
Aṣṭāvakra–Strī-saṃvāda: Dhṛti, hospitality, and a dispute on autonomy
Upa-parva: Strī-dharma–Saṃyama (Episode on self-restraint and contested autonomy)
Bhīṣma narrates that a woman, having addressed a brāhmaṇa-sage, brings divine oil and bathing cloth and, with the muni’s permission, anoints his limbs. The sage proceeds to a bathing hall and is bathed carefully with proper observances; the comfort is such that the night passes without his notice. On rising he sees the sun and, perplexed, asks what to do; she offers food described as nectar-like, after which the day passes to evening. She then urges him to sleep on a prepared divine bed. Aṣṭāvakra refuses sexual involvement with another’s spouse, instructing her to retire. She asserts independence and denies any “dharma-deception” in him; Aṣṭāvakra responds with a normative claim that women lack independence, citing guardianship by father, husband, and sons. The woman counters that she is a maiden observing brahmacarya and asks him not to doubt her. Aṣṭāvakra reflects on the anomaly—her earlier aged appearance versus present maidenly form—and resolves to maintain restraint through dhṛti, treating the situation as a test or impediment to be understood without yielding.
Chapter Arc: अष्टावक्र मुनि वदान्य ऋषि के कथन से उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान करते हैं; मार्ग में कुबेर का दिव्य स्वागत और उत्तर-दिशा की रहस्यमयी स्त्री-रूपधारिणी शक्तियों का संकेत कथा को कौतूहल से भर देता है। → कुबेर के यक्ष-गन्धर्व-किन्नरों सहित वैभवपूर्ण आश्रम-परिसर में ‘सहधर्म’ की परिभाषा पर प्रश्न उठता है—महर्षियों द्वारा पूर्वोक्त स्त्री-पुरुष सहधर्म की बात और उसके ‘देश-काल’ के अनुसार बदलते अर्थ को लेकर अष्टावक्र के मन में गहरा संदेह पैदा होता है। → स्त्री-रूपधारिणी सत्ता अष्टावक्र से कहती है कि ‘देश और काल के अनुसार’ वे सत्य को अनुभव करेंगे; आगे चलकर अष्टावक्र स्पष्ट घोषणा करते हैं कि वे पर-स्त्री-संसर्ग नहीं कर सकते—धर्मशास्त्रों के अनुसार यह दूषित है—और इसी कसौटी पर ‘सहधर्म’ की परीक्षा निर्णायक रूप लेती है। → अष्टावक्र स्त्रियों को अपने-अपने घर लौट जाने का निर्देश देते हैं और केवल एक (ज्ञानवती/प्रशान्त/उचित) स्त्री को रहने देते हैं; रात्रि-विश्राम की व्यवस्था होती है, संवाद शान्त होता है, और मुनि धर्म-सीमा को अक्षुण्ण रखते हुए स्थिति को संयम में बाँध देते हैं। → ‘देश-काल’ के अनुसार अनुभव कराने का वचन बना रहता है—अगले प्रसंग में यह परीक्षा किस रूप में आगे बढ़ेगी, यह अनिश्चित रहकर जिज्ञासा जगाता है।
Verse 1
अत एकोनविशो< ध्याय: अष्टावक्र मुनिका वदान्य ऋषिके कहनेसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान, मार्गमें कुबेरके द्वारा उनका स्वागत तथा स्त्रीरूपधारिणी उत्तरदिशाके साथ उनका संवाद युधिछिर उवाच यदिदं सहधर्मेति प्रोच्यते भरतर्षभ । पाणिग्रहणकाले तु स्त्रीणामेतत् कथं स्मृतम्,युधिष्ठिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ! जो यह स्त्रियोंक लिये विवाहकालमें सहधर्मकी बात कही जाती है, वह किस प्रकार बतायी गयी है?
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, pada saat pernikahan, ketika tentang perempuan dikatakan ‘ia adalah sahadharmīṇī, rekan dalam dharma’, bagaimana prinsip ini harus dipahami dan atas dasar apa ajaran itu ditetapkan?”
Verse 2
आर्ष एष भवेद् धर्म: प्राजापत्यो5थवा55सुर: । यदेतत् सहधर्मेति पूर्वमुक्ते महर्षिभि:,महर्षियोंने पूर्वकालमें जो यह स्त्री-पुरुषोंके सहधर्मकी बात कही है, यह आर्ष धर्म है या प्राजापत्य धर्म; अथवा आसुर धर्म है?
Yudhiṣṭhira berkata: “Aturan dharma yang dahulu diucapkan para maharsi sebagai ‘sahadharma’ bagi perempuan dan laki-laki—termasuk jenis dharma yang mana? Apakah itu dharma ārṣa, prājāpatya, ataukah āsura?”
Verse 3
संदेह: सुमहानेष विरुद्ध इति मे मतिः । इह यः सहधर्मों वै प्रेत्यायं विहितः क्व नु
Yudhiṣṭhira berkata: “Keraguan besar timbul dalam benakku, dan ajaran ini tampak saling bertentangan. ‘Sahadharma’ yang ditetapkan di dunia ini—di manakah ia ditetapkan bagi keadaan setelah kematian?”
Verse 4
मेरे मनमें यह महान् संदेह पैदा हो गया है। मैं तो ऐसा समझता हूँ कि यह सहधर्मका कथन विरुद्ध है। यहाँ जो सहधर्म है, वह मृत्युके पश्चात् कहाँ रहता है? ।। स्वर्गो मृतानां भवति सहधर्म: पितामह । पूर्वमेकस्तु म्रियते क्व चैकस्तिष्ठते वद,पितामह! जबकि मरे हुए मनुष्योंका स्वर्गवास हो जाता है एवं पति और पत्नीमेंसे एककी पहले मृत्यु हो जाती है, तब एक व्यक्तिमें सहधर्म कहाँ रहता है? यह बताइये
Yudhiṣṭhira berkata: “Keraguan besar muncul dalam benakku; ajaran tentang ‘sahadharma’ ini tampak tidak selaras. Jika sahadharma mengikat suami dan istri, setelah kematian ia tinggal di mana? Wahai Pitāmaha, orang yang wafat dikatakan mencapai surga; namun bila salah satu pasangan meninggal lebih dahulu, pada siapa ‘dharma bersama’ itu bersemayam? Katakanlah kepadaku.”
Verse 5
नानाधर्मफलोपेता नानाकर्मनिवासिता: । नानानिरयनिष्ठान्ता मानुषा बहवो यदा,जब बहुत-से मनुष्य नाना प्रकारके धर्मफलसे संयुक्त होते हैं, नाना प्रकारके कर्मवश विभिन्न स्थानोंमें निवास करते हैं और शुभाशुभ कर्मोके फल-स्वरूप स्वर्ग-नरक आदि नाना अवस्थाओंमें पड़ते हैं, तब वे सहधर्मका निर्वाह किस प्रकार कर सकते हैं?
Yudhiṣṭhira berkata: “Ketika banyak manusia terikat pada beragam buah dharma, digiring oleh perbuatan mereka yang bermacam-macam untuk tinggal dalam keadaan yang berbeda-beda, dan berakhir pada berbagai tujuan—seperti surga dan neraka—yang lahir dari karma baik dan buruk, bagaimana mungkin mereka dapat menegakkan dan memenuhi sahadharma bersama?”
Verse 6
अनृताः स्त्रिय इत्येवं सूत्रकारो व्यवस्यति । यदानृताः स्त्रियस्तात सहधर्म: कुतः स्मृत:,धर्मसूत्रकार यह निश्चितरूपसे कहते हैं कि स्त्रियाँ असत्यपरायण होती हैं। तात! जब स्त्रियाँ असत्यवादिनी ही हैं तब उन्हें साथ रखकर सहधर्मका अनुष्ठान कैसे किया जा सकता है?
Penyusun Dharma-sūtra menetapkan dengan tegas: “Perempuan itu cenderung pada ketidakbenaran.” Wahai anakku! Jika perempuan memang berkata tidak benar, bagaimana mungkin ‘saha-dharma’—kewajiban bersama—dapat dijalankan dengan menyertakan mereka?
