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सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का जन्म’ और अहं-क्रोध-प्रताप के बीच मर्यादा का प्राकट्य। बालकाण्ड इस अर्थ में प्रथम सीढ़ी है कि यहाँ राम-नाम/राम-रूप के प्रति श्रद्धा, विनय, और गुरु-समाज में व्यवहार-धर्म का संस्कार बनता है; साधक के भीतर उठती ‘तेज-आक्रोश’ शक्ति को ‘मृदु-वाणी’ और ‘दास्य’ में रूपांतरित करने का द्वार यही है।
この段は『バーラ・カーンダ』の弓折りの直後に、「パラシュラーマの憤怒」の波を呼び起こす。ラサの織りは、憤怒(ラウドラ:パラシュラーマ)、武勇を帯びた笑い/諧謔(ラクシュマナ)、そして寂静・哀憐・謙譲(ラーマ)の三流合流である。 सभाの集団的な「戦慄」と、ジャナカ一族の憂慮は、社会的ダルマ秩序の繊細さを示す。ラクシュマナの辛辣な言葉は「クシャトリヤの威光」の昂りであるが、トゥルシーはそれを最終真理とはしない。ラーマの「きわめて謙虚で、柔らかく涼やかな言葉」が憤怒を鎮め、マリヤーダを स्थापितする。これは修行者の内に起こる我慢と誇示を、謙譲の信愛へと転じる霊的劇である——力を否定するのではなく、浄化するのである。ここに『バーラ・カーンダ』の段階の法が明らかとなる。信愛の芽は、規律と奉仕の भाव(ダースヤ)において स्थिरされる。
Verse 562 (चौपाई)
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए।। सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे।। अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।। बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू।। अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।। सुर मुनि नाग नगर नर नारी।।सोचहिं सकल त्रास उर भारी।। मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी।। भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता।।
ジャナカはすべてを語り、王たちが来た理由を説明した。言葉を聞いて、彼らは互いに見やり、地上に散らばった弓の破片を見た。激しい怒りで厳しい言葉を発した。「愚かなジャナカ、誰が弓を折ったのか言え。すぐに示せ、さもなくば今日、お前の王国のある場所で大地をひっくり返す。」王は恐怖も動揺も見せなかった。狡猾な王は心の中で喜んだ。神々、聖者、蛇、市民、男女すべてが不安に満ち、心に重い恐怖を抱いた。シーターの母は心で後悔した。「ブラフマーは今、歪めたものを正した。」ブリグの主の性質を聞いて、シーターには半瞬間が一劫のように思えた。
Verse 563 (दोहा/सोरठा)
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु। हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।।270।।
人々は皆、ジャーナキーが臆病であることを知り、恐れおののいて見守っていた。彼の心には喜びも悲しみもなく、シュリー・ラグヴィーラはそう語った。
Verse 564 (चौपाई)
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।। आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।। सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।। सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।। सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।। सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।। बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।। एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।।
「主よ、シヴァの弓を折ることができる者はいるでしょうか。そしてあなたの僕となるでしょうか。」「なぜ尋ねるのか。何を目的とするのか。」これを聞いて、聖賢は怒って語った。「僕として振る舞う者だけが僕の務めを果たす。友としてなすべきことをなし、今や戦わねばならない。」「聞け、ラーマよ。シヴァの弓を折った者は誰であれ、サハスラバーフのように私の敵である。彼を前に出てこの集まりから去らせよ。さもなくば、私はすべての王を殺すであろう。」聖賢の言葉を聞いて、ラクシュマナは微笑んで言った。「あなたはその斧とともに恥をかくであろう。」「幼少の頃、多くの弓を折ったが、主よ、私は決してこのような怒りを示さなかった。」「この弓への執着は何のためか。」これを聞いて、ブリグ族の旗印は怒って語った。
Verse 565 (दोहा/सोरठा)
रे नृप बालक कालबस बोलत तोहि न सँमार।। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।271।।
王よ、この少年は死の支配下にあり、自分の語ることを知らない。彼の弓はトリプラの破壊者の弓のようであり、全世界に知られている。
Verse 566 (चौपाई)
लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।। का छति लाभु जून धनु तौरें। देखा राम नयन के भोरें।। छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू । बोले चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।। बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही।। बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही।। भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।। सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा।।
ラクシュマナは微笑んで言った。「私を自分人と思ってください。神々よ、聞いてください、すべての弓は同じです。」「弓を持ち上げることに何の恐れがあろうか。ラーマは自分の目でそれを見た。」「触れただけで折れるなら、ラグの主に責めはない。なぜ聖賢は理由もなく怒るのか。」彼は斧の方を見て語った。「悪人よ、あなたは私の本質を理解していない。」「少年と呼んであなたを殺しはしない。愚かな聖賢たちだけが私をただの子供と思う。」「私は若い禁欲者であり、怒りに満ち、クシャトリヤ族の敵として世界中に知られている。」「腕の力で私は大地を王なしにし、何度も大地の神々に与えた。」「王子よ、サハスラバーフの千の腕を断った者の斧を見よ。」
Verse 567 (दोहा/सोरठा)
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर। गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।272।।
王子よ、父母を心配して思い悩むな。私の恐ろしい斧は胎内の幼児さえも砕く。
Verse 568 (चौपाई)
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी।। पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू।। इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं।। देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।। भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी।। सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरें कुल इन्ह पर न सुराई।। बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें।। कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा।।
ラクシュマナは笑って穏やかな言葉で語った。「聖賢の主よ、あなたは大変な自慢屋です。」「何度も何度も私に斧を見せるが、まるで息で山を吹き飛ばそうとするようだ。」「ここには、あなたの脅しの指を見ただけで死ぬようなカボチャのつるなどない。」「あなたの斧を見て、私は弓に弦を張った。いくらか誇りを持って語った。」「ブリグの子は理解し、私を見て、怒りを抑えて言うことを耐え忍ぶ者と思った。」「神々、大地の主たち、ヴィシュヌの僕たち、そして牛、これらに私の家系は苦しみを与えない。」「殺す者には罪と汚名が積もる。たとえあなたを殺しても、私はあなたの足元にひれ伏すであろう。」「あなたの言葉は千万の雷のようだ。あなたは弓、矢、斧を無駄に持っている。」
Verse 569 (दोहा/सोरठा)
जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर। सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर।।273।।
大聖賢よ、あなたを見て不適切なことを語ったなら、お許しください。これを聞いて、ブリグ族の宝石は怒って深い言葉を語った。
Verse 570 (चौपाई)
कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल घालकु।। भानु बंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुस अबुध असंकू।। काल कवलु होइहि छन माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं।। तुम्ह हटकउ जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा।। लखन कहेउ मुनि सुजस तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा।। अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी।। नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू।। बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा।।
クシカよ、聞け。この少年は鈍感で、時の哀れな奴隷であり、自分の家系を滅ぼす者である。彼は太陽の血統の汚点であり、まったく制御されず、愚かで恐れを知らない。彼は一瞬にして死の餌食となるであろう。私は叫んで語るが、彼は私に少しも耳を傾けない。彼を救いたいなら、引き止めよ。私は私の力、強さ、怒りを語った。ラクシュマナは聖賢に言った。「あなたの名声は高潔です。誰があなたを十分に語れるでしょうか。あなたご自身があなた自身の証人です。私はこれを多くの方法で何度も言った。満足できないなら、もっと何か言ってください。怒りを抑えて耐え難い苦しみに耐えないでください。あなたは英雄であり、堅実で非の打ちどころがない。他人を罵って名誉を得ることはない。」
Verse 571 (दोहा/सोरठा)
सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु। बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।।274।।
英雄は戦いの業を行い、自分を誇示しない。敵が戦場にいるとき、臆病者だけが自分の勇武を語る。
Verse 572 (चौपाई)
