त्याग–धर्म–मर्यादा का सोपान: यहाँ ‘राज्य’ बाह्य सत्ता नहीं, बल्कि मन-राज्य (अहं-राज) का परित्याग है। अयोध्या काण्ड साधक को शोक से विवेक, और अधिकार-लालसा से सेवाभाव की ओर ले जाता है—पितृवचन-पालन, गुरु-आज्ञा, और लोकधर्म के माध्यम से ‘निज हित’ को ‘राम-हित’ में विलीन करना। यह सीढ़ी बताती है कि मुक्ति का द्वार राजसुख नहीं, बल्कि मर्यादा-पालन और अनासक्ति है।
এই পদগুলিতে করুণ-রসের মূল প্রবাহ (দশরথের দাহ, তিলাঞ্জলি, দশগাত্র) ধীরে ধীরে শান্ত-রস ও ধর্ম-রসে রূপান্তরিত হয়। ভরতের চরিত্র এখানে ‘দুঃখের উদাত্তীকরণ’: শোককে আত্ম-নিন্দা নয়, আত্ম-শুদ্ধির সাধন করা হয়েছে। বশিষ্ঠের উপদেশ ‘হানি-লাভ, জীবন-মরণ’কে বিধির হস্ত বলে ক্রোধ-নির্বাপিত করে—এটাই মানস-তত্ত্বের কেন্দ্র: ঈশ্বর-লীলায় ব্যক্তির মর্যাদার ভূমিকা। তারপর নীতি-সূচি (কার শোকযোগ্য, কার নয়) লোকধর্মকে আধ্যাত্মিক বিবেকের উপকরণ করে। ভরতের প্রত্যুত্তর ভক্তি-লক্ষণকে উজ্জ্বল করে—রাজ্য ‘বাদি’ (গৌণ); রঘুরাই ছাড়া দেহভোগ, জপ, যোগ—সবই নিরর্থক। এভাবে অযোধ্যা-কাণ্ডের এই খণ্ড ‘বৈরাগ্যজাত দাস্য-ভক্তি’ প্রতিষ্ঠা করে সোপানের পরবর্তী ধাপ—রাম-সেবা/পাদুকা-রাজ—এর প্রস্তুতি ঘটায়।
চৌপাই 170.1-4
नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा।परम बिचित्र बिमानु बनावा।।
गहि पद भरत मातु सब राखी।रहीं रानि दरसन अभिलाषी।।
चंदन अगर भार बहु आए।अमित अनेक सुगंध सुहाए।।
सरजु तीर रचि चिता बनाई।जनु सुरपुर सोपान सुहाई।।
एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही।बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही।।
सोधि सुमृति सब बेद पुराना।कीन्ह भरत दसगात बिधाना।।
जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा।तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा।।
भए बिसुद्ध दिए सब दाना।धेनु बाजि गज बाहन नाना।।
nṛpatanu beda bidita anhavāvā |parama bicitra bimānu banāvā ||
gahi pada bharata mātu saba rākhī |rahīṁ rāni darasana abhilāṣī ||
caṁdana agara bhāra bahu āe |amita aneka sugaṁdha suhāe ||
saraju tīra raci citā banāī |janu surapura sopāna suhāī ||
ehi bidhi dāha kriyā saba kīnhī |bidhivata nhāi tilāṁjuli dīnhī ||
sodhi sumṛti saba beda purānā |kīnha bharata dasagāta bidhānā ||
jahã jasa munibara āyasu dīnhā |tahã tasa sahasa bhā̃ti sabu kīnhā ||
bhae bisuddha die saba dānā |dhenu bāji gaja bāhana nānā ||
রাজার দেহ বেদোক্ত বিধিতে স্নান করাইয়া এক অতি বিচিত্র শবযান নির্মাণ করিলেন। ভরত সকল মাতার চরণ ধরিয়া তাঁহাদিগকে নিবৃত্ত রাখিলেন; রানীগণ দর্শনের অভিলাষে অবস্থান করিলেন। চন্দন ও অগরের অনেক ভার আনিল, অসংখ্য সুগন্ধ দ্রব্য, বহু প্রকারের, মনোরম। সরযূর তীরে চিতা নির্মাণ করিয়া সাজাইল, স্বর্গপুরীর সোপানের ন্যায় সুন্দর। এইভাবে সমস্ত দাহক্রিয়া সম্পন্ন হইল; ভরত বিধিপ্রকারে স্নান করিয়া তিলাঞ্জলি প্রদান করিলেন। স্মৃতি, বেদ ও পুরাণ সকল অধ্যয়ন করিয়া ভরত দশম দিনের বিধান সম্পাদন করিলেন। যেখানে যেভাবে মুনিবর আজ্ঞা প্রদান করিয়াছিলেন, সেখানে সেভাবে সহস্র প্রকারে সব করিলেন। শুদ্ধ হইয়া সকল প্রকার দান প্রদান করিলেন: গো, অশ্ব, গজ ও বহু প্রকার বাহন।
দোহা 170
सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम।दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम।।170।।
siṁghāsana bhūṣana basana anna dharani dhana dhāma |die bharata lahi bhūmisura bhe paripūrana kāma ||170||
সিংহাসন, অলংকার, বস্ত্র, অন্ন, ভূমি, ধন ও গৃহ ভরত দান করলেন, আর ভূমিসুর ব্রাহ্মণরা সেগুলি গ্রহণ করে সকল কামনায় পরিপূর্ণ হলেন।
