh dan waktu yang panjang; namun akhirnya aku kehabisan tenaga, dan di mana pun tak kutemukan perlindungan.

Verse 90

ततः कदाचित्‌ पश्यामि तस्मिन्‌ सलिलसंचये । न्यग्रोधं सुमहान्तं वै विशालं पृथिवीपते,राजन्‌! तदनन्तर एक दिन एकार्णवकी उस अगाध जलराशिमें मैंने एक बहुत विशाल बरगदका वृक्ष देखा

Kemudian pada suatu ketika, wahai Raja, penguasa bumi, ketika aku memandang ke dalam himpunan air yang maha luas itu, kulihat di sana sebatang pohon beringin yang sangat besar dan lebar.

Verse 91

शाखायां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णायां नराधिप । पर्यड्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्तृते,नराधिप! उस वृक्षकी चौड़ी शाखापर एक पलंग था, जिसके ऊपर दिव्य बिछौने बिछे हुए थे। महाराज! उस पलंगपर एक सुन्दर बालक बैठा दिखायी दिया, जिसका मुख कमलके समान कमनीय शोभा धारण करनेवाला तथा चन्द्रमाके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाला था। उसके नेत्र प्रफुल्ल पद्मदलके समान विशाल थे

Wahai raja, pelindung bumi, pada cabang pohon itu yang lebar dan menjulur, ada sebuah dipan, tertutup hamparan peraduan surgawi.

Verse 92

उपविष्टं महाराज पद्मेन्दुसद्शाननम्‌ | फुल्लपद्मविशालाक्षं बालं पश्यामि भारत,नराधिप! उस वृक्षकी चौड़ी शाखापर एक पलंग था, जिसके ऊपर दिव्य बिछौने बिछे हुए थे। महाराज! उस पलंगपर एक सुन्दर बालक बैठा दिखायी दिया, जिसका मुख कमलके समान कमनीय शोभा धारण करनेवाला तथा चन्द्रमाके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाला था। उसके नेत्र प्रफुल्ल पद्मदलके समान विशाल थे

Wahai Maharaja, wahai Bhārata, kulihat seorang bocah duduk di sana—wajahnya elok laksana teratai dan rembulan, dan matanya lebar bagaikan kelopak teratai yang sedang mekar.

Verse 93

ततो मे पृथिवीपाल विस्मय: सुमहानभूत्‌ | कथं त्वयं शिशु: शेते लोके नाशमुपागते,पृथ्वीनाथ! उसे देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। मैं सोचने लगा--'सारे संसारके नष्ट हो जानेपर भी यह बालक यहाँ कैसे सो रहा है?”

Maka, wahai pelindung bumi, timbullah keheranan yang amat besar dalam diriku. Aku berpikir: “Bagaimana mungkin anak ini terlelap di sini, ketika dunia telah sampai pada kebinasaan?”

Verse 94

तपसा चिन्तयंश्वापि तं शिशुं नोपलक्षये । भूतं भव्यं भविष्यं च जानन्नपि नराधिप,नरेश्वर! मैं भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंका ज्ञाता होनेपर भी तपस्यासे भलीभाँति चिन्तन करता (ध्यान लगाता) रहा, तो भी उस शिशुके विषयमें कुछ न जान सका

Wahai raja, sekalipun aku menekuni tapa dan merenung dengan pemusatan batin, aku tetap tak mampu mengetahui apa pun tentang anak itu; padahal aku mengetahui masa lampau, masa kini, dan masa depan.

Verse 95

अतसीपुष्पवर्णा भ: श्रीवत्सकृतभूषण: । साक्षाल्लक्ष्म्या इवावास: स तदा प्रतिभाति मे,उसकी अंगकान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम थी। उसका वक्ष:स्थल श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित था। वह उस समय मुझे साक्षात्‌ लक्ष्मीका निवासस्थान-सा प्रतीत होता था

Waiśampāyana berkata: “Pancaran tubuhnya tampak biru-gelap, laksana warna bunga rami (flax). Dadanya berhias tanda Śrīvatsa. Pada saat itu, ia tampak bagiku seperti tempat bersemayamnya Lakṣmī sendiri.”

Verse 96

ततो मामब्रवीद्‌ बाल: स पद्मनिभलोचन: । श्रीवत्सधारी द्युतिमान्‌ वाक्‍्यं श्रुतिसुखावहम्‌

Kemudian anak laki-laki yang bercahaya itu—bermata laksana teratai dan memikul tanda Śrīvatsa—berbicara kepadaku dengan kata-kata yang sedap didengar.

Verse 97

जानामि त्वां परिश्रान्तं ततो विश्रामकाड्क्षिणम्‌ । मार्कण्डेय इहास्स्व त्वं यावदिच्छसि भार्गव

“Aku tahu engkau letih, maka engkau mendambakan istirahat. Wahai Mārkaṇḍeya, wahai Bhārgava—tinggallah di sini selama yang kau kehendaki.”

