
Chapter 39 — भूपरिग्रहविधानम् (Bhū-parigraha-vidhāna: Procedure for Acquiring and Ritually Securing Land)
हयग्रीव प्रतिष्ठा-विधान के पूर्वांग के रूप में भूमि के विधिपूर्वक ग्रहण और शुद्धि का क्रम बताते हैं। पहले हयशीर्ष-तंत्र आदि तंत्रों का उल्लेख कर पाञ्चरात्र/तांत्रिक परंपरा की प्रामाणिकता स्थापित होती है, फिर कौन प्रतिष्ठा कर सकता है, मिथ्या आचार्य के लक्षण, और बाह्य चिह्नों से नहीं बल्कि तंत्र-निपुणता से सच्चे गुरु की पहचान बताई जाती है। आगे वास्तु-योजना में देवताओं का बस्ती की ओर मुख, तथा दिशानुसार स्थापना—अग्नि, यम, चण्डिका, वरुण, वायु, नाग, कुबेर/गुह, ईशान-क्षेत्र के देव—निर्दिष्ट हैं। अनुपात व सीमा-नियमों के बाद भूमि-शोधन, भूत-बलि, अष्ट दिशाओं में अष्टाक्षर मंत्र से सत्तू का छिड़काव, फिर हल चलाना और गो-चरण से स्थल को स्थिर करने का विधान है। अंत में त्रसरेणु से पद्महस्त तक माप-श्रृंखला देकर शुद्धि को निर्माण-विज्ञान से जोड़ा गया है।
Verse 1
अवर्णनं नाम अष्टत्रिंशोध्यायः कृष्णाश्रये गता इति ख, घ, ङ, चिह्नितपुस्तकत्रयपाठः प्रतिष्ठाद्यमिति ख, ङ, चिह्नितपुस्तकद्वयपाठः अथोनचत्वारिंशो ऽध्यायः भूपरिग्रहविधानं हयग्रीव उवाच विष्ण्वादीनां प्रतिष्ठादि वक्ष्ये ब्रह्मन् शृणुष्व मे प्रोक्तानि पञ्चरातराणि सप्तरात्राणि वै मया
अब उनचालीसवाँ अध्याय—भूमि-परिग्रह (भूमि-ग्रहण) की विधि। हयग्रीव बोले—हे ब्रह्मन्, मैं विष्णु आदि देवताओं की प्रतिष्ठा आदि विधियाँ कहूँगा; मेरी बात सुनो। पाँच-रात्र और सात-रात्र के व्रत-नियम मैंने ही बताए हैं। (पाठभेद: अड़तीसवें अध्याय का नाम ‘अवर्णन’; कुछ प्रतियों में ‘कृष्णाश्रये गता’ तथा कुछ में ‘प्रतिष्ठाद्यम्’ पाठ मिलता है।)
Verse 2
व्यस्तानि मुनिभिर्लोके पञ्चविंशतिसङ्ख्यया हयशीर्षं तन्त्रमाद्यं तन्त्रं त्रैलोक्यमोहनं
लोक में मुनियों ने तंत्रों को पच्चीस की संख्या में व्यवस्थित किया है। उनमें प्रथम हयशीर्ष-तंत्र है, जो त्रैलोक्य को मोहित करने वाला तंत्र है।
Verse 3
वैभवं पौष्करं तन्त्रं प्रह्रादङ्गार्ग्यगालवं नारदीयञ्च सम्प्रश्नं शाण्डिल्यं वैश्वकं तथा
वैभव, पौष्कर-तंत्र, प्रह्राद, आङ्गार्ग्य और गालव, नारदीय, सम्प्रश्न, शाण्डिल्य तथा वैश्वक—ये भी प्रामाणिक ग्रंथ हैं।
Verse 4
सत्योक्तं शौनकं तन्त्रं वासिष्ठं ज्ञानसागरं स्वायम्भुवं कपिलञ्च तार्क्षं नारायणीयकं
सत्योक्त, शौनक-तंत्र, वासिष्ठ, ज्ञानसागर, स्वायम्भुव, कपिल, तार्क्ष्य तथा नारायणीयक—इनको भी प्रामाणिक ग्रंथ जानना चाहिए।
Verse 5
आत्रेयं नारसिंहाख्यमानन्दाख्यं तथारुणं बौधायनं तथार्षं तु विश्वोक्तं तस्य सारतः
सार रूप में परंपरा इस प्रकार कही गई है—आत्रेय, ‘नारसिंह’ नामक, ‘आनन्द’ नामक, तथा अरुण; बौधायन, आर्ष और ‘विश्वोक्त’ नामक (ग्रंथ)।
