
Chapter 153 — Brahmacarya-āśrama-dharma (The Dharma of the Student Stage)
इस अध्याय में गृहस्थ-आचार के बाद ब्रह्मचर्य-आश्रम का धर्म बताया गया है, जहाँ धर्म को जीवन-क्रम की शिक्षा मानकर समाज-रक्षा और आध्यात्मिक उन्नति का साधन कहा गया है। आरम्भ में ऋतु-रात्रियों के नियम तथा गर्भाधान/गर्भ-सम्बन्धी विधियाँ आती हैं। फिर जन्म-संस्कार—सीमन्त, जातकर्म और नामकर्म—और वर्णानुसार नामकरण की परम्पराएँ वर्णित हैं। आगे चूड़ाकर्म आदि तथा वर्ण और आयु-सीमा के अनुसार उपनयन-काल बताया गया है; विद्यार्थी की मेखला, अजिन, दण्ड, वस्त्र और उपवीत जैसी सामग्री का क्रमबद्ध विधान भी है। आचार्य के कर्तव्य—शौच, सदाचार, अग्नि-कार्य और सन्ध्या-उपासना का प्रशिक्षण—उल्लेखित हैं। भोजन की दिशा-प्रतीकता, नित्य आहुति-सम्बन्धी अनुशासन, तथा भोग-विलास, हिंसा, निन्दा और अश्लीलता के निषेध दिए गए हैं। अंत में वेद-स्वीकार, दक्षिणा और समावर्तन-स्नान के साथ ब्रह्मचर्य को शास्त्र-अध्ययन व नैतिक संयम से युक्त ज्ञान-व्रत के रूप में पूर्ण किया गया है।
Verse 1
इत्य् आग्नेये महापुराणे गृहस्थवृत्तयो नाम व्रिपञ्चाशदधिकशततमो ऽध्यायः अथ त्रिपञ्चाशदधिकशततमो ऽध्यायः ब्रह्मचर्याश्रमधर्मः पुष्कर उवाच धर्ममाश्रमिणां वक्ष्ये भुक्तिमुक्तिप्रदं शृणु षोडशर्तुनिशा स्त्रीणामाद्यस्तिस्रस्तु गर्हिताः
इस प्रकार आग्नेय महापुराण में ‘गृहस्थवृत्तयः’ नामक एक सौ बावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब एक सौ तिरपनवाँ अध्याय—‘ब्रह्मचर्याश्रम-धर्म’ आरम्भ होता है। पुष्कर बोले—आश्रमों में स्थित जनों के धर्म मैं कहूँगा; सुनो, जो भोग और मोक्ष दोनों देने वाले हैं। स्त्रियों के लिए सोलह ‘ऋतु-रात्रियाँ’ (उर्वर रात्रियाँ) होती हैं; पर प्रथम तीन निन्दित हैं।
Verse 2
व्रजेद्युग्मासु पुत्रार्थी कर्माधानिकमिष्यते गर्भस्य स्पष्टताज्ञाने सवनं स्पन्दनात् पुरा
पुत्र की इच्छा रखने वाला पुरुष (ऋतु-काल की) सम (युग्म) रात्रियों में (पत्नी के पास) जाए; उसके लिए गर्भाधान-संबन्धी कर्म (आधानिक कर्म) विहित है। गर्भ की स्पष्ट स्थिति जानने हेतु, भ्रूण-चेष्टा (स्पन्दन) अनुभव होने से पहले ‘सवन’ (निर्धारित अनुष्ठान) करना चाहिए।
Verse 3
षष्ठे ऽष्टमे वा सीमन्तं पुत्रीयं नामभं शुभं अच्छिन्ननाड्यां कर्तव्यं जातकर्म विचक्षणैः
छठे या आठवें महीने में सीमन्त-संस्कार करना चाहिए। तत्पश्चात् संतान-प्रद शुभ नाम रखा जाए। नाल कटने से पहले विद्वानों द्वारा जातकर्म किया जाए।
Verse 4
अशौचे तु व्यतिक्रान्ते नामकर्म विधीयते शर्मान्तं ब्राह्मस्योक्तं वर्मान्तं क्षत्रियस्य तु
अशौच की अवधि बीत जाने पर नामकरण-संस्कार किया जाए। ब्राह्मण के लिए ‘-शर्मन्’ से अंत होने वाला नाम कहा गया है और क्षत्रिय के लिए ‘-वर्मन्’ से अंत होने वाला।
Verse 5
गुप्तदासात्मकं नाम प्रशस्तं वैश्यशूद्रयोः शर्मान्तं ब्रह्मणस्योक्तं वर्मान्तं क्षत्रियस्य च
वैश्य और शूद्र के लिए ‘-गुप्त’ या ‘-दास’ से युक्त नाम प्रशस्त है। ब्राह्मण के लिए ‘-शर्मन्’ तथा क्षत्रिय के लिए ‘-वर्मन्’ अंत वाला नाम कहा गया है।
Verse 6
गुप्तदासात्मकं नाम प्रशस्तं वैश्यशूद्रयोः बालं निवेदयेद्भर्त्रे तव पुत्रो ऽयमित्युत
वैश्य और शूद्र के लिए ‘-गुप्त’ या ‘-दास’ प्रकार का नाम प्रशस्त है। फिर पति को बालक दिखाकर कहा जाए—“यह आपका पुत्र है।”
Verse 7
यथाकुलन्तु चूडाकृद् ब्राह्मणस्योपनायनं गर्भाष्टमे ऽष्टमे वाब्दे गर्भादेकादशे नृपे
कुल-परंपरा के अनुसार चूड़ाकर्म (मुंडन) करना चाहिए। हे नृप! ब्राह्मण का उपनयन गर्भ से आठवें वर्ष में—या जन्म से आठवें वर्ष में—अथवा गर्भ से ग्यारहवें वर्ष में किया जाए।