Verse 98

मुझे विस्मयमें पड़ा देख कमलके समान नेत्रवाले उस श्रीवत्सधारी कान्तिमान्‌ बालकने मुझसे इस प्रकार श्रवणसुखद वचन कहा--'भृगुवंशी मार्कण्डेय! मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम बहुत थक गये हो और विश्राम चाहते हो। तुम्हारी जबतक इच्छा हो यहाँ बैठो ।। अभ्यन्तरं शरीरे मे प्रविश्य मुनिसत्तम । आस्स्व भो विहितो वास: प्रसादस्ते कृतो मया,“'मुनिश्रेष्ठ! मैंने तुमपर कृपा की है। तुम मेरे शरीरके भीतर प्रवेश करके विश्राम करो। वहाँ तुम्हारे रहनेके लिये व्यवस्था की गयी है”

Waiśampāyana berkata: Melihatku tertegun dalam keheranan, anak yang bercahaya itu—bermata laksana teratai dan memikul tanda Śrīvatsa—berkata dengan tutur yang sedap didengar: “Wahai Mārkaṇḍeya dari garis Bhṛgu, aku mengenalmu. Engkau sangat letih dan menginginkan istirahat. Duduklah di sini selama yang kau kehendaki.” Lalu ia menambahkan: “Wahai yang terbaik di antara para resi, masuklah ke dalam tubuhku dan beristirahatlah. Tempat tinggal telah disiapkan bagimu; aku telah menganugerahkan rahmat kepadamu.”

Verse 99

ततो बालेन तेनैवमुक्तस्थासीत्‌ तदा मम । निर्वेदो जीविते दीर्घे मनुष्यत्वे च भारत,उस बालकके ऐसा कहनेपर उस समय मुझे अपने दीर्घ-जीवन और मानव-शरीरपर बड़ा खेद और वैराग्य हुआ

Waiśampāyana berkata: “Wahai Bhārata, ketika anak itu berkata demikian kepadaku, seketika timbul dalam diriku suatu kejenuhan yang dalam—rasa lepas dari keterikatan terhadap umur panjang, bahkan terhadap keadaan sebagai manusia.”

Verse 100

ततो बालेन तेनास्यं सहसा विवृतं कृतम्‌ । तस्याहमवशो वकत्रे दैवयोगात्‌ प्रवेशित:,तदनन्तर उस बालकने सहसा अपना मुख खोला और मैं दैवयोगसे परवशकी भाँति उसमें प्रवेश कर गया

Lalu anak itu tiba-tiba membuka mulutnya lebar-lebar. Dan oleh kehendak takdir, aku—tak berdaya, seakan dipaksa—terseret masuk ke dalam mulutnya.

Verse 101

ततः प्रविष्टस्तत्कुक्षिं सहसा मनुजाधिप । सराष्ट्रनगराकीर्णा कृत्स्नां पश्यामि मेदिनीम्‌,राजन! उसमें प्रवेश करते ही मैं सहसा उस बालकके उदरमें जा पहुँचा। वहाँ मुझे समस्त राष्ट्रों और नगरोंसे भरी हुई यह सारी पृथ्वी दिखायी दी

Wahai penguasa manusia, begitu aku memasukinya, seketika aku berada di dalam perut anak itu. Di sana kulihat seluruh bumi, lengkap adanya, dipenuhi kerajaan-kerajaan dan kota-kota.

Verse 102

गड्डां शतद्रं सीतां च यमुनामथ कौशिकीम्‌ । चर्मण्वतीं वेत्रवर्ती चन्द्रभागां सरस्वतीम्‌,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा

Wahai insan utama, kemudian aku mengembara di dalam perut anak yang berhati luhur itu. Dalam pengembaraan itu kulihat sungai-sungai suci: Gaṅgā, Śatadrū, Sītā, Yamunā, Kauśikī, Carmaṇvatī, Vetravatī, Candrabhāgā, dan Sarasvatī.

Verse 103

सिन्धुं चैव विपाशां च नदीं गोदावरीमपि । वस्वोकसारां नलिनीं नर्मदां चैव भारत,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा

Wahai Bhārata, di sana kulihat pula sungai Sindhu, juga Vipāśā, dan sungai Godāvarī; demikian pula Vasvokasārā, Nalinī, dan Narmadā.

Verse 104

नदीं ताम्रां च वेणां च पुण्यतोयां शुभावहाम्‌ । सुवेणां कृष्णवेणां च इरामां च महानदीम्‌,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा

Di sana kulihat sungai Tāmrā, juga Veṇā, serta Puṇyato yā yang suci dan membawa keberkahan; juga Suveṇā, Kṛṣṇaveṇā, dan Irāmā, sungai besar itu.

Verse 105

वितस्तां च महाराज कावेरीं च महानदीम्‌ । शोणं च पुरुषव्याप्र विशल्यां किम्पुनामपि,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja agung, wahai harimau di antara manusia, aku pun menyaksikan sungai Vitastā, Kāverī yang perkasa di antara sungai-sungai, juga Śoṇa, Viśalyā, bahkan Kimpunā.”

Verse 106

एताश्षान्याश्व नद्यो5हं पृथिव्यां या नरोत्तम । परिक्रामन्‌ प्रपश्यामि तस्य कुक्षौ महात्मन:,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा

Wahai insan terbaik, ketika aku berkeliling, di dalam perut makhluk agung itu aku menyaksikan semua sungai ini—dan juga sungai-sungai lain yang mengalir di bumi.

Verse 107

ततः समुद्र पश्यामि यादोगणनिषेवितम्‌ । रत्नाकरममित्रघ्न पयसो निधिमुत्तमम्‌,शत्रुसूदन! इसके बाद जलजन्तुओंसे भरे हुए अगाध जलके भण्डार परम उत्तम रत्नाकर समुद्रको भी देखा

Kemudian aku melihat samudra, yang didatangi kawanan makhluk air—lumbung air yang tak terduga dalamnya, amat utama, dan tambang permata. Wahai penumpas musuh, demikianlah kulihat lautan yang luhur itu.