চৌপাই 171.1-4
पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी।सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी।।
सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए।सचिव महाजन सकल बोलाए।।
बैठे राजसभाँ सब जाई।पठए बोलि भरत दोउ भाई।।
भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे।नीति धरममय बचन उचारे।।
प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी।कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी।।
भूप धरमब्रतु सत्य सराहा।जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा।।
कहत राम गुन सील सुभाऊ।सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ।।
बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी।सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी।।
pitu hita bharata kīnhi jasi karanī |so mukha lākha jāi nahiṁ baranī ||
sudinu sodhi munibara taba āe |saciva mahājana sakala bolāe ||
baiṭhe rājasabhā̃ saba jāī |paṭhae boli bharata dou bhāī ||
bharatu basiṣṭha nikaṭa baiṭhāre |nīti dharamamaya bacana ucāre ||
prathama kathā saba munibara baranī |kaikai kuṭila kīnhi jasi karanī ||
bhūpa dharamabratu satya sarāhā |jehiṁ tanu parihari premu nibāhā ||
kahata rāma guna sīla subhāū |sajala nayana pulakeu munirāū ||
bahuri lakhana siya prīti bakhānī |soka saneha magana muni gyānī ||
পিতার হিতের জন্য ভরত যে কর্ম করেছিলেন, তা লক্ষ মুখেও বর্ণনা করা যায় না। তারপর মহামুনি একটি শুভ দিন বেছে নিয়ে এলেন, এবং সমস্ত মন্ত্রী ও প্রধান নাগরিকদের ডেকে পাঠালেন। সকলে রাজসভায় গিয়ে বসলেন, এবং ভরত ও তাঁর ভ্রাতা, দুই ভাইকে ডেকে পাঠালেন। বশিষ্ঠ ভরতকে নিকটে বসালেন এবং নীতি ও ধর্মপূর্ণ বাক্য উচ্চারণ করলেন। প্রথমে মহামুনি সমস্ত কাহিনী বর্ণনা করলেন, কৈকেয়ী যে কুটিল কর্ম করেছিলেন তা। রাজার ধর্মব্রত ও সত্যতার প্রশংসা করলেন, যার দ্বারা তিনি দেহ ত্যাগ করে প্রেম পূর্ণ করেছিলেন। রামের গুণ, শীল ও স্বভাব বর্ণনা করতে করতে মুনির চোখে জল এল এবং শরীর রোমাঞ্চিত হল। তারপর লক্ষ্মণ ও সীতার প্রেম বর্ণনা করলেন, এবং জ্ঞানী মুনি শোক ও স্নেহে মগ্ন হলেন।
দোহা 171
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।।171।।
sunahu bharata bhāvī prabala bilakhi kaheu muninātha |hāni lābhu jīvana maranu jasu apajasu bidhi hātha ||171||
বিলাপ করে মুনিনাথ বললেন, "হে ভরত, শোনো, ভাগ্য প্রবল। হানি, লাভ, জীবন, মরণ, যশ, অপযশ সবই বিধির হাতে।"
চৌপাই 172.1-4
अस बिचारि केहि देइअ दोसू।ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू।।
तात बिचारु केहि करहु मन माहीं।सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं।।
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना।तजि निज धरमु बिषय लयलीना।।
सोचिअ नृपति जो नीति न जाना।जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना।।
सोचिअ बयसु कृपन धनवानू।जो न अतिथि सिव भगति सुजानू।।
सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी।मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी।।
सोचिअ पुनि पति बंचक नारी।कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी।।
सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई।जो नहिं गुर आयसु अनुसरई।।
asa bicāri kehi deia dosū |byaratha kāhi para kījia rosū ||
tāta bicāru kehi karahu mana māhīṁ |soca jogu dasarathu nṛpu nāhīṁ ||
socia bipra jo beda bihīnā |taji nija dharamu biṣaya layalīnā ||