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा।। सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा।। अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू।। बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा।। कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू।। खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही।। उतर देत छोड़उँ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें।। न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें।।
クシカよ、あなたはまるで死そのものを追い立てるように、何度も何度も私を呼んだ。ラクシュマナの厳しい言葉を聞いて、パラシュは恐ろしい斧を手に取った。今や人々が私を責めないように。この口の悪い少年は死に値する。子供だと見て長く許してきたが、今や彼は本当に死ぬべき者となった。クシカは言った。「罪をお許しください。子供の過ちは善行では測られません。私はパラシュ、怒りでは情け知らず。今後、私は罪人であり、師への反逆者です。答えを述べて、殺さずに去る。ただクシカよ、あなたの徳に対する敬意からです。さもなくば、この残酷な斧で彼を切り裂き、師への借りをわずかな労力で返していただろう。」
Verse 573 (दोहा/सोरठा)
गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ। अयमय खाँड न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ।।275।।
ガディの息子は心の中で微笑みながら語った。聖者はそれを理解した。曲がらぬ剣は砂糖でできてはいない。今なお理解せぬ者は理解しない。
Verse 574 (चौपाई)
कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा।। माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें।। सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा।। अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली।। सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा।। भृगुबर परसु देखावहु मोही। बिप्र बिचारि बचउँ नृपद्रोही।। मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विज देवता घरहि के बाढ़े।। अनुचित कहि सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे।।
ラクシュマナは言った。聖者よ、あなたの徳は知られており、世界中に名高い。あなたは両親への恩義をよく果たしたが、師への恩義は残り、大きな重荷となっている。その恩義を今私の頭に置いた。日々は過ぎ、利子は大きく増えた。今すぐ請求を持ってきて精算せよ。私はすぐに財布を開けよう。この厳しい言葉を聞いて、パラシュは斧を研いだ。ああ、ああと全会衆が叫んだ。ブリグの最優秀者よ、斧を見せてください。私は王への反逆者と呼ばれるのを免れよう。真の戦士はバラモンや神と戦場で会うことはない。彼らは自らの家を守る者である。すべての人々がこれは不適切だと叫んだ。ラグの主はその時もラクシュマナを制止した。
Verse 575 (दोहा/सोरठा)
लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु। बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु।।276।।
ラクシュマナの怒りは祭火のように燃え上がり、ブリグの最優秀者の怒りに似ていた。それが増すのを見て、ラグ王朝の太陽は水のように涼しい言葉を語った。
Verse 576 (चौपाई)
नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू।। जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना। तौ कि बराबरि करत अयाना।। जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं।। करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी।। राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखनु बहुरि मुसकाने।। हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी। राम तोर भ्राता बड़ पापी।। गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूटमुख पयमुख नाहीं।। सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही। नीचु मीचु सम देख न मौहीं।।
主よ、この子供に慈悲を示してください。新鮮な牛乳のように無邪気な子供に厳しく当たらないでください。もしあなたが主の力を少しでも知っていたら、このように無知に振る舞うのが間違っていると分かるはずです。もし子供が何か間違ったことをしたなら、それが師、父、母の心に喜びをもたらすように。子供でありあなたの僕であることを知って、慈悲を示してください。あなたは知恵ある聖者であり、他の誰にも劣らぬ忍耐強く徳高いお方です。ラーマの言葉を聞いて、ラクシュマナは少し恥じらい、少し語ってからまた微笑んだ。彼が微笑むのを見て、パラシュの怒りは頭からつま先まで満ちた。彼は言った。ラーマ、あなたの兄弟は大きな罪人だ。彼の体は白いが心は暗い。彼は口から乳を出す者のようではなく、毒を吐く者のようだ。彼は生まれつき曲がっており、決して正さない。低い者と卑しい者の違いを見ず、抑制を知らない。
