
Chapter Arc: अश्वत्थामा के आग्नेयास्त्र के प्रचण्ड प्राकट्य से पाण्डव-सेना में भगदड़ मचती है; श्रीकृष्ण और अर्जुन के प्रयत्न से भी सैनिक ठहर नहीं पाते। → अस्त्र-तेज से दिशाएँ दहक उठती हैं—महाभूत भ्रमित-से, सूर्य घूमता-सा, त्रैलोक्य ज्वरग्रस्त-सा प्रतीत होता है। पाण्डव-पक्ष की एक अक्षौहिणी जलकर नष्ट होने लगती है; अर्जुन अकेले सोमक, मत्स्य और अन्य टुकड़ियों को समेटकर कौरवों की ओर मोड़ते हैं, पर विनाश-वेग थमता नहीं। → आग्नेयास्त्र के तेज से पाण्डवों की पूरी अक्षौहिणी ‘अद्भुत रूप’ से दग्ध दिखाई देती है—युद्धभूमि एक अग्निकुण्ड बन जाती है और समस्त लोक-व्यवस्था डगमगाती-सी लगती है। → व्यास धृतराष्ट्र को इस ‘महत्त्वपूर्ण विषय’ का रहस्य बताने का उपक्रम करते हैं—अस्त्रों के पीछे स्थित दैवी-तत्त्व और तपोबल का संकेत देते हुए प्रसंग को व्याख्या-धारा में मोड़ते हैं; अंततः अस्त्र-प्रभाव से मुक्त होकर श्रीकृष्ण और अर्जुन साथ-साथ प्रकट होते हैं, मानो आकाश में तमोनुद चन्द्र-सूर्य। → व्यास की व्याख्या आगे किस दैवी-नियम/स्तुति (शतरुद्रीय) से जुड़कर इस अस्त्र-प्रलय का अर्थ स्पष्ट करेगी—यह जिज्ञासा बनी रहती है।
Verse 1
#सस्न का + () अजानना एकाधिकंद्विशततमो<्ध्याय: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे पी अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और महिमा बताना संजय उवाच तत् प्रभग्नं बल॑ दृष्टवा कुन्तीपुत्रो धनंजय: । न्यवारयदमेयात्मा द्रोणपुत्रजयेप्सया
قال سانجيا: أيها الملك! لما رأى الجيش قد تكسّر صفّه وولّى هاربًا، أوقفه دهننجايا (أرجونا) ابن كونتي—ذو الروح التي لا تُقاس—مدفوعًا بعزمٍ على الظفر بابن درونا.
Verse 2
ततस्ते सैनिका राजन् नैव तत्रावतस्थिरे । संस्थाप्यमाना यत्नेन गोविन्देनारजुनेन च,नरेश्वर! श्रीकृष्ण और अर्जुनके द्वारा प्रयत्नपूर्वक ठहराये जानेपर भी वे सैनिक वहाँ खड़े न हो सके
قال سانجيا: ثم إن أولئك الجنود، أيها الملك، لم يستطيعوا الثبات هناك البتة. ومع أن جوفيندا (كريشنا) وأرجونا بذلا الجهد لتثبيتهم وإعادة صفوفهم، لم يقدروا على الوقوف صامدين.
Verse 3
एक एव च बीभत्सु: सोमकावयवै: सह । मत्स्यैरन्यैश्व संधाय कौरवान् संन्यवर्तत,अकेले अर्जुन ही सोमकोंकी टुकड़ियों, मत्स्यदेशीय योद्धाओं तथा अन्य लोगोंको साथ लेकर कौरवोंका सामना करनेके लिये लौटे
قال سانجيا: إن أرجونا—المُرهب لأعدائه—وإن بدا وحيدًا، فقد كان معه فِرَق السومَكَة ومحاربو مَتسْيَة وسائر الحلفاء؛ فشدّ صفوفهم في تشكيلٍ متماسك ثم عاد ليلاقي الكوروَفَة.
Verse 4
ततो द्रुतमतिक्रम्य सिंहलाडगूलकेतनम् । सव्यसाची महेष्वासमश्चृत्थामानमब्रवीत्,सव्यसाची अर्जुन सिंहकी पूँछके चिह्नवाली ध्वजासे युक्त महाधनुर्थर अश्वत्थामाके पास तुरंत आकर उससे इस प्रकार बोले--
قال سانجيا: ثم إن أرجونا، المشهور بلقب «سَفْيَسَاتشي»، اندفع مسرعًا متجاوزًا المحارب الذي يحمل رايةً عليها شعار ذيل الأسد، وخاطب أشفَتّھاما، الرامي العظيم، قائلاً—
Verse 5
या शक्तिर्यच्च विज्ञानं यद् वीर्य यच्च पौरुषम् । धार्तरिष्ट्रेषु या प्रीतिद्वेषो5स्मासु च यश्व ते
قال سانجيا: «يا ابن الآچاريا! أظهر عليّ كل ما فيك: قوتك، وبصيرتك، وبأسك في القتال، وعزمك الرجولي؛ ومودّتك لآل دهارتراشترا، وبغضك لنا كذلك. ولْيَتَجلَّ بتمامه بريقك ونفوذك!»
Verse 6
यच्च भूयो<स्ति तेजस्ते तत् सर्व मयि दर्शय । स एव द्रोणहन्ता ते दर्प छेत्स्यति पार्षत:
قال سنجيا: «وأيُّ بريقٍ وقوةٍ ما زالت لديك—فأظهرها كلَّها عليّ. فإنَّ ذلك البارْشَتَ، دْهْرِشْتَديومْنَ، قاتلَ دْرونا، سيحطّم كبرياءك تحطيماً».
Verse 7
कालानलसमप्रख्यं द्विषतामन्तकोपमम् | समासादय पाज्चाल्यं मां चापि सहकेशवम् । दर्प नाशयितास्म्यद्य तवोद्वृत्तस्य संयुगे
قال سنجيا: «اهجم على أمير البانچالا، دْهْرِشْتَديومْنَ، المتوهّج كَنارِ الزمان، والمُرعِب لأعدائه كالموت نفسه؛ وهاجمني أنا أيضاً مع كيشافا (كريشنا). لقد تماديت في الصَّلَف؛ واليوم في ساحة القتال سأحطّم كبرياءك كلَّه.»
Verse 8
धृतराष्ट्र रवाच आचार्य पुत्रो मानाहों बलवांश्वापि संजय । प्रीतिर्धनंजये चास्य प्रियश्षापि महात्मन:
قال دْهْرِتَراشْتْرَ: «يا سنجيا، إنّي أرى أَشْوَتْثامَن، ابنَ المُعلِّم، قويّاً جديراً بالإكرام. له مودةٌ لِدَهنَنْجَيا (أرجونا)، وأرجونا العظيم النفس يحبه أيضاً. ما سمعتُ قطّ أرجونا يخاطبه بمثل هذه القسوة. فلماذا إذن، في ذلك اليوم، كلّم ابنُ كونتي، أرجونا، صديقه بتلك الشدّة؟»
Verse 9
न भूतपूर्व बीभत्सोर्वाक्यं परुषमीदृशम् । अथ कस्मात् स कौन्तेय: सखायं रूक्षमुक्तवान्
قال سنجيا: «لم يُسمَع قطّ من أرجونا (بيبَهَتسو) كلامٌ بهذه الخشونة. فلماذا إذن خاطب ابنُ كونتي صديقه بمثل هذه الكلمات الجافية؟»
Verse 10
संजय उवाच युवराजे हते चैव वृद्धक्षत्रे च पौरवे । इष्वस्त्रविधिसम्पन्ने मालवे च सुदर्शने
قال سنجيا: «لمّا قُتِل الأميرُ الفتيّ، وسقط أيضاً فْرِدْدْهَكْشَتْرَ الباورَفي—وكلاهما مُتقِنٌ لعلوم الرمي بالقوس ولأساليب الأسلحة القاذفة—وسقط كذلك المحاربُ المالَفي سُودَرْشَنَ…»
Verse 11
धृष्टय्युम्ने सात्यकौ च भीमे चापि पराजिते । युधिष्ठिरस्य॒ तैर्वाक्यैर्मर्मण्यपि च घट्टिते
قال سنجيا: لما هُزم دْهْرِشْتَدْيُومْنَ وساتْيَكِي وبهِيما، ولما أُصيب يُدْهِشْتِهيرا هو أيضًا إلى أعماقه—كأن كلماتهم قد خدشت مواضع حياته—لم يكن ثِقَلُ الموقف الأخلاقي في خسارة ساحة القتال وحدها، بل في التوبيخ والمشورة النافذين اللذين زعزعا عزم الملك وإحساسه بالواجب.
Verse 12
अन्तर्भेदे च संजाते दुःखं संस्मृत्य च प्रभो । अभूतपूर्वो बीभत्सोर्दु:खान्मन्युरजायत
قال سنجيا: «يا مولاي، لما دبّ الشقاق في صفوفهم، ومع استحضار الحزن، وُلد في بيبهاتسو (أرجونا) غضبٌ لم يُعهد من قبل، انبثق من صميم الأسى.»