Verse 108

तत्र पश्यामि गगन चन्द्रसूर्यविराजितम्‌ । जाज्वल्यमानं तेजोभि: पावकार्कसमप्रभम्‌,वहाँ मुझे चन्द्रमा और सूर्यसे सुशोभित आकाशमण्डल दिखायी दिया, जो अनन्त तेजसे प्रज्वलित तथा अग्नि एवं सूर्यके समान देदीप्यमान था

Di sana aku menyaksikan bentangan langit, dihiasi bulan dan matahari—menyala oleh sinar tanpa batas, berkilau laksana api dan sang surya.

Verse 109

पश्यामि च महीं राजन्‌ काननैरुपशोभिताम्‌ । (सपर्वतवनद्वीपां निमग्नाशतसड्कुलाम्‌ ।) यजन्ते हि तदा राजन्‌ ब्राह्मणा बहुभिर्मखै:,राजन! वहाँकी भूमि विविध काननोंसे सुशोभित, पर्वत, वन और द्वीपोंसे उपलक्षित तथा सैकड़ों सरिताओंसे संयुक्त दिखायी देती थी। ब्राह्मणलोग नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान्‌ यज्ञपुरुषकी आराधना करते थे

Wahai Raja, aku pun menyaksikan negeri itu, elok oleh banyak rimba, bertanda gunung, hutan, dan pulau, serta dipenuhi ratusan sungai dan aliran air. Pada masa itu, wahai Raja, para brāhmaṇa mempersembahkan banyak yajña, memuja Tuhan sebagai Yajñapuruṣa—Pribadi yang menjadi hakikat kurban suci.

Verse 110

क्षत्रियाश्ष प्रवर्तन्ते सर्ववर्णानुरंजनै: । वैश्या: कृषिं यथान्यायं कारयन्ति नराधिप,नरेश्वर! क्षत्रिय राजा सब वर्णोकी प्रजाका अनुरंजन करते--सबको सुखी और प्रसन्न रखते थे। वैश्य न्यायपूर्वक खेतीका काम और व्यापार करते थे

Waiśampāyana berkata: “Para kṣatriya menunaikan dharmanya dengan meraih keridaan semua golongan, membuat semua orang tenteram dan berkenan. Dan para vaiśya, wahai raja, menyelenggarakan pertanian dan perdagangan menurut keadilan serta tata aturan yang benar.”

Verse 111

शुश्रूषायां च निरता द्विजानां वृषलास्तदा । ततः परिपतन्‌ राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मन:,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्‌, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे

Waiśampāyana berkata: “Pada masa itu para śūdra tekun dalam pelayanan dan pengabdian kepada kaum dwija. Lalu, wahai raja, ketika aku mengembara di dalam perut sang mahatma itu, kulihat banyak gunung—Himavān, Hemakūṭa, Niṣadha, Śvetagiri yang berkilau perak, Gandhamādana, Mandarācala, gunung besar Nīla, Meru yang keemasan, Mahendra, Vindhya yang luhur, Malaya, dan Pāriyātra—beserta banyak lainnya, semuanya berhias aneka permata. Berkelana di sana, aku pun melihat binatang-binatang seperti singa, harimau, dan babi hutan.”

Verse 112

हिमवन्तं च पश्यामि हेमकूटं च पर्वतम्‌ । निषध॑ चापि पश्यामि श्वेतं च रजतान्वितम्‌,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्‌, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे

Aku melihat Himavān dan juga gunung Hemakūṭa; aku pun melihat Niṣadha, serta Śveta yang berkilau dengan perak.

Verse 113

पश्यामि च महीपाल पर्वतं गन्धमादनम्‌ । मन्दरं मनुजव्याप्र नीलं चापि महागिरिम्‌,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्‌, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे

Wahai pelindung bumi, aku melihat gunung Gandhamādana; dan wahai harimau di antara manusia, aku juga melihat Mandara serta gunung besar Nīla.

Verse 114

पश्यामि च महाराज मेरुं कनकपर्वतम्‌ | महेन्द्र चैव पश्यामि विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम्‌,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्‌, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे

Wahai maharaja, aku melihat Meru, gunung keemasan; aku juga melihat Mahendra, dan Vindhya, yang paling utama di antara gunung-gunung.

Verse 115

मलयं चापि पश्यामि पारियात्र च पर्वतम्‌ | एते चान्ये च बहवो यावन्त: पृथिवीधरा:,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्‌, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे

Waiśampāyana berkata: “Aku pun menyaksikan jajaran Malaya dan gunung Pāriyātra; dan selain itu masih banyak gunung lain—sebanyak yang menyangga bumi. Ketika aku bergerak dan mengembara di dalam perut anak yang berhati luhur itu, tampaklah bagiku Himavān, Hemakūṭa, Niṣadha, Śvetagiri yang berhiaskan perak, Gandhamādana, Mandarācala, Mahāgiri Nīla, Meru yang keemasan, Mahendra, Vindhya yang utama, Malaya, serta Pāriyātra. Gunung-gunung itu dan banyak lagi kulihat di sana, semuanya berkilau dihias aneka permata.”

