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त्याग–धर्म–मर्यादा का सोपान: यहाँ ‘राज्य’ बाह्य सत्ता नहीं, बल्कि मन-राज्य (अहं-राज) का परित्याग है। अयोध्या काण्ड साधक को शोक से विवेक, और अधिकार-लालसा से सेवाभाव की ओर ले जाता है—पितृवचन-पालन, गुरु-आज्ञा, और लोकधर्म के माध्यम से ‘निज हित’ को ‘राम-हित’ में विलीन करना। यह सीढ़ी बताती है कि मुक्ति का द्वार राजसुख नहीं, बल्कि मर्यादा-पालन और अनासक्ति है।
これらの詩句では、カルナー・ラサの根流(ダシャラタの火葬、供水の儀、十日祭)が、次第にシャーンタ・ラサとダルマ・ラサへと転じてゆく。バラタの人物像はここで「悲しみの崇高化」である。嘆きを自己否定ではなく、自己浄化の手段とする。ヴァシシュタの教誡は「損得・生死」をヴィディ(天命)の御手として示し、怒りを鎮める――ここに『マーナス』神学の中心がある。神のリーラーの中での、人のマリヤーダーとしての役割である。さらに倫理的箴言(嘆くべき者、嘆くべからざる者)が、世俗のダルマを霊的弁別の道具へと変える。バラタの返答はバクティの相を際立たせる――王国は二次的であり、ラグの主なくしては身体の享楽も、ジャパも、ヨーガもすべて空しい。かくして本段は「離欲より生じるダースヤ(奉仕)バクティ」を確立し、次の段――ラーマ奉仕/パードゥカー統治――への準備を整える。
Verse 347 (चौपाई)
नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा।। गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी।। चंदन अगर भार बहु आए। अमित अनेक सुगंध सुहाए।। सरजु तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई।। एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही।। सोधि सुमृति सब बेद पुराना। कीन्ह भरत दसगात बिधाना।। जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा। तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा।। भए बिसुद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजि गज बाहन नाना।।
ヴェーダに通じた王は、極めて不思議な空飛ぶ戦車を作らせた。バラタは母の足を取り、すべてを守った。王妃たちは彼を一目見ようと願って留まった。白檀と沈香が大量に届き、数え切れないほどの多くの香りが漂った。サラユ川の岸辺で火葬の薪を組んだ。それは神々の都の階段を飾るかのようであった。このようにしてすべての火葬の儀式が行われた。儀式の沐浴の後、水の供物が捧げられた。スムリティ、すべてのヴェーダとプラーナを調べて、バラタは十種の儀式を行った。大聖者が命じたところで、そのように、千通りの方法ですべてが行われた。すべてが清められ、贈り物が与えられた。牛、馬、象、そして様々な乗り物が。
Verse 348 (दोहा/सोरठा)
सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम। दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम।।170।।
玉座、装飾品、衣類、穀物、土地、富、そして家々。バラタはそれらすべてを与え、地上の王たちは願いを完全に満たした。
Verse 349 (चौपाई)
पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी।। सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।। बैठे राजसभाँ सब जाई। पठए बोलि भरत दोउ भाई।। भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे। नीति धरममय बचन उचारे।। प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी। कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी।। भूप धरमब्रतु सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा।। कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ।। बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी।।
バラタが父のために行ったこと、その行いは十万語を尽くしても語り尽くせない。吉祥の日を選び、大聖者に相談してから、彼は来てすべての大臣と長老を呼び集めた。皆は王宮の集会所に行って座った。バラタは二人の兄弟を呼び寄せた。バラタはヴァシシュタを近くに座らせ、法と正義に満ちた言葉を語った。まず大聖者がすべての物語を語った。欺瞞に満ちたカイケーイーがどう振る舞ったかを。王は法を守る者として、真実の者として称えられた。自らの身を捨てて愛を貫いた彼は。ラーマの徳、その性格と本質を語り、聖者の目は涙で満ち、身は震えた。再びラクシュマナとシーターの愛を語り、賢明な聖者は悲しみと愛情に浸った。
Verse 350 (दोहा/सोरठा)
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।।171।।
聞け、バラタよ、未来は強大である。聖者の主は泣きながら語った。損失と利益、生と死、名誉と不名誉は、すべて天命の手の中にある。
Verse 351 (चौपाई)
अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू।। तात बिचारु केहि करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं।। सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना।। सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना।। सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू।। सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी।। सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी।। सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई।।
このように考えて、誰を責めるべきか。無駄に誰に怒るべきか。父よ、心の中で何を考えるべきか。ダシャラタ王は嘆くべき方ではない。ヴェーダを持たず、自らの法を捨てて感覚的快楽に浸るバラモンを嘆け。統治の道を知らず、民が命のように愛しくない王を嘆け。客、シヴァ、そして信仰を敬うことを知らない富める年寄りの守銭奴を嘆け。バラモンを軽蔑し、大声で、称賛を好み、偽りの知識に驕るシュードラを嘆け。夫を欺き、曲がった心を持ち、争いを好み、自分の意のままに振る舞う妻を嘆け。自らの誓いを捨て、グルの命令に従わない学生を嘆け。
Verse 352 (दोहा/सोरठा)
सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग। सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग।।172।।
迷いに支配されて正しい行いの道を捨てる家長を嘆け。世界に執着し、分別と離脱を失った行者を嘆け。
Verse 353 (चौपाई)
बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू।। सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी।। सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी।। सोचनीय सबहि बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई।। सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।। भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा।। बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा। बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा।।
苦行を失って享楽を求めるヴァイカーナサ修行者を悼みなさい。理由もなく怒り、母、父、師、親族に敵対する中傷者を悼みなさい。あらゆる点で他人を害し、自分の体を養い、徹底的に無慈悲な者を悼みなさい。ハリの僕でありながら欺瞞を捨てない者だけが、あらゆる点で悼まれるに値する。コーサラの主は悼まれるべきではない、その栄光は十四世界に現れている。過ぎ去ったことは取り消せず、今後も決して取り消されない、バラタ王よ、あなたの父はそのような方であった。ブラフマー、ヴィシュヌ、シヴァ、神々の主、方位の主たちが皆、ダシャラタの徳の物語を語る。
Verse 354 (दोहा/सोरठा)
कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु। राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु।।173।।
父よ、誰がどのようにして彼を非難できましょうか。ラーマ、ラクシュマナ、そしてあなたは彼の善良で純粋な息子たちのようであり、敵の破壊者です。
Verse 355 (चौपाई)
सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी।। यहु सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू।। राँय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा।। तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरहागी।। नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना।। करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई।। परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी।। तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ।।
王はあらゆる点で最も幸運です、だから悲しみを捨ててこの務めに励みなさい。これを聞いて理解し、すべての不安を捨て去り、王の命令を頭に受けなさい。王はあなたに主権を与えた、父の言葉は遅滞なく果たされなければならない。自分の言葉に固執してラーマを捨てた者、その者はラーマと離別し、自らの体を捨てた。王にとって言葉は愛しい、命そのものは愛しくない、だから愛しい子よ、父の言葉を受け入れなさい。王の命令を頭に受けなさい、すべての善があらゆる点であなたにもたらされる。パラシュラーマは父の命令を守り、全世界が証人となる中で母を殺した。若さにおいて命を捧げた者は、父の命令によって罪も不名誉も負わなかった。
Verse 356 (दोहा/सोरठा)
अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन। ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन।।174।।
適切か不適切かという考えを捨てて父の言葉を果たす者たちは、幸福と良き名声の器となり、不死の主の御前に住む。
Verse 357 (चौपाई)
अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू।। सुरपुर नृप पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू।। बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका।। करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी।। सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं। अनुचित कहब न पंडित केहीं।। कौसल्यादि सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं।। परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि।। सौंपेहु राजु राम कै आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ।।
王よ、必ず言葉を遅滞なく果たしなさい、民を守り、悲しみを捨てなさい。神々の都で王は満足を得る、あなたには功徳と良き名声があり、非難はない。ヴェーダは宣言し、すべての者が同意する、父が王国を与える者が王冠を受ける。王国を治め、すべての恥を捨てなさい、私の言葉を善と知って受け入れなさい。これを聞いて、ラーマとジャナキは慰めを得る、賢者は誰もそれを不適切とは呼ばない。カウサリヤとすべての母たち、そして同様に民も、幸福になり喜びに満ちる。ラーマはあなたが彼に極めて献身していることを知る、彼はあらゆる点であなたを善き者と見なす。ラーマが帰還したとき王国を彼に委ねなさい、愛と献身をもって彼に仕えなさい。
Verse 358 (दोहा/सोरठा)
कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि। रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि।।175।।
師の命令を必ず実行しなさい、と顧問たちは合掌して言う。ラグの主が帰還したとき、その時状況に応じて適切なことを行う。
Verse 359 (चौपाई)
कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई।। सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी।। बन रघुपति सुरपति नरनाहू। तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू।। परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा।। लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई।। सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू।। गुर के बचन सचिव अभिनंदनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु।। सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी।।
カウサリヤは勇気を抱いて言った、「息子よ、師の命令は有益で適切である。だからそれを敬い、善と受け入れなさい、時の移り変わりを知って悲しみを捨てなさい。ラグの主は森に行った、神々の主、人間の主、あなた、息子よ、このように苦悩している。親族、民、顧問、母よ、すべてが息子であるあなたにのみ頼っている。運命の逆転、時代の厳しさを見て、勇気を抱きなさい、母よ、私はあなたに身を捧げる。師の命令を頭に受け、それに従いなさい、民を守り、親族の悲しみを取り除きなさい。師の言葉に顧問たちは歓喜した、バラタはそれを聞き、心はあたかもチャンダンで癒されるように慰められた。それから再び母の優しい言葉を聞いた、徳、愛、素朴な優雅さに満ちた。
Verse 360 (छंद)
सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरत ब्याकुल भए। लोचन सरोरुह स्त्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए।। सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की। तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की।।