Verse 13
संजयने कहा--प्रभो! चेदिदेशके युवराज
قال سنجيا: «يا مولاي! لما قُتل وليُّ عهدِ تشيدي، وسقط كذلك الشيخُ المحاربُ من آلِ پوروڤا، وسودَرْشَنَ ملكُ المالَڤا الماهرُ في استعمال السهام؛ ولما هُزم دْهْرِشْتَدْيُومْنَ وساتْيَكِي وبهِيماسينا، اعتصر الألمُ قلبَ أرجونا. ثم إن كلماتِ يُدْهِشْتِهيرا الساخرة أصابت مَكْمَنَهُ الحساس، ومع استحضار أحزان الماضي كاد فؤاده ينفطر. فبسبب فرط الأسى استيقظ في أرجونا غضبٌ لم يُعرف له مثيل. لذلك خاطب أَشْوَتْثامان، ابنَ درونا—وهو جديرٌ بالتوقير ولا يليق أن يُواجَه بالخشونة—بألفاظٍ لا تليق: فاحشةٍ مُرّةٍ قاسية، كما يُقذَف بها جبان.»
Verse 14
एवमुक्त: श्वसन् क्रोधान्महेष्वासतमो नृप । पार्थेन परुषं वाक््यं सर्वमर्मभिदा गिरा
قال سنجيا: وهكذا، أيها الملك، لما خاطبه پارتها (أرجونا) بكلامٍ قاسٍ، بقولٍ يطعن كل موضعٍ حساس، أخذ أَشْوَتْثامان، أبرعَ أصحاب القسي العظام، يلهث ويتنفس طويلاً من شدة الغضب.
Verse 15
द्रौणिश्वुकोप पार्थाय कृष्णाय च विशेषतः । स तु यत्तो रथे स्थित्वा वार्युपस्पृश्य वीर्यवान्
قال سنجيا: اشتعل أَشْوَتْثامان، ابنُ درونا، غضبًا على پارتها (أرجونا) وعلى كريشنا على وجه الخصوص. غير أن ذلك البطلَ الجسور كبح نفسه، فظل قائمًا على مركبته، وأجرى طقسَ مسِّ الماء—تهيؤًا رزينًا قبل الإقدام على الفعل.
Verse 16
दृश्यादृश्यानरिगणानुद्दिश्याचार्यनन्दन:
قال سنجيا: إنَّ أشفَتّامَا، ابنَ المُعلِّم، وقد اجتاحه سيلُ الغضب من كلِّ جانب، استحضر سهماً متلألئاً كالنار التي لا دخان لها، وقرَّبه بالمانترا. ثم وجَّهَه إلى جموع الأعداء—الظاهرين والخفيّين—وأطلقه قاصداً إفناءَ أبطال الخصم. وتُبرز الآية أن الغضب إذا اعتلى العرش حوَّل حتى القوّة المُقدَّسة إلى أداة خرابٍ لا تُميِّز.
Verse 17
सोऊभिमन्त्र्य शरं दीप्तं विधूममिव पावकम् | सर्वतः क्रोधमाविश्य चिक्षेप परवीरहा
قال سنجيا: بعدما قوّى أشفَتّامَا سهماً متّقداً بالمانترا، كأنه نارٌ بلا دخان، وهو قاتلُ أبطال العدو، وقد استبدّ به الغضب من كل جانب، قذفه موجِّهاً إيّاه ليصيب الأعداء المرئيّين والخفيّين معاً. ويُبرز المشهد أن القوّة المُقدَّسة، إذا ساقها غضبٌ منفلت، غدت في الحرب أداةً مروّعة للدمار غير المميِّز.
Verse 18
ततस्तुमुलमाकाशे शरवर्षमजायत । पावकार्चि: परीतं तत् पार्थमेवाभिपुप्लुवे,फिर तो आकाशमें बाणोंकी भयंकर वर्षा होने लगी और सब ओर फैली हुई आगकी लपटें अर्जुनपर ही टूट पड़ीं
قال سنجيا: ثم نشأ في السماء وابلٌ هائجٌ من السهام. وقد أحاطت به ألسنةُ النار المتأجّجة، اندفع ذلك الهجوم وانصبّ في معظمه على بارثا (أرجونا)، كأنّ ضراوةَ المعركة تتقاطر عليه وحده.
Verse 19
उल्काश्च गगनात् पेतुर्दिशश्व॒ न चकाशिरे । तमश्न सहसा रौद्रं चमूमवततार ताम्,आकाशसे उल्काएँ गिरने लगीं, दिशाओंका प्रकाश लुप्त हो गया और उस सेनामें सहसा भयानक अन्धकार उतर आया
قال سنجيا: بدأت الشُّهُبُ تتساقط من السماء، ولم تعد الجهات تلمع. وفجأةً هبط على ذلك الجيش ظلامٌ عاتٍ مروّع—نذيرُ شؤمٍ بأن عنفَ الحرب بلغ ذروةً مخيفة.
Verse 20
रक्षांसि च पिशाचाश्न विनेदुरतिसड्रता: । ववुश्चवाशिशिरा वाता: सूर्यो नैव तताप च,राक्षत और पिशाच परस्पर मिलकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे, गरम हवा चलने लगी और सूर्यका ताप क्षीण हो गया
قال سنجيا: «إنّ الرّاكشاسا والبيشاشا، وقد استبدّ بهم اضطرابٌ عنيف، أخذوا يعوون ويزأرون بصوتٍ عالٍ. وهبّت رياحٌ باردة، وحتى الشمس بدت كأنها فقدت حرارتها». وتشير الآية إلى انعطافٍ مشؤوم في الحرب—فالطبيعة والقوى الخفيّة تعكس الاضطراب الأخلاقي والعاطفي في ساحة القتال، مُنذِرةً بتصاعد العنف والفوضى.
Verse 21
वायसाश्चापि चाक्रन्दन् दिक्षु सर्वासु भैरवम् । रुधिरं चापि वर्षन्तो विनेदुस्तोयदा दिवि,कौए सम्पूर्ण दिशाओंमें काँव-काँव करके भयानक कोलाहल मचाने लगे तथा मेघ रक्तकी वर्षा करते हुए आकाशमें गरजने लगे
قال سنجيا: «حتى الغربان أخذت تنعق نعيقًا مفزعًا في كل الجهات؛ وغيوم المطر، كأنها تمطر دمًا، كانت تزأر في السماء.»
Verse 22
पक्षिण: पशवो गावो विनेदुश्चापि सुव्रता: । परम॑ प्रयतात्मानो न शान्तिमुपलेभिरे,पक्षी और गाय आदि पशु भी चीत्कार करने लगे। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले शुद्धचित्त साधु पुरुष भी अत्यन्त अशान्त हो उठे
قال سنجيا: «حتى الطيور والوحوش والأبقار أخذت تصرخ. وأولئك الرجال المنضبطون، ذوو القلوب الطاهرة، المتمسكون بالنذور السامية، لم يجدوا سلامًا قط.»
Verse 23
भ्रान्तसर्वमहाभूतमावर्तितदिवाकरम् | त्रैलोक्यमभिसंतप्तं ज्वराविष्टमिवाभवत्
قال سنجيا: «بدت العناصر العظمى كلها كأنها تترنح في اضطراب، وحتى الشمس خُيِّل أنها تدور. واحترقت العوالم الثلاثة بحرٍّ شديد، كأن حُمّى ملتهبة قد استولت عليها.»
Verse 24
अश्वत्थामाके द्वारा अर्जुनपर आग्नेयास्त्रका प्रयोग एवं उसके द्वारा पाण्डव-सेनाका संहार अस्त्रतेजो$भिसंतप्ता नागा भूमिशयास्तथा । निःश्वसन्तः समुत्पेतुस्तेजो घोरं मुमुक्षव:
قال سنجيا: «حتى الناغا، الأفاعي التي كانت تضطجع على الأرض، إذ لَفَحَها وهجُ ذلك السلاح المتأجّج، أخذت تفحّ وتثب إلى أعلى، تطلب النجاة من تلك الحرارة الرهيبة.»
Verse 25
जलजानि च सत्त्वानि दहमानानि भारत । न शान्तिमुपजम्मुर्हि तप्यमानैर्जलाशयै:,भारत! जलाशय भी तप गये थे, जिससे दग्ध होनेवाले जलचर प्राणियोंको भी शान्ति नहीं मिल पाती थी
قال سنجيا: «يا بهاراتا، حتى الكائنات المولودة في الماء، وهي تحترق بتلك الحرارة، لم تنل سكينة؛ لأن البحيرات والبرك نفسها قد غدت ملتهبة.»
Verse 26
दिग्भ्य: प्रदिग्भ्य: खाद् भूमे: सर्वत: शरवृष्टय: । उच्चावचा निपेतुर्वे गरुड़ानिलरंहस:
قال سَنجايا: من كل جهةٍ ومن الجهاتِ البينية، من السماء ومن الأرض من كل ناحية، ابتدأت زخّاتُ السهام تهوي—منها العالي ومنها المنخفض، على ألوانٍ شتّى—وكلُّ سهمٍ يندفع كغارودا وكالريح العاصفة. كان المشهدُ علامةً على أن ساحة القتال قد غمرتها الحربُ غمراً تامّاً؛ إذ طغت البراعةُ القتالية على الميدان، وثقلُ العنف الأخلاقي يضغط على كل من يشهد.
