
Chapter 21 — सामान्यपूजाकथनम् (Teaching on General Worship)
इस अध्याय में विष्णु आदि देवताओं के लिए “सामान्य-पूजा” का मानक ढाँचा बताया गया है। अच्युत को सपरिवार सार्वत्रिक नमस्कार से आरम्भ कर, परिचर देवताओं, मण्डल-विन्यास और रक्षा/शक्ति-वर्धक अंगों का क्रमशः विस्तार होता है। द्वार-श्री, वास्तु आदि स्थल-शक्तियाँ, कूर्म व अनन्त जैसे विश्व-आधार, तथा कमल-प्रतीक में धर्म और उसके विपरीत गुणों का मानचित्रण वर्णित है। आगे विष्णु के आयुध व बीज (श्रीं, ह्रीं, क्लीं), शिव-पूजा की सामान्य विधि (नन्दी व महाकाल से आरम्भ), और सूर्य-पूजा में हृदय/शिर/नेत्र आदि न्यास-सदृश विन्यास, कवच-अंग तथा राहु–केतु सहित ग्रह-समन्वय दिया है। मंत्र-रचना के नियम (प्रणव, बिन्दु, चतुर्थी + नमः) और तिल-घृत से होम द्वारा पुरुषार्थ-फलदायी समापन, तथा पाठान्तरों का उल्लेख भी है।
Verse 1
इत्य् आदिमहापुराणे आग्नेये जगत्सर्गवर्णनं नाम विंशतितमो ऽध्यायः अथ एकविंशो ऽध्यायः सामान्यपूजाकथनं नारद उवाच सामान्यपूजां विष्ण्वादेर्वक्ष्ये मन्त्रांश् च सर्वदान् समस्तपरिवाराय अच्युताय नमो यजेत्
इस प्रकार श्री अग्नि-महापुराण में ‘जगत्सर्ग-वर्णन’ नामक बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब इक्कीसवाँ अध्याय ‘सामान्य-पूजा का कथन’ आरम्भ होता है। नारद बोले—मैं विष्णु आदि देवताओं की सामान्य पूजा-विधि तथा सर्वकाल में प्रयोज्य मंत्रों का वर्णन करूँगा। ‘समस्त परिवार सहित अच्युत को नमस्कार’ कहकर पूजा करे।
Verse 2
साग्नयो ह्य् अगादिति ख, चिह्नितपुस्तकपाठः, अग्निपाला वर्हिषदो ह्य् आज्यपाः साग्नयो ह्य् अजादिति घ, चिह्नितपुस्तकपाठः वैसारणी सुते इति ख, चिह्नितपुस्तकपाठः धात्रे विधात्रे गङ्गायै यमुनायै निधी तथा द्वारश्रियं वस्तुनवं शक्तिं कूर्ममनन्तकम्
कुछ पाण्डुलिपियों में ‘साग्नयः…’ ऐसा पाठ है; चिह्नित पुस्तकों में ‘अग्निपाल, बर्हिषद, आज्यप, साग्नयः…’ तथा ‘साग्नयः… अज’ इत्यादि पाठान्तर भी मिलता है; और कहीं ‘वैसारणी, हे सूत’ ऐसा भी है। (पूजा में) धाता और विधाता को, गंगा और यमुना को, तथा दोनों निधियों को; द्वार-श्री, वास्तु-नव (वास्तु-देवता), शक्ति, कूर्म और अनन्त को भी नमस्कार/आहुति दे।
Verse 3
पृथिवीं धर्मकं ज्ञानं वैराग्यैश्वर्यमेव च अधर्मादीन् कन्दनालपद्मकेशरकर्णिकाः
पृथ्वी को मूल के समान, धर्म को कन्द/डंठल के समान, और ज्ञान को कमल के समान समझना चाहिए; वैराग्य और ऐश्वर्य उसके केसर और कर्णिका के तुल्य हैं। अधर्म आदि को इसके विपरीत, मलिन करने वाले तत्त्वों के रूप में जानना चाहिए।
