
Chapter 40 — भूपरिग्रहो नाम (Bhū-parigraha) / अर्घ्यदानविधानम् (Arghya-dāna-vidhāna)
भगवान अग्नि इस अध्याय में भूमि-पूजन को वास्तु-पुरुष की पौराणिक-वैदिक सत्ता से जोड़ते हैं—देवताओं द्वारा वश में किया गया वह पुरुष पृथ्वी पर लिटाया गया, इसलिए स्थल स्वयं पवित्र देह बनता है। साधक 64-पद (मंडल) में पदों व अर्ध-पदों पर देवताओं/शक्तियों का विन्यास कर घी, अक्षत, पुष्प, धान्य, मांस, मधु, दुग्ध-विकार तथा रंगीन द्रव्यों से हवन-बलि देता है, जिससे शुभ शक्तियाँ पुष्ट हों और आसुरी विघ्न, पाप व रोग शांत हों। निर्माण से पहले राक्षस, मातृगण, पिशाच, पितृ और क्षेत्रपाल आदि को बलि देना अनिवार्य बताया गया है, ताकि स्थल-सामंजस्य पूर्ण हो। आगे प्रतिष्ठा-विधि में कुम्भ-स्थापन (महीश्वर/वास्तु-रूप व वर्धनी सहित), ब्रह्मा व दिक्पाल-कुम्भ, पूर्णाहुति, मंडल-प्रदक्षिणा, सूत्र-जल से रेखांकन, खाई/खनन, मध्य-कूप की तैयारी, चतुर्भुज विष्णु को अर्घ्य, तथा श्वेत पुष्प, दक्षिणावर्त शंख, बीज और मिट्टी आदि शुभ-निक्षेप बताए गए हैं। अंत में वास्तु-शास्त्रीय चेतावनी है—जल-स्तर तक खुदाई कर शल्य (छिपी बाधक वस्तु) खोजकर हटाएँ; संकेतों से उसका ज्ञान होता है, और न हटाने पर दीवारों का विकार व गृहस्वामी का कष्ट आदि दोष होते हैं—इस प्रकार आध्यात्मिक शुद्धि और अभियान्त्रिक सावधानी दोनों का समन्वय किया गया है।
Verse 1
इत्य् आदिमहापुराणे आग्नेये प्रतिष्ठायां भूपरिग्रहो नामोनचत्वारिंशोध्यायः अथ चत्वारिंशो ऽध्यायः अर्घ्यदानविधानं भगवानुवाच पूर्वमासित् महद्भूतं सर्वभूतभयङ्करं तद्देवैर् निहितं भुमौ स वास्तुपुरुषः स्मृतः
इस प्रकार आदिमहापुराण अग्निपुराण के प्रतिष्ठा-खण्ड में ‘भू-परिग्रह’ नामक चालीसवाँ अध्याय है। अब चालीसवाँ अध्याय—अर्घ्यदान की विधि। भगवान ने कहा—पूर्वकाल में एक महान्, समस्त प्राणियों को भय देने वाला भूत था; देवताओं ने उसे पृथ्वी पर लिटा दिया; वही ‘वास्तु-पुरुष’ के नाम से स्मरण किया जाता है।
Verse 2
चतुःषष्टिपदे क्षेत्रे ईशं कोणार्धसंस्थितं घृताक्षतैस्तर्पयेत्तं पर्जन्यं पदगतं ततः
चौंसठ पदों वाले क्षेत्र-विन्यास में कोणार्ध-स्थान में स्थित ईश (शिव) को घृत और अक्षत से तर्पण करे। तत्पश्चात् अपने-अपने पद में स्थित पर्जन्य (वर्षा-देव) की पूजा करे।
Verse 3
उत्पलादिभिर्जयन्तञ्च द्विपदस्थं पताकया महेन्द्रञ्चैककोष्ठस्थं सर्वरक्तैः पदे रविं
उत्पल आदि से जयन्त का चित्रण करे—दो पदों पर स्थित, ध्वजा सहित। महेन्द्र को एक ही कोष्ठ में दर्शाए; और रवि (सूर्य) को अपने पद में सर्वथा रक्तवर्ण से अंकित करे।
Verse 4
वितानेनार्धपदगं सत्यं पदे भृशं घृतैः व्योम शाकुनमांसेन कोणार्धपदसंस्थितं
अर्धपद में वितान को स्थापित करे; पद में सत्य को रखे। ‘व्योम’ प्रदेश को घृत से भली-भाँति परिपूर्ण करे; और कोणार्धपद में पक्षियों का मांस विन्यस्त करे।
Verse 5
स्रुचा चार्धपदे वह्निं पूषाणं लाजयैकतः स्वर्णेन वितथं द्विष्ठं मथनेन गृहाक्षतं