Verse 6
प्रतिष्ठां हि द्विजः कुर्यान्मध्यदेशादिसम्भवः नकच्छदेशसम्भूतः कावेरीकोङ्कणोद्गतः
प्रतिष्ठा-विधि वही द्विज करे जो मध्यदेश आदि (मान्य) प्रदेशों में उत्पन्न हो; कच्छ-देश में जन्मा, तथा कावेरी-प्रदेश या कोङ्कण से आया हुआ (व्यक्ति) यह कर्म न करे।
Verse 7
कामरूपकलिङ्गोप्त्यः काञ्चीकाश्मीरकोशलः आकाशवायुतेजोम्बु भूरेताः पञ्च रात्रयः
कामरूप, कलिंग, उत्कल, कांची, कश्मीर और कोशल; तथा पाँच ‘रात्रियाँ’—आकाश, वायु, तेज, जल, भूमि—और रेतस् (बीज/सार) मानी जाती हैं।
Verse 8
अचैतन्यास्तमोद्रिक्ताः पञ्चरात्रविवर्जितं ब्रह्माहं विष्णुरमल इति विद्यात्स देशिकः
जो अचैतन्य है, तमोगुण से आक्रान्त है और पाञ्चरात्र परम्परा से रहित है—और कहता है, ‘मैं ब्रह्मा हूँ; मैं निर्मल विष्णु हूँ’—ऐसा व्यक्ति ‘देशिक’ (आचार्य) नहीं, ऐसा ही जानना चाहिए।
Verse 9
सर्वलक्षणहीणोपि स गुरुस्तन्त्रपारगः चैश्वरं तथेति ग, ङ, घ, चिह्नितपुस्तकत्रयपाठः तथाष्टाङ्गमिति ख, ङ, चिह्नितपुस्तकद्वयपाठः काश्मीरके स्थित इति ग, चिह्नितपुस्तकपाठः नगराभिमुखाः स्थाप्या देवा न च पराङ्मुखाः
यद्यपि वह समस्त (बाह्य) लक्षणों से हीन हो, तथापि यदि वह तन्त्र में पारंगत है तो वही गुरु है। देवताओं की स्थापना नगराभिमुख (बस्ती की ओर) करनी चाहिए, पराङ्मुख (पीठ फेरकर) नहीं।
Verse 10
कुरुक्षेत्रे गयादौ च नदीनान्तु समीपतः ब्रह्मा मध्ये तु नगरे पूर्वे शक्रस्य शोभनं
कुरुक्षेत्र, गया आदि में तथा नदियों के तट के समीप; नगर के मध्य में ब्रह्मा (का स्थान) और पूर्व दिशा में शक्र (इन्द्र) का शोभन (स्थान) होता है।
Verse 11
अग्नावग्नेश् च मातॄणां भूतानाञ्च यमस्य च दक्षिणे चण्डिकायाश् च पितृदैत्यादिकस्य च
अग्नि (वेदी) में अग्नि और अग्नेश के लिए, तथा मातृकाओं, भूतों और यम के लिए (भाग/आहुति) होते हैं। दक्षिण दिशा में चण्डिका के लिए, पितरों के लिए और दैत्यों आदि के लिए (भाग/आहुति) होते हैं।
Verse 12
वैरृते मन्दिरं कुर्यात् वरुणाददेश् च वारुणे वायोर् नागस्य वायव्ये सौम्ये यक्षगुहस्य च
नैऋत्य (दक्षिण‑पश्चिम) दिशा में मन्दिर बनाना चाहिए। पश्चिम (वारुण) में वरुण तथा उस दिशा के देवताओं को, उत्तर‑पश्चिम (वायव्य) में वायु और नाग को, तथा उत्तर (सौम्य) में यक्ष (कुबेर) और गुह (कार्त्तिकेय) को स्थापित करे।
Verse 13
चण्डीशस्य महेशस्य ऐशे विष्णोश् च सर्वशः पूर्वदेवकुलं पीड्य प्रासादं स्वल्पकं त्वथ
ईशान (उत्तर‑पूर्व) भाग में चण्डीश और महेश के लिए, तथा उसी प्रकार सर्वथा विष्णु के लिए—पूर्व के देवकुल (देव‑परिसर) को सम्यक् समायोजित/स्थानान्तरित करके—तदनन्तर अपेक्षाकृत छोटा प्रासाद (मन्दिर) बनाना चाहिए।
Verse 14
समं वाप्यधिकं वापि न कर्तव्यं विजानता उभयोर्द्विगुणां सीमां त्यक्त्वा चोच्छ्रयसम्मितां