Verse 4
ऋग्वेदाद्यं कृताद्यञ्च सत्वाद्यर्कादिमण्डलम् विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया योगा च ता यजेत्
ऋग्वेद से आरम्भ होने वाले, कृतयुग से आरम्भ होने वाले, तथा सत्त्व से आरम्भ होने वाले सूर्य-मण्डल की पूजा करे; और साथ ही शुद्धि तथा उत्कर्ष देने वाली त्रयी—ज्ञान, क्रिया और योग—की भी आराधना करे।
Verse 5
प्रह्वीं सत्यां तथेशानानुग्रहासनमूर्तिकाम् दुर्गां गिरङ्गणं क्षेत्रं वासुदेवादिकं यजेत्
प्रह्वी, सत्याः तथा ‘ईशान-अनुग्रह-आसन-मूर्तिका’ नामक रूप की, और दुर्गा की पूजा करे; साथ ही गिर-अङ्गण (पर्वत-परिसर) और क्षेत्र (तीर्थ/मन्दिर-स्थल) की, तथा वासुदेव आदि (व्यूह-रूपों) की भी आराधना करे।
Verse 6
हृदयञ्च शिरः शूलं वर्मनेत्रमथास्त्रकम् शङ्खं चक्रं गदां पद्मं श्रीवत्सं कौस्तुभं यजेत्
हृदय और शिर में स्थित अधिष्ठातृ-शक्तियों का पूजन करे; फिर त्रिशूल, कवच और नेत्र-शक्ति, तथा उसके बाद अस्त्र-शक्ति का; और शंख, चक्र, गदा, पद्म, श्रीवत्स-चिह्न तथा कौस्तुभ-मणि का भी पूजन करे।
Verse 7
वनमालां श्रियं पुष्टिं गरुडं गुरुमर्चयेत् इन्द्रमग्निं यमं रक्षो जलं वायुं धनेश्वरम्
वनमाला, श्री (लक्ष्मी), पुष्टि, गरुड़ और गुरु का अर्चन करे; तथा इन्द्र, अग्नि, यम, रक्षः-पालक शक्ति, जल, वायु और धनेश्वर कुबेर का भी पूजन करे।
Verse 8
ईशानन्तमजं चास्त्रं वाहनं कुमुदादिकम् विष्वक्सेनं मण्डलादौ सिद्धिः पूजादिना भवेत्
मण्डल-व्यवस्था में ईशान, अनन्त, अज, अधिष्ठातृ-अस्त्र, वाहन, कुमुद आदि तथा विष्वक्सेन का विन्यास/आह्वान करे; पूजन और सम्बद्ध नियमों से सिद्धि प्राप्त होती है।
Verse 9
शिवपूजाथ सामान्या पूर्वं नन्दिनमर्चयेत् महाकालं यजेद्गङ्गां यमुनाञ्च गणादिकम्
शिव-पूजा की सामान्य विधि में पहले नन्दी का पूजन करे; फिर महाकाल का यजन करे, और गंगा-यमुना तथा गण आदि परिचारक देवताओं का भी पूजन करे।
Verse 10
गिरं श्रियं गुरुं वास्तुं शक्यादीन् धर्मकादिकम् वामा ज्येष्ठा तथा रौद्री काली कलविकारिणी
वह वाणी, श्री (समृद्धि), गुरु और वास्तु-तत्त्व के रूप में स्तुत्य है; वह शाक्या आदि तथा धर्मका आदि नामों से भी जानी जाती है; और वह वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली तथा कलविकारिणी भी है।
Verse 11
बलविकरिणी चापि बलप्रमथिनी क्रमात् घ, चिह्नितपुस्तकपाठः यजेत् दुर्गां इति ख, घ, चिह्नितपुस्तकपाठः गिरिं श्रियमिति ख, चिह्नितपुस्तकपाठः शिवं श्रियतमिति घ, चिह्नितपुस्तकपाठः गौरीं श्रियं गुरुं चास्त्रं शक्त्यादिं धर्मकादिकमिति ङ, चिह्नितपुस्तकपाठः सर्वभूतदमनी च मदनोन्मादिनी शिवासनं