socia nṛpati jo nīti na jānā |jehi na prajā priya prāna samānā ||
socia bayasu kṛpana dhanavānū |jo na atithi siva bhagati sujānū ||
socia sūdru bipra avamānī |mukhara mānapriya gyāna gumānī ||
socia puni pati baṁcaka nārī |kuṭila kalahapriya icchācārī ||
socia baṭu nija bratu pariharaī |jo nahiṁ gura āyasu anusaraī ||
এইরূপ বিবেচনা করে কাকে দোষ দেব? বৃথা কার প্রতি রোষ করব? হে তাত, মনে এই বিবেচনা করো: রাজা দশরথ শোকের যোগ্য নন। শোক করো সেই ব্রাহ্মণের জন্য যে বেদহীন, যে নিজ ধর্ম ত্যাগ করে বিষয়ে লীন হয়েছে। শোক করো সেই রাজার জন্য যে নীতি জানে না, যার কাছে প্রজা প্রাণের মতো প্রিয় নয়। শোক করো সেই বণিকের জন্য যে ধনবান হয়েও কৃপণ, যে অতিথি সেবা ও শিব ভক্তিতে পারদর্শী নয়। শোক করো সেই শূদ্রের জন্য যে ব্রাহ্মণকে অবমাননা করে, যে বাচাল, মানপ্রিয় ও জ্ঞানের অহংকারী। আবার শোক করো সেই স্ত্রীর জন্য যে স্বামীকে প্রতারিত করে, যে কুটিল, কলহপ্রিয় ও স্বেচ্ছাচারী। শোক করো সেই ব্রহ্মচারীর জন্য যে নিজ ব্রত পরিত্যাগ করে, যে গুরুর আজ্ঞা অনুসরণ করে না।
দোহা 172
सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग।।172।।
socia gṛhī jo moha basa karai karama patha tyāga |socia jati praṁpaca rata bigata bibeka birāga ||172||
দুঃখী সেই গৃহস্থ যে মোহের বশে কর্মপথ ত্যাগ করে; দুঃখী সেই সন্ন্যাসীও যে সংসারে আসক্ত এবং বিবেক ও বৈরাগ্য হারিয়েছে।
চৌপাই 173.1-4
बैखानस सोइ सोचै जोगु।तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू।।
सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी।जननि जनक गुर बंधु बिरोधी।।
सब बिधि सोचिअ पर अपकारी।निज तनु पोषक निरदय भारी।।
सोचनीय सबहि बिधि सोई।जो न छाड़ि छलु हरि जन होई।।
सोचनीय नहिं कोसलराऊ।भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।।
भयउ न अहइ न अब होनिहारा।भूप भरत जस पिता तुम्हारा।।
बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा।बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा।।
baikhānasa soi socai jogu |tapu bihāi jehi bhāvai bhogū ||
socia pisuna akārana krodhī |janani janaka gura baṁdhu birodhī ||
saba bidhi socia para apakārī |nija tanu poṣaka niradaya bhārī ||
socanīya sabahi bidhi soī |jo na chāṛi chalu hari jana hoī ||
socanīya nahiṁ kosalarāū |bhuvana cāridasa pragaṭa prabhāū ||
bhayau na ahai na aba honihārā |bhūpa bharata jasa pitā tumhārā ||
bidhi hari haru surapati disināthā |baranahiṁ saba dasaratha guna gāthā ||
যে তপ ত্যাগ করে ভোগে আনন্দ পায়, সেই বানপ্রস্থীর জন্য করুণা হয়। পরনিন্দাকারী ও কারণ ছাড়া ক্রোধী, যে মাতা, পিতা, গুরু ও বান্ধবের শত্রু, তার জন্যও করুণা হয়। যে অন্যের অপকার করে, যে কেবল নিজ দেহ পোষণ করে এবং অত্যন্ত নির্দয়, তার জন্য সর্বপ্রকারে করুণা হয়। যে ছল ত্যাগ না করে হরির দাস হয় না, তার জন্যও সর্বপ্রকারে করুণা হয়। কিন্তু কোসলরাজের জন্য করুণা হয় না, যাঁর প্রভা চৌদ্দ ভুবনে প্রকট। এমন রাজা পূর্বে ছিল না, এখন নেই, আর হবেও না, ভরত, তোমার পিতার মতো। ব্রহ্মা, বিষ্ণু, শিব, দেবরাজ ইন্দ্র ও দিকপালেরা সকলেই দশরথের গুণগাথা বর্ণনা করেন।
দোহা 173
कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु।राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु।।173।।
kahahu tāta kehi bhā̃ti kou karihi baṛāī tāsu |rāma lakhana tumha satruhana sarisa suana suci jāsu ||173||
বলো বৎস, কীভাবে কেউ তাঁর প্রশংসা যথাযথভাবে করবে, যাঁর পুত্রেরা এত পবিত্র: রাম, লক্ষ্মণ, তুমি এবং শত্রুঘ্ন?