जो जानकार है वह माप को न तो बिल्कुल समान रखे और न ही उसे अत्यधिक करे। दोनों ओर की दुगुनी सीमा‑रेखा को त्यागकर, निर्धारित ऊँचाई के अनुरूप ही अनुपात ग्रहण करे।
Verse 15
प्रासादं कारयेदन्यं नोभयं पीडयेद्बुधः भूमौ तु शोधितायां तु कुर्याद्भुमिपरिग्रहं
बुद्धिमान व्यक्ति अन्य (नया) प्रासाद बनवाए और दोनों पक्षों को कष्ट न दे। भूमि के शुद्ध हो जाने पर ही भूमि‑परिग्रह (औपचारिक अधिग्रहण) करे।
Verse 16
प्राकारसीमापर्यन्तं ततो भुतबलिं हरेत् माषं हरिद्राचूर्णन्तु सलाजं दधिसक्तुभिः
फिर प्राकार‑सीमा तक भूतबलि (भूत‑प्रेतादि हेतु अर्पण) करे। उसमें माष (उड़द), हरिद्रा‑चूर्ण, लाजा (भुना चावल) तथा दधि और सत्तू सहित अर्पित करे।
Verse 17
अष्टाक्षरेण सक्तूंश् च पातायित्वाष्टदिक्षु च राक्षसाश् च पिशाचाश् च येस्मिंस्तिष्ठन्ति भूतले
अष्टाक्षरी मंत्र का जप करते हुए आठों दिशाओं में सक्तु (भुना अन्न) बिखेरने से, उस स्थान की पृथ्वी पर रहने वाले राक्षस और पिशाच आदि सब दूर हो जाते हैं।
Verse 18
सर्वे ते व्यपगच्छन्तु स्थानं कुर्यामहं हरेः हलेन वाहयित्वा गां गोभिश् चैवावदारयेत्
“वे सब (विघ्न/अशुद्धियाँ) दूर हों। मैं हरि का स्थान तैयार करूँ।” बैल को जोतकर हल से भूमि जोते, और गायों से उसे रौंदकर/साफ कराए।
Verse 19
प्रमाण्वष्टकेनैव त्रसरेणुः प्रकीर्त्यते
आठ प्रमाणों से ही ‘त्रसरेणु’ की संज्ञा कही गई है।
Verse 20
तैर् अष्टभिस्तु बालाग्रं लिख्या तैर् अष्टभिर्मता ताभिर्यूकाष्टभिः ख्याता ताश्चाष्टौ यवमध्यमः
उनमें से आठ से बाल का अग्रभाग (बालाग्र) होता है; ऐसे ही आठ से जूँ (यूका) मानी गई है; और ऐसी आठ जूँ से मध्यम यव (यवमध्यम) कहा गया है।
Verse 21
नद्यद्रिषु इति ख, ग, ङ, चिह्नितपुस्तकत्रयपाठः यवाष्टकैर् अङ्गुलं स्याच्चतुर्विंशाङ्गुलः करः चतुरङ्गुलसंयुक्तः स हस्तः पद्महस्तकः
ख, ग और ङ चिह्नित तीन पांडुलिपियों में पाठ “नद्यद्रिषु” है। आठ यव से एक अङ्गुल होता है; चौबीस अङ्गुल का एक कर होता है; और उसमें चार अङ्गुल जोड़ देने पर वह हस्त कहलाता है, जिसे ‘पद्महस्त’ कहते हैं।
To define how land is ritually secured and purified as a prerequisite for deity consecration (pratiṣṭhā), integrating vāstu orientation, apotropaic offerings, and construction measurements.
It couples bhūmi-śodhana and bhūta-bali (removal of obstacles) with strict directional placements and a formal metrology (yava–aṅgula–hasta), showing that sacred presence depends on both purity and precision.
Because correct consecration is treated as a technical-sacred operation; mastery of the tantra ensures orthopraxy, while mere outward signs can mask tamasic or non-Pañcarātra deviations.