Verse 116

तस्योदरे मया दृष्टा: सर्वे रत्नविभूषिता: । सिंहान्‌ व्याप्रान्‌ वराहांश्न॒ पश्यामि मनुजाधिप,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्‌, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे

Di dalam perut anak itu kulihat semuanya berhias permata. Wahai penguasa manusia, ketika aku mengembara di sana, kulihat pula singa, harimau, dan babi hutan.

Verse 117

पृथिव्यां यानि चान्यानि सत्त्वानि जगतीपते । तानि सर्वाण्यहं तत्र पश्यन्‌ पर्यचरं तदा,पृथ्वीपते! भूमण्डलमें जितने प्राणी हैं, उन सबको देखते हुए मैं उस समय उस बालकके उदरमें विचरता रहा

Wahai penguasa dunia, semua makhluk yang ada di bumi—semuanya kulihat di sana; dan sambil menyaksikan mereka, saat itu aku terus mengembara di dalamnya.

Verse 118

कुक्षौ तस्य नरव्याघ्र प्रविष्ट: संचरन्‌ दिश: । शक्रादींश्वापि पश्यामि कृत्स्नान्‌ देवगणानहम्‌,नरश्रेष्ठ उस शिशुके उदरमें प्रविष्ट हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते हुए इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंके भी दर्शन हुए

Wahai harimau di antara manusia, setelah memasuki perut anak itu aku mengembara ke segala penjuru. Di sana kulihat pula Śakra (Indra) dan yang lainnya—seluruh rombongan para dewa.

Verse 119

साध्यान्‌ रुद्रांस्तथा5<दित्यान्‌ गुह्मकान्‌ पितरस्तदा । सर्पान्‌ नागान्‌ सुपर्णाश्च वसूनप्यश्चिनावपि,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्‌! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता

Waiśampāyana berkata: “Wahai penguasa bumi, kulihat para Sādhya, para Rudra, dan para Āditya; para Guhyaka dan para Pitṛ; ular-ular dan para Nāga; para Suparṇa (makhluk bersayap agung); para Vasu dan juga kedua Aśvin. Aku pun melihat Gandharwa, Apsara, Yakṣa, dan para Ṛṣi. Kulihat rombongan Daitya dan Dānava, putra-putra Siṁhikā seperti Rāhu, serta musuh-musuh para dewa yang lain. Wahai raja, apa pun yang pernah kulihat di dunia ini—yang bergerak maupun yang tak bergerak—semuanya tampak bagiku di dalam perut sang mahatma itu. Dan, wahai raja agung, setiap hari aku hidup dari buah-buahan dan terus mengembara di seluruh jagat ini.”

Verse 120

गन्धर्वाप्सरसो यक्षानषींश्वैव महीपते । देत्यदानवसड्घांश्व नागांश्न मनुजाधिप,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्‌! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja, penguasa manusia, pelindung bumi! Aku menyaksikan para Gandharwa dan Apsara, para Yakṣa dan para Ṛṣi; rombongan Daitya dan Dānava; serta para Nāga. Aku pun melihat para Sādhya, Rudra, Āditya, para Guhyaka, para Pitṛ; ular-ular dan Nāga, Suparṇa, para Vasu, serta sepasang Aśvinī-kumāra; juga Gandharwa, Apsara, Yakṣa, dan banyak yang lain. Aku melihat pula putra-putra Siṃhikā (seperti Rāhu) dan musuh-musuh para dewa lainnya. Wahai raja, apa pun yang pernah kulihat di dunia ini—segala yang bergerak maupun yang tak bergerak—semuanya tampak kepadaku di dalam perut sang mahātmā itu. Dan, wahai maharaja, aku hidup setiap hari dengan memakan buah-buahan dan mengembara di seluruh jagat ini.”

Verse 121

सिंहिकातनयांश्वापि ये चान्ये सुरशत्रव: । यच्च किंचिन्मया लोके दृष्टं स्थावरजड्रमम्‌,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्‌! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता

Waiśampāyana berkata: “Aku pun menyaksikan putra-putra Siṃhikā dan musuh-musuh para dewa lainnya. Dan apa pun yang pernah kulihat di dunia ini—segala yang tetap maupun yang bergerak—wahai pelindung bumi, semuanya tampak kepadaku di dalam perut sang mahātmā itu. Aku melihat para Sādhya, Rudra, Āditya, para Guhyaka, para Pitṛ; ular-ular dan Nāga, Suparṇa, para Vasu, sepasang Aśvin; Gandharwa, Apsara, Yakṣa, dan para Ṛṣi. Aku melihat rombongan Daitya dan Dānava, para Nāga, putra-putra Siṃhikā (Rāhu dan yang sejenisnya), serta para musuh dewa lainnya. Wahai raja, seluruh bentangan keberadaan yang pernah kusaksikan tampak seakan terhimpun di dalam dirinya. Dan, wahai maharaja, aku hidup tiap hari dengan buah-buahan dan terus mengembara di seluruh jagat ini.”

Verse 122

सर्व पश्याम्यहं राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मन: । चरमाण: फलाहार: कृत्स्नं जगदिदं विभो,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्‌! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja, aku melihat segalanya di dalam perut sang mahātmā itu. Dengan hidup dari buah-buahan dan mengembara, wahai tuan yang perkasa, wahai pelindung bumi, aku menyaksikan seluruh jagat di sana.”