Verse 577 (दोहा/सोरठा)
लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल। जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल।।277।।
ラクシュマナは笑って言った。聖者よ、聞いてください。怒りはすべての罪の根元です。その支配下で人々はふさわしくないことをし、世界に反する行いを犯すのです。
Verse 578 (चौपाई)
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया।। टूट चाप नहिं जुरहि रिसाने। बैठिअ होइहिं पाय पिराने।। जौ अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई।। बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं।। थर थर कापहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़ भारी।। भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी। रिस तन जरइ होइ बल हानी।। बोले रामहि देइ निहोरा। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा।। मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसैं।।
私はあなたの僕です、聖者の長よ。怒りを捨てて今慈悲を示してください。折れた弓は怒っていても直らない。座れば足が痛むだけです。もしそれほどお好きなら、何か対策を考えてください。偉大な弓の名手を呼んで一緒に直させてください。ラクシュマナが話している間、ジャナカは恥じた。このように不適切に振る舞うのは良くないと思った。町の男女は震えた。若い王子は小さいが、その曲がった心は大きかった。ラクシュマナの恐れを知らぬ言葉を何度も聞いて、ブリグの主は怒りで燃え、力が衰え始めた。彼はラーマに逃げ道を求めて語った。あなたの兄弟は若く、あなたの身内だから、許してやろう。彼の心は汚れているのに体は美しいのはどうしたことか。金の器に毒が満ちているようだ。
Verse 579 (दोहा/सोरठा)
सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम। गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम।।278।।
これを聞いてラクシュマナは再び笑い、ラーマは細めた目で彼を見た。師の前でさらに話すのを恥じ、厳しい言葉を控えた。
Verse 580 (चौपाई)
अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी।। सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना।। बररै बालक एकु सुभाऊ। इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ।। तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी में नाथ तुम्हारा।। कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं। मो पर करिअ दास की नाई।। कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनिनायक सोइ करौं उपाई।। कह मुनि राम जाइ रिस कैसें। अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें।। एहि के कंठ कुठारु न दीन्हा। तौ मैं काह कोपु करि कीन्हा।।
非常に謙虚で、穏やかで涼しい言葉で、ラーマは両手を合わせて語った。主よ、聞いてください。あなたは本質から常に賢明です。子供の言葉を無視しないでください。子供には一つの性質しかなく、聖者は誰もそれを咎めない。彼には害や破滅の理由がない。主よ、過失は私にあります。慈悲を示すも怒るも、主よ、私を僕として扱ってください。あなたの怒りがどうすれば鎮まるか、すぐに教えてください。それを私は行います、聖者の長よ。聖者は言った。ラーマ、私の怒りはどうして去ろうか。今なおあなたの弟は理由もなく私を見ている。私は斧を彼の喉に当てなかった。それなのになぜこれほど怒ったのか。
Verse 581 (दोहा/सोरठा)
गर्भ स्त्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर। परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर।।279।।
斧の恐ろしい動きを聞いて、大地は震え、地面は揺れる。若き王子よ、斧はまだ触れていないのに、敵が生きているのを見る。
परंपरा में यह अंश ‘क्रोध-शमन’ और ‘वाणी-संयम’ की सिद्धि से जोड़ा जाता है: राम की विनय-भाषा और लक्ष्मण-परशुराम संवाद का पाठ गृह-कलह/अहंकार-उत्थान में शान्ति, सभा-धर्म और गुरु-आदर की बुद्धि देता है—विशेषतः बालकाण्ड-पाठ में ‘मर्यादा’ का संस्कार दृढ़ होता है।
सामान्य सत्संग-परंपरा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (राम-नाम) या ‘सीता-राम’ का संकीर्तन-सम्पुट लगाया जाता है; इस प्रसंग में विशेष रूप से ‘राम-नाम’ को ‘क्रोध-निवारक’ मानकर दोहा-समाप्ति पर जप-सम्पुट प्रचलित है।
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