চৌপাই 174.1-4
सब प्रकार भूपति बड़भागी।बादि बिषादु करिअ तेहि लागी।।
यहु सुनि समुझि सोचु परिहरहू।सिर धरि राज रजायसु करहू।।
राँय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा।पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा।।
तजे रामु जेहिं बचनहि लागी।तनु परिहरेउ राम बिरहागी।।
नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना।करहु तात पितु बचन प्रवाना।।
करहु सीस धरि भूप रजाई।हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई।।
परसुराम पितु अग्या राखी।मारी मातु लोक सब साखी।।
तनय जजातिहि जौबनु दयऊ।पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ।।
saba prakāra bhūpati baṛabhāgī |bādi biṣādu karia tehi lāgī ||
yahu suni samujhi socu pariharahū |sira dhari rāja rajāyasu karahū ||
rā̃ya rājapadu tumha kahũ dīnhā |pitā bacanu phura cāhia kīnhā ||
taje rāmu jehiṁ bacanahi lāgī |tanu parihareu rāma birahāgī ||
nṛpahi bacana priya nahiṁ priya prānā |karahu tāta pitu bacana pravānā ||
karahu sīsa dhari bhūpa rajāī |hai tumha kahã saba bhā̃ti bhalāī ||
parasurāma pitu agyā rākhī |mārī mātu loka saba sākhī ||
tanaya jajātihi jaubanu dayaū |pitu agyā̃ agha ajasu na bhayaū ||
সর্বপ্রকারে রাজা অতিশয় ভাগ্যবান; তাঁর জন্য বৃথাই বিষাদ করছেন। এই কথা শুনে বুঝে শোক ত্যাগ করুন; মস্তকে রাজার আজ্ঞা ধারণ করে তা পালন করুন। রাজা আপনাকে রাজসিংহাসন দিয়েছেন, এবং পিতার বাক্য সত্য করা আপনার কর্তব্য। যিনি নিজের বাক্যের নিমিত্তে রামকে ত্যাগ করলেন, তিনি রামের বিরহে নিজের দেহ ত্যাগ করলেন। রাজার কাছে বাক্য প্রিয় ছিল, প্রাণ প্রিয় ছিল না। সুতরাং হে তাত, পিতার বাক্য প্রমাণরূপে গ্রহণ করে পালন করুন। মস্তকে রাজার আজ্ঞা ধারণ করে পালন করুন; সর্বপ্রকারে এটি আপনার মঙ্গলের জন্য হবে। পরশুরাম পিতার আজ্ঞা রক্ষা করে মাতাকে বধ করলেন, এবং সমগ্র বিশ্ব তার সাক্ষী। এক পুত্র যযাতিকে নিজের যৌবন দান করল; পিতার আজ্ঞা পালনে পাপ বা অপবাদ হয়নি।
দোহা 174
अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन।।174।।
anucita ucita bicāru taji je pālahiṁ pitu baina |te bhājana sukha sujasa ke basahiṁ amarapati aina ||174||
যারা উচিত-অনুচিত বিচার ত্যাগ করে পিতার বাক্য পালন করেন, তাঁরা সুখ ও সুখ্যাতির পাত্র হন এবং অমরপতি ইন্দ্রের প্রাসাদে বাস করেন।
চৌপাই 175.1-4
अवसि नरेस बचन फुर करहू।पालहु प्रजा सोकु परिहरहू।।
सुरपुर नृप पाइहि परितोषू।तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू।।
बेद बिदित संमत सबही का।जेहि पितु देइ सो पावइ टीका।।
करहु राजु परिहरहु गलानी।मानहु मोर बचन हित जानी।।
सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं।अनुचित कहब न पंडित केहीं।।
कौसल्यादि सकल महतारीं।तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं।।
परम तुम्हार राम कर जानिहि।सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि।।
सौंपेहु राजु राम कै आएँ।सेवा करेहु सनेह सुहाएँ।।
avasi naresa bacana phura karahū |pālahu prajā soku pariharahū ||
surapura nṛpa pāihi paritoṣū |tumha kahũ sukṛta sujasu nahiṁ doṣū ||