Verse 123

अन्तःशरीरे तस्याहं वर्षाणामधिकं शतम्‌ । न च पश्यामि तस्याहं देहस्यान्तं कदाचन,उस बालकके शरीरके भीतर मैं सौ वर्षमे अधिक कालतक घूमता रहा, तो भी कभी उसके शरीरका अन्त नहीं दिखायी दिया

Waiśampāyana berkata: “Di dalam tubuh anak itu aku mengembara lebih dari seratus tahun; namun tak pernah sekalipun kulihat ujung atau batas tubuhnya.”

Verse 124

सततं धावमानश्ष्‌ चिन्तयानो विशाम्पते । (भ्रमंस्तत्र महीपाल यदा वर्षगणान्‌ बहून्‌ ।) आसादयामि नैवान्तं तस्य राजन्‌ महात्मन:,युधिष्ठिर! मैं निरन्तर दौड़ लगाता और चिन्तामें पड़ा रहता था। महाराज! जब बहुत वर्षोतक भ्रमण करनेपर भी उस महात्माके शरीरका अन्त नहीं मिला, तब मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन वरदायक एवं वरेण्य देवताकी ही विधिपूर्वक शरण ली

Waiśampāyana berkata: “Aku terus berlari ke sana kemari, diliputi kecemasan, wahai pelindung rakyat. Wahai raja, setelah mengembara di sana bertahun-tahun lamanya, aku tetap tak dapat menemukan ujung sang mahātmā itu. Maka, wahai raja, dengan pikiran, ucapan, dan perbuatan—menurut tata cara yang semestinya—aku berlindung pada dewa yang menganugerahkan karunia itu, yang paling patut dimuliakan.”

Verse 125

ततस्तमेव शरणं गतो<5स्मि विधिवत्‌ तदा । वरेण्यं वरदं देव॑ं मनसा कर्मणैव च,युधिष्ठिर! मैं निरन्तर दौड़ लगाता और चिन्तामें पड़ा रहता था। महाराज! जब बहुत वर्षोतक भ्रमण करनेपर भी उस महात्माके शरीरका अन्त नहीं मिला, तब मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन वरदायक एवं वरेण्य देवताकी ही विधिपूर्वक शरण ली

Saat itu juga, sesuai tata cara, aku berlindung pada dewa yang sama—yang paling layak dipilih dan penganugerahan berkah—mencarinya dengan batin dan dengan perbuatan. Wahai Yudhiṣṭhira, aku terus berlari ke sana kemari dalam kegelisahan; dan ketika, meski telah mengembara bertahun-tahun, aku tak juga menemukan ujung dari tubuh sang mahātmā itu, maka dengan pikiran, ucapan, dan tindakan aku berserah diri dengan semestinya kepada dewa yang mulia, sang pemberi anugerah itu.

Verse 126

ततो<5हं सहसा राजन्‌ वायुवेगेन नि:सृतः । महात्मनो मुखात्‌ तस्य विवृतात्‌ पुरुषोत्तम,पुरुषरत्न युधिष्ठिर! उनकी शरण लेते ही मैं वायुके समान वेगसे उक्त महात्मा बालकके खुले हुए मुखकी राहसे सहसा बाहर निकल आया

Lalu, wahai Raja, aku tiba-tiba terhempas keluar secepat angin, keluar melalui mulut sang mahātmā yang terbuka. Wahai Yudhiṣṭhira, permata di antara manusia—begitu aku berlindung padanya, seketika aku muncul ke luar dengan cepat seperti itu.

Verse 127

ततस्तस्यैव शाखायां न्यग्रोधस्य विशाम्पते । आस्ते मनुजशार्दूल कृत्स्नमादाय वै जगत्‌,नरश्रेष्ठ राजन! बाहर आकर देखा तो उसी बरगदकी शाखापर उसी बाल-वेषसे सम्पूर्ण जगत्‌को अपने उदरमें लेकर श्रीवत्सचिह्लसे सुशोभित वह अमिततेजस्वी बालक पूर्ववत्‌ बैठा हुआ है

Kemudian, wahai penguasa rakyat, setelah keluar aku melihat: pada dahan banyan yang sama itu, sang “harimau di antara manusia” tetap berada dalam rupa kanak-kanak, duduk seperti semula—seakan-akan seluruh jagat raya dipangkunya dan tersimpan di dalam perutnya.

Verse 128

तेनैव बालवेषेण श्रीवत्सकृतलक्षणम्‌ | आसीन तं॑ नरव्याप्र पश्याम्यमिततेजसम्‌,नरश्रेष्ठ राजन! बाहर आकर देखा तो उसी बरगदकी शाखापर उसी बाल-वेषसे सम्पूर्ण जगत्‌को अपने उदरमें लेकर श्रीवत्सचिह्लसे सुशोभित वह अमिततेजस्वी बालक पूर्ववत्‌ बैठा हुआ है

Wahai harimau di antara manusia, wahai Raja terbaik di antara manusia—ketika aku keluar, kulihat anak itu lagi: dalam rupa kanak-kanak yang sama, bertanda Śrīvatsa, berkilau dengan sinar tak terukur. Ia duduk seperti semula di dahan banyan itu, seakan-akan menanggung seluruh jagat di dalam perutnya.

Verse 129

ततो मामब्रवीद्‌ बाल: स प्रीत: प्रहसन्निव । श्रीवत्सधारी द्युतिमान्‌ पीतवासा महाद्युति:,तब महातेजस्वी पीताम्बरधारी श्रीवत्सभूषित कान्तिमान्‌ उस बालकने प्रसन्न होकर हँसते हुए-से मुझसे कहा--

Lalu anak itu—berseri, mengenakan kain kuning, dan berhias tanda Śrīvatsa—berkata kepadaku dengan hati yang berkenan, seolah tersenyum. Ia memancarkan cahaya agung.