素朴で優しい母の言葉を聞いて、バラタは極度に苦悩した。蓮の目から涙が流れ、心の別離の悲しみの新芽を潤した。その状態を見て、その瞬間に彼は体のすべての意識を忘れた。トゥルシダースは、敬意をもってシヴァの自然な愛を大切にするすべての人を称える。
Verse 361 (दोहा/सोरठा)
भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि। बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि।।176।।
バラタは蓮のような手を合わせ、勇敢でありながらその勇気を抑え、忍耐を保った。あたかも言葉に蜜を注ぐように、すべてに適切な答えを与えた。
Verse 362 (चौपाई)
मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का।। मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा।। गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी।। उचित कि अनुचित किएँ बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू।। तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई।। जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें।। अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू।। ऊतरु देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू।।
師は私に良い教えを与えた、民と顧問が皆認めるものを。母は適切な命令を与えた、私は必ず頭を垂れてそれを実行したい。師、父、母、主の言葉は私のための善である、それを聞いて心は喜び、正しいと知るべきだ。適切か不適切か、私は熟考した、ダルマが失われれば、罪の重荷は私の頭に落ちる。私に従えば善をもたらす、そのような単純な教えだけを与えてください。私はこれをよく理解しているが、それでも心は満足しない。今、私の祈りを聞き、従うべき教えを与えてください。私は答えを与える、私の過ちを許してください。苦悩する者は過失や徳を数えても救済を見出せない。
Verse 363 (दोहा/सोरठा)
पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु। एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु।।177।।
母上よ、お聞きください。シーターとラーマを森へ行かせ、私に王国をお与えください。これが私の利益であり、あなた自身の大きな目的であるとお知りください。
Verse 364 (चौपाई)
हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई।। मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपायँ मोर हित नाहीं।। सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें।। बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू।। सरुज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा।। जायँ जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई।। जाउँ राम पहिं आयसु देहू। एकहिं आँक मोर हित एहू।। मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू।।
私の真の善はシーターの主に仕えることにあります。そのハリを、母の狡猾さによって奪われてしまいました。私は心の中で熟考し、私の善のためには他に道がないことを悟りました。悲しみ、世間、王権が何の意味を持つでしょう。ラークマナ、ラーマ、シーターなしでは、私には居場所がありません。それは衣装や装飾のない体のようであり、最高者への瞑想のない離脱のようです。美しい姿が多くの楽しみを欠くように、瞑想の実践のないハリへの帰依のようです。美しい体のない生き物のように、ラーグの主なしの私の全存在です。ラーマのもとへ行かせてください、ご命令を。これだけが私の善への唯一の思いです。私を王にしようとなさるなら、その愛は愚かさに過ぎないとお知りください。
Verse 365 (दोहा/सोरठा)
कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज। तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज।।178।।
カイケーイーの息子は、曲がった心を持ち、ラーマから背を向け、恥を失いました。あなたは迷妄の中で幸福を求めますが、私にとってあなたは最も卑劣な王です。
Verse 366 (चौपाई)
कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू।। मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं।। मोहि समान को पाप निवासू। जेहि लगि सीय राम बनबासू।। रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा। बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा।। मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउँ सचेतू।। बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू।। राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे।। कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई।।
我が主よ、真実を申し上げます。お聞きください。王は正義の性格であるべきです。あなたが頑固に私に王国をお与えになる時、その瞬間に大地は地下界へ沈むでしょう。私のような罪人がどこにいましょうか、そのためにシーターとラーマが追放されるのです。王はラーマに森をお与えになり、別れ際に神々の都へ旅立たれました。私は悪人であり、すべての災いの原因です。目覚めて座り、すべての言葉を聞いています。ラーグの主なしで私の住まいを見つめ、命は世間の嘲笑に耐えています。ラーマは聖なるお方です。世の楽しみは彼には乾いたものです。彼は渇望から自由で、大地の享受のみを求めておられます。私の心の硬さをどこまで語りましょうか。それは金剛杵より硬く、偉大さを得ています。
Verse 367 (दोहा/सोरठा)
कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहि मोर। कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर।।179।।
私のために任務は困難になりましたが、過失は私にはありません。金剛杵は骨から、石は山から、鉄は恐ろしく硬くなります。
परंपरागत मान्यता में यह अंश ‘पितृ-श्राद्ध/स्मृति’ और ‘धर्म-स्थैर्य’ का फल देता है: शोक का शमन, क्रोध-रोष की निवृत्ति, और गुरु-आज्ञा/पितृ-वचन पालन की बुद्धि। विशेषतः भरत-वैराग्य के श्रवण से ‘राजसुख-आसक्ति’ घटती और दास्य-भक्ति दृढ़ होती है।
सत्संग-परंपराओं में सामान्यतः रामनाम-सम्पुट जोड़ा जाता है—‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ अथवा ‘राम राम’—विशेषकर ‘बचन अमिअँ’ और ‘बिनु हरिभगति’ जैसे स्थलों पर। (स्थानीय परंपरा/सम्प्रदाय के अनुसार पाठ-रीति बदल सकती है।)
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