इसके बाद क्रम से देवी का आवाहन ‘बलविकरिणी’ तथा ‘बलप्रमथिनी’ नामों से करे। पाठान्तरों में कहीं ‘दुर्गा की पूजा करे’, कहीं ‘गिरि-श्री (पर्वत की समृद्धि)’, और कहीं ‘शिव—परम कल्याणकारी/श्रियतम’ कहा गया है। आगे देवी ‘गौरी’, ‘श्री’, ‘गुरु’, ‘अस्त्र’, ‘शक्ति आदि’, ‘धर्म आदि’ तथा ‘सर्वभूतदमनी’, ‘मदनोन्मादिनी’ और ‘शिवासना’ नामों से भी पूज्या है।
Verse 12
हां हुं हां शिवमूर्तये साङ्गवक्त्रं शिवं यजेत् हौं शिवाय हामित्यादि हामीशानादिवक्त्रकं
‘हां हुं हां’ इस मंत्र-क्रम से अंगों और मुखों सहित शिव—शिवमूर्ति—की पूजा करे। इसी प्रकार ‘हौं शिवाय’ तथा ‘हाम्…’ आदि मंत्रों से ईशान आदि (दिशाओं के) मुखों वाले शिव का पूजन करे।
Verse 13
ह्रीं गौरीं गं गणः शक्रमुखाश् चण्डीहृतादिकाः क्रमात्सूर्यार्चने मन्त्रा दण्डी पूज्यश् च पिङ्गलः
सूर्य-पूजन में मंत्रों का प्रयोग क्रम से हो—पहले ‘ह्रीं’, फिर ‘गौरीं’, फिर ‘गं’; इसके बाद गण (गणेश), फिर शक्र (इन्द्र) आदि देवता; तथा चण्डी, हृत (हृदय) आदि। तत्पश्चात दण्डी और पिङ्गल की भी पूजा करे।
Verse 14
उच्चैःश्रवाश्चारुणश् च प्रभूतं विमलं यजेत् साराध्योपरमसुखं स्कन्दाद्यं मध्यतो यजेत्
उच्चैःश्रवा और चारुण, तथा प्रभूत और विमल की पूजा करे। साराध्य और परमसुख का भी पूजन करे, और मध्य-स्थान में स्कन्द आदि का यजन करे।
Verse 15
दीप्ता सूक्ष्मा जया भद्रा विभूतिर्विमला तथा अमोघा विद्युता चैव पूज्याथ सर्वतोमुखी
वह दीप्त, सूक्ष्म, जयदायिनी, भद्रा है; वह विभूति-स्वरूपा और विमला भी है। वह अमोघा, विद्युत्-सम तेजस्विनी, सर्वदा पूज्या और सर्वतोमुखी (सर्वदिशा में व्याप्त) है।
Verse 16
अर्कासनं हि हं खं ख सोल्कायेति च मूर्तिकाम् ह्रां ह्रीं स सूर्याय नम आं नमो हृदाय च
अर्कासन (सूर्य-आसन) के लिए ‘हं, खं, ख’ ये बीजाक्षर तथा ‘सोल्काय’ यह पद मूर्ति-स्थापन हेतु प्रयोग करें। फिर ‘ह्रां ह्रीं स—सूर्याय नमः’ का जप करें और हृदय-न्यास में ‘आं—नमो हृदाय’ कहें।
Verse 17
अर्काय शिरसे तद्वदग्नीशासुरवायुगान् भूर्भुवः स्वरे ज्वालिनि शिखा हुं कवचं स्मृतं
शिर-न्यास में सूर्य का विन्यास करें; उसी प्रकार अग्नि, ईश, असुर और वायु का भी। ‘भूः’ और ‘भुवः’ के उच्चारण तथा स्वर सहित ‘ज्वालिनि, शिखा, हुं’ यह मंत्र कवच (रक्षा) के रूप में स्मरण किया गया है।
Verse 18