Verse 130

अपीदानीं शरीरेडस्मिन्‌ मामके मुनिसत्तम | उषितस्त्व॑ सुविश्रान्तो मार्कण्डेय ब्रवीहि मे,“'मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय! क्या तुम मेरे इस शरीरमें रहकर विश्राम कर चुके? मुझे बताओ”

Waiśaṃpāyana berkata: “Wahai resi termulia, Mārkaṇḍeya—apakah kini engkau telah tinggal di dalam tubuhku ini dan memperoleh istirahat sepenuhnya? Katakanlah kepadaku.”

Verse 131

मुहूर्तादथ मे दृष्टि: प्रादुर्भूता पुनर्नवा । यया निर्मुक्तमात्मानमपश्यं लब्धचेतसम्‌,फिर दो ही घड़ीमें मुझे एक नवीन दृष्टि प्राप्त हुई, जिससे मैं अपने-आपको मायासे मुक्त और सचेत अनुभव करने लगा

Waiśaṃpāyana berkata: Setelah sejenak, kejernihan penglihatan yang baru muncul kembali dalam diriku. Melaluinya aku melihat diriku terbebas dari maya dan pulih sepenuhnya dalam kesadaran—batinku kembali teguh dan mantap.

Verse 132

तस्य ताम्रतलौ तात चरणौ सुप्रतिषछ्ितौ । सुजातौ मृदुरक्ताभिरड्जुलीभिविराजितौ

Waiśaṃpāyana berkata: “Wahai dear one, kedua kakinya—dengan telapak berwarna tembaga—berdiri teguh. Indah dan serasi bentuknya, berkilau oleh jari-jari yang lembut kemerahan.”

Verse 133

दृष्टवा परिमितं तस्य प्रभावममितौजस:,उस अमित तेजस्वी शिशुका अनन्त प्रभाव देखकर मैं यत्नपूर्वक उसके समीप गया और विनीतभावसे हाथ जोड़कर सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा उस कमलनयन देवताका दर्शन किया

Melihat daya pengaruhnya yang terukur namun menakjubkan—ia yang berenergi tanpa batas—dan memandang sang anak yang bercahaya dengan kemuliaan tak bertepi, aku mendekatinya dengan penuh kehati-hatian. Dengan rendah hati aku menyatukan kedua telapak tangan, lalu menatap sang dewa bermata teratai—Atman batin semua makhluk.

Verse 134

विनयेनाञ्जलिं कृत्वा प्रयत्नेनोपगम्य ह । दृष्टो मया स भूतात्मा देवः कमललोचन:,उस अमित तेजस्वी शिशुका अनन्त प्रभाव देखकर मैं यत्नपूर्वक उसके समीप गया और विनीतभावसे हाथ जोड़कर सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा उस कमलनयन देवताका दर्शन किया

Dengan rendah hati aku menyatukan kedua telapak tangan, dan dengan sungguh-sungguh mendekat. Maka kulihat sang dewa bermata teratai—Atman batin semua makhluk.

Verse 135

तमहं प्राउ्जलिर्भूत्वा नमस्कृत्येदमन्रुवम्‌ । ज्ञातुमिच्छामि देव त्वां मायां चैतां तवोत्तमाम्‌,फिर हाथ जोड़े नमस्कार करके मैंने उससे इस प्रकार कहा--देव! मैं आपको और आपकी इस उत्तम मायाको जानना चाहता हूँ

Maka aku pun merangkapkan kedua telapak tangan, bersujud hormat, lalu berkata demikian: “Wahai Yang Ilahi, aku ingin memahami Engkau—dan juga māyā-Mu yang paling luhur ini.”

Verse 136

आस्थयेनानुप्रविष्टो5हं शरीरे भगवंस्तव । दृष्टवानखिलान्‌ सर्वान्‌ समस्तान्‌ जठरे हि ते,'भगवन्‌! मैंने आपके मुखकी राहसे शरीरमें प्रवेश करके आपके उदरमें समस्त सांसारिक पदार्थोका अवलोकन किया है

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Bhagavān, melalui jalan mulut-Mu aku memasuki tubuh-Mu; dan di dalam perut-Mu aku menyaksikan seluruh jagat—segala sesuatu, tanpa tersisa.”

Verse 137

तव देव शरीरस्था देवदानवराक्षसा: । यक्षगन्धर्वनागाश्न जगत्‌ स्थावरजड्रमम्‌

Vaiśampāyana berkata: “Di dalam tubuh ilahi-Mu bersemayam para dewa, para Dānava, dan para Rākṣasa; juga Yakṣa, Gandharva, dan Nāga—bahkan seluruh jagat, yang bergerak maupun yang tak bergerak.”