beda bidita saṁmata sabahī kā |jehi pitu dei so pāvai ṭīkā ||
karahu rāju pariharahu galānī |mānahu mora bacana hita jānī ||
suni sukhu lahaba rāma baidehīṁ |anucita kahaba na paṁḍita kehīṁ ||
kausalyādi sakala mahatārīṁ |teu prajā sukha hohiṁ sukhārīṁ ||
parama tumhāra rāma kara jānihi |so saba bidhi tumha sana bhala mānihi ||
sauṁpehu rāju rāma kai āẽ |sevā karehu saneha suhāẽ ||
অবশ্যই রাজার বাক্য সত্য করুন। প্রজা পালন করুন এবং শোক ত্যাগ করুন। দেবপুরে রাজা সন্তুষ্ট হবেন, আর আপনার জন্য এটি পুণ্য ও সুখ্যাতি হবে, দোষ নয়। বেদে ঘোষিত ও সকলের সম্মত, যাকে পিতা দেন সেই রাজচিহ্ন লাভ করে। রাজ্য শাসন করুন এবং লজ্জা ত্যাগ করুন; হিত জেনে আমার বাক্য মানুন। রাম ও সীতা শুনে আনন্দিত হবেন, আর কোনো পণ্ডিত একে অনুচিত বলবেন না। কৌশল্যা প্রভৃতি সমস্ত মাতৃগণও প্রজার সুখে সুখী হবেন। রাম আপনার পরম ভক্তি জানবেন, এবং সর্ববিধে আপনাকে ভালো মানবেন। রাম ফিরে এলে রাজ্য তাঁকে সঁপে দিন, এবং স্নেহসহকারে তাঁর সেবা করুন।
দোহা 175
कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि।रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि।।175।।
kījia gura āyasu avasi kahahiṁ saciva kara jori |raghupati āẽ ucita jasa tasa taba karaba bahori ||175||
হাত জোড় করে মন্ত্রীরা বললেন, গুরুর আদেশ অবশ্যই পালন করবেন। রঘুপতি যখন ফিরে আসবেন, তখন যা উচিত তাই করবেন।
চৌপাই 176.1-4
कौसल्या धरि धीरजु कहई।पूत पथ्य गुर आयसु अहई।।
सो आदरिअ करिअ हित मानी।तजिअ बिषादु काल गति जानी।।
बन रघुपति सुरपति नरनाहू।तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू।।
परिजन प्रजा सचिव सब अंबा।तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा।।
लखि बिधि बाम कालु कठिनाई।धीरजु धरहु मातु बलि जाई।।
सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू।प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू।।
गुर के बचन सचिव अभिनंदनु।सुने भरत हिय हित जनु चंदनु।।
सुनी बहोरि मातु मृदु बानी।सील सनेह सरल रस सानी।।
kausalyā dhari dhīraju kahaī |pūta pathya gura āyasu ahaī ||
so ādaria karia hita mānī |tajia biṣādu kāla gati jānī ||
bana raghupati surapati naranāhū |tumha ehi bhā̃ti tāta kadarāhū ||
parijana prajā saciva saba aṁbā |tumhahī suta saba kahã avalaṁbā ||
lakhi bidhi bāma kālu kaṭhināī |dhīraju dharahu mātu bali jāī ||
sira dhari gura āyasu anusarahū |prajā pāli parijana dukhu harahū ||
gura ke bacana saciva abhinaṁdanu |sune bharata hiya hita janu caṁdanu ||
sunī bahori mātu mṛdu bānī |sīla saneha sarala rasa sānī ||
কৌশল্যা ধৈর্য ধরে বললেন, পুত্র, গুরুর আজ্ঞা তোমার জন্য পথ্য ঔষধ। তাহাকে সমাদর করো এবং হিত বুঝে গ্রহণ করো। কালের গতি জেনে শোক ত্যাগ করো। রঘুপতি রাম বনে আছেন, আর নৃপতি দেবরাজের কাছে গেছেন। পুত্র, তুমি এইভাবে কাপুরুষের মতো আচরণ করছ। পরিজন, প্রজা, সচিব এবং সমস্ত মাতা, তুমিই পুত্র সকলের আশ্রয়। বিধি প্রতিকূল আর কাল কঠিন দেখে ধৈর্য ধরো, মাতা তোমার জন্য বলি যায়। গুরুর আজ্ঞা মস্তকে ধরে অনুসরণ করো, প্রজা রক্ষা করো এবং পরিজনের দুঃখ দূর করো। গুরুর বাক্য ও সচিবদের অভিনন্দন ভরত শুনলেন, তা তাঁর হৃদয়ে হিতকর চন্দনের ন্যায় শীতল হলো। তারপর তিনি মাতার কোমল বাণী শুনলেন, শীল, স্নেহ ও সরলতার মধুর রসে পূর্ণ।