भां नेत्रं वस् तथार्कास्त्रं राज्ञी शक्तिश् च निष्कुभा सोमो ऽङ्गारकोथ बुधो जीवः शुक्रः शनिः क्रमात्
‘भां’ नेत्र के लिए; ‘वस्’ तथा ‘अर्कास्त्र’ (सूर्य का अस्त्र); ‘राज्ञी’ (रानी), ‘शक्ति’ (भाला) और ‘निष्कुभा’—ये क्रमशः सोम (चन्द्र), अङ्गारक (मंगल), बुध, जीव (बृहस्पति), शुक्र और शनि के लिए विन्यस्त किए जाते हैं।
Verse 19
राहुः केतुस्तेजश् चण्डः सङ्क्षेपादथ पूजनं आसनं मूर्तये मूलं हृदाद्यं परिचारकः
राहु और केतु को ‘तेज’ तथा ‘चण्ड’ नाम से भी आवाहन किया जाता है। संक्षेप में उनकी पूजा यह है—देव-मूर्ति को आसन अर्पित करें, मूल-मंत्र तथा हृदय आदि का न्यास करें, और परिचारक देवताओं का आवाहन करें।
Verse 20
विष्ण्वासनं विष्णुर्मूर्तेरों श्रीं श्रीं श्रीधरोहरिः ह्रीं सर्वमूर्तिमन्त्रोयमिति त्रैलोक्यमोहनः
विष्णु की मूर्ति के लिए विष्ण्वासन (विष्णु-आसन) यह है—‘ॐ श्रीं श्रीं—श्रीधर हरि; ह्रीं।’ यह ‘सर्वमूर्ति’ मंत्र कहलाता है और ‘त्रैलोक्य-मोहन’ के नाम से प्रसिद्ध है।
Verse 21
ह्रीं हृषीकेशः क्लीं विष्णुः स्वरैर् दीर्घैर्हृदादिकं समस्तैः पञ्चमी पूजा सङ्ग्रामादौ जयादिदा
‘ह्रीं’ बीज से हृषीकेश का, और ‘क्लीं’ बीज से विष्णु का आवाहन किया जाता है। हृदादि (हृदय आदि) मन्त्रों का पाठ सभी दीर्घ स्वरों सहित करना चाहिए। पञ्चमी तिथि की पूजा, विशेषकर युद्धारम्भ में, विजय आदि फल देती है।
Verse 22
सावाराध्योपरं दुःखमिति ख, चिह्नितपुस्तकपाठः अग्निसाश्रयवायुगानिति ख, चिह्नितपुस्तकपाठः अर्काय शिरसे तद्वदग्निजायायुतञ्च तदिति ङ,चिह्नितपुस्तकपाठः शक्तिश् च निर्गता इति ख, चिह्नितपुस्तकपाठः चक्रं गदां क्रमाच्छङ्खं मुषलं खड्गशार्ङ्गकम् पाशाङ्कुशौ च श्रीवत्सं कौस्तुभं वनमालया
कुछ पाण्डुलिपियों में ‘सावाराध्य…’, ‘अग्निसाश्रय…’, ‘अर्क के लिए शिरः… वैसे ही अग्निजाया के लिए…’ तथा ‘शक्ति निकल पड़ी…’ ऐसे पाठभेद मिलते हैं। प्रचलित पाठ में देवता के हाथों में चक्र, गदा, क्रम से शंख; मूसल, खड्ग और शार्ङ्ग (धनुष); साथ ही पाश और अंकुश; तथा श्रीवत्स-चिह्न, कौस्तुभ-मणि और वनमाला का वर्णन है।
Verse 23
श्रीं श्रीर्महालक्ष्मीतार्क्ष्यो गुरुरिन्द्रादयो ऽर्चनम् सरस्वत्यासनं मूर्तिरौं ह्रीं दधी सरस्वती
‘श्रीं’ बीज श्री (लक्ष्मी), महालक्ष्मी, तार्क्ष्य (गरुड़), गुरु तथा इन्द्र आदि का स्वरूप है—इनका अर्चन करना चाहिए। सरस्वती के आसन और मूर्ति का आवाहन ‘ॐ’ और ‘ह्रीं’ बीजों से किया जाता है। ‘दधि’ सरस्वती का नैवेद्य/लक्षण है।
Verse 24