Verse 138

“देव! आपके शरीरमें देवता, दानव, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, नाग तथा समस्त स्थावर- जंगमरूप जगत्‌ विद्यमान है ।। त्वत्प्रसादाच्च मे देव स्मृतिर्न परिहीयते । ट्रुतमन्त:शरीरे ते सततं परिवर्तिन:,'प्रभो! आपकी कृपासे आपके शरीरके भीतर निरन्तर शीघ्र गतिसे घूमते रहनेपर भी मेरी स्मरणशक्ति नष्ट नहीं हुई है

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Tuhan! Di dalam tubuh-Mu berdiam para dewa, para Dānava, Yakṣa, Rākṣasa, Gandharva, Nāga, dan seluruh alam semesta—yang bergerak maupun yang tak bergerak. Dan berkat anugerah-Mu, wahai Yang Ilahi, ingatanku tidak sirna: meski aku dibawa berputar cepat tanpa henti di dalam diri-Mu, wahai Sang Penguasa, daya ingatku tidak hancur.”

Verse 139

निर्गतो5हमकामस्तु इच्छया ते महाप्रभो । इच्छामि पुण्डरीकाक्ष ज्ञातुं त्वाहमनिन्दितम्‌,“महाप्रभो! मैं अपनी अभिलाषा न रहनेपर भी केवल आपकी इच्छासे बाहर निकल आया हूँ। कमलनयन! आप सर्वोत्कृष्ट देवताको मैं जानना चाहता हूँ

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Mahāprabhu, meski aku tak memiliki kehendak pribadi, aku keluar semata-mata karena kehendak-Mu. Wahai Pundarīkākṣa (bermata teratai), aku ingin mengenal Engkau—yang tak tercela dan tiada banding di antara para dewa.”

Verse 140

इह भूत्वा शिशु: साक्षात्‌ कि भवानवतिष्ठते । पीत्वा जगदिदं सर्वमेतदाख्यातुमहसि,“आप इस सम्पूर्ण जगत्‌को पी करके यहाँ साक्षात्‌ बालकवेषमें क्‍यों विराजमान हैं? यह सब बतानेकी कृपा करें

Setelah meneguk seluruh jagat raya, mengapa Engkau bersemayam di sini dalam wujud anak yang tampak nyata? Mohon jelaskan semuanya ini.

Verse 141

किमर्थ च जगत्‌ सर्व शरीरस्थं तवानघ । कियन्तं च त्वया कालमिह स्थेयमरिंदम,“अनघ! यह सारा संसार आपके शरीरमें किसलिये स्थित है? शत्रुदमन! आप कितने समयतक यहाँ इस रूपमें रहेंगे?

Wahai yang tak bercela, untuk tujuan apakah seluruh jagat ini berdiam di dalam tubuh-Mu? Dan wahai penakluk musuh, sampai berapa lama Engkau akan tinggal di sini dalam wujud yang termanifestasi ini?

Verse 142

एतदिच्छामि देवेश श्रोतु ब्राह्मणकाम्यया । त्वत्त: कमलपत्राक्ष विस्तरेण यथातथम्‌,'देवेश्वर! कमलनयन! ब्राह्मणमें जो सहज जिज्ञासा होती है, उससे प्रेरित होकर मैं आपसे यह सब बातें यथाविधि विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ

Wahai Penguasa para dewa, bermata laksana kelopak teratai—didorong oleh keingintahuan alami yang layak bagi seorang brāhmaṇa, aku ingin mendengar semuanya ini darimu, setepat-tepatnya, dengan uraian yang lengkap.

Verse 143

महद्धयेतदचिन्त्यं च यदहं दृष्टवान्‌ प्रभो । इत्युक्त: स मया श्रीमान्‌ देवदेवो महाद्युति: । सान्त्वयन्‌ मामिदं वाक्यमुवाच वदतां वर:,'प्रभो! मैंने जो कुछ देखा है, यह अगाध और अचिन्त्य है।” मेरे इस प्रकार पूछनेपर वे वक्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी देवाधिदेव श्रीभगवान्‌ मुझे सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले

Aku berkata, “Wahai Prabhu, apa yang kulihat sungguh maha luas dan tak terpikirkan.” Ketika aku berkata demikian, Sang Dewa di atas para dewa, yang bercahaya agung—terutama di antara para penutur—menghiburku dan mengucapkan kata-kata ini.

Verse 187

इस प्रकार श्रीम्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वनें मत्स्योपाख्यानविषयक एक सौ सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-187 tentang Matsya-upākhyāna, dalam Markandeya Samasya Parvan, bagian dari Vana Parva dalam Mahābhārata yang suci.

Verse 188

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि अष्टाशीत्यधिकशततमो<ध्याय:

Demikian berakhir bab ke-188 dalam Vana Parva dari Śrī Mahābhārata, pada bagian yang dikenal sebagai Mārkaṇḍeya-samāsya (kompendium Mārkaṇḍeya).

Verse 213

आदितो मनुजव्याप्र कृत्स्नस्य जगत: क्षये । ये अन्तर्यामी आत्मा होनेसे सबको जानते हैं, परंतु इन्हें वेद भी नहीं जानते। नृपशिरोमणे! नरश्रेष्ठ! सम्पूर्ण जगत्‌का प्रलय होनेके पश्चात्‌ इन आदिभूत परमेश्वरसे ही यह सम्पूर्ण आश्वर्यमय जगत्‌ पुनः उत्पन्न हो जाता है

Wahai harimau di antara manusia! Sejak awal lenyapnya seluruh jagat, Sang Paramātman yang bersemayam sebagai Antaryāmin mengetahui semua; namun bahkan Weda pun tak mampu mengenal-Nya. Wahai mahkota para raja, wahai yang terbaik di antara manusia! Setelah pralaya melanda segenap alam, dari Parameśvara yang mula itulah jagat yang menakjubkan ini lahir kembali.