Verse 27
तैः शरैद्रोणपुत्रस्य वजवेगै: समाहता: । प्रदग्धा रिपव: पेतुरग्निदग्धा इव द्रुमा:
قال سَنجايا: لما أُصيب الأعداءُ بتلك السهام التي أطلقها ابنُ دروṇa—سريعةً كالصاعقة—أخذ المحاربون يسقطون كأنهم قد احترقوا، مثل أشجارٍ أكلتها النار حتى هوَت. ويُبرز هذا المقطع زخمَ المعركة المرعب: فحين تُطلَق البراعةُ القتالية، تُسقط الخصمَ عاجزاً، وتُثقل الكفّة الأخلاقية للعنف حتى في حربِ الكشاتريا.
Verse 28
दहामाना महानागा: पेतुरुर्व्या समनन््ततः । नदन्तो भैरवान् नादाज्जलदोपमनि:स्वनान्,विशालकाय गजराज दग्ध हो-होकर मेघकी गर्जनाके समान भयंकर चीत्कार करते हुए सब ओर धराशायी होने लगे
قال سَنجايا: وبينما كانت تُحرق، كانت الفيلةُ العظام تهوي إلى الأرض من كل جانب، مطلِقةً صرخاتٍ مروّعة—أصواتاً كدويّ السحب الرعدية—وأجسادُها الضخمة تشتعل وسط مذابح الحرب.
Verse 29
अपरे प्रद्रुता नागा भयत्रस्ता विशाम्पते । भ्रेमुर्दिशो यथा पूर्व वने दावाग्निसंवृता:
قال سَنجايا: يا سيّدَ الناس، إن فيلةً أخرى أيضاً، وقد استبدّ بها الفزعُ وهي تفرّ، أخذت تدور في كل اتجاه—كما كانت من قبل تدور في الغابة بلا حيلة حين يطوّقها حريقٌ هائج. تُبرز الصورة كيف يبعثر الخوفُ في الحرب حتى الأقوياء، فيدفعهم إلى حركةٍ عمياء طلباً للنجاة بدل فعلٍ منظم.
Verse 30
ट्रमाणां शिखराणीव दावदग्धानि मारिष | अश्वव्न्दान्यदृश्यन्त रथवृन्दानि भारत
قال سَنجايا: «يا أيها النبيل، يا بهاراتا، بدت جموعُ العربات وقطعانُ الخيل كأنها قممُ جبالٍ قد أحرقتها نارُ الغابة—مسوَّدةً، مكسَّرةً، وقد سُلِبت بهاءَها القديم.»
Verse 31
अपतन्त रथौघाश्ष तत्र तत्र सहस्रश: | माननीय नरेश! भारत! अश्वसमूह तथा रथवृन्द दावानलसे दग्ध हुए वृक्षोंके अग्रभागके समान दिखायी दे रहे थे और जहाँ-तहाँ सहस्रों रथसमूह गिरे पड़े थे || ३० ई ।।
قال سَنجايا: «أيها الملك المُبجَّل، يا منحدرَ بهاراتا! كانت تشكيلاتُ العرباتِ الحربية تتهاوى هنا وهناك بالآلاف. وكانت جموعُ الخيل وعناقيدُ العربات تبدو كقممِ الأشجار المحترقة التي أكلتها نارُ الغابة؛ وفي مواضع كثيرة كانت عرباتٌ لا تُحصى مطروحةً ساقطة. ذلك الجيش، وقد زُلزل بالخوف، كان يُلتهم في ساحة القتال، يا بهاراتا».
Verse 32
दृष्टवा तु पाण्डवीं सेना दह्यमानां महाहवे
قال سَنجايا: «ولمّا رأى جيشَ الباندافا كأنه يحترق في المعركة العظمى، وصف المشهدَ بأنه دمارٌ طاغٍ—صورةٌ تُبيّن أن الحرب، إذا أُطلقت، التهمت حتى جانبَ الحق، ممتحنةً العزمَ والدارما وسط الفوضى».
Verse 33
ततस्तूर्यसहस्राणि नानालिज्रानि भारत
ثمّ، يا بهاراتا، دُوِّيَت آلافُ آلاتِ الحرب—الأبواقُ وسائرُ الإشاراتِ الرنّانة على اختلافها—فازداد صخبُ المعركة واشتدّت عزائمُ المقاتلين.
Verse 34
कृत्स्ना हाक्षीहिणी राजन् सव्यसाची च पाण्डव:
قال سَنجايا: «أيها الملك، إنّ الأَكشَوْهِني (فرقة الجيش الكاملة) بأسرها، ومعها رامِي الباندافا سَفْيَسَاتشي (أرجونا) كذلك…» (تُشير هذه العبارة إلى ضخامة القوى وإلى حضور أرجونا المحوري، فتُؤطِّر الحدث بقوةٍ قتاليةٍ طاغية وبثِقَلٍ أخلاقيٍّ يحمله البطل الرئيس.)
Verse 35
नैव नस्तादृशं राजन दृष्टपूर्व न च श्रुतम्
قال سَنجايا: «أيها الملك، ما رأينا مثل هذا قطّ من قبل، ولا سمعنا به.»
Verse 36
अर्जुनस्तु महाराज ब्राद्ममस्त्रमुदैरयत्
قال سانجيا: أيها الملك العظيم، عندئذٍ أطلق أرجونا سلاح براهما—مستدعياً قوةً عليا مقدّسة في قلب المعركة؛ لحظةٌ تُظهر كيف تصاعدت الحرب حتى بلغت استعمال قوى خارقة، وأن إطلاقها يحمل وزناً أخلاقياً جسيماً.
Verse 37
सर्वस्त्रिप्रतिघातार्थ विहितं पद्मययोनिना । महाराज! उस समय अर्जुनने ब्रह्मास्त्रको प्रकट किया; जिसे ब्रह्माजीने सम्पूर्ण अस्त्रोंके विनाशके लिये बनाया है ।। ततो मुहूर्तादिव तत् तमो व्युपशशाम ह
قال سانجيا: «أيها الملك العظيم، في ذلك الحين أظهر أرجونا البراهمَاسترا—الذي سنَّه براهما، المولود من اللوتس، ليكون لردّ جميع الأسلحة وإفنائها. ثم كأنما في لحظةٍ واحدة انقشع ذلك الظلام المطبق.»
Verse 38
तत्राद्भुतमपश्याम कृत्स्नामक्षौहिणीं हताम्
قال سانجيا: «هناك رأينا أمراً عجيباً—أكشوهيني كاملة (فرقةً قتاليةً تامة) مطروحةً صريعة.»
Verse 39
ततो वीरौ महेष्वासौ विमुक्तौ केशवार्जुनौ
قال سانجيا: ثم إن البطلين، سيدي القوس العظيم—كيشافا وأرجونا—أُطلق سراحهما، فعادا إلى حرية الفعل وسط زحمة القتال.
Verse 40
ततो गाण्डीवधन्वा च केशवश्चाक्षतावुभौ
قال سانجيا: ثم إن أرجونا حامل غانديفا وكيشافا (كريشنا) كليهما بقيا سالمين لا جراح بهما—إذ لم يستطع أذى أن يمسّ جسديهما. وكانت عربتهما، بما عليها من راية ولواء، وخيلٍ ولُجُمٍ وأسلحةٍ نفيسة، قد تحررت وبقيت سليمة، فأشرقت لمعاناً وألقت الرعب في جنودك.
Verse 41
सपताकध्वजहय: सानुकर्षवरायुध: । प्रबभौ स रथो मुक्तस्तावकानां भयंकर:
في ذلك الحين لم يستطع لهيبٌ ولا حَرٌّ أن يمسَّ جسدي أرجونا حامل «غانديڤا» والربّ شري كريشنا. وتألقَت عربتهما—وقد انفلَتَت من (أثر) السلاح—مزدانةً بالرايات والألوية والخيول واللُّجُم وأفخر العُدَد، مُرعبةً جنودَك.
Verse 42
हु ढ़ है (हे ततः किलकिलाशब्द: शड्खभेरीस्वनै: सह । पाण्डवानां प्रहृष्टानां क्षेन समजायत,तब पाण्डव हर्षसे खिल उठे और क्षणभरमें शंख तथा भेरियोंकी ध्वनिके साथ उनका आनन्दमय कोलाहल गूँज उठा
قال سنجيا: ثم في لحظةٍ واحدة ارتفع بين الباندڤا المسرورين صخبٌ متهلّل، ممتزجًا بنفير الأصداف ورجْع طبول الحرب. وكان ذلك الصوت علامةً على اندفاع الثقة وتماسك العزم الجماعي، وهم يواجهون العبء الأخلاقي للقتال دون أن يحيدوا عن القضية التي اختاروها.