ছন্দ 176
सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरत ब्याकुल भए।लोचन सरोरुह स्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए।।
सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की।तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की।।
sānī sarala rasa mātu bānī suni bharata byākula bhae |locana saroruha sravata sīṁcata biraha ura aṁkura nae ||
so dasā dekhata samaya tehi bisarī sabahi sudhi deha kī |tulasī sarāhata sakala sādara sīvã sahaja saneha kī ||
মাতার সরল ও কোমল ভাবপূর্ণ বাণী শুনে ভরত অত্যন্ত ব্যাকুল হলেন। তাঁর কমল-নয়ন থেকে অশ্রু প্রবাহিত হয়ে হৃদয়ে বিরহের নূতন অঙ্কুরকে সেচন করতে লাগল। সেই সময়ে তাঁর সেই অবস্থা দেখে সকলেই নিজ দেহের সমস্ত স্মৃতি ভুলে গেলেন। তুলসীদাস বলেন, সকলেই শ্রদ্ধাভরে তাঁকে সহজ স্নেহের সীমা বলে প্রশংসা করলেন।
সোরঠা 176
भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि।बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि।।176।।
bharatu kamala kara jori dhīra dhuraṁdhara dhīra dhari |bacana amiã janu bori deta ucita uttara sabahi ||176||
ভরত, ধৈর্যশালীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ভারবহনকারী, নিজের পদ্মহস্ত যুক্ত করে ধৈর্য ধারণ করলেন। যেন অমৃতে নিজের বাক্য ডুবিয়ে সকলকে উপযুক্ত উত্তর দিলেন।
চৌপাই 177.1-4
मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका।प्रजा सचिव संमत सबही का।।
मातु उचित धरि आयसु दीन्हा।अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा।।
गुर पितु मातु स्वामि हित बानी।सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी।।
उचित कि अनुचित किएँ बिचारू।धरमु जाइ सिर पातक भारू।।
तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई।जो आचरत मोर भल होई।।
जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें।तदपि होत परितोषु न जी कें।।
अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू।मोहि अनुहरत सिखावनु देहू।।
ऊतरु देउँ छमब अपराधू।दुखित दोष गुन गनहिं न साधू।।
mohi upadesu dīnha gura nīkā |prajā saciva saṁmata sabahī kā ||
mātu ucita dhari āyasu dīnhā |avasi sīsa dhari cāhaũ kīnhā ||
gura pitu mātu svāmi hita bānī |suni mana mudita karia bhali jānī ||
ucita ki anucita kiẽ bicārū |dharamu jāi sira pātaka bhārū ||
tumha tau dehu sarala sikha soī |jo ācarata mora bhala hoī ||
jadyapi yaha samujhata haũ nīkeṁ |tadapi hota paritoṣu na jī keṁ ||
aba tumha binaya mori suni lehū |mohi anuharata sikhāvanu dehū ||
ūtaru deũ chamaba aparādhū |dukhita doṣa guna ganahiṁ na sādhū ||