Verse 236

तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्व॒ ततः: परम्‌ । तीन हजार दिव्य वर्षोका त्रेतायुग बताया जाता है, उसकी संध्या और संध्यांशके भी उतने ही (तीन-तीन) सौ दिव्य वर्ष होते हैं (इस तरह यह युग छत्तीस सौ दिव्य वर्षोंका होता है)

Vaiśaṃpāyana berkata: Tretā-yuga disebut berlangsung tiga ribu tahun ilahi. Masa fajar (sandhyā) dan masa senja penutupnya (sandhyāṃśa) masing-masing sama ukurannya—tiga ratus tahun ilahi. Maka, beserta masa peralihannya, yuga itu berjumlah tiga ribu enam ratus tahun ilahi.

Verse 246

तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशश्ष तथाविध: । द्वापरका मान दो हजार दिव्य वर्ष है तथा उतने ही सौ दिव्य वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके हैं (अत: सब मिलकर चौबीस सौ दिव्य वर्ष द्वापरके हैं)

Vaiśampāyana berkata: Bagi Dvāpara-yuga pun, masa senja peralihan (sandhyā) adalah dua ratus (tahun ilahi), dan bagian senja penutupnya (sandhyāṃśa) sama ukurannya. Dvāpara disebut dua ribu tahun ilahi; ditambah dua ratus di awal dan dua ratus di akhir, jumlahnya menjadi dua ribu empat ratus tahun ilahi.

Verse 283

लोकानां मनुजव्याघ्र प्रलयं त॑ विदुर्बुधा: । नरश्रेष्ठ] एक हजार चतुर्युग बीतनेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है। यह सारा जगत्‌ ब्रह्माके दिनभर ही रहता है (और वह दिन समाप्त होते ही नष्ट हो जाता है।) इसीको विद्वान्‌ पुरुष लोकोंका प्रलय मानते हैं

Vaiśaṃpāyana berkata: “Wahai harimau di antara manusia, orang bijak mengetahui inilah pralaya bagi dunia-dunia. Wahai yang terbaik di antara manusia, ketika seribu siklus empat yuga berlalu, genaplah satu hari Brahmā. Seluruh alam semesta bertahan hanya sepanjang siang Brahmā; ketika hari itu berakhir, ia pun musnah. Para terpelajar menyebutnya sebagai pralaya—pelarutan berkala dunia-dunia.”

Verse 316

क्षत्रधर्मेण वाप्यत्र वर्तयन्ति गते युगे । युगकी समाप्तिके समय ब्राह्मण शूद्रोंके कर्म करते हैं और शाद्र वैश्योंकी भाँति धनोपार्जन करने लगते हैं अथवा क्षत्रियोंके कर्मसे जीविका चलाने लगते हैं

Ketika suatu zaman berlalu dan saat akhir yuga tiba, orang-orang di sini mulai menopang hidup dengan mengambil kewajiban ksatria; dengan demikian tatanan varṇa-dharma runtuh dan peran-peran yang semestinya teratur menjadi bercampur-aduk.

Verse 463

मिथ्या च नखरोमाणि धारयन्ति तदा द्विजा: । गृहस्थलोग करके भारसे डरकर लुटेरे बन जायाँगे। ब्राह्मण मुनियों-जैसी कपटपूर्ण आकृति धारण किये वैश्यवृत्तिसे जीविका चलायेंगे और झूठे दिखावेके लिये नख तथा दाढ़ी-मूछ धारण करेंगे

Pada zaman itu, kaum dwija pun akan memelihara kuku dan rambut secara menipu—sekadar untuk pamer tanda lahiriah. Takut oleh beban hidup berumah tangga, orang-orang akan berubah menjadi perampok; mengenakan rupa munī secara munafik, mereka akan hidup dari cara-cara niaga, dan demi pertunjukan palsu mereka akan memanjangkan kuku serta janggut–kumis.

Verse 1323

प्रयत्नेन मया मूर्ध्ना गृहीत्वा हभिवन्दितौ | तात! तदनन्तर मैंने कोमल और लाल रंगकी अँगुलियोंसे सुशोभित लाल-लाल तलवेवाले उस बालकके सुन्दर एवं सुप्रतिष्ठित चरणोंको प्रयत्नपूर्वक पकड़कर उन्हें अपने मस्तकसे प्रणाम किया

Dengan penuh kehati-hatian aku memegangnya dan menunduk memberi hormat. Lalu, wahai yang terkasih, kaki anak itu yang indah dan tegak serasinya—dihiasi jari-jari lembut kemerahan dan telapak yang merah menyala—kupegang dengan hormat, kutaruh di atas kepalaku, dan aku bersujud dalam takzim.

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira asks how to remain established in dharma while protecting subjects and acting in the world without deviating from svadharma; the response frames doubt itself as a risk to dharmic stability when it becomes excessive suspicion toward sound counsel.

Govern through compassion and protection as if subjects were one’s own children; correct missteps through appropriate giving; honor ancestors and deities; and maintain disciplined respect toward learned authorities, treating dharma as the ruler’s continuous inner alignment in thought, speech, and action.

Yes. The chapter explicitly frames the discourse as conveying past and future knowledge remembered from Vāyu-proclaimed tradition and r̥ṣi-praised purāṇic material, and it closes by noting the audience’s astonishment at the purāṇa-style exposition—signaling its didactic and archival intent.