Verse 7
अनृताः स्त्रिय इत्येवं वेदेष्वपि हि पठ्यते । धर्मो<यं पूर्विका संज्ञा उपचार: क्रियाविधि:,वेदोंमें भी यह बात पढ़ी गयी है कि स्त्रियाँ असत्यभाषिणी होती हैं, ऐसी दशामें उनका वह असत्य भी सहधर्मके अन्तर्गत आ सकता है, किंतु असत्य कभी धर्म नहीं हो सकता; अतः दाम्पत्यधर्मको जो सहधर्म कहा गया है, यह उसकी गौण संज्ञा है। वे पति-पत्नी साथ रहकर जो भी कार्य करते हैं, उसीको उपचारत: धर्म नाम दे दिया गया है
Bahkan dalam Weda pun dibaca demikian: “Perempuan itu tidak berkata benar.” Dalam keadaan seperti itu, ketidakbenaran mereka dapat diperlakukan seakan termasuk dalam lingkup ‘saha-dharma’ (kewajiban bersama) dalam perkawinan; namun ketidakbenaran tidak pernah menjadi dharma. Karena itu, menyebut dharma rumah tangga sebagai ‘saha-dharma’ hanyalah sebutan sekunder, kiasan belaka. Segala perbuatan yang suami-istri lakukan bersama menurut tata laku yang ditetapkan, oleh kebiasaan disebut ‘dharma’.
Verse 8
गद्दरं प्रतिभात्येतन्मम चिन्तयतो5निशम् | निः:संदेहमिदं सर्व पितामह यथाश्रुति,पितामह! मैं ज्यों-ज्यों इस विषयपर विचार करता हूँ, त्यों-त्यों यह बात मुझे अत्यन्त दुर्बोध प्रतीत होती है। अत: आपने इस विषयमें जो कुछ श्रुतिका विधान हो, उसके अनुसार यह सब समझाइये जिससे मेरा संदेह दूर हो जाय
Wahai Kakek Agung! Semakin aku merenungkan perkara ini tanpa henti, semakin tampak bagiku amat dalam dan sukar dipahami. Karena itu, jelaskanlah semuanya kepadaku tanpa keraguan, sesuai ajaran śruti, agar kebimbanganku sirna.
Verse 9
यदैतद् यादृशं चैतद् यथा चैतत् प्रवर्तितम् । निखिलेन महाप्राज्ञ भवानेतद् ब्रवीतु मे,महामते! यह सहधर्म जबसे प्रचलित हुआ, जिस रूपमें सामने आया और जिस प्रकार इसकी प्रवृत्ति हुई, ये सारी बातें आप मुझे बताइये
Wahai yang amat bijaksana! Katakanlah kepadaku dengan lengkap: seperti apakah ‘saha-dharma’ ini, dalam bentuk apa ia mula-mula tampak, dan dengan cara bagaimana ia mulai dijalankan serta ditegakkan.
Verse 10
भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । अष्टावक्रस्य संवादं दिशया सह भारत,भीष्मजीने कहा--भरतनन्दन! इस विषयमें अष्टावक्र मुनिका उत्तर दिशाकी अधिष्ठात्रीदेवीके साथ जो संवाद हुआ था, उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है
Bhishma berkata: “Wahai keturunan Bharata! Dalam perkara ini pun dikemukakan sebuah kisah purba sebagai teladan—yakni dialog resi Ashtavakra dengan dewi penjaga arah utara.”
Verse 11
निर्वेष्टकामस्तु पुरा अष्टावक्रो महातपा: । ऋषेरथ वदान्यस्य वत्रे कन्यां महात्मन:,पूर्वकालकी बात है, महातपस्वी अष्टावक्र विवाह करना चाहते थे, उन्होंने इसके लिये महात्मा वदान्य ऋषिसे उनकी कन्या माँगी
Bhishma berkata: Pada zaman dahulu, resi agung Aṣṭāvakra—seorang pertapa besar—berkehendak memasuki grihastha-dharma dan, dengan cara yang benar menurut dharma, meminang putri resi mulia Vadānya.
Verse 12
सुप्रभां नाम वै नाम्ना रूपेणाप्रतिमां भुवि | गुणप्रभावशीलेन चारित्रेण च शोभनाम्,उस कन्याका नाम था सुप्रभा। इस पृथ्वीपर उसके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी। गुण, प्रभाव, शील और चरित्र सभी दृष्टियोंसे वह परम सुन्दर थी
Bhishma berkata: Gadis itu bernama Suprabhā. Dalam rupa ia tiada banding di bumi; dan oleh kebajikan—wibawa, budi pekerti, serta laku hidupnya—ia tampak bercahaya dan elok dipandang.
Verse 13
सा तस्य दृष्टवैव मनो जहार शुभलोचना । वनराजी यथा चित्रा वसन्ते कुसुमाचिता,जैसे वसंतऋतुमें सुन्दर फूलोंसे सजी हुई विचित्र वनश्रेणी मनुष्यके मनको लुभा लेती है, उसी प्रकार उस शुभलोचना मुनिकुमारीने दर्शनमात्रसे अष्टावक्रका मन चुरा लिया था
Bhishma berkata: Sang gadis bermata elok itu merampas hati Aṣṭāvakra seketika ia memandangnya. Seperti rimbun hutan yang beraneka warna, berhias bunga-bunga di musim semi, memikat batin, demikian pula ia—hanya dengan terlihat—mengikat pikirannya.
Verse 14
ऋषिस्तमाह देया मे सुता तुभ्यं हि तच्छृणु । (अनन्यस्त्रीजन: प्राज्ञो हाप्रवासी प्रियंवद: । सुरूप: सम्मतो वीर: शीलवान् भोगभुक्छवि: ।। दारानुमतयज्ञश्न सुनक्षत्रामथोद्वहेत् । स्वभर्त्रा स््वजनोपेत इह प्रेत्य च मोदते ।।) गच्छ तावद् दिशं पुण्यामुत्तरां द्रक्ष्य्से ततः,वदान्य ऋषिने अष्टावक्रके माँगनेपर इस प्रकार उत्तर दिया--“विप्रवर! जिसके दूसरी कोई स्त्री न हो, जो परदेशमें न रहता हो, विद्वान, प्रिय वचन बोलनेवाला, लोकसम्मानित, वीर, सुशील, भोग भोगनेमें समर्थ, कान्तिमान् और सुन्दर पुरुष हो, उसीके साथ मुझे अपनी पुत्रीका विवाह करना है। जो स्त्रीकी अनुमतिसे यज्ञ करता और उत्तम नक्षत्रवाली कन्याको व्याहता है, वह पुरुष अपनी पत्नीके साथ तथा पत्नी अपने पतिके साथ रहकर दोनों ही इहलोक और परलोकमें आनन्द भोगते हैं। मैं तुम्हें अपनी कन्या अवश्य दे दूँगा, परंतु पहले एक बात सुनो, यहाँसे परम पवित्र उत्तर दिशाकी ओर चले जाओ। वहाँ तुम्हें उसका दर्शन होगा”
Bhishma berkata: Sang resi berkata kepadanya, “Aku akan memberikan putriku kepadamu—dengarkanlah. Aku hendak menikahkannya hanya dengan seorang bijak yang tidak memiliki perempuan lain, tidak hidup merantau, bertutur manis, rupawan, dihormati masyarakat, gagah, berkelakuan luhur, mampu menikmati kenikmatan yang sah menurut dharma, dan bercahaya wibawanya. Seorang yang melaksanakan yajña dengan persetujuan istrinya dan menikahi gadis pada rasi-bintang yang mujur—suami bersama istri, dan istri bersama suami, bersukacita baik di dunia ini maupun setelah wafat. Aku sungguh akan memberikan putriku; namun terlebih dahulu satu hal: pergilah kini ke arah utara yang amat suci; di sana engkau akan melihat dia.”
Verse 15
अष्टावक्र उवाच किं द्रष्टव्यं मया तत्र वक्तुमहति मे भवान् | तथेदानीं मया कार्य यथा वक्ष्यति मां भवान्,अष्टावक्रने पूछा--महर्षे! उत्तर दिशामें जाकर मुझे किसका दर्शन करना होगा? आप यह बतानेकी कृपा करें तथा उस समय मुझे क्या और किस प्रकार करना चाहिये, यह भी आप ही बतायेंगे
Aṣṭāvakra berkata: “Wahai Maharsi, siapakah yang harus kulihat di sana? Mohon berkenan menjelaskannya. Dan kini, apa yang harus kulakukan, dan bagaimana caranya—sebagaimana engkau menasihatiku, demikianlah akan kulaksanakan.”