গুরু আমাকে উত্তম উপদেশ দিয়েছেন, এবং প্রজা ও মন্ত্রীগণ সকলেই তাতে সম্মত হয়েছেন। মাতাও আমাকে উপযুক্ত আজ্ঞা দিয়েছেন, এবং অবশ্যই আমি তা মস্তকে ধারণ করে পালন করব। গুরু, পিতা, মাতা বা স্বামীর হিতবাক্য শুনে মনে আনন্দ নিয়ে তা কল্যাণকর জেনে পালন করা উচিত। তাতে উচিত কি অনুচিত তা বিচার করলে ধর্ম নষ্ট হয় এবং মস্তকে পাপের ভার বর্তায়। আপনি তো সরল উপদেশ দিচ্ছেন, যা অনুসরণ করলে আমার মঙ্গল হবে। যদিও আমি এটি স্পষ্ট বুঝতে পারছি, তবু মন প্রীতি পাচ্ছে না। এখন আপনি আমার অনুনয় শুনুন এবং আমার অনুরূপ উপদেশ দিন। আমি উত্তর দিচ্ছি, সুতরাং আমার অপরাধ ক্ষমা করুন, কারণ দুঃখীর দোষ ও গুণ সাধু ব্যক্তিরা গণনা করেন না।
দোহা 177
पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु।एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु।।177।।
pitu surapura siya rāmu bana karana kahahu mohi rāju |ehi teṁ jānahu mora hita kai āpana baṛa kāju ||177||
পিতা দেবপুরে গেছেন, সীতা ও রাম বনে আছেন, আর আপনি আমাকে রাজ্য গ্রহণ করতে বলছেন। এই থেকে বিচার করুন, আপনি আমার হিত চান নাকি নিজের কোনো বড় কাজ।
চৌপাই 178.1-4
हित हमार सियपति सेवकाई।सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई।।
मैं अनुमानि दीख मन माहीं।आन उपायँ मोर हित नाहीं।।
सोक समाजु राजु केहि लेखें।लखन राम सिय बिनु पद देखें।।
बादि बसन बिनु भूषन भारू।बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू।।
सरुज सरीर बादि बहु भोगा।बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा।।
जायँ जीव बिनु देह सुहाई।बादि मोर सबु बिनु रघुराई।।
जाउँ राम पहिं आयसु देहू।एकहिं आँक मोर हित एहू।।
मोहि नृप करि भल आपन चहहू।सोउ सनेह जड़ता बस कहहू।।
hita hamāra siyapati sevakāī |so hari līnha mātu kuṭilāī ||
maiṁ anumāni dīkha mana māhīṁ |āna upāyã mora hita nāhīṁ ||
soka samāju rāju kehi lekheṁ |lakhana rāma siya binu pada dekheṁ ||
bādi basana binu bhūṣana bhārū |bādi birati binu brahma bicārū ||
saruja sarīra bādi bahu bhogā |binu haribhagati jāyã japa jogā ||
jāyã jīva binu deha suhāī |bādi mora sabu binu raghurāī ||
jāũ rāma pahiṁ āyasu dehū |ekahiṁ ā̃ka mora hita ehū ||
mohi nṛpa kari bhala āpana cahahū |sou saneha jaṛatā basa kahahū ||
আমার কল্যাণ সীয়াপতির সেবায়, আর সেটি আমার মায়ের কুটিলতা হরণ করেছে। আমি মনে মনে অনুমান করে দেখেছি, অন্য কোনো উপায়ে আমার কল্যাণ নেই। শোকের স্তূপ রাজ্য কী হিসাবের? লক্ষণ, রাম ও সীয়ার চরণ বিনা দেখলে। বস্ত্রহীন ভূষণের ভার বৃথা, আর ব্রহ্মচিন্তা বিনা বৈরাগ্যও বৃথা। রুগ্ণ শরীরে বহু ভোগ বৃথা, আর হরিভক্তি বিনা জপ ও যোগও বৃথা। সুন্দর দেহ প্রাণহীন হলে বৃথা, তেমনি রঘুরাজ বিনা আমার সবই বৃথা। রামের কাছে যাওয়ার আজ্ঞা দিন, এক কথায় এটাই আমার কল্যাণ। আমাকে রাজা করে আপনি আমার মঙ্গল চান, কিন্তু সেটিও স্নেহ ও মূঢ়তার বশে বলছেন।
দোহা 178
कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज।तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज।।178।।
kaikeī sua kuṭilamati rāma bimukha gatalāja |tumha cāhata sukhu mohabasa mohi se adhama keṁ rāja ||178||
আমি কৈকেয়ীর পুত্র, কুটিলমতি, রামের প্রতি মুখ ফিরিয়ে নিয়েছি, লজ্জাহীন; অথচ তুমি মোহবশত আমার মতো অধমের রাজ্যে সুখ কামনা করছ।