Verse 8
गर्भात्तु द्वादशे वैश्ये षोडशाब्दादितो न हि मुञ्जानां वल्कलानान्तु क्रमान्मौज्ज्याः प्रकीर्तिताः
वैश्य के लिए गर्भगणना से बारहवें वर्ष में उपनयन करना चाहिए; सोलहवें वर्ष से आगे आरम्भ करके नहीं करना चाहिए। क्रम से मौंजी (पवित्र मेखला) मुञ्ज-घास और वल्कल-तन्तुओं से बनी कही गई है।
Verse 9
मार्गवैयाध्रवास्तानि चर्माणि व्रतचारिणां पर्णपिप्पलविल्वानां क्रमाद्दण्डाः प्रकीर्तिताः
व्रत का आचरण करने वालों के लिए मृग (हरिण) और व्याघ्र (बाघ) के चर्म विहित हैं। और क्रम से दण्ड परṇa (पलाश), पिप्पल (अश्वत्थ) तथा बिल्व की लकड़ी के कहे गए हैं।
Verse 10
केशदेशललाटास्यतुल्याः प्रोक्ताः क्रमेण तु अवक्राः सत्वचः सर्वे नाविप्लुष्टास्तु दण्डकाः
वे (दण्ड) क्रम से केश-देश, ललाट और मुख के प्रमाण के समान कहे गए हैं। सब दण्ड सीधे हों, उनकी त्वचा सुदृढ़ हो; और दण्डक न फफोले पड़े हुए हों, न जले हुए।
Verse 11
वासोपवीते कार्पासक्षौमोर्णानां यथाक्रमं आदिमध्यावसानेषु भवच्छब्दोपलक्षितं
वस्त्र और उपवीत के विषय में क्रम से कपास, क्षौम (सन) और ऊन का प्रयोग करना चाहिए। तथा वाणी के आरम्भ, मध्य और अन्त में ‘भवत्’ शब्द से आदर-सूचना होती है।
Verse 12
प्रथमं तत्र भ्हिक्षेत यत्र भिक्षा ध्रुवं भवेत् स्त्रीणाममन्त्रतस्तानि विवाहस्तु समन्त्रकः
पहले वहीं भिक्षा माँगे जहाँ भिक्षा का निश्चय हो। स्त्रियों के लिए ये संस्कार वेद-मन्त्रों के बिना करने चाहिए; परन्तु विवाह मन्त्रों सहित करना चाहिए।
Verse 13
उपनीय गुरुः शिष्यं सिक्षयेच्छौचमादितः आचारमग्निकार्यं च सन्ध्योपासनमेव च
उपनयन के बाद गुरु शिष्य को पहले शौच-नियम, सदाचार, अग्निकार्य के कर्तव्य तथा संध्या-उपासना का उपदेश दे।
Verse 14
आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते यशस्यं दक्षिणामुखः श्रियं प्रत्यङ्मुखी भुङ्क्ते ऋतं भुङ्क्ते उदङ्मुखः
पूर्वमुख होकर भोजन करने से आयुष्य, दक्षिणमुख से यश, पश्चिममुख से श्री-समृद्धि, और उत्तरमुख से ऋत—धर्मानुकूल सत्य-व्यवस्था—प्राप्त होती है।
Verse 15
सायं प्रातश् च जुहुयान् नामेध्यं व्यस्तहस्तकं मधु मांस जनैः सार्धं गीतं नृत्यञ्च वै त्यजेत्
सायं और प्रातः हवन करे; तथा अपवित्रता, अस्त-व्यस्त हाथों से किए गए अनुचित कर्म, मधु और मांस, भोग-विलास हेतु लोगों की संगति, और गीत-नृत्य का त्याग करे।
Verse 16
नृत्यञ्च वर्जयेदिति ख , ग , घ , ङ , छ , ञ , ट च सायं प्रातश्चेत्यादिः, नृत्यञ्च वै त्यजेदित्यन्तः पाठः ज पुस्तके नास्ति हिंसाम्परापवादं च अश्लीलं च विशेषतः दण्डादि धारयेन्नष्टमप्सु क्षिप्त्वान्यधारणं
‘नृत्य का वर्जन करे’—यह पाठ कुछ पाण्डुलिपियों में है; ‘…और नृत्य का त्याग करे’ वाला अंत ज-पुस्तक में नहीं। विशेषतः हिंसा, पर-अपवाद और अश्लीलता से बचे। दण्ड आदि धारण कर सकता है; यदि वह नष्ट हो जाए तो उसे जल में प्रवाहित कर दूसरा धारण करे।
Verse 17
वेदस्वीकरणं कृत्वा स्रायाद्वै दत्तदक्षिणः
वेद-स्वीकरण (औपचारिक ग्रहण) करके और नियत दक्षिणा देकर, वह तत्पश्चात् समापन-रूप स्नान करे।
It specifies saṃskāra sequencing and technical constraints—timing for sīmanta and upanayana, varṇa-linked naming suffixes, and standardized materials and quality-controls for the student’s girdle, skins, and staff.
By treating disciplined study, purity, sandhyā worship, and restraint as a single vow-structure: regulated conduct stabilizes the senses, supports Vedic learning, and aligns daily life with ṛta/dharma, thereby serving both social duty and liberation.