Verse 16
वदान्य उवाच धनदं समतिक्रम्य हिमवन्तं च पर्वतम् । रुद्रस्यायतनं दृष्टवा सिद्धचारणसेवितम्,वदान्यने कहा--वत्स! तुम कुबेरकी अलकापुरीको लाँधकर जब हिमालय पर्वतको भी लाँघ जाओगे तब तुम्हें सिद्धों और चारणोंसे सेवित रुद्रके निवासस्थान कैलास पर्वतका दर्शन होगा
Wadānya berkata, “Anakku! Setelah engkau melampaui Alakāpurī milik Kubera dan menyeberangi pula Pegunungan Himavān, engkau akan menyaksikan Gunung Kailāsa—kediaman Rudra yang dihormati dan dilayani oleh para Siddha serta Cāraṇa.”
Verse 17
संहृष्टे: पार्षदैर्जुष्ट नृत्यद्भिविविधाननै: | दिव्याड्ररागै: पैशाचैरन्यैर्नानाविधै: प्रभो:,वहाँ नाना प्रकारके मुखवाले भाँति-भाँतिके दिव्य अंगराग लगाये अनेकानेक पिशाच तथा अन्य भूत-वैताल आदि भगवान् शिवके पार्षदगण हर्ष और उल्लासमें भरकर नाच रहे होंगे
Di sana, para pengiring Sang Prabhu (Śiva)—bersama banyak piśāca dan makhluk halus lain seperti bhūta dan vetāla, yang berwajah beraneka ragam serta berbalut aneka olesan ilahi—menari dalam suka cita dan kegembiraan yang meluap.
Verse 18
पाणितालसुतालै श्व शम्पातालै: समैस्तथा । सम्प्रहृष्टे: प्रनृत्यद्भि: शर्वस्तत्र निषेव्यते,वे करताल और सुन्दर ताल बजाकर शम्पा ताल देते हुए समभावसे हर्षविभोर हो जोर-जोरसे नृत्य करते हुए वहाँ भगवान् शंकरकी सेवा करते हैं
Dengan tepuk tangan dan irama yang teratur, disertai pula hentakan śampā-tāla yang lincah, mereka—tetap seimbang dalam sikap namun meluap oleh sukacita—menari dengan gagah. Di tempat itu Śarva (Śiva) dilayani dengan bakti.
Verse 19
इष्टं किल गिरौ स्थान तद्दिव्यमिति शुश्रुम । नित्यं संनिहितो देवस्तथा ते पार्षदा: स्मृता:,इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टावक्रदिक्संवादे एकोनविंशो5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें अष्ावक्र और उत्तर दिशाका संवादविषयक उत्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Kami telah mendengar bahwa di gunung itu ada suatu tempat yang amat dicintai—sungguh sebuah kawasan ilahi. Di sana Sang Dewa senantiasa hadir, dan para pengiring-Nya pun dikenang sebagai yang menetap di sana.
Verse 20
उस पर्वतका वह दिव्य स्थान भगवान् शंकरको बहुत प्रिय है। यह बात हमारे सुननेमें आयी है। वहाँ महादेवजी तथा उनके पार्षद नित्य निवास करते हैं ।। तत्र देव्या तपस्तप्तं शड्करार्थ सुदुश्चरम् अतस्तदिष्ट॑ देवस्य तथोमाया इति श्रुति:,वहाँ देवी पार्वतीने भगवान् शंकरकी प्राप्तिके लिये अत्यन्त दुष्कर तपस्या की थी, इसीलिये वह स्थान भगवान् शिव और पार्वतीको अधिक प्रिय है, ऐसा सुना जाता है
Tempat bercahaya di gunung itu amat dikasihi oleh Śaṅkara—demikianlah yang kami dengar. Di sana Mahādeva bersemayam senantiasa bersama para pengiring-Nya. Di sanalah pula Sang Dewi menjalani tapa yang sangat berat demi memperoleh Śaṅkara; karena itu, menurut tradisi suci, tempat itu terutama dicintai oleh Śiva dan juga Umā.
Verse 21
पूर्वे तत्र महापाश्वे देवस्योत्तरतस्तथा । ऋतव: कालरात्रिश्व ये दिव्या ये च मानुषा:,महादेवजीके पूर्व तथा उत्तर भागमें महापार्श्व नामक पर्वत है, जहाँ ऋतु, कालरात्रि तथा दिव्य और मानुषभाव सब-के-सब मूर्तिमान् होकर महादेवजीकी उपासना करते हैं। उस स्थानको लाँघकर तुम आगे बढ़ते ही चले जाना
Di sana, di sebelah timur dan juga di sebelah utara Sang Dewa, terbentang gunung agung bernama Mahāpārśva. Di tempat itu, para Musim dan Kālarātri—baik dalam wujud ilahi maupun wujud manusia—tampak berjasad dan memuja Mahādeva. Setelah melintasi kawasan suci itu, engkau harus terus melangkah tanpa berhenti.
Verse 22
देवं चोपासते सर्वे रूपिण: किल तत्र ह | तदतिक्रम्य भवन त्वया यातव्यमेव हि,महादेवजीके पूर्व तथा उत्तर भागमें महापार्श्व नामक पर्वत है, जहाँ ऋतु, कालरात्रि तथा दिव्य और मानुषभाव सब-के-सब मूर्तिमान् होकर महादेवजीकी उपासना करते हैं। उस स्थानको लाँघकर तुम आगे बढ़ते ही चले जाना
Di sana, sungguh, semua makhluk yang berwujud memuja Yang Ilahi. Setelah melewati tempat itu, engkau memang harus terus melanjutkan perjalanan tanpa berhenti.
Verse 23
ततो नील वनोद्देशं द्रक्ष्यसे मेघसंनिभम् । रमणीयं मनोग्राहि तत्र वै द्रक्ष्यसे स्त्रियम्,तदनन्तर तुम्हें मेघोंकी घटाके समान नीला एक वन्य प्रदेश दिखायी देगा। वह बड़ा ही मनोरम और रमणीय है। उस वनमें तुम एक स्त्रीको देखोगे जो तपस्विनी, महान् सौभाग्यवती, वृद्धा और दीक्षापरायण है। तुम यत्नपूर्वक वहाँ उसका दर्शन और पूजन करना
Kemudian engkau akan melihat suatu kawasan hutan, biru-gelap laksana gumpalan awan—indah dan memikat hati. Di sana pula engkau akan melihat seorang perempuan.
Verse 24
तपस्विनीं महाभागां वृद्धां दीक्षामनुछिताम् । द्रष्टव्या सा त्वया तत्र सम्पूज्या चैव यत्नतः,तदनन्तर तुम्हें मेघोंकी घटाके समान नीला एक वन्य प्रदेश दिखायी देगा। वह बड़ा ही मनोरम और रमणीय है। उस वनमें तुम एक स्त्रीको देखोगे जो तपस्विनी, महान् सौभाग्यवती, वृद्धा और दीक्षापरायण है। तुम यत्नपूर्वक वहाँ उसका दर्शन और पूजन करना
Di sana engkau harus menemui dan memandang sang pertapa perempuan itu—yang sangat mulia, telah lanjut usia, dan teguh dalam dīkṣā-vrata—serta menghormatinya dengan pemujaan yang sungguh-sungguh dan penuh kehati-hatian.
Verse 25
तां दृष्टवा विनिवृत्तस्त्वं ततः पार्णिं ग्रहीष्यसि । यद्येष समय: सर्व: साध्यतां तत्र गम्यताम्,उसे देखकर लौटनेपर ही तुम मेरी पुत्रीका पाणिग्रहण कर सकोगे। यदि यह सारी शर्त स्वीकार हो तो इसे पूरी करनेमें लग जाओ और अभी वहाँकी यात्रा आरम्भ कर दो
Hanya setelah engkau melihatnya dan kemudian kembali, barulah engkau boleh mengambil tangan putriku dalam pernikahan. Jika seluruh syarat ini engkau terima, maka bersegeralah menunaikannya dan mulailah perjalanan ke sana saat ini juga.
