
Explanation of the Characteristics of Mudrās (मुद्रालक्षणकथनं)
पिछले अध्याय में मंत्रों के प्रदर्शन के बाद यहाँ मुद्रा-लक्षण का निरूपण है—वे विधिपूर्वक हस्त-आकार जिनसे देव-सन्निधि और अन्य कर्मफल उत्पन्न होते हैं। नारद हृदय के समीप की गई ‘अंजलि’ को मुख्य नमस्कार-मुद्रा बताकर भक्ति को तकनीकी विधि का प्रवेशद्वार ठहराते हैं। फिर बाएँ हाथ की मुठ्ठी, ऊपर उठा अंगूठा और दाएँ अंगूठे की पकड़ आदि से आरम्भ कर सूक्ष्म देह-चेष्टा का क्रम बताया गया है। यज्ञ-व्यूह में साधारण और असाधारण मुद्राओं का भेद तथा कनिष्ठिका से क्रमशः खोलते हुए आठ मुद्राओं की अनुक्रमणा दी गई है। बीज-प्रयोग, सिद्धि आदि उद्देश्यों में पाठान्तरों का संकेत, वराह-मुद्रा और अङ्गना-मुद्राओं का क्रम भी आता है। अंत में दाहिनी ओर उसी रचना को संकुचित कर प्रतिबिम्बित करने की विधि बताकर कहा गया है कि शुद्ध विन्यास से मुद्रा-सिद्धि होती है।
Verse 1
इत्य् आदिमहापुराणे आग्नेये मन्त्रप्रदर्शनं नाम पञ्चविंशो ऽध्यायः अथ षड्विंशो ऽध्यायः मुद्रालक्षणकथनं नारद उवाच मुद्राणां लक्षणं वक्ष्ये सान्निध्यादिप्रकारकं अञ्जलिः प्रथमा मुद्रा वन्दनी हृदयानुगा
इस प्रकार आदि-महापुराण, अग्निपुराण में ‘मन्त्र-प्रदर्शन’ नामक पच्चीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब छब्बीसवाँ अध्याय ‘मुद्राओं के लक्षणों का कथन’ आरम्भ होता है। नारद बोले—मैं मुद्राओं के लक्षण बताऊँगा, जो सान्निध्य आदि (अनुष्ठान-फल) उत्पन्न करती हैं। प्रथम मुद्रा ‘अञ्जलि’ है—यह वन्दना की मुद्रा है, जो हृदय के अनुसार (हृदय के पास) की जाती है।
Verse 2
ऊर्ध्वाङ्गुष्ठोवाममुष्टिर्दक्षिणाङ्गुष्ठबन्धनं सव्यस्य तस्य चाङ्गुष्ठो यस्य चोर्ध्वे प्रकीर्तितः
बाएँ हाथ की मुट्ठी बनाकर उसका अँगूठा ऊपर उठाए। दाएँ हाथ का अँगूठा उस बाएँ (मुष्टि) को बाँधे/जकड़े। यह वही मुद्रा कही गई है जिसमें अँगूठा ऊपर स्थित रहता है।
Verse 3
तिस्रः साधरणा व्यूहे अथासाधरणा इमाः कनिष्ठादिविमोकेन अष्टो मुद्रा यथाक्रमं
व्यूह (अनुष्ठान-रचना) में तीन साधारण मुद्राएँ होती हैं; अब ये असाधारण मुद्राएँ (कही जाती हैं)। कनिष्ठा (छोटी उँगली) से क्रमशः खोलने/छोड़ने के द्वारा, यथाक्रम आठ मुद्राएँ होती हैं।
Verse 4
अष्टानां पूर्ववीजानां क्रमशस्त्ववधारयेत् अङ्गुष्ठेन कनिष्टान्तं नमयित्वाङ्गुलित्रयं
पहले आठ बीजाक्षरों का क्रम यथाविधि निश्चित करे। अँगूठे से कनिष्ठा की नोक को मोड़कर, फिर तीन उँगलियों के समूह को भी मोड़े।
Verse 5
ऊर्ध्वं कृत्वा सम्मुखञ्च वीजाय नवमाय वै वामहस्तमथोत्तानं कृत्वार्धं नामयेच्छनैः
उसे ऊपर उठाकर और सामने की ओर करके, नवम ‘वीजायन’ (पंखा-हस्त) करे। फिर बाएँ हाथ को हथेली ऊपर करके, उसे धीरे-धीरे आधा मोड़े।
Verse 6
सर्वसिद्ध्यै इति ख, ङ, चिह्नितपुस्तकद्वयपाठः वैराजं नागसंयुतमिति ख, चिह्नितपुस्तकपाट्ःअः यौ वीजं चाङ्गसंयुतमिति ङ, चिह्नितपुस्तकपाठः यः सव्येर्धे प्रकीर्तित इति ख, चिह्नितपुस्तकपाठः वराहस्य स्मृता मुद्रा अङ्गनाञ्च क्रमादिमाः एकैकां मोचयेद्बद्ध्वा वाममुष्टो तथागुलीं
‘सर्वसिद्ध्यै’—ऐसा कुछ चिह्नित पाण्डुलिपियों में पाठ है; और कुछ में ‘वैराजं नागसंयुतम्’ पढ़ा जाता है। अन्यत्र ‘यौ’ बीज को अङ्ग-मन्त्रों सहित कहा गया है, और कुछ में ‘यः सव्येर्धे प्रकीर्तितः’—ऐसा पाठ है। फिर वराह की मुद्रा तथा अङ्गना-मुद्राओं का क्रम बताया गया है; बाएँ हाथ की मुट्ठी और उँगलियाँ बाँधकर, उन्हें क्रम से एक-एक करके खोलना चाहिए।
Verse 7
आकुञ्चयेत् पूर्वमुद्रां दक्षिणेप्येवमेव च ऊर्ध्वाङ्गुष्ठो वाममुष्ठिर्मुद्रासिद्धिस्ततो भवेत्
पहले पूर्वोक्त मुद्रा को संकुचित (अकुंचित) करे; और दाहिनी ओर भी उसी प्रकार करे। बाएँ हाथ की मुट्ठी बनाकर अँगूठा ऊपर रखे—तब मुद्रा की सिद्धि होती है।
Añjali (palms joined) is taught first; it functions as a gesture of reverent salutation and is performed in alignment with the heart, establishing devotional orientation and ritual propriety.
By disciplining bodily action into precise mudrā-forms that invoke sannidhya, the chapter links external ritual correctness (karma/ācāra) with inner devotion and concentration, supporting Dharma and ultimately aiding the pursuit of Mukti while enabling efficacious practice (Bhukti).