स्रुचा (हवन-चम्मच) से अर्धपद में वह्नि (अग्नि) को स्थापित करे; पूषन् को लाज (भुने धान) के साथ एकत्र रखे। स्वर्ण से वितथ (असत्य/दोष) का शमन करे; मथन-दण्ड से द्विष्ट (शत्रुता) का निवारण करे; और गृहाक्षत से कर्म की प्रतिष्ठा करे।
Verse 6
मांसौदनेन धर्मेशमेकैकस्मिन् स्थितं द्वयं गन्धर्वं द्विपदं गन्धैर् भृशं शाकुनजिह्वया
हे धर्मेश! मांसौदन (मांसयुक्त पका अन्न) से प्रत्येक स्थान पर दो भाग रखे जाएँ—एक गन्धर्व के लिए और दूसरा द्विपद (मनुष्यादि) के लिए। उन्हें सुगन्धों से भली-भाँति सुवासित करके ‘शाकुनजिह्वा’ से अर्पित करे।
Verse 7
एकस्थमूर्ध्वसंस्थञ्च मृगं नीलपटैस् तथा पितॄन् कृशरयार्धस्थं दन्तकाष्ठैः पदस्थितं
वह ध्यान करे कि एक स्थान में स्थिर, ऊर्ध्वमुख मृग नीले वस्त्रों से आच्छादित है; और पितृगण कृशरा (चावल-दाल) के पात्र पर अर्धासीन हैं तथा दन्तकाष्ठों पर पाद-स्थित हैं।
Verse 8
नृहस्त इति ख, चिह्नितपुस्तकपाठः व्योम शाकुलमांसेनेति ख, चिह्नितपुस्तकपाठः दौवारिकं द्विसंस्थञ्च सुग्रीवं यावकेन तु पुष्पदन्तं कुशस्तम्बैः पद्मैर् वरुणमेकतः
चिह्नित पाण्डुलिपियों में ‘नृहस्त’ और ‘व्योम’ का पाठ मिलता है। (विधि यह कि) दौवारिक (द्वारपाल) तथा द्विसंस्थ को अर्पण करे; सुग्रीव को यावक (जौ) से, पुष्पदन्त को कुश-स्तम्बों से, और वरुण को पृथक् कमल-पुष्पों से अर्पित करे।
Verse 9
असुरं सुरया द्विष्ठं पदे शेषं घृताम्भसा यवैः पापं पदार्धस्थं रोगमर्धे च मण्डकैः
सुरा (मद्य) से द्विष्ट असुर-भाव को दूर करे। पाद पर जो शेष (अवशिष्ट दोष) रहे उसे घृतमिश्रित जल से शुद्ध करे। पाद के अर्धभाग में स्थित पाप को यव (जौ) से नष्ट करे, और मध्यभाग में स्थित रोग को मण्डक (पकवान) से शमित करे।
Verse 10
नागपुष्पैः पदे नागं मुख्यं भक्ष्यैर् द्विसंस्थितं मुद्गौदनेन भल्लाटं पदे सोमं पदे तथा
नागपुष्पों से (निर्दिष्ट) पद में नागदेव को स्थापित करे। मुख्य स्थान में भक्ष्य-प्रधान नैवेद्य को दो भागों में स्थित करके रखे। मुद्गौदन (मूँगयुक्त पका अन्न) से भल्लाट का अर्पण करे, और इसी प्रकार (अन्य) पद में सोम का भी स्थापित करे।
Verse 11
मधुना पायसेनाथ शालूकेन ऋषिं द्वये पदे दितिं लोपिकाभिरर्धे दितिमथापरं
मधु, पायस तथा शालूक (कमल-डंठल) के हवि-दान से ऋषि-पद प्राप्त होता है; उससे दो पद ऊपर दिति का पद मिलता है। लोपिका से आधे प्रमाण में दिति की प्राप्ति होती है और उसके बाद अन्य उच्च अवस्था प्राप्त होती है।
Verse 12
पूरिकाभिस्ततश्चापमीशाधः पयसा पदे ततोधश्चापवत्सन्तु दध्ना चैकपदे स्थितं
तदनंतर पूरिका से ‘अप्’ (जल-निवेदन) स्थापित करे। ईश-स्थान के नीचे उसके पद में दूध रखे। उसके नीचे ‘आपवत्स’ (दूध-मिश्रित जल) रखे, और दही को एक पद (निर्धारित स्थान) में स्थापित करे।
Verse 13
लड्डुकैश् च मरीचिन्तु पूर्वकोष्ठचतुष्टये सवित्रे रक्तपुष्पाणि ब्रह्माधःकोणकोष्ठके
लड्डू और मरीच (काली मिर्च) से पूर्व के चार कोष्ठ भरें। सवितृ के लिए ब्रह्मा के नीचे वाले कोण-कोष्ठ में लाल पुष्प स्थापित करें।