Verse 26
अष्टावक्र उवाच तथास्तु साधयिष्यामि तत्र यास्याम्यसंशयम् । यत्र त्वं वदसे साधो भवान् भवतु सत्यवाक्,अष्टावक्र बोले--ऐसा ही होगा, मैं यह शर्त पूरी करूँगा। श्रेष्ठ पुरुष! आप जहाँ कहते हैं वहाँ अवश्य जाऊँगा। आपकी वाणी सत्य हो
Aṣṭāvakra berkata: “Demikianlah. Aku akan menunaikannya; tanpa ragu aku akan pergi ke tempat yang engkau tunjukkan, wahai orang saleh. Semoga ucapanmu terbukti benar.”
Verse 27
भीष्म उवाच ततो5गच्छत् स भगवानुत्तरामुत्तरां दिशम् हिमवन्तं गिरिश्रेष्ठ सिद्धा्चारणसेवितम्,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! तदनन्तर भगवान् अष्टावक्र उत्तरोत्तर दिशाकी ओर चल दिये। सिद्धों और चारणोंसे सेवित गिरिश्रेष्ठ महापर्वत हिमालयपर पहुँचकर वे श्रेष्ठ द्विज धर्मसे शोभा पानेवाली पुण्यमयी बाहुदा नदीके तटपर गये
Bhishma berkata: “Kemudian resi yang mulia itu berangkat, melangkah semakin jauh ke arah utara. Ia mencapai Himavat, gunung yang termulia, yang dihormati dan didatangi para Siddha dan Charana.”
Verse 28
स गत्वा द्विजशार्दूलो हिमवन्तं महागिरिम् । अभ्यगच्छन्नदीं पुण्यां बाहुदां धर्मशालिनीम्,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! तदनन्तर भगवान् अष्टावक्र उत्तरोत्तर दिशाकी ओर चल दिये। सिद्धों और चारणोंसे सेवित गिरिश्रेष्ठ महापर्वत हिमालयपर पहुँचकर वे श्रेष्ठ द्विज धर्मसे शोभा पानेवाली पुण्यमयी बाहुदा नदीके तटपर गये
Bhishma berkata: “Sang ‘harimau di antara para brahmana’ itu pergi ke gunung besar Himavat. Setelah mencapainya, ia mendekati sungai suci Bāhudā, yang termasyhur karena kemuliaan dharma.”
Verse 29
अशोके विमले तीर्थे स्नात्वा वै तर्प्प देवता: । तत्र वासाय शयने कौशे सुखमुवास ह,वहाँ निर्मल अशोक तीर्थमें स्नान करके देवताओंका तर्पण करनेके पश्चात् उन्होंने कुशकी चटाईपर सुखपूर्वक निवास किया
Setelah mandi di tirtha Aśoka yang bening dan mempersembahkan tarpaṇa kepada para dewa, ia tinggal di sana dengan tenteram, berbaring di atas alas dari rumput kuśa.
Verse 30
ततो रात्र्यां व्यतीतायां प्रातरुत्थाय स द्विज: । स्नात्वा प्रादुश्चकाराग्निं स्तुत्वा चैनं प्रधानत:,तदनन्तर रात बीतनेपर वे द्विज प्रातःकाल उठे और उन्होंने स्नान करके अग्निदेवको प्रज्वलित किया। फिर मुख्य-मुख्य वैदिक मन्त्रोंसे अग्निदेवकी स्तुति करके “रुद्राणी रुद्र' नामक तीर्थमें गये और वहाँ सरोवरके तटपर कुछ कालतक विश्राम करते रहे। विश्रामके पश्चात् उठकर वे कैलासकी ओर चल दिये
Setelah malam berlalu, sang brahmana bangun saat fajar. Sesudah mandi, ia menyalakan api suci dan memujanya terlebih dahulu dengan kidung-kidung utama Weda.
Verse 31
रुद्राणीं रुद्रमासाद्य हदे तत्र समाश्वसत् । विश्रान्तश्न समुत्थाय कैलासमभितो ययौ,तदनन्तर रात बीतनेपर वे द्विज प्रातःकाल उठे और उन्होंने स्नान करके अग्निदेवको प्रज्वलित किया। फिर मुख्य-मुख्य वैदिक मन्त्रोंसे अग्निदेवकी स्तुति करके “रुद्राणी रुद्र' नामक तीर्थमें गये और वहाँ सरोवरके तटपर कुछ कालतक विश्राम करते रहे। विश्रामके पश्चात् उठकर वे कैलासकी ओर चल दिये
Bhīṣma berkata: Setelah mencapai tīrtha suci bernama Rudrāṇī–Rudra, ia beristirahat di tepi danau dan meneguhkan kembali batinnya. Sesudah itu, ia bangkit dan melanjutkan perjalanan menuju Kailāsa.
Verse 32
सो<पश्यत् काञ्चनद्वारं दीप्यमानमिव श्रिया । मन्दाकिनीं च नलिनीं धनदस्य महात्मन:,कुछ दूर जानेपर उन्होंने कुबेरकी अलकापुरीका सुवर्णमय द्वार देखा, जो दिव्य दीप्तिसे देदीप्यमान हो रहा था। वहीं महात्मा कुबेरकी कमलपुष्पोंसे सुशोभित एक बावड़ी देखी, जो गंगाजीके जलसे परिपूर्ण होनेके कारण मन्दाकिनी नामसे विख्यात थी
Bhīṣma berkata: Lebih jauh sedikit, ia melihat gerbang emas milik Dhanada (Kubera) yang agung, berkilau seakan memancarkan sinar Śrī (kemakmuran). Ia juga melihat Mandākinī, telaga Kubera yang dihiasi teratai, termasyhur karena kejernihan dan keindahannya.
Verse 33
अथ ते राक्षसा: सर्वे येडभिरक्षन्ति पद्मिनीम् प्रत्युत्थिता भगवन्तं मणिभद्रपुरोगमा:
Kemudian semua rākṣasa yang menjaga Padminī bangkit menyambut dengan hormat Sang Mulia, dengan Maṇibhadra sebagai pemimpin mereka.
Verse 34
वहाँ जो उस पद्मपूर्ण पुष्करिणीकी रक्षा कर रहे थे, वे सब मणिभद्र आदि राक्षस भगवान् अष्टावक्रको देखकर उनके स्वागतके लिये उठकर खड़े हो गये ।। स तानू प्रत्यर्चयामास राक्षसान् भीमविक्रमान् । निवेदयत मां क्षिप्रं धनदायेति चाब्रवीत्,मुनिने भी उन भयंकर पराक्रमी राक्षसोंके प्रति सम्मान प्रकट किया और कहा --“आपलोग शीघ्र ही धनपति कुबेरको मेरे आगमनकी सूचना दे दें”
Ia pun membalas penghormatan kepada para penjaga yang gagah itu, lalu berkata, “Segera sampaikan kepada Dhanada (Kubera) kabar kedatanganku.”
Verse 35
ते राक्षसास्तथा राजन् भगवन्तमथान्रुवन् । असौ वैश्रवणो राजा स्वयमायाति तेडन्तिकम्,राजन! वे राक्षस वैसा करके भगवान् अष्टावक्रसे बोले--'प्रभो! राजा कुबेर स्वयं ही आपके निकट पधार रहे हैं
Wahai raja, para rākṣasa itu lalu berkata kepada sang mulia: “Raja Vaiśravaṇa (Kubera) sendiri sedang datang mendekat kepadamu.”
Verse 36
विदितो भगवानस्य कार्यमागमनस्य यत् । पश्यैनं त्वं महाभागं ज्वलन्तमिव तेजसा,“आपका आगमन और इस आगमनका जो उद्देश्य है, वह सब कुछ कुबेरको पहलेसे ही ज्ञात है। देखिये, ये महाभाग धनाध्यक्ष अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए आ रहे हैं'
Tujuan kedatanganmu telah diketahui lebih dahulu oleh Bhagawan Kubera, penguasa kekayaan. Lihatlah—Kubera yang mulia itu mendekat, menyala seakan-akan terbakar oleh sinar kemuliaannya sendiri.
Verse 37
ततो वैश्रवणो<भ्येत्य अष्टावक्रमनिन्दितम् । विधिवत्कुशल पृष्टवा ततो ब्रह्मर्षिमब्रवीत्,तदनन्तर विश्रववाके पुत्र कुबेरने निकट आकर निन्दारहित ब्रह्मर्षि अष्टावक्रसे विधिपूर्वक कुशल-समाचार पूछते हुए कहा--
Kemudian Vaiśravaṇa (Kubera) mendekati resi Aṣṭāvakra yang tak bercela. Setelah menanyakan kesejahteraannya menurut tata krama, ia pun berbicara kepada brahmarṣi itu.
Verse 38
सुखं प्राप्तो भवान् कच्चित् कि वा मत्तश्चिकीर्षति । ब्रृहि सर्व करिष्यामि यन्मां वक्ष्यसि वै द्विज,“ब्रह्म! आप सुखपूर्वक यहाँ आये हैं न? बताइये मुझसे किस कार्यकी सिद्धि चाहते हैं? आप मुझसे जो-जो कहेंगे, वह सब पूर्ण करूँगा
Wahai Brahman, apakah engkau tiba di sini dengan selamat dan tenteram? Tujuan apa yang hendak kau capai melalui diriku? Katakanlah, wahai yang dua kali lahir—apa pun yang kau minta akan kulaksanakan sepenuhnya.
Verse 39
भवन प्रविश त्वं मे यथाकामं द्विजोत्तम । सत्कृतः कृतकार्यश्व भवान् यास्यत्यविघ्नतः:,द्विजश्रेष्ठ] आप इच्छानुसार मेरे भवनमें प्रवेश कीजिये और यहाँका सत्कार ग्रहण करके कृतकृत्य हो यहाँसे निर्विघ्न यात्रा कीजियेगा
Wahai brahmana terbaik, masuklah ke kediamanku sesukamu. Terimalah penghormatan di sini; setelah maksudmu tercapai, engkau akan berangkat dari sini tanpa rintangan.
Verse 40
प्राविशद् भवन स्वं वै गृहीत्वा तं द्विजोत्तमम् । आसन स्वं ददौ चैव पाद्यमर्घ्य तथैव च,ऐसा कहकर कुबेरने विप्रवर अष्टावक्रको साथ लेकर अपने भवनमें प्रवेश किया और उन्हें पाद्य, अर््ध तथा अपना आसन दिया
Setelah berkata demikian, Kubera membawa brahmana utama itu masuk ke istananya. Di sana ia mempersilahkannya dengan tempat duduknya sendiri, serta mempersembahkan air pembasuh kaki dan arghya, sebagaimana layaknya penyambutan tamu mulia.
Verse 41
अथोपविष्टयोस्तत्र मणिभद्रपुरोगमा: । निषेदुस्तत्र कौबेरा यक्षगन्धर्वकिन्नरा:,जब कुबेर और अष्टावक्र दोनों वहाँ आरामसे बैठ गये तब कुबेरके सेवक मणिभद्र आदि यक्ष, गन्धर्व और किन्नर भी नीचे बैठ गये
Ketika Kubera dan Aṣṭāvakra telah duduk dengan tenteram di sana, para pengiring Kubera—dipimpin Maṇibhadra—yakni para Yakṣa, Gandharva, dan Kinnara, pun duduk di dekatnya.
Verse 42
ततस्तेषां निषण्णानां धनदो वाक्यमब्रवीत् । भवच्छन्दं समाज्ञाय नृत्येरन्नप्सरोगणा:,उन सबके बैठ जानेपर कुबेरने कहा--“आपकी इच्छा हो तो उसे जानकर यहाँ अप्सराएँ नृत्य करें; क्योंकि आपका आतिथ्य सत्कार और सेवा करना हमलोगोंका परम कर्तव्य है।' तब मुनिने मधुर वाणीमें कहा, “तथास्तु--ऐसा ही हो”
Setelah semuanya duduk, Dhanada (Kubera) berkata: “Mengetahui kehendakmu, bila berkenan, biarlah rombongan apsara menari di sini; sebab memuliakan tamu dan melayanimu adalah kewajiban tertinggi kami.” Sang resi pun menjawab dengan lembut, “Demikianlah—biarlah terjadi.”
Verse 43
आतिथ्यं परम॑ कार्य शुश्रूषा भवतस्तथा । संवर्ततामित्युवाच मुनिर्मधुरया गिरा,उन सबके बैठ जानेपर कुबेरने कहा--“आपकी इच्छा हो तो उसे जानकर यहाँ अप्सराएँ नृत्य करें; क्योंकि आपका आतिथ्य सत्कार और सेवा करना हमलोगोंका परम कर्तव्य है।' तब मुनिने मधुर वाणीमें कहा, “तथास्तु--ऐसा ही हो”
Dengan suara lembut sang resi berkata: “Menjamu tamu adalah kewajiban tertinggi, demikian pula pelayanan kepadamu; maka biarlah demikian—laksanakanlah.”
Verse 44
अथोरवरा मिश्रकेशी रम्भा चैवोर्वशी तथा । अलम्बुषा घृताची च चित्रा चित्राड़दा रुचि:,तदनन्तर उर्वरा, मिश्रकेशी, रम्भा, उर्वशी, अलम्बुषा, घृताची, चित्रा, चित्रांगदा, रुचि, मनोहरा, सुकेशी, सुमुखी, हासिनी, प्रभा, विद्युता, प्रशमी, दान्ता, विद्योता और रति-ये तथा और भी बहुत-सी शुभलक्षणा अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और गन्धर्वगण नाना प्रकारके बाजे बजाने लगे
Kemudian tampak Urvarā, Miśrakeśī, Rambhā, dan Urvaśī; Alambuṣā dan Ghṛtācī; Citrā, Citrāṅgadā, dan Ruci.
Verse 45
मनोहरा सुकेशी च सुमुखी हासिनी प्रभा । विद्युता प्रशमी दान्ता विद्योता रतिरेवच,तदनन्तर उर्वरा, मिश्रकेशी, रम्भा, उर्वशी, अलम्बुषा, घृताची, चित्रा, चित्रांगदा, रुचि, मनोहरा, सुकेशी, सुमुखी, हासिनी, प्रभा, विद्युता, प्रशमी, दान्ता, विद्योता और रति-ये तथा और भी बहुत-सी शुभलक्षणा अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और गन्धर्वगण नाना प्रकारके बाजे बजाने लगे
Manoharā, Sukeśī, Sumukhī, Hāsinī, Prabhā, Vidyutā, Praśamī, Dāntā, Vidyotā, dan Rati—mereka serta banyak apsara lain yang bertanda mujur mulai menari, sementara para gandharva memainkan beragam alat musik.
Verse 46
एताश्षान्याश्न वै वह्नयः प्रनृत्ताप्सरस: शुभा: । अवादयंश्न गन्धर्वा वाद्यानि विविधानि च,तदनन्तर उर्वरा, मिश्रकेशी, रम्भा, उर्वशी, अलम्बुषा, घृताची, चित्रा, चित्रांगदा, रुचि, मनोहरा, सुकेशी, सुमुखी, हासिनी, प्रभा, विद्युता, प्रशमी, दान्ता, विद्योता और रति-ये तथा और भी बहुत-सी शुभलक्षणा अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और गन्धर्वगण नाना प्रकारके बाजे बजाने लगे
Kemudian banyak Apsaras lain yang bertanda mujur—bercahaya laksana nyala api—mulai menari, dan para Gandharwa memainkan beragam alat musik. Sesudah itu Urvarā, Miśrakeśī, Rambhā, Urvaśī, Alambuṣā, Ghṛtācī, Citrā, Citrāṅgadā, Ruci, Manoharā, Sukeśī, Sumukhī, Hāsinī, Prabhā, Vidyutā, Praśamī, Dāntā, Vidyotā, dan Rati—bersama banyak Apsaras lain yang beralamat baik—turut mengangkat tarian, sementara rombongan Gandharwa meneruskan musiknya yang beraneka ragam.
Verse 47
अथ प्रवृत्ते गान्धर्वे दिव्ये ऋषिरुपाविशत् । दिव्यं संवत्सरं तत्रारमतैष महातपा:,वह दिव्य नृत्य-गीत आरम्भ होनेपर महातपस्वी ऋषि अष्टावक्र भी दर्शक-मण्डलीमें आ बैठे और वे देवताओंके वर्षसे एक वर्षतक इसी आमोद-प्रमोदमें रमते रहे
Ketika pertunjukan Gandharwa yang surgawi—nyanyian dan tari—dimulai, sang resi pun duduk di antara para penonton. Pertapa agung itu tinggal di sana, larut dalam kegembiraan tarian dan nyanyian langit, selama genap satu tahun ilahi.
Verse 48
ततो वैश्रवणो राजा भगवन्तमुवाच ह । साग्र: संवत्सरो जातो विप्रेह तव पश्यत:,तब राजा वैश्रवण (कुबेर)-ने भगवान् अष्टावक्रसे कहा--“विप्रवर! यहाँ नृत्य देखते हुए आपका एक वर्षसे कुछ अधिक समय व्यतीत हो गया है
Lalu Raja Vaiśravaṇa (Kubera) berkata kepada resi yang mulia itu, “Wahai brāhmaṇa, selagi engkau menyaksikan di sini, telah berlalu satu tahun—bahkan sedikit lebih.”
Verse 49
हार्योयं विषयो ब्रह्मन् गान्धर्वो नाम नामतः । छन््दतो वर्ततां विप्र यथा वदति वा भवान्,“ब्रह्मन! यह नृत्य-गीतका विषय जिसे “गान्धर्व” नाम दिया गया है बड़ा मनोहारी है; अतः यदि आपकी इच्छा हो तो यह आयोजन कुछ दिन और इसी तरह चलता रहे अथवा विप्रवर! आप जैसी आज्ञा दें वैसा किया जाय
Bhīṣma berkata, “Wahai Brahmana, seni nyanyian dan tari yang disebut ‘Gāndharva’ ini sungguh mempesona. Maka, bila engkau berkenan, biarlah pertunjukan ini berlanjut beberapa hari lagi dengan cara yang sama; atau, wahai yang terbaik di antara para brāhmaṇa, lakukanlah tepat sebagaimana perintahmu.”
Verse 50
अतिथि: पूजनीयस्त्वमिदं च भवतो गृहम् । सर्वमाज्ञाप्पतामाशु परवन्तो वयं त्वयि
Bhīṣma berkata, “Engkau adalah tamu yang patut dimuliakan, dan rumah ini pun milikmu. Perintahkan apa pun segera; kami sepenuhnya berada dalam kuasamu.”
Verse 51
“आप मेरे पूजनीय अतिथि हैं। यह घर आपका ही है। आप निस्संकोच भावसे शीघ्र ही सभी कार्योके लिये हमें आज्ञा दें। हम आपके वशवर्ती किंकर हैं” ।। अथ वैश्रवण् प्रीतो भगवान् प्रत्यभाषत । अर्चितोडस्मि यथान्यायं गमिष्यामि धनेश्वर,तब अत्यन्त प्रसन्न हुए भगवान् अष्टावक्रने कुबेरसे कहा--“धनेश्वर! आपने यथोचित रूपसे मेरा सत्कार किया है। अब आज्ञा दें, मैं यहाँसे जाऊँगा
Bhishma berkata: “Engkau adalah tamu yang patut kumuliakan. Rumah ini sungguh milikmu. Tanpa ragu, segeralah perintahkan kami dalam segala urusan. Kami adalah pelayan yang tunduk kepadamu.” Lalu Vaishravana (Kubera), dengan hati gembira, menjawab: “Wahai Penguasa kekayaan, aku telah dihormati menurut tata yang semestinya; kini aku akan berangkat.” Maka Bhagawan Ashtavakra, sangat bersukacita, berkata kepada Kubera: “Wahai Dhaneśvara, engkau telah menyambutku dengan hormat yang layak. Kini berilah izin; aku akan pergi dari sini.”
Verse 52
प्रीतो5स्मि सदृशं चैव तव सर्व धनाधिप । तव प्रसादाद् भगवन् महर्षेश्न महात्मन:,“धनाधिप! मैं बहुत प्रसन्न हूँ। आपकी सारी बातें आपके अनुरूप ही हैं। भगवन्! अब मैं आपकी कृपासे उन महात्मा महर्षि वदान्यकी आज्ञाके अनुसार आगे जाऊँगा। आप अभ्युदयशील एवं समृद्धिशाली हों।! इतना कहकर भगवान् अष्टावक्र उत्तर दिशाकी ओर मुँह करके चल दिये
Bhishma berkata: “Wahai penguasa kekayaan, aku sangat berkenan. Segala yang kau ucapkan sepenuhnya sepadan dengan keluhuran dirimu. Wahai Yang Mulia, maharsi termulia, berhati agung—berkat anugerahmu kini aku akan melanjutkan perjalanan sesuai titah maharsi dermawan itu. Semoga kesejahteraan dan kemakmuranmu senantiasa bertambah.” Setelah berkata demikian, Bhagawan Ashtavakra menghadap ke arah utara dan berangkat.
Verse 53
नियोगादद्य यास्यामि वृद्धिमानृद्धिमान् भव । अथ निष्क्रम्य भगवान् प्रययावुत्तरामुख:,“धनाधिप! मैं बहुत प्रसन्न हूँ। आपकी सारी बातें आपके अनुरूप ही हैं। भगवन्! अब मैं आपकी कृपासे उन महात्मा महर्षि वदान्यकी आज्ञाके अनुसार आगे जाऊँगा। आप अभ्युदयशील एवं समृद्धिशाली हों।! इतना कहकर भगवान् अष्टावक्र उत्तर दिशाकी ओर मुँह करके चल दिये
Bhishma berkata: “Sesuai perintah, hari ini juga aku akan berangkat. Semoga engkau senantiasa maju dan makmur.” Setelah berkata demikian, sang mulia keluar dan melanjutkan perjalanan menghadap ke utara.
Verse 54
कैलासं मन्दरं हैमं॑ सर्वाननुचचार ह । एवं समूचे कैलास, मन्दराचल और हिमालयपर विचरण करने लगे || ५३ $ || तानतीत्य महाशैलान् कैरातं स्थानमुत्तमम्,उन बड़े-बड़े पर्वतोंको लाँचकर यतचित्त हो उन्होंने किरातवेषधारी महादेवजीके उत्तम स्थानकी परिक्रमा की और उसे मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। फिर नीचे पृथ्वीपर उतरकर वे उस स्थानके माहात्म्यसे तत्काल पवित्रात्मा हो गये
Bhishma berkata: Mereka menjelajahi Kailasa, Mandara, dan pegunungan haima yang berkilau laksana salju keemasan. Demikianlah mereka mengembara di seluruh Kailasa, Mandaracala, dan Himalaya. Setelah melampaui puncak-puncak besar itu, dengan batin terkendali, mereka mengitari (pradaksina) tempat luhur Mahadeva dalam wujud Kirata—Śiva sebagai pemburu—seraya menundukkan kepala dalam hormat. Lalu, turun kembali ke bumi, oleh kemuliaan tempat suci itu mereka seketika menjadi bersih jiwanya.
Verse 55
प्रदक्षिणं तथा चक्रे प्रयतः शिरसा नतः । धरणीमवतीर्याथ पूतात्मासौ तदाभवत्,उन बड़े-बड़े पर्वतोंको लाँचकर यतचित्त हो उन्होंने किरातवेषधारी महादेवजीके उत्तम स्थानकी परिक्रमा की और उसे मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। फिर नीचे पृथ्वीपर उतरकर वे उस स्थानके माहात्म्यसे तत्काल पवित्रात्मा हो गये
Bhishma berkata: Dengan disiplin dan kepala tertunduk, ia melakukan pradaksina mengelilingi tempat suci itu. Lalu, setelah turun ke bumi, oleh kemuliaan tempat tersebut ia seketika menjadi suci jiwanya.
Verse 56
सतं प्रदक्षिणं कृत्वा त्रि: शैलं चोत्तरामुख: । समेन भूमिभागेन ययौ प्रीतिपुरस्कृत:,तीन बार उस पर्वतकी परिक्रमा करके वे उत्तराभिमुख हो समतल भूमिसे प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़े
Setelah mengelilingi gunung itu tiga kali dengan penuh hormat, ia pun melangkah maju menghadap ke utara, meniti tanah yang rata, dengan sukacita dan niat bakti sebagai penuntun langkahnya.
Verse 57
ततो<परं वनोद्देशं रमणीयमपश्यत । सर्वर्तुभिर्मूलफलै: पक्षिभिश्च॒ समन्वितै:
Sesudah itu ia melihat hamparan hutan lain yang elok—kaya akan umbi dan buah di segala musim, serta diramaikan oleh burung-burung.
Verse 58
तत्राश्रमपद्द दिव्यं ददर्श भगवानथ,वहाँ भगवान् अष्टावक्रने एक दिव्य आश्रम देखा। उस आश्रमके चारों ओर नाना प्रकारके सुवर्णमय एवं रत्नभूषित पर्वत शोभा पा रहे थे। वहाँकी मणिमयी भूमिपर कई सुन्दर बावड़ियाँ बनी थीं
Di sana sang resi mulia melihat sebuah tapak pertapaan yang menakjubkan dan suci.
Verse 59
शैलांश्व विविधाकारान् काज्चनान् रत्नभूषितान् | मणिभूमौ निविष्टाश्च पुष्करिण्यस्तथैव च,वहाँ भगवान् अष्टावक्रने एक दिव्य आश्रम देखा। उस आश्रमके चारों ओर नाना प्रकारके सुवर्णमय एवं रत्नभूषित पर्वत शोभा पा रहे थे। वहाँकी मणिमयी भूमिपर कई सुन्दर बावड़ियाँ बनी थीं
Di sana tampak gunung-gunung beraneka rupa, berkilau laksana emas dan berhias permata; di atas tanah yang seolah bertatahkan ratna, kolam-kolam teratai pun tertata.
Verse 60
अन्यान्यपि सुरम्याणि पश्यत: सुबहून्यथ । भृशं तस्य मनो रेमे महर्षेभावितात्मन:
Sambil memandang banyak pemandangan lain yang amat elok, batin sang maharsi—yang jiwanya telah terasah dan terkendali—bersukacita dengan sangat.
Verse 61
इनके सिवा और भी बहुत-से सुरम्य दृश्य वहाँ दिखायी देते थे। उन सबको देखते हुए उन भावितात्मा महर्षिका मन वहाँ विशेष आनन्दका अनुभव करने लगा ।। स तत्र काजउ्चनं दिव्यं सर्वरत्नमयं गृहम् | ददर्शादूभुतसंकाशं धनदस्य गृहाद् वरम्,महर्षिने उस प्रदेशमें एक दिव्य सुवर्णमय भवन देखा, जिसमें सब प्रकारके रत्न जड़े गये थे। वह मनोहर गृह कुबेरके राजभवनसे भी सुन्दर, श्रेष्ठ एवं अदभुत था
Bhishma berkata—di sana sang maharṣi melihat sebuah istana surgawi dari emas, bertatahkan segala macam permata. Berkilau dengan cahaya yang menakjubkan, bangunan itu melampaui bahkan istana Dhanada (Kubera) dalam keindahan dan keagungannya. Menyaksikan kemuliaan ilahi demikian, batin sang pertapa yang telah terolah pun dipenuhi sukacita yang halus dan luhur.
Verse 62
महान्तो यत्र विविधा मणिकाञउ्चनपर्वता: । विमानानि च रम्याणि रत्नानि विविधानि च,वहाँ भाँति-भाँतिके मणिमय और सुवर्णमय विशाल पर्वत शोभा पाते थे। अनेकानेक सुरम्य विमान तथा नाना प्रकारके रत्न दृष्टिगोचर होते थे
Bhishma berkata—di sana tampak gunung-gunung besar dari berbagai macam, ada yang tersusun dari permata dan ada yang dari emas, memancarkan keindahan. Vimāna-vimāna yang elok terlihat, dan permata aneka ragam tampak di mana-mana.
Verse 63
मन्दारपुष्पै: संकीर्णा तथा मन्दाकिनीं नदीम् | स्वयंप्रभाश्चव मणयो वजैर्भूमिश्व भूषिता,उस प्रदेशमें मन्दाकिनी नदी प्रवाहित होती थी, जिसके स्रोतमें मन्दारके पुष्प बह रहे थे। वहाँ स्वयं प्रकाशित होनेवाली मणियाँ अपनी अद्भुत छटा बिखेर रही थीं। वहाँकी भूमि हीरोंसे जड़ी गयी थी
Bhishma berkata—di wilayah itu mengalir sungai Mandākinī, airnya dipenuhi guguran bunga mandāra. Di sana permata yang bercahaya sendiri memancarkan sinar menakjubkan, dan bahkan tanahnya pun berhias intan.
Verse 64
नानाविधैश्व भवनैर्विचित्रमणितोरणै: । मुक्ताजालविनिक्षिप्तैमणिरत्नविभूषितै:,उस आश्रमके चारों ओर विचित्र मणिमय तोरणोंसे सुशोभित, मोतीकी झालरोंसे अलंकृत तथा मणि एवं रत्नोंसे विभूषित सुन्दर भवन शोभा पा रहे थे। वे मनको मोह लेनेवाले तथा दृष्टिको बरबस अपनी ओर आकृष्ट कर लेनेवाले थे। उन मंगलमय भवनोंसे घिरा और ऋषि-मुनियोंसे भरा हुआ वह आश्रम बड़ा मनोहर जान पड़ता था
Bhishma berkata—di sekeliling pertapaan itu berdiri berbagai macam bangunan indah; gerbang-gerbangnya dihiasi permata yang menakjubkan, tergantung untaian mutiara laksana jala, dan diperkaya oleh ratna serta permata berharga. Bangunan-bangunan yang membawa berkah itu memikat hati dan pandangan, seakan menarik mata dengan paksa. Dikepung oleh bangunan suci demikian dan dipenuhi para ṛṣi serta muni, āśrama itu tampak amat menawan.
Verse 65
मनोदृष्टिहरै रम्यै: सर्वतः संवृतं शुभै: । ऋषिभिश्चावृतं तत्र आश्रमं तं मनोहरम्,उस आश्रमके चारों ओर विचित्र मणिमय तोरणोंसे सुशोभित, मोतीकी झालरोंसे अलंकृत तथा मणि एवं रत्नोंसे विभूषित सुन्दर भवन शोभा पा रहे थे। वे मनको मोह लेनेवाले तथा दृष्टिको बरबस अपनी ओर आकृष्ट कर लेनेवाले थे। उन मंगलमय भवनोंसे घिरा और ऋषि-मुनियोंसे भरा हुआ वह आश्रम बड़ा मनोहर जान पड़ता था
Bhishma berkata—āśrama itu dikelilingi dari segala sisi oleh bangunan-bangunan yang elok dan membawa berkah, yang memikat hati serta pandangan. Dipenuhi pula oleh para ṛṣi, pertapaan itu tampak amat indah dan menenteramkan.
Verse 66
ततस्तस्या भवच्चिन्ता कुत्र वासो भवेदिति । अथ द्वारं समभितो गत्वा स्थित्वा ततो<ब्रवीत्,वहाँ पहुँचकर अष्टावक्रके मनमें यह चिन्ता हुई कि अब कहाँ ठहरा जाय। यह विचार उठते ही वे प्रमुख द्वारके समीप गये और खड़े होकर बोले--
Lalu timbul kegelisahan dalam benaknya: “Di manakah aku harus tinggal sekarang?” Begitu pikiran itu muncul, ia mendekati gerbang utama, berdiri di sana, lalu berbicara.
Verse 67
अतिथिं समनुप्राप्तमभिजानन्तु येजत्र वै । अथ कन्या: परिवृता गृहात् तस्माद् विनिर्गता:,“इस घरमें जो लोग रहते हों, उन्हें यह विदित होना चाहिये कि मैं एक अतिथि यहाँ आया हूँ।” उनके इस प्रकार कहते ही उस घरसे एक साथ सात कन्याएँ निकलीं। वे सब- की-सब भिन्न-भिन्न रूपवाली तथा बड़ी मनोहर थीं। विभो! अष्टावक्र मुनि उनमेंसे जिस- जिस कनन््याकी ओर देखते, वही-वही उनका मन हर लेती थी
“Biarlah orang-orang yang tinggal di rumah ini mengetahui bahwa seorang atithi telah datang.” Begitu ia berkata demikian, tujuh gadis keluar bersama-sama dari rumah itu.
Verse 68
नानारूपा: सप्त विभो कन्या: सर्वा मनोहरा: । यां यामपश्यत् कनन््यां वै सा सा तस्य मनो5हरत्,“इस घरमें जो लोग रहते हों, उन्हें यह विदित होना चाहिये कि मैं एक अतिथि यहाँ आया हूँ।” उनके इस प्रकार कहते ही उस घरसे एक साथ सात कन्याएँ निकलीं। वे सब- की-सब भिन्न-भिन्न रूपवाली तथा बड़ी मनोहर थीं। विभो! अष्टावक्र मुनि उनमेंसे जिस- जिस कनन््याकी ओर देखते, वही-वही उनका मन हर लेती थी
Wahai yang perkasa, ketujuh gadis itu beraneka rupa dan semuanya memikat. Gadis mana pun yang dipandang resi Aṣṭāvakra, gadis itulah yang seketika mencuri hatinya.
Verse 69
न च शक्तो वारयितुं मनो5स्याथावसीदति । ततो धृति: समुत्पन्ना तस्य विप्रस्यथ धीमत:,वे अपने मनको रोक नहीं पाते थे। बलपूर्वक रोकनेपर उनका मन शिथिल होता जाता था। तदनन्तर उन बुद्धिमान् ब्राह्मणके हृदयमें किसी तरह धैर्य उत्पन्न हुआ
Ia tidak mampu menahan pikirannya sendiri; dan ketika ia mencoba menekannya dengan paksa, pikirannya justru makin lemah dan murung. Lalu, entah bagaimana, keteguhan muncul dalam hati Brahmana yang bijaksana itu.
Verse 70
अथ तं प्रमदाः प्राहुर्भगवान् प्रविशत्विति । स च तासां सुरूपाणां तस्यैव भवनस्य हि
Kemudian para wanita itu berkata kepadanya, “Wahai Bhagavan, silakan masuk.” Dan ia pun, bersama para wanita yang elok rupa itu, memasuki rumah itu juga.
Verse 71
तत्रापश्यज्जरायुक्तामरजो<म्बरधारिणीम्
Di sana ia melihatnya—ditandai oleh usia tua, namun mengenakan busana yang bersih tanpa noda dan debu.
Verse 72
स्वस्तीति तेन चैवोक्ता सा स्त्री प्रत्यवदत् तदा
Ketika ia menyapanya dengan salam keberkahan “svasti”, perempuan itu pun saat itu juga menjawabnya kembali.
Verse 73
सअद्टावक्र उवाच सर्वा: स्वानालयान् यान्तु एका मामुपतिष्ठतु
Aṣṭāvakra berkata: “Biarlah semua kembali ke kediaman masing-masing; biarlah satu orang tinggal di sini dan melayani aku.”
Verse 74
ततः प्रदक्षिणीकृत्य कन्यास्तास्तमृषिं तदा
Kemudian para gadis itu mengelilingi sang resi dengan hormat (pradakṣiṇā), sesuai tata laku yang patut.
Verse 75
अथ तां संविशन् प्राह शयने भास्वरे तदा
Lalu, ketika ia berbaring di dipan yang bercahaya, ia berbicara kepadanya—membuka suasana bagi wejangan dalam ketenangan.
Verse 76
संलापात् तेन विप्रेण तथा सा तत्र भाषिता
Melalui percakapan dengan brahmana itu, ia pun berbicara di sana dengan cara yang sama—menjawab setimpal seiring dialog itu mengalir.
Verse 77
अथ सा वेपमानाड्ी निमित्तं शीतजं तदा,थोड़ी ही देरमें वह सरदी लगनेका बहाना करके थरथर काँपती हुई आयी और महर्षिकी शय्यापर आरूढ़ हो गयी। पास आनेपर भगवान् अष्टावक्रने “आइये, स्वागत है' ऐसा कहकर उसके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया
Lalu ia, dengan dalih terserang dingin, datang dalam waktu singkat sambil menggigil dan naik ke dipan sang resi. Ketika ia mendekat, Bhagawan Aṣṭāvakra menyapanya, “Datanglah, selamat datang,” dan memperlihatkan penghormatan yang semestinya.
Verse 78
व्यपदिश्य महर्षेवँ शयनं व्यवरोहत । स्वागतेनागतां तां तु भगवानभ्यभाषत,थोड़ी ही देरमें वह सरदी लगनेका बहाना करके थरथर काँपती हुई आयी और महर्षिकी शय्यापर आरूढ़ हो गयी। पास आनेपर भगवान् अष्टावक्रने “आइये, स्वागत है' ऐसा कहकर उसके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया
Dengan menjadikan sang resi sebagai alasan, ia naik ke pembaringan itu; dan ketika ia datang, Bhagawan menyapanya dengan, “Selamat datang.”
Verse 79
सोपागूहद् भुजाभ्यां तु ऋषिं प्रीत्या नरर्षभ । निर्विकारमृषिं चापि काष्ठकुड्योपमं तदा,नरश्रेष्ठस उसने प्रेमपूर्वक दोनों भुजाओंसे ऋषिका आलिंगन कर लिया तो भी उसने देखा, ऋषि अष्टावक्र सूखे काठ और दीवारके समान विकारशून्य हैं
Wahai banteng di antara manusia! Ia memeluk sang resi dengan kedua lengannya karena kasih; namun tetap ia melihat resi itu tak berubah sedikit pun—laksana kayu kering atau dinding, tanpa reaksi lahiriah.
Verse 80
दुःखिता प्रेक्ष्य संजल्पमकार्षीदृषिणा सह । ब्रह्मन्नकामतो<न्यास्ति स्त्रीणां पुरुषतो धृति:
Melihatnya bersedih, ia berkata sambil bermusyawarah dengan sang resi: “Wahai Brahmana, keteguhan hati perempuan tidak berdiri sendiri terlepas dari kehendak laki-laki; tekad mereka dipaksa oleh kehendak laki-laki.”
Verse 81
कामेन मोहिता चाहं त्वां भजन्तीं भजस्व माम् | प्रह्द्ो भव विप्रर्षे समागच्छ मया सह
Dikuasai nafsu, aku pun menjadi terkelabui. Karena engkau berbakti kepadaku, maka berbaktilah kepadaku pula sebagai balasan. Wahai brahmarṣi, bergembiralah dan bersatulah denganku.
Verse 82
उनकी ऐसी स्थिति देख वह बहुत दुखी हो गयी और मुनिसे इस प्रकार बोली --“ब्रह्मन! पुरुषको अपने समीप पाकर उसके काम-व्यवहारको छोड़कर और किसी बातसे स्त्रीको धैर्य नहीं रहता। मैं कामसे मोहित होकर आपकी सेवामें आयी हूँ। आप मुझे स्वीकार कीजिये। ब्रह्मर्ष! आप प्रसन्न हों और मेरे साथ समागम करें ।। उपगूह च मां विप्र कामार्ताहं भृशं त्वयि । एतद्धि तव धर्मात्मंस्तपस: पूज्यते फलम्,“विप्रवर! आप मेरा आलिंगन कीजिये। मैं आपके प्रति अत्यन्त कामातुर हूँ। धर्मात्मन्! यही आपकी तपस्याका प्रशस्त फल है
Melihat keadaannya, ia sangat berduka dan berkata kepada sang muni: “Wahai brāhmaṇa, bila seorang lelaki berada dekat, seorang perempuan tak lagi mampu meneguhkan hati pada hal lain, selain pada tingkah laku dan pergaulannya. Terpedaya oleh nafsu, aku datang untuk melayanimu—terimalah aku. Wahai brahmarṣi, berkenanlah dan bersatulah denganku. Peluklah aku, wahai yang terbaik di antara brāhmaṇa; aku sangat tersiksa oleh hasrat kepadamu. Wahai yang berpegang pada dharma, inilah yang disebut ‘buah’ mulia dari tapa-pertapaanmu.”
Verse 83
प्रार्थितं दर्शनादेव भजमानां भजस