हृदाद्या लक्ष्मीर्मेधा च कलातुष्टिश् च पुष्टिका गौरी प्रभामती दुर्गा गणो गुरुश् च क्षेत्रपः
हृदाद्या, लक्ष्मी, मेधा, कला, तुष्टि, पुष्टिका, गौरी, प्रभामती, दुर्गा, गण, गुरु और क्षेत्रप—ये पावन दिव्य नाम स्मरण/आवाहन के योग्य हैं।
Verse 25
तथा गं गणपतये च ह्रीं गौर्यै च श्रीं श्रियै ह्रीं त्वरितायै ह्रीं सौ त्रिपुरा चतुर्थ्यन्तनमोन्तकाः
इसी प्रकार ‘गं’ बीज गणपति के लिए, ‘ह्रीं’ गौरी के लिए, ‘श्रीं’ श्री (लक्ष्मी) के लिए, ‘ह्रीं’ त्वरिता के लिए, और ‘ह्रीं’ के साथ ‘सौ’ त्रिपुरा के लिए—इन सबको चतुर्थी (दत्तिव) विभक्ति में रखकर अंत में ‘नमः’ जोड़कर पूर्ण करना चाहिए।
Verse 26
प्रणवाद्याश् च नामाद्यमक्षरं विन्दुसंयुतं ॐ युतं वा सर्वमन्त्रपूजनाज्जपतः स्मृताः
प्रणव (ॐ) से आरम्भ करके, नाम का प्रथम अक्षर बिन्दु (ं) से युक्त या ॐ से संयुक्त—यह सब मन्त्रों की पूजा हेतु किए जाने वाले जप के लिए परम्परा से विहित माना गया है।
Verse 27
होमात्तिलघृताद्यैश् च धर्मकामार्थमोक्षदाः पूजामन्त्रान् पठेद्यस्तु भुक्तभोगो दिवं व्रजेत्
तिल, घी आदि से होम करके धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष देने वाले पूजामन्त्रों का पाठ करना चाहिए; जो उनका पाठ करता है, वह (धर्मसम्मत) भोग भोगकर स्वर्ग को जाता है।
It outlines a repeatable template: invoke the main deity with retinue, establish āsana/mūrti, perform hṛd-ādi placements (nyāsa), add kavaca/astra protections, worship emblems and attendants in a maṇḍala order, and complete with japa and homa for puruṣārtha results.
The chapter includes site and threshold powers (Vāstu, Dvāra-Śrī), cosmic supports (Kūrma, Ananta), rivers (Gaṅgā, Yamunā), guardians and gods (Indra, Agni, Yama, Vāyu, Kubera), Viṣṇu’s retinue and emblems, Śiva’s attendants (Nandin, Mahākāla, Gaṇas), and Sūrya-linked grahas including Rāhu and Ketu.
It frames mantra-japa and homa as dharma–kāma–artha–mokṣa bestowing, showing that correct ritual order (vidhi), protective formulae, and disciplined recitation are not merely technical but vehicles aligning worldly success with ultimate liberation.
Mantras should begin with praṇava (Oṃ); use the first syllable of the deity-name joined with bindu (ṃ) or conjoined with Oṃ; and in several cases employ the dative (fourth-case) ending, concluding with “namaḥ.”