চৌপাই 179.1-4
कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू।चाहिअ धरमसील नरनाहू।।
मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं।रसा रसातल जाइहि तबहीं।।
मोहि समान को पाप निवासू।जेहि लगि सीय राम बनबासू।।
रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा।बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा।।
मैं सठु सब अनरथ कर हेतू।बैठ बात सब सुनउँ सचेतू।।
बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू।रहे प्रान सहि जग उपहासू।।
राम पुनीत बिषय रस रूखे।लोलुप भूमि भोग के भूखे।।
कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई।निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई।।
kahaũ sā̃cu saba suni patiāhū |cāhia dharamasīla naranāhū ||
mohi rāju haṭhi deihahu jabahīṁ |rasā rasātala jāihi tabahīṁ ||
mohi samāna ko pāpa nivāsū |jehi lagi sīya rāma banabāsū ||
rāyã rāma kahũ kānanu dīnhā |bichurata gamanu amarapura kīnhā ||
maiṁ saṭhu saba anaratha kara hetū |baiṭha bāta saba sunaũ sacetū ||
binu raghubīra biloki abāsū |rahe prāna sahi jaga upahāsū ||
rāma punīta biṣaya rasa rūkhe |lolupa bhūmi bhoga ke bhūkhe ||
kahã lagi kahauṁ hṛdaya kaṭhināī |nidari kulisu jehiṁ lahī baṛāī ||
আমি সত্য কথা বলছি, সবাই শুনে বিশ্বাস করো, রাজা হওয়া উচিত ধর্মপরায়ণ ব্যক্তিকে। যখনই তোমরা জোর করে আমাকে রাজ্য দেবে, ঠিক তখনই পৃথিবী রসাতলে ধসে যাবে। আমার সমান পাপের বাসস্থান আর কে আছে, যার কারণে সীতা ও রাম বনবাসে গেল? রাজা রামকে বন দিলেন, আর তাঁর থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে অমরপুরে গমন করলেন। আমি নীচ, সব অনর্থের কারণ, অথচ জেনেশুনে বসে সব কথা শুনছি। রঘুবীর রাম ছাড়া প্রাসাদ দেখে, প্রাণ রয়েছে জগতের উপহাস সহ্য করে। রাম পবিত্র, বিষয়রসে উদাসীন, আর আমি ভূমির অধিপতি হয়েও ভোগের লোলুপ, ভোগের ক্ষুধায় ক্ষুধিত। কতদূর বলব হৃদয়ের কঠিনতা, যা বজ্রকেও লজ্জায় হারিয়ে বড়াই পেয়েছে?
দোহা 179
कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहि मोर।कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर।।179।।
kārana teṁ kāraju kaṭhina hoi dosu nahi mora |kulisa asthi teṁ upala teṁ loha karāla kaṭhora ||179||
কারণের চেয়ে কার্য কঠিন হয়, ইহতে আমার কোনো দোষ নেই। হাড় থেকে তৈরি বজ্র হাড়ের চেয়ে কঠিন, আর পাথর থেকে তৈরি লোহা পাথরের চেয়ে ভয়ংকর ও কঠোর।
परंपरागत मान्यता में यह अंश ‘पितृ-श्राद्ध/स्मृति’ और ‘धर्म-स्थैर्य’ का फल देता है: शोक का शमन, क्रोध-रोष की निवृत्ति, और गुरु-आज्ञा/पितृ-वचन पालन की बुद्धि। विशेषतः भरत-वैराग्य के श्रवण से ‘राजसुख-आसक्ति’ घटती और दास्य-भक्ति दृढ़ होती है।
सत्संग-परंपराओं में सामान्यतः रामनाम-सम्पुट जोड़ा जाता है—‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ अथवा ‘राम राम’—विशेषकर ‘बचन अमिअँ’ और ‘बिनु हरिभगति’ जैसे स्थलों पर। (स्थानीय परंपरा/सम्प्रदाय के अनुसार पाठ-रीति बदल सकती है।)
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