Adhyaya 152
Dharma-shastraAdhyaya 1525 Verses

Adhyaya 152

The Livelihood of the Householder (गृहस्थवृत्तिः) — Agni Purana, Chapter 152

इस अध्याय में पुष्कर वर्णान्तर-धर्म से आगे बढ़कर गृहस्थ-वृत्ति का धर्मशास्त्रीय विवेचन करते हैं। ब्राह्मण के लिए स्वधर्म से आत्मनिर्वाह प्रधान है; आवश्यकता में क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र-प्रकार के कार्य का आश्रय भी मान्य है, पर शूद्र की दासवत् पराधीनता या शूद्र-जन्मी मुख्य आजीविका निषिद्ध है। द्विजों के लिए कृषि, व्यापार, पशुरक्षा और कुसिद (धन-उधार) आदि अनुमत बताए गए हैं तथा भोग-वाणिज्य में नैतिक मर्यादाएँ भी रखी गई हैं। खेती में पृथ्वी, वनस्पति और कीटों की हिंसा से उत्पन्न दोष स्वीकार कर यज्ञ और देव-पूजा द्वारा शुद्धि/प्रायश्चित्त को धर्मोपाय कहा गया है। हल-प्रयोग के संदर्भ में गो-दण्डों द्वारा क्रमिक दण्ड-व्यवस्था देकर आवश्यकता, क्रूरता और धर्म-हानि का संतुलन दिखाया गया है। अंत में ऋत, अमृत, मृत, प्रमृत—इन आजीविकाओं का क्रम बताकर आपत्काल में सत्य-असत्य मिश्रण तक की छूट कही गई है, पर नीच और अधर्म्य वृत्ति सर्वथा त्याज्य है।

Shlokas

Verse 1

इत्य् आग्नेये महापुराणे वर्णान्तरधर्मा नामैकपञ्चाशदधिकशततमो ऽध्यायः अथ द्विपञ्चाशदधिकशततमो ऽध्यायः गृहस्थवृत्तिः पुष्कर उवाच आजीवंस्तु यथोक्तेन ब्राह्मणः स्वेन कर्मणा क्षत्रविट्शूद्रधर्मेण जीवेन्नैव तु शूद्रजात्

इस प्रकार अग्नि-महापुराण में ‘वर्णान्तर-धर्म’ नामक 151वाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब 152वाँ अध्याय ‘गृहस्थ-वृत्ति’ आरम्भ होता है। पुष्कर बोले—ब्राह्मण को शास्त्रोक्त अपने कर्म से ही आजीविका चलानी चाहिए; आपत्ति में वह क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र-धर्म से भी जीवित रह सकता है, पर शूद्र-जात (शूद्र-आश्रित/शूद्रजन्य) आजीविका से नहीं।

Verse 2

कृषिबाणिज्यगोरक्ष्यं कुशीदञ्च द्विजश् चरेत् गोरसं गुडलवणलाक्षामांसानि वर्जयेत्

द्विज (ब्राह्मण) कृषि, वाणिज्य, गोरक्षा और कुसीद (ब्याज पर धन देना) भी कर सकता है; परन्तु गो-उत्पाद, गुड़, नमक, लाख और मांस का त्याग करे।

Verse 3

श्रीजीवनञ्च तत्र स्यात् प्रोक्तमिति ग , घ , ङ , ञ च भूमिं भित्वौषधीश्छित्वा हुत्वा कोटपिपीलिकान् पुनन्ति खलु यज्ञेन कर्षका देवपूजनात्

वहाँ समृद्ध जीवन-यापन होता है—ऐसा (ग, घ, ङ, ञ) पाठभेदों में कहा गया है। यद्यपि किसान भूमि को चीरते, औषधियों/वनस्पतियों को काटते और खेती में असंख्य चींटियों को अग्नि में होम देते हैं, तथापि वे यज्ञ और देव-पूजन से निश्चय ही शुद्ध होते हैं।

Verse 4

हलमष्टगवं धर्म्यं षड्गवं जीवितार्थिनां चर्तुर्गवं नृशंसानां द्विगवं धर्मघातिनां

हल (जोत/हल चलाने) का दण्ड—धर्मानुसार आचरण करने वाले के लिए आठ गायें; जीविका चाहने वाले के लिए छह; क्रूर के लिए चार; और धर्म का घात करने वाले के लिए दो गायें (निर्धारित) हैं।

Verse 5

ऋतामृताभ्यां जीवेत मृतेन प्रमृतेन वा सत्यानृताभ्यामपिवा न स्ववृत्त्या कदा च न

मनुष्य को ऋत और अमृत से, अथवा मृत और प्रमृत से जीवन-निर्वाह करना चाहिए; सत्य में असत्य मिला हो तब भी (कभी-कभी) चल सकता है—परंतु अपनी ऐसी नीच जीविका से, जो सदाचार का हनन करे, किसी भी समय नहीं।

Frequently Asked Questions

A Dharma-shastra taxonomy of livelihood (ṛta/amṛta/mṛta/pramṛta), a regulated list of permissible economic activities (agriculture, trade, cattle-protection, money-lending), abstentions, and a graded penalty structure (in cows) associated with the plough—calibrated by intent and dharma-injury.

It sacralizes economic life by subordinating livelihood to dharma: necessity-based occupational flexibility is bounded by purity norms, and the harms of livelihood (e.g., farming) are ritually counterbalanced through yajña and deva-pūjā, turning household prosperity into a disciplined path of purification.