
Abhiṣeka-vidhāna (The Procedure for Consecratory Bathing)
इस अध्याय में दीक्षा-वर्णन के बाद नारद अभिषेक-विधान का विस्तार से निरूपण करते हैं। अभिषेक आचार्य और साधक-शिष्य को सिद्धि देने वाला तथा रोग-शमन करने वाला उपचारात्मक कर्म कहा गया है। रत्नों से अलंकृत, प्रतिमायुक्त कुम्भों को मध्य से आरम्भ कर पूर्व आदि दिशाओं में क्रमबद्ध रखा जाता है, जिससे ब्रह्माण्डीय विन्यास प्रकट हो। कर्म की तीव्रता हेतु सहस्रावृत्ति, अथवा सामर्थ्य अनुसार शतावृत्ति बताई गई है। मण्डप-मण्डल में विष्णु को पीठ पर पूर्व व ईशानाभिमुख प्रतिष्ठित कर वास्तु-तर्क से जोड़ा गया है। आचार्यगण और पुत्रक की तैयारी, अभिषेक-देवता का पूजन, तथा गीत/पाठ जैसे मङ्गल-ध्वनियों के साथ विधि सम्पन्न होती है। अंत में योगपीठ-संबंधी सामग्री का प्रदान, गुरु द्वारा समय-व्रतों की घोषणा, तथा गोपनीयता व अनुशासन से शिष्य को परम्परा के पूर्ण अधिकार का पात्र बताया गया है।
Verse 1
ए इत्य् आदिमहापुराणे आग्नेये सर्वदीक्षाकथनं नाम सप्तविंशोध्यायः पशूनिति घ, चिह्नितपुस्तकपाठः तत् पुनरिति ख, ग, घ, ङ, चिह्नितपुस्तकचतुष्टयपाठः अथ अष्टाविंशोध्यायः अभिषेकविधानं नारद उवाच अभिषेकं प्रवक्ष्यामि यथाचार्यस्तु पुत्रकः सिद्धिभाक् साधको येन रोगी रोगाद्विमुच्यते
आग्नेय आदिमहापुराण में सत्ताईसवाँ अध्याय “सर्वदीक्षा-कथन” नाम से प्रसिद्ध है (चिह्नित पाण्डुलिपियों में पाठभेद सूचित हैं)। अब अट्ठाईसवाँ अध्याय “अभिषेक-विधान” आरम्भ होता है। नारद बोले—मैं अभिषेक का विधान बताता हूँ, जिससे आचार्य और पुत्रक-साधक सिद्धि को प्राप्त होते हैं और रोगी रोग से मुक्त होता है।
Verse 2
राज्यं राजा सुतं स्त्रीञ्च प्राप्नुयान्मलनाशनं मूर्तिकुम्भान् सुरत्नाढ्यान्मध्यपूर्वादितो न्यसेत्
इस मल-नाशक विधान से राजा राज्य-प्राप्ति करता है; पुत्र और पत्नी भी प्राप्त होते हैं। उत्तम रत्नों से अलंकृत मूर्ति-युक्त कलशों को मध्य से रखकर फिर पूर्व दिशा से क्रमशः स्थापित करे।
Verse 3
सहस्रावर्तितान् कुर्यादथवा शतवर्तितान् मण्डपे मण्डले विष्णुं प्राच्यैशान्याञ्च पीठिके
सहस्रावृत्ति (हज़ार बार) अथवा शतावृत्ति (सौ बार) के अनुसार (वस्तुओं/जपादि) की व्यवस्था करे। मण्डप के मण्डल में पूर्व तथा ईशान (उत्तर-पूर्व) की पीठिका पर विष्णु को स्थापित करे।
Verse 4
निवेश्य शकलीकृत्य पुत्रकं साधकादिकं अभिषेकं समभ्यर्च्य कुर्याद्गीतादिपूर्वकं
व्यवस्था करके ‘पुत्रक’ को खण्ड-खण्ड कर तैयार करे, तथा साधक आदि कर्मकर्ताओं के साथ अभिषेक का सम्यक् पूजन करे; फिर गीत आदि (मंगल-पाठ) से पूर्वक होकर विधान सम्पन्न करे।
Verse 5
दद्याच्च योगपीठादींस्त्वनुग्राह्यास्त्वया नराः गुरुश् च समयान् ब्रूयाद्गुप्तः शिष्योथ सर्वभाक्
योगपीठ आदि सामग्री का दान करे; जिन मनुष्यों पर तुम्हें अनुग्रह करना है वे (इस प्रकार) प्रसाद प्राप्त करें। गुरु समय (अनुशासन-व्रत) भी बताए। शिष्य उन्हें गुप्त रखकर तब सबका अधिकारी हो जाता है।
It is described as impurity-destroying, granting sovereignty to a king, enabling attainment of son and wife, producing siddhi for guru and sādhaka, and releasing a sick person from disease.
The procedural details (mandala layout, repetition counts, installation, music/recitation) culminate in samaya vows and secrecy, showing that efficacy depends on disciplined conduct and controlled transmission, not merely external performance.