Verse 14
तदधःकोष्ठके दद्यात् सावित्र्यै च कुशोदकं विवस्ते ऽरुणं दद्याच्चन्दनञ्चतुरङ्घ्रिषु
उसके नीचे वाले कोष्ठ में सावित्री के लिए कुश-मिश्रित जल दें। वस्त्र-भाग में अरुण (लाल) वस्त्र अर्पित करें और चारों चरणों पर चन्दन का लेप/अर्पण करें।
Verse 15
रक्षोधःकोणकोष्ठे तु इन्द्रायान्नं निशान्वितं इन्द्रजयाय तस्याधो घृतान्नं कोणकोष्ठके
राक्षस-दिशा के कोण-कोष्ठ में इन्द्र के लिए हल्दी-मिश्रित अन्न-नैवेद्य रखें। उसके नीचे के कोण-कोष्ठ में इन्द्रजय (इन्द्र-विजय) हेतु घृतान्न (घी-भात) स्थापित करें।
Verse 16
चतुष्पदेषु दातव्यमिन्द्राय गुडपायसं वाय्वधःकोणदेशे तु रुद्राय पक्वमांसकं
चतुष्पद दिशाओं में इन्द्र को गुड़-मिश्रित पायस अर्पित करना चाहिए; और वायव्य अधःकोण प्रदेश में रुद्र को पका हुआ मांस निवेदित करना चाहिए।
Verse 17
तदधःकोणकोष्ठे तु यक्षायार्द्रं फलन्तथा महीधराय मांसान्नं माघञ्च चतुरङ्घ्रिषु
उस अधःकोण के कोष्ठ में यक्ष को रसयुक्त (आर्द्र) फल देना चाहिए; तथा महीधर को मांसयुक्त अन्न; और चतुरङ्घ्रि-स्थानों में माघ का भी अर्पण करना चाहिए।
Verse 18
मध्ये चतुष्पदे स्थाप्या ब्रह्मणे तिलतण्डुलाः चरकीं माषसर्पिभ्यां स्कन्दं कृशरयासृजा
मध्य के चतुष्पद (चतुष्कोण) स्थान में ब्रह्मा के लिए तिल और तण्डुल स्थापित करने चाहिए। चरकी को माष और घी के साथ अर्पित करे, और स्कन्द को कृशरा के साथ रक्त-रस सहित निवेदित करे।
Verse 19
रक्तपद्मैर् विदारीञ्च कन्दर्पञ्च पलोदनैः पूतनां पलपित्ताभ्यां मांसासृग्भ्याञ्च जम्भकं
रक्त कमलों के साथ विदारी और कन्दर्प को पलोदन सहित (अर्पित करे)। पूतना को पलपित्त के साथ, और जम्भक को मांस तथा रक्त के साथ (समर्पित/प्रयुक्त करे)।
Verse 20
मध्यचतुष्टये इति ख, चिह्नितपुस्तकपाठः पित्तासृगस्थिभिः पापां पिलिपिञ्जं स्रजासृजा ईशाद्यान् रक्तमांसेन अभावादक्षतैर् यजेत्
“मध्य-चतुष्टय में”—ऐसा पाठ है। पित्त, रक्त और अस्थियों से पापा (पाप-स्वरूपा) का पूजन करे; पिलिपिञ्ज का स्नायु-निर्मित माला से पूजन करे। ईश आदि देवताओं का रक्त-मांस से पूजन करे; इनके अभाव में अक्षत (कच्चे चावल) को विकल्प रूप में रखकर पूजन करे।
Verse 21
रक्षोमातृगणेभ्यश् च पिशाचादिभ्य एव च पितृभ्यः क्षेत्रपालेभ्यो बलीन् दद्यात् प्रकामतः
राक्षसों और मातृगणों, पिशाच आदि तथा पितरों और क्षेत्रपालों को भी इच्छानुसार और यथोचित मात्रा में बलि-आहुति देनी चाहिए।
Verse 22
आहुत्वैतानसन्तर्प्य प्रासादादीन्न कारयेत् ब्रहमस्थाने हरिं लक्ष्मीं गणं पश्चात् समर्चयेत्
इनको आहुति देकर तृप्त किए बिना प्रासाद आदि का निर्माण आरम्भ न करे। ब्रह्मस्थान में हरि (विष्णु), लक्ष्मी और तत्पश्चात् गण (गणेश) की विधिपूर्वक पूजा करे।
Verse 23
महीश्वरं वास्तुमयं वर्धन्या सहितं घटं ब्रह्माणं मध्यतः कुम्भे ब्रह्मादींश् च दिगीश्वरान्
घट (कुम्भ) में वास्तुरूप महेश्वर को वर्धनी सहित स्थापित करे; और कुम्भ के मध्य में ब्रह्मा तथा ब्रह्मा आदि दिगीश्वरों (दिक्पालों) का आवाहन करे।