Verse 43
हताविति तयोरासीत् सेनयोरुभयोर्मतिः । तरसाभ्यागतौ दृष्टवा सहितौ केशवार्जुनौ
قال سنجيا: لقد اعتقد الجيشان كليهما أن كريشنا وأرجونا قد قُتلا. ولكن لما رأوا كيشافا وأرجونا يعودان معًا مسرعين بقوة، سرت موجةٌ من الارتياح والفرح في الصفوف—كاشفةً كيف يزعزع الخوفُ والإشاعةُ العقولَ سريعًا في الحرب، وكيف تعيدُ هيبةُ القيادةِ العادلة المعنوياتِ والثبات.
Verse 44
तावक्षतौ प्रमुदितौ दध्यतुर्वारिजोत्तमौ । दृष्टवा प्रमुदितान् पार्थास्त्वदीया व्यथिता भृशम्
لم تُصَب أجسادُهما بأذى. وابتهج البطلان فنفخا في صَدَفَيْهما الكريمين. ولمّا رأى أبناءُ كونتي فرحين، اعتصر الألمُ الشديد قلوبَ أبناءِك.
Verse 45
विमुक्तौ च महात्मानौ दृष्टवा द्रौणि: सुदु:खित: । मुहूर्त चिन्तयामास किं त्वेतदिति मारिष
قال سنجيا: لما رأى أشفَتّھاما ابنَ درونا أن البطلين العظيمي الروح—شري كريشنا وأرجونا—قد انفلتَا من سلاح النار (أغنييسترا)، غمره حزنٌ شديد. أيها الملك الموقّر، ظلّ برهةً غارقًا في التفكير قائلاً: «كيف حدث هذا؟»
Verse 46
चिन्तयित्वा तु राजेन्द्र ध्यानशोकपरायण: । निःश्वसन् दीर्घमुष्णं च विमनाश्चाभवत् ततः
قال سنجيا: أيها الملك، بعدما تفكّر عميقًا، غارقًا في همٍّ وحزنٍ مُلازمين، أطلق زفرةً طويلةً حارّة؛ ثم انحطّت روحه إلى الكآبة واليأس.
Verse 47
राजेन्द्र! चिन्ता और शोकमें मग्न होकर कुछ देरतक विचार करनेके पश्चात् अश्वत्थामा गरम-गरम दीर्घ उच्छवास लेने लगा और मन-ही-मन उदास हो गया ।।
يا ملكَ الملوك! إذ غاص في الهمّ والحزن، وبعد أن فكّر برهةً، أخذ أشوَتّامَا يطلق زفراتٍ طويلةً حارّة، واعتراه في باطنه كمدٌ شديد. ثم إنّ درَوْني ألقى قوسه، وقفز من العربة مسرعًا، وقال: «عارٌ! عارٌ! إنّ هذا كلَّه باطل!» ثم اندفع هاربًا من ساحة القتال.
Verse 48
तत्पश्चात् द्रोणकुमार धनुष त्यागकर रथसे कूद पड़ा और “धिक्कार है! धिककार है!! यह सब मिथ्या है' ऐसा कहकर वह रणभूमिसे वेगपूर्वक भाग चला ।।
بعد ذلك ألقى ابنُ دروṇa قوسَه، وقفز من العربة، وهو يصيح: «عارٌ! عارٌ! إنّ هذا كلَّه باطل!» ثم فرّ مسرعًا من ساحة القتال. وفي تلك اللحظة أبصر الحكيمَ فياسا—داكنَ اللون كالسحاب الماطر الكثيف، منزَّهًا عن الإثم، كأنّه مقامُ الفيدا وسَرَسْوَتي، وهو الذي بسط علومَ الفيدا ورتّبها—واقفًا أمامه.
Verse 49
त॑ं द्रौणिरग्रतो दृष्टवा स्थितं कुरुकुलोद्वह । सन्नकण्ठोडब्रवीद् वाक्यमभिवाद्य सुदीनवत्
قال سنجيا: يا أكرمَ رجالِ آلِ كورو، لما رأى ابنُ دروṇa الحكيمَ قائمًا أمامه اختنقَتْ حنجرتُه بالعبرة وامتلأت عيناه بالدمع. فانحنى مُسلِّمًا بإجلال، ثم تكلّم في غاية التواضع والانكسار.
Verse 50
५ ]/7 १0) ॥ ५८८, थ्र्टा श्व्ट ॥/९ २2०.४ है ४ ५। भो भो माया यदच्छा वा न विद्य: किमिदं भवेत् । अस्त्रं त्विदं कथं मिथ्या मम कश्न व्यतिक्रम:,“महर्षे! यह माया है या दैवेच्छा। मेरी समझमें नहीं आता कि यह क्या है? यह अस्त्र झूठा कैसे हो गया? मुझसे कौन-सी गलती हो गयी?
وقال: «أيها المَهَرِشي! أهذا مَايَا أم مشيئةُ القدر؟ لا أفهم ما الذي آل إليه الأمر. كيف صار هذا السلاحُ باطلَ الأثر؟ أيُّ تجاوزٍ—أيُّ خطأ—اقترفتُه أنا؟»
Verse 51
अधरोत्तरमेतद् वा लोकानां वा पराभव: । यदिमौ जीवत: कृष्णौ कालो हि दुरतिक्रम:
قال سَنْجَيا: «أ意كون قد وقع انقلابٌ في عمل هذا السلاح (الأغنيَة)، أم إن العوالم نفسها قد قُدِّر لها الهزيمة—حتى إن هذين “الكِرِشنَين” قد بقيا حيَّين؟ فإن الزمان (كالا) حقًّا عسيرٌ جدًّا على التجاوز».
Verse 52
नासुरा न च गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसा: । न सर्पा यक्षपतगा न मनुष्या: कथंचन
قال سَنْجَيا: «لا الآسورا ولا الغندهرفا، لا البيشاتشا ولا الراكشاسا؛ ولا الحيّات ولا الياكشا ولا الطير ولا البشر—لم يكن لأحدٍ أن يجعل السلاح الذي أطلقته باطلاً بأي وجه. ومع ذلك فإن ذلك المقذوف المتّقد، بعدما أحرق أكشوهِني واحدة من الجند فحسب، هدأ وسكن.»
Verse 53
उत्सहन्ते3न्यथा कर्तुमेतदस्त्रं मयेरितम् तदिदं केवल हत्वा शान्तमक्षौहिणीं ज्वलत्
قال سَنْجَيا: «ما من كائنٍ يستطيع بأي وجه أن يُبطل هذا السلاح الذي أطلقته. ومع ذلك فإن هذا المقذوف المتّقد، بعدما التهم أكشوهِني واحدة من الجند فحسب، قد سكن وهدأ.»
Verse 54
सर्वघाति मया मुक्तमस्त्रं परमदारुणम् | केनेमौ मर्त्यधर्माणौ नावधीत् केशवार्जुनौ
قال سَنْجَيا: «لقد أطلقت سلاحًا بالغ الفظاعة، قادرًا على إفناء الجميع. فكيف لم يُقتل به هذان—كيشافا وأرجونا—مع أنهما خاضعان لشرط البشر الفانين؟»
Verse 55
'मैंने तो अत्यन्त भयंकर एवं सर्वसंहारक अस्त्रका प्रयोग किया था; फिर उसने किस कारणसे इन मर्त्यधर्मा श्रीकृष्ण और अर्जुनका वध नहीं किया? ।।
«يا أيها المبارك، يا أيها الحكيم العظيم—أخبرني بهذا على وجهه الحق كما هو، إذ قد سألتك. إني أريد أن أسمع الأمر كله وفق الحقيقة: مع أن سلاحًا شديد الهول، مُفنيًا للجميع، قد استُعمل—فلأي سبب لم يقتل كِرِشنَة وأرجونا، وهما خاضعان لشرط الفناء البشري؟»
Verse 56
व्यास उवाच महान्तमेवमथ मां यं त्वं पृष्छसि विस्मयात् । त॑ प्रवक्ष्यामि ते सर्व समाधाय मन: शृणु
قال فياسا: «إن الأمر الذي تسألني عنه بدهشةٍ عظيمة هو حقًّا أمرٌ جليل. سأبيّنه لك بيانًا تامًّا؛ فاثبّت قلبك وأصغِ بتركيزٍ كامل».
Verse 57
व्यासजी बोले--तू जिसके सम्बन्धमें आश्वर्यके साथ प्रश्न कर रहा है, उस महत्त्वपूर्ण विषयको मैं तुझसे बता रहा हूँ। तू अपने मनको एकाग्र करके सब कुछ सुन ।।
قال فياسا: «إن ما تسأل عنه بدهشةٍ أمرٌ عميق؛ وسأبيّنه لك. فاجمع ذهنك واصغِ إلى كل شيء. إن الرب المسمّى نارايانا—سَلَفٌ حتى لأسلاف الأقدمين—هو الإله الأول، جگنّاثا، سيّد الكون، صانع العوالم، والمالك بسلطانه الحق. هو العلّة الأولى لكل الخلق، لا بداية له ولا نهاية، ولا يزيغ عن نظامه؛ لذلك يُدعى أتشيوتا، الذي لا يسقط ولا يَخيب. والڤيدا والريشي العظام يجتهدون في شرح حقيقته؛ ومن ثمّ فإن ربّ العالم لا يُقهر من أي كائن—ولا حتى في الخاطر. ومع ذلك، ولغايةٍ مخصوصة، وُلد ذلك الخالق نفسه مرةً ابنًا لدارما، نازلًا إلى العالم ليقيم النظام الكوني ويصون الدارما عبر تجسّدٍ مختار.»