Verse 24
दद्यात् पूर्णाहुतिं पश्चात् स्वस्ति वाच्य प्रणम्य च प्रगृह्य कर्करीं सम्यक् मण्डलन्तु प्रदक्षिणं
तदनन्तर पूर्णाहुति दे। फिर स्वस्तिवाचन कराकर प्रणाम करके, कर्करी को सम्यक् ग्रहण कर, मण्डल की प्रदक्षिणा करे।
Verse 25
सूत्रमार्देण हे ब्रह्मंस्तोयधाराञ्च भ्रामयेत् पूर्ववत्तेन मार्गेण सप्त वीजानि वापयेत्
हे ब्राह्मण! आर्द्र सूत्र से जलधारा को घुमाए; फिर उसी पूर्वोक्त मार्ग से सात बीज बोए।
Verse 26
प्रारम्भं तेन मार्गेण तस्य खातस्य कारयेत् ततो गर्तं खनेन्मध्ये हस्तमात्रं प्रमाणतः
निर्दिष्ट मार्ग के अनुसार पहले खाई (खात) बनवाए। फिर उसके मध्य में एक हस्त-प्रमाण का गर्त (गड्ढा) खोदे।
Verse 27
चतुरङ्गुलकं चाधश्चोपलिप्यार्चयेत्ततः ध्यात्वा चतुर्भुजं विष्णुमर्घ्यं दद्यात्तु कुम्भतः
नीचे के भाग को चार अङ्गुल प्रमाण तक लेपकर (शुद्ध कर) फिर पूजन करे। चतुर्भुज विष्णु का ध्यान करके कुम्भ से अर्घ्य अर्पित करे।
Verse 28
कर्कर्या पूरयेत् श्वभ्रं शुक्लपुष्पाणि च न्यसेत् दक्षिणावर्तकं श्रेष्ठं बीजैर् मृद्द्भिश् च पूरयेत्
गर्त/गुहा को कंकरी से भर दे और वहाँ श्वेत पुष्प रखे। परम शुभ दक्षिणावर्त शंख स्थापित करे तथा उसे बीजों और मिट्टी के ढेलों से भी भर दे।
Verse 29
अर्घ्यादानं विनिष्पाद्य गोवस्त्रादीन्ददेद्गुरौ कालज्ञाय स्थपतये वैष्णवादिभ्य अर्चयेत्
अर्घ्यदान पूर्ण करके गुरु को गौ, वस्त्र आदि दान दे। फिर कालज्ञ (मुहूर्तज्ञ), स्थापति (वास्तुकार) तथा वैष्णवों आदि का पूजन-सत्कार करे।
Verse 30
ततस्तु खानयेद्यत्नज्जलान्तं यावदेव तु पुरुषाधःस्थितं शल्यं न गृहे दोषदं भवेत्
तत्पश्चात् यत्नपूर्वक जल-स्तर तक खुदाई करे, जिससे पुरुष के नीचे स्थित शल्य (अशुभ वस्तु) घर में न रहे और दोषकारक न बने।
Verse 31
पिलिपिच्छमिति ङ, चिह्नितपुस्तकपाठः महीधरं वास्तुमयमिति ख, ङ, चिह्नितपुस्तकपाठः पुरुषाधिष्ठितं शल्यमिति ग, चिह्नितपुस्तकपाठः अस्थिशल्ये विद्यते वै भित्तिर्वै गृहिणो ऽसुखं यन्नामशब्दं शृणुयात्तत्र शल्यं तदुद्भवं
अस्थि-शल्य (हड्डी-सदृश छिपी बाधा) होने पर दीवार में विकार होता है और गृहस्वामी को निश्चय ही कष्ट होता है। जो भी नाम या शब्द निमित्त रूप से सुनाई दे, उसी से उत्पन्न शल्य को वहाँ समझना चाहिए।
The chapter emphasizes a Vāstu-śāstra workflow: 64-pada maṇḍala zoning with substance-specific offerings, followed by kumbha-sthāpana, pūrṇāhuti, traced trenching/pit creation, auspicious deposits (dakṣiṇāvarta conch, seeds), and finally śalya-doṣa detection by excavation to the water-line.
By treating land-taking and construction as dharmic worship: the site is approached as Vāstu-Puruṣa, offerings cultivate gratitude and restraint, bali reconciles visible and invisible stakeholders, and doṣa-removal becomes inner purification—aligning practical building with cosmic order and devotional discipline.