Verse 58
स तपस्तीव्रमातस्थे शिशिरं गिरिमास्थित: । ऊर्ध्वबाहुर्महातेजा ज्वलनादित्यसंनिभ:
قال فياسا: «إذ أقام على الجبل المكلّل بالثلج، باشر تَقَشُّفًا بالغ الشدّة—واقفًا وذراعاه مرفوعتان. وكان ذا بهاءٍ عظيم، يلمع كالنار وكالشمس.»
Verse 59
षष्टिं वर्षमहस्राणि तावन्त्येव शतानि च । अशोषयत् तदा55त्मानं वायुभक्षोअम्बुजेक्षण:
قال فياسا: «ستين ألف سنة—ومثلها مئاتٌ أيضًا—أيبس جسده آنذاك، مكتفيًا بالهواء غذاءً، يا ذا العينين كاللوتس.»
Verse 60
उन कमलनयन श्रीहरिने छाछठ हजार वर्षोतक केवल वायु पीकर उन दिनों अपने शरीरको सुखाया ।।
قال فياسا: «ثم بعد ذلك، إذ عاد إلى التقشّف مرةً أخرى—ضعف المدة، ثم تقشّفًا عظيمًا آخر—ملأ بضياءٍ وُلِد من تَبَسِه الفضاءَ المتوسط بين السماء والأرض.»
Verse 61
स तेन तपसा तात ब्रह्मभूतो यदाभवत् | ततो विश्वेश्वरं योनिं विश्वस्य जगत: पतिम्
قال فياسا: «يا بُنيّ، بتلك الزهادة (التَّبَس) لمّا استقرّ في مقام البراهمان (Brahman) استقرارَ العارف، أبصر ربَّ الكون—فيشفيشڤارا (Viśveśvara)—وهو رحمُ الخلق ومصدرُه، وحافظُ العالم.»
Verse 62
ददर्श भृशदुर्धर्ष सर्वदेवैरभिष्टतम् । अणीयांसमणुभ्यश्व बृहदभ्यश्व बृहत्तमम्
قال فياسا: «ورأى الربَّ شديدَ الامتناع عن الغَلَبة، المحبوبَ والممجَّدَ عند جميع الآلهة—ألطفَ من كلِّ لطيف، وأعظمَ من كلِّ عظيم.»
Verse 63
रुद्रमीशानवृषभं हरं शम्भुं कपर्दिनम् | चेकितानं परां योनिं तिषछततो गच्छतश्ष ह
قال فياسا: «(أُثني على) رودرا (Rudra)—إيشانا (Īśāna)، السيد ذو راية الثور؛ هارا (Hara)، شمبهو (Śambhu)، ذو الشعر المعقود. هو مُوقِظُ الوعي في جميع الكائنات، وهو العِلّةُ العليا للوجود، متحرّكِه وساكنِه. ولأنه يزيل الألم سُمّي “رودرا”؛ وبين براهما وحُماة العوالم هو الأوّل—مُزيلُ الخطيئة وواهِبُ اليُمن.»
Verse 64
दुर्वार्णं दुर्दुशं तिग्ममन्युं महात्मानं सर्वहरं प्रचेतसम् । दिव्यं चापमिषुधी चाददानं हिरण्यवर्माणमनन्तवीर्यम्
قال فياسا: «هو لا يُقاوَم ويَعسُرُ النظرُ إليه؛ وغضبُه على الأشرار حادٌّ كالنصل. عظيمُ الروح، نافذُ البصيرة، يَسلبُ الآلامَ كلَّها—أو إذا اقتضى الزمانُ، أتى بالهلاك الشامل. يحمل قوسًا إلهيًّا وجُعبتين، ودرعُه من ذهب، وبأسُه وقوّتُه بلا نهاية.»
Verse 65
पिनाकिनं वज़िणं दीप्तशूलं परश्चधिं गदिनं चायतासिम् । शुभ्रं जटिलं मुसलिन चन्द्रमौलिं व्याप्राजिनं परिघिणं दण्डपाणिम्
قال فياسا: «يحمل قوسَ بيناكا (Pināka) والصاعقةَ (vajra)؛ وفي يدٍ يلمع رمحُه الثلاثيّ المتّقد على الدوام. ويحمل الفأسَ والدبّوسَ والسيفَ الطويل؛ كما تُزيّن يديه الهراوةُ (pestle) والعمودُ الحديديّ والعصا. إشراقُه ساطع، وشَعرُه معقودٌ، وعلى هامته القمرُ تاجًا، وجسدُه مُجلَّلٌ بجلدِ نمر.»
Verse 66
शुभाड़दं नागयज्ञोपवीतं विश्वैर्गणै: शोभितं भूतसंघै: । एकी भूतं तपसां संनिधानं वयो&तिगै: सुष्ठतमिष्टवाग्भि:
قال فياسا: إنّه مُزَيَّنٌ بأساورَ جميلةٍ على الذراعين، ويلبس الخيطَ المقدّس (yajñopavīta) على هيئةِ حيّة؛ ويشرقُ في وسطِ الجموع والكتائب من الكائنات التي تحفّ به. فاعرفوه ربًّا واحدًا لا ندَّ له—كنزَ الزهد وموضعَه المقيم—يمدحه الشيوخ من الحكماء بكلماتٍ منتقاةٍ مُرضية.
Verse 67
जल दिशं खं क्षितिं चन्द्रसूर्यी तथा वाय्वग्नी प्रमिमाणं जगच्च । नालं द्रष्ट यं जना भिन्नवृत्ता ब्रह्मद्विषष्नममृतस्य योनिम्
قال فياسا: الماءُ والجهاتُ والسماءُ والأرضُ والقمرُ والشمسُ، وكذلك الريحُ والنارُ، والزمنُ الذي يقيسُ العالمَ كلَّه—كلُّ ذلك صورٌ له. وهو مُهلِكُ من يُبغضُ البراهمان (Brahman)، وهو المصدرُ الأعلى للخلود (التحرّر). أمّا ذوو السلوكِ المتشعّب الفاسد فلا يطيقون رؤيتَه.
Verse 68
यं पश्यन्ति ब्राह्मणा: साधुवृत्ता: क्षीणे पापे मनसा वीतशोका: । त॑ निष्पतन्तं तपसा धर्ममीड्यं तदभकक्त्या वै विश्वरूप॑ ददर्श | दृष्टवा चैनं वाड्मनोबुद्धिदेहै: संह्ृष्टात्मा मुमुदे वासुदेव:
قال فياسا: إنّ البراهمة ذوي السيرة الصالحة—وقد نُفِدت خطاياهم وتحرّرت عقولهم من الحزن—يُبصرونه. ذلك الربّ الجدير بالمدح، وهو الدارما نفسها، الذي هيئته الكون كلّه، تجلّى هناك بقوّة الزهد والعبادة؛ فرأى الناسك نارايانا ذلك الـ«فيشفاروبا». ولمّا رآه، أزهرت ذاتُ فاسوديفا الباطنة فرحًا—مع كلامه وعقله ولبّه وجسده—وذَاق سرورًا عميقًا.
Verse 69
अक्षमालापरिक्षिप्तं ज्योतिषां परमं निधिम् । ततो नारायणो दृष्टवा ववन्दे विश्वसम्भवम्,रुद्राक्षकी मालासे विभूषित तथा तेजकी परम निधिरूप उन विश्व-विधाताका दर्शन करके भगवान् नारायणने उनकी वन्दना की
«مُتزيّنًا بمسبحةٍ من حَبّات الرودراكشا (rudrākṣa)، كنزًا أسمى بين المتلألئين—لمّا رأى نارايانا مصدرَ الكون، انحنى بخشوعٍ وسجد إجلالًا لمنشأ العالم.»
Verse 70
वरदं पृथुचार्वड्र्या पार्वत्या सहित प्रभुम् । क्रीडमानं महात्मानं भूतसड्डघगणैर्वृतम्
قال فياسا: لقد أبصر الربّ—واهِبَ النِّعَم—مصاحبًا لبارفَتي على الجبل العريض الجميل، يلهو في حرّيةٍ إلهيّة؛ ذلك العظيمُ الروح كانت تحيط به جموعٌ وكتائبُ من البهوتا.
Verse 71
अजमीशानमव्यक्त कारणात्मानमच्युतम् । वे वरदायक प्रभु हृष्ट-पुष्ट एवं मनोहर अंगोंवाली पार्वतीदेवीके साथ क्रीड़ा करते हुए पधारे थे। उन अजन्मा, ईशान, अव्यक्त, कारणस्वरूप और अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले परमात्माको उनके पार्षदस्वरूप भूतगणोंने घेर रखा था || ७० $ ।।
يروي فياسا: إن الرب غير المولود—إيشانا، غير المتجلّي، مبدأ العِلّة ذاته، والذي لا يزول عن مجده الذاتي—قد أقبل وهو يلهو مع بارفتي، ذات الأعضاء المتألّقة المتناسقة الآسرة. وكانت جموع الكائنات العنصرية، من حاشيته وأتباعه، تحيط بتلك الألوهية العظمى. ثم إن بدمَاكشا (شري هري) خرّ على الأرض راكعًا على ركبتيه، وجمع كفّيه فوق رأسه، وانحنى لرودرا، القاتل السريع لأندهاكا. وممتلئًا بالعبادة، شرع الرب ذو العينين كاللوتس في تمجيد فيروباكشا (ذو الأشكال المتعددة/ذو العين الثالثة)، مُقرّرًا خُلُق التوقير: حتى الأعظم شأنًا يكرّم النظام الإلهي بالتواضع والعبادة.
Verse 72
श्रीनारायण उवाच त्वत्सम्भूता भूतकृतो वरेण्य गोप्तारोड5स्य भुवनस्यादिदेव । आविश्येमां धरणीं ये5भ्यरक्षन् पुरा पुराणीं तव देवसृष्टिम्ू
قال شري نارايانا: يا أسمى الإلهة الأولى! منك وُلد البراجابتي، صُنّاع الكائنات. هم حُرّاس هذا العالم؛ إذ دخلوا هذه الأرض قديمًا فحمَوا خَلْقَكَ الإلهي العتيق.
Verse 73
सुरासुरान् नागरक्ष:पिशाचान् नरान् सुपर्णानथ गन्धर्वयक्षान् । पृथग्विधान् भूतसंघांश्व विश्वां- स्त्वत्सम्भूतान् विद्य सर्वास्तथैव । ऐन्द्रं याम्यं वारुणं वैत्तपाल्यं पैन्र॑ त्वाष्टर कर्म सौम्यं च तुभ्यम्
قال شري نارايانا: «اعلم أن جميع جموع الكائنات المتنوعة—الآلهة والآسورا، والناگا، والراكشاسا والبيشاتشا، والبشر، والسوبرنا (طيور كغارودا)، وكذلك الغاندارفـا والياكشا—بل كل الحشد على اختلاف صوره، مولود منك. وكذلك المناصب والقوى المنسوبة إلى إندرا وياما وفارونا وكوبيرا؛ وعالم الأسلاف (البيتر)؛ وحتى صنعة فيشفاكَرمان الرقيقة—كل ذلك أيضًا ينبثق منك.»
Verse 74
रूपं ज्योति: शब्द आकाशवायु: स्पर्श: स्वाद्यं सलिलं गन्ध उर्वी । कालो ब्रह्मा ब्रह्म च ब्राह्मणाश्न त्वत्सम्भूतं स्थास्नु चरिष्णु चेदम्
قال شري نارايانا: الصورة والنور، والصوت والفضاء، واللمس والريح، والطعم والماء، والرائحة والأرض—كلها تنشأ منك. والزمان، وبراهما، والڤيدا، والبراهمة، وهذا الكون كله، المتحرك والساكن، مولود منك كذلك.
Verse 75
अदृभ्य: स्तोका यान्ति यथा पृथक्त्त्वं ताभिश्रैक्यं संक्षये यान्ति भूय: । एवं विद्वान प्रभवं चाप्ययं च मत्वा भूतानां तव सायुज्यमेति
كما تنفصل القطرات عن الماء فتبدو متمايزة، ثم إذا تناقصت مع مرور الزمن عادت فاندَمَجت في الماء نفسه وصارت واحدة معه؛ كذلك جميع الكائنات تنشأ منك وتذوب عائدةً إليك. ومن عرف هذا المبدأ وهذا المآل نال السايوجيا (sāyujya): الاتحاد بك.
Verse 76
दिव्यामृतौ मानसौ द्वौ सुपर्णो वाचा शाखा: पिप्पला: सप्त गोपा: । दशाप्यन्ये ये पुरं धारयन्ति त्वया सृष्टास्त्वं हि तेभ्य: परो हि
قال نارايانا: «في الأداة الباطنة (مركّب العقل والقلب) يقيم طائران إلهيّان خالدَان—الربّ والنفس الفرديّة. وأشجار البيبّلا السبع هي المكوّنات الجسديّة السبع التي تحرس تلك الحياة الداخليّة؛ وأغصانها هي نطقُ الفيدا. وهناك أيضًا عشرة عوامل أخرى—الحواس—تسند المدينة التي هي الجسد المؤلَّف من العناصر الخمسة. كلّ ذلك من صنعك، ومع ذلك فأنت متعالٍ عن الجميع.»
Verse 77
भूतं भव्यं भविता चाप्यधृष्यं त्वत्सम्भूता भुवनानीह विश्वा । भक्त च मां भजमानं भजस्व मा रीरिषो मामहिताहितेन
«أنت الماضي والحاضر والمستقبل، وأنت الزمان الذي لا يُقهَر. ومنك وحدك نشأت العوالم كلّها هنا. أنا عبدٌ لك، أعبدك—فاقبلني واحفظني. ولا تدعني أُؤذى على يد من يسعون بسوء النيّة والباطل.»
Verse 78
आत्मानं त्वामात्मनो5नन्यबोधं विद्वानेवं गच्छति ब्रह्म शुक्रम् । अस्तौषं त्वां तव सम्मानमिच्छन् विचिन्वन् वै सदृशं देववर्य । सुदुर्लभान् देहि वरान् ममेष्टा- नभिष्टृत: प्रविकार्षीक्ष मायाम्
قال نارايانا: «إنّ الحكيم الذي يعرفك بوصفك الذات—مفهومةً على أنّها غير مغايرة لذاته الباطنة—يبلغ بذلك حالَ براهمان الطاهر الذي لا دنس فيه. يا خيرَ الآلهة، رغبةً في إكرامك قدّمتُ هذا النشيد من الثناء. طالما التمستُ من يستحقّ حقًّا ثناءً كاملاً: الربّ الذي يساويك في السموّ. والآن، وقد أُثني عليك كما ينبغي، فاسحب قوّتك الحاجبة (مايا) وامنحني العطايا النادرة التي أبتغيها.»
Verse 79
व्यास उवाच तस्मै वरानचिन्त्यात्मा नीलकण्ठ: पिनाकधृत् । अर्हते देवमुख्याय प्रायच्छदृषिसंस्तुत:
قال فياسا: عندئذٍ منح الربّ شيفا—ذو الجوهر الذي لا يُدرَك، الأزرق الحلق، حامل قوس بيناكا، والممدوح من الرِّشيّين—عطايا كثيرة له، لذاك نارايانا، سيّد الآلهة، المستحقّ حقًّا لتلقّيها.
Verse 80
श्रीभगवानुवाच मत्प्रसादान्मनुष्येषु देवगन्धर्वयोनिषु । अप्रमेयबलात्मा त्वं नारायण भविष्यसि
قال الربّ المبارك: «بنعمة رضاي، بين البشر وكذلك في مواليد الديفا والغاندهرفا، ستغدو—يا نارايانا—ذا طبيعةٍ قوامها قوّةٌ وبأسٌ لا يُقاسان.»
Verse 81
नच त्वां प्रसहिष्यन्ति देवासुरमहोरगा: । न पिशाचा न गन्धर्वा न यक्षा न च राक्षसा:
قال فياسا: «لا الآلهة ولا الأسورا ولا الحيّات العظام يقدرون على احتمال اندفاعك. ولا البيشاتشا ولا الغندهرفا، ولا الياكشا ولا الراكشاسا يثبتون أمامك. وفي الإطار الأخلاقي للملحمة ليس هذا مجرد ثناء على القوة، بل إشارة إلى زخمٍ مُجازٍ بإرادةٍ إلهية في ساحة القتال؛ إذ يطمئن المتكلمُ المحاربَ بأن حتى مراتب الكائنات فوق البشرية لن تستطيع كبحه في الميدان، وكأن قضيته وعزيمته قد وافقتا في هذه اللحظة من الحرب أمرًا أعلى.»
Verse 82
न सुपर्णास्तथा नागा न च विश्वे वियोनिजा: । न वश्चित् त्वां च देवोडपि समरेषु विजेष्यति
قال فياسا: «لا السوبرنات ولا الناجات، ولا حتى الفيشڤه-ديفات وسائر الكائنات ذات المواليد المتنوعة، يقدرون على احتمال قوتك. وفي ميادين القتال، لن يستطيع إلهٌ واحد أن يهزمك.»
Verse 83
न शस्त्रेण न वज्ेण नाग्निना न च वायुना | नचार्द्रेण न शुष्केण त्रसेन स्थावरेण च
قال فياسا: «لا بسلاحٍ ولا بصاعقةٍ (فَجْرَةٍ)، لا بنارٍ ولا بريح؛ لا بما هو رطبٌ ولا بما هو يابس؛ لا بالمتحرّك ولا بالساكن—بشيءٍ من ذلك كلّه لا يستطيع أحدٌ أن يؤذيك ما دامت نعمتي تظلّلك. فإذا بلغتَ ساحة القتال صرتَ أقوى مني.»
Verse 84
कश्चित् तव रुजां कर्ता मत्प्रसादात् कथंचन । अपि वै समरं गत्वा भविष्यसि ममाधिक:
قال فياسا: «بفضلي لا يستطيع أحدٌ أن يُنزل بك أذىً على أي وجه. وحتى إذا دخلتَ ساحة القتال فستغدو أشدَّ مني بأسًا.»
Verse 85
एवमेते वरा लब्धा: पुरस्ताद् विद्धि शौरिणा । स एष देवश्लवरति मायया मोहयञ्जगत्
قال فياسا: «اعلم أن هذه العطايا قد نالها شَوري (كريشنا) منذ زمنٍ بعيد. ذلك نارايانا الإلهي بعينه، وقد تجلّى في صورة كريشنا، يجول في العالم ويُضلّ الكائنات بماياه الخاصة.»
Verse 86
तस्यैव तपसा जात नरं नाम महामुनिम् | तुल्यमेतेन देवेन तं जानीहा[र्जुन॑ सदा,नारायणके ही तपसे महामुनि नर प्रकट हुए हैं, जो इन भगवानके ही समान शक्तिशाली हैं। तू अर्जुनको सदा उन्हीं भगवान् नरका अवतार समझ
قال فياسا: «من زهدِ ذلك الربّ بعينه وُلد الحكيمُ العظيم المسمّى نارا. فاعلمْه دائمًا، يا أرجونا، مساوِيًا في القدرة لهذا الربّ الإلهي». وهكذا يصوّر النص أرجونا لا كمحارب فحسب، بل كمن تتجذّر هويته في رياضةٍ مقدّسة وغايةٍ ربّانية، فيُؤسِّس أخلاق الفعل على الأصل الروحي لا على الطموح الشخصي.
Verse 87
तावेतौ पूर्वदेवानां परमोपचितावृषी । लोकयात्राविधानार्थ संजायेते युगे युगे
قال فياسا: «هذان الاثنان هما أرفع الحكماء، قد بلغا كمالًا عظيمًا بالزهد، ومنتميان إلى النظام الإلهي القديم. ولأجل إقامة سنن مسيرة الحياة في العالم—كي يُصان الناس ضمن حدود الدارما—يولدان مرارًا وتكرارًا في كل عصر.»
Verse 88
तथैव कर्मणा कृत्स्नं महतस्तपसोडपि च । तेजो मन्युं च बिभ्रत्त्वं जातो रौद्रो महामते
قال فياسا: «وكذلك، بتمام أعمالك الصالحة وبعظيم رياضتك أيضًا، حملتَ توهّجًا روحيًّا متّقدًا وغضبًا شديدًا، أيها الحكيم، فصرتَ ذا طبيعة “راودرا”. وفي تلك الولادة السابقة كنتَ—كربّ نارايانا—موفورَ المعرفة الحقّة؛ وإذ رغبتَ في إرضاء شانكرا، ورأيتَ العالم كلَّه مشمولًا به، أخذتَ بنذورٍ ورياضاتٍ قاسية شتّى، حتى أضعفتَ جسدك بصرامة الكبح والتقشّف.»
Verse 89
स भवान् देववत् प्राज्ञो ज्ञात्वा भवमयं जगत् । अवाकर्षस्त्वमात्मानं नियमैस्तत्प्रियेप्सपा
قال فياسا: «أنتَ، الحكيم كالإله، أدركتَ أن هذا العالم مشمولٌ ببهَفَ (شيفا). وإذ رغبتَ في إرضائه، يا عظيم الهمة، قهرتَ نفسك بصرامة المراسم والالتزامات، فأوهنتَ الجسد برياضاتٍ شديدة في سبيل التعبّد.»
Verse 90
शुभ्रमत्र भवान् कृत्वा महापुरुषविग्रहम् । ईजिवांस्त्वं जपैहोमिरुपहारैश्षन मानद,मानद! तूने यहाँ परम पुरुष भगवान् शंकरके उज्ज्वल विग्रहकी स्थापना करके होम, जप और उपहारोंद्वारा उनकी आराधना की थी
قال فياسا: «هنا أقمتَ صورةً متلألئة للإنسان الأسمى، الربّ شانكرا. يا مانحَ الإكرام، لقد عبدتَه بالتلاوة المنضبطة (جَپَ)، وبالقرابين النارية (هوما)، وبالهدايا المقدَّمة بخشوع.»
Verse 91
स तथा पूज्यमानस्ते पूर्वदेहे5प्यतूतुषत् । पुष्कलांश्व वरान् प्रादात् तव विद्वन् हृदि स्थितान्
وهكذا، حين عبدته في تجسّدٍ سابق، غمرته غبطةٌ عميقة. أيها الحكيم، إنّ الرب شانكرا (Śaṅkara) منحك آنذاك نِعَمًا كثيرة مباركة—نِعَمًا طالما أضمرها قلبك وتشوّف إليها—مُبيّنًا أنّ الإخلاص في البهاكتي، وإن عبر الحيوات، يُثمر ثمرًا لائقًا.
Verse 92
जन्मकर्मतपोयोगास्तयोस्तव च पुष्कला: । ताभ्यां लिड्रेडर्चितो देवस्त्वयार्चायां युगे युगे
قال فياسا: «إنّ مولدك وأعمالك وزهدك وانضباطك اليوغي وافرة؛ وكذلك شأن الآخر. وبهذه الاستحقاقات قد كُرِّم الإلهيّ كما ينبغي—من قِبَلك، عبر عبادة صورته المقدّسة، عصرًا بعد عصر.»
Verse 93
इस प्रकार तेरे और नर-नारायणके जन्म, कर्म, तप और योग पर्याप्त हैं। नर-नारायणने शिवलिंगमें तथा तूने प्रतिमामें प्रत्येक युगमें महादेवजीकी आराधना की है ।।
قال فياسا: «وهكذا فإنّ الميلاد والأعمال والتقشّف واليوغا لديك ولدى نارا–نارايانا وافرة مكتملة. لقد عبد نارا–نارايانا مهاديڤا في اللِّنگا (liṅga)، وعبدته أنت في التمثال المقدّس، في كل يوجا. ومن عرف بهاڤا (Śiva) أنّه الواحد الذي كلّ صورةٍ هي صورته، ثمّ عبد ذلك الربّ في اللِّنگا، استقرّ فيه الانضباط الأبدي: يوغا الذات—بصيرة مباشرة بحقيقة الآتمان والبرماتمان—ويوغا النصوص—حكمة تولد من الدراسة والتعلّم المقدّس. وهكذا، عبر العصور، تنضج البهاكتي القائمة على الفهم الصحيح إلى معرفة روحية باقية.»
Verse 94
एवं देवा यजन्तो हि सिद्धाश्ष परमर्षय: । प्रार्थयन्ते परं लोके स्थाणुमेकं॑ स सर्वकृत्
قال فياسا: «وهكذا فإنّ الآلهة—مع الكائنات الكاملين والريشيّات العظام—وهم يؤدّون العبادة، لا يطلبون مقاصدهم المنشودة في المقام الأعلى إلا من الربّ ستهانو (Sthāṇu، شيفا) وحده، لأنه الفاعل الكونيّ، والقوّة التي بها يتمّ كلّ شيء.»
Verse 95
स एष रुद्रभक्तश्ष॒ केशवो रुद्रसम्भव: । कृष्ण एव हि यष्टव्यो यज्ैश्ञेव सनातन:
قال فياسا: «إنّ هذا كيشافا (Keśava) عابدٌ مُخلِص لرودرا (Rudra)، وهو أيضًا متجلٍّ بوساطة فعل رودرا. لذلك فكرشنا (Kṛṣṇa) الأزليّ وحده هو الذي ينبغي أن يُعبَد—ولا سيّما عبر شعائر اليَجْنَة (yajña)—تأكيدًا أنّ التبجيل الحقّ يكتمل في إكرام الربّ السرمديّ، لا في الضياع داخل الانقسام المذهبيّ.»
Verse 96
सर्वभूतभवं ज्ञात्वा लिड्रमर्चति यः प्रभो: । तस्मिन्नभ्यधिकां प्रीतिं करोति वृषभध्वज:
قال فياسا: من أدرك أن لِنْغا الربّ هو عينُ المنبع الذي تنشأ منه جميع الكائنات، ثم عبده—فإن فْرِشَبَهَدْفَجَا (شِيفا، صاحب الراية التي تحمل الثور) يفيض عليه محبةً ونعمةً أعظم.
Verse 97
संजय उवाच तस्य तदू वचन श्रुत्वा द्रोणपुत्रो महारथ: । नमश्लकार रुद्राय बहु मेने च केशवम्
قال سنجيا: لما سمع تلك الكلمات، انحنى ابن درونا—ذلك الفارس العظيم على العربة—إجلالاً لرودرا، ورفع كيشافا (كريشنا) إلى منزلةٍ رفيعة في قلبه.
Verse 98
संजय कहते हैं--राजन्! व्यासजीकी यह बात सुनकर द्रोणपुत्र महारथी अश्वत्थामाने मन-ही-मन भगवान् शंकरको प्रणाम किया और श्रीकृष्णकी भी महत्ता स्वीकार कर ली ।।
قال سنجيا: أيها الملك، لما سمع أشوَتّھاما—ذلك الفارس العظيم على العربة، ابن درونا—كلام فياسا، سجد في باطنه للرب شنكر (شِيفا) واعترف كذلك بعظمة شري كريشنا. فاقشعرّ جلده ووقف شعره؛ وكان ضابط النفس متواضعاً، فحيّا الحكيم الجليل. ثم التفت إلى جنده، فأمر بإطلاق الإشارة، وأصدر الأمر للجيش أن يعود إلى المعسكر.
Verse 99
ततः प्रत्यवहारो5भूत् पाण्डवानां विशाम्पते | कौरवाणां च दीनानां द्रोणे युधि निपातिते
قال سنجيا: يا سيدَ الرعية، لما سقط درونا صريعاً في القتال، وقع الانسحاب من جانب الباندافا، وكذلك من جانب الكورافا وقد خارت عزائمهم؛ فعاد الجيشان كلٌّ إلى معسكره.
Verse 100
युद्ध कृत्वा दिनान् पज्च द्रोणो हत्वा वरूथिनीम् । ब्रह्मलोक॑ गतो राजन ब्राह्म॒णो वेदपारग:
قال سنجيا: أيها الملك، إن درونا—مع أنه براهمنٌ متقنٌ للڤيدا—قد قاتل خمسة أيام وأفنى جموع العدو، ثم مضى إلى برهمالوكَا، عالم براهما.
Verse 156
देवैरपि सुदुर्धर्षमस्त्रमाग्नेयमाददे । उस समय द्रोणपुत्रको अर्जुन और श्रीकृष्णपर अधिक क्रोध हुआ
قال سانجيا: تناول سلاح «أغنيَيا»—وهو مقذوف سماويّ مُحرق عسيرُ الاحتمال، حتى إن الآلهة تكاد لا تقهره. وفي لهيب المعركة، وقد اشتد غضبه على أرجونا وشري كريشنا، ثبت ابنُ درونا على عربته، وأدّى بعناية طقس «آجامانا» (ācamana، رشفات التطهير بالماء)، ثم قبض على ذلك السلاح الناريّ المهيب—إشارةً إلى تصعيدٍ خطير، حيث يوشك الغضب أن يطغى على ضبط النفس وعلى الدارما في الحرب.
Verse 200
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें अश्वत्थामाका पराक्रमविषयक दो सौवाँ अध्याय पूरा हुआ
قال سانجيا: وهكذا، في «شري مهابهاراتا»، ضمن «درونا بارفا»—وخاصة في القسم المتعلق بإطلاق سلاح «نارايانا» (وما تلاه من انحلال أثره)—يُختَتم الفصل المئتان، الذي يتناول بأس أشفَتّاما. وهذه العبارة الختامية على هيئة كولوفون تُعلن وقفةً رسمية في سرد الحرب، وتُبرز خطورة الأسلحة الإلهية وثِقل العبء الأخلاقي الذي يتحمّله من يطلقها.
Verse 316
युगान्ते सर्वभूतानि संवर्तक इवानल: । भरतनन्दन! जैसे प्रलयकालमें संवर्तक अग्नि सब प्राणियोंको जलाकर भस्म कर देती है
قال سانجيا: «يا بهجة آل بهاراتا! كما أن نارَ “سَمْفَرْتَكَ” في نهاية الدهر تحرق جميع الكائنات حتى تصير رمادًا، كذلك بدأ سلاحُ أغنيَيا يحرق جيشَ الباندافا المذعور في ساحة القتال.»
Verse 323
प्रहशस्तावका राजन् सिंहनादान् विनेदिरे । राजन्! उस महासमरमें पाण्डव-सेनाको दग्ध होती देख आपके सैनिक अत्यन्त प्रसन्न हो जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे
قال سانجيا: «أيها الملك! في ذلك القتال العظيم، لما رأى جنودُك جيشَ الباندافا وهو يُحرق، غمرتهم فرحةٌ بالغة، فأطلقوا زئيرَ الأسود عاليًا، مرةً بعد مرة.»
Verse 336
तूर्णमाजष्निरे हृष्टास्तावका जितकाशिन: । भारत! तदनन्तर हर्षसे उललसित और विजयसे सुशोभित होनेवाले आपके सैनिक नाना प्रकारके सहस्रों बाजे बजाने लगे
قال سانجيا: ثم، يا بهاراتا، إن جنودك—وقد طربوا واطمأنّوا إلى الظفر—رفعوا سريعًا جلبةَ النصر. وبعد ذلك مباشرةً، وهم في غبطةٍ وقد تزيّنوا بإحساس الغلبة، شرعوا يقرعون آلاف الآلات على اختلاف أنواعها، مُعلنين معنوياتهم وإيمانهم بأن النجاح بات وشيكًا.
Verse 343
तमसा संवृते लोके नादृश्यन्त महाहवे । नरेश्वर! उस महासमरमें सब लोग अन्धकारसे आच्छन्न हो गये थे। पाण्डवोंकी सारी अक्षौहिणी सेना और सव्यसाची अर्जुन भी नहीं दिखायी देते थे
قال سنجيا: «يا أيها الملك، حين غشي الظلامُ العالمَ لم يُرَ شيءٌ في تلك المعركة العظمى. وفي ذلك الاصطدام الهائل غطّى الدجى الجميع؛ حتى جيش الباندافا كلَّه—وهو أكشوهيني كامل—وأرجونا المشهور بلقب سافياساشي لم يعودا يُرى لهما أثر».
Verse 356
यादृशं द्रोणपुत्रेण सृष्टमस्त्रममर्षिणा । राजन! अमर्षमें भरे हुए द्रोणपुत्रने जैसे अस्त्रकी सृष्टि की थी, वैसा हमलोगोंने पहले न तो कभी देखा था और न सुना ही था
قال سنجيا: «يا أيها الملك، إن السلاح الذي أطلقه ابنُ درونا، مدفوعًا بغضبٍ لا يُطاق، كان على هيئةٍ لم نرَ مثلها قط من قبل، ولم نسمع بها حتى سماعًا».
Verse 373
प्रववी चानिल: शीतो दिशश्व विमला बभु: । फिर तो दो घड़ीमें वह सारा अन्धकार दूर हो गया, शीतल वायु बहने लगी और सारी दिशाएँ स्वच्छ हो गयीं
قال سنجيا: «ثم ما لبثت تلك الظلمة أن انقشعت؛ وهبّت ريحٌ باردة، وصارت الجهات كلّها صافيةً نقية.»
Verse 383
अनभिश्ञेयरूपां च प्रदग्धामस्त्रतेजसा । वहाँ हमलोगोंने अद्भुत दृश्य देखा। पाण्डवोंकी वह सारी अक्षौहिणी उस अस्त्रके तेजसे इस प्रकार दग्ध एवं नष्ट हो गयी थी कि उसे पहचानना असम्भव हो गया
قال سنجيا: «هناك رأينا منظرًا عجيبًا. فقد أُحرِق جيشُ الباندافا كلُّه—وهو أكشوهيني بأسره—بوهج ذلك السلاح، حتى غدا مُتفحّمًا مُبادًا على هيئةٍ لا تُعرَف ولا تُميَّز».
Verse 393
सहितीौ प्रत्यदृश्येतां नभसीव तमोनुदौ । तदनन्तर उस अस्त्रसे मुक्त हुए महाधनुर्थर वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन एक साथ दिखायी दिये, मानो आकाशमें चन्द्रमा और सूर्य प्रकट हो गये हों
قال سنجيا: «ثم لما انطلقت قوةُ ذلك السلاح وزال ما أحدثه من حجاب، ظهر شري كريشنا وأرجونا—وهما البطلان صاحبا القوس العظيم—معًا من جديد، كأن القمر والشمس قد بديا في السماء.»
Verse 2031
इति श्रीमहा भारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि व्यासवाक्ये शतरुद्रिये एकाधिकद्विशततमो<ध्याय:
وهكذا، في «المهابهارتا» الموقَّرة، ضمن «بارفا درونا» (Droṇa Parva)، في القسم المتعلّق بإطلاق سلاح «نارايانا» (Nārāyaṇāstra)، في رواية فياسا (Vyāsa)، في مقطع «شاتارودريا» (Śatarudrīya)، تنتهي هنا الفصلُ الحادي بعد المئتين. إن هذا الخاتمةَ التوثيقية تُؤطِّر الحدث بوصفه تاريخًا مقدّسًا، وتُعلن نقطةَ انتقالٍ في سرد الحرب، حيث يغدو السلاح الإلهي وضبط النفس محورَ الهمّ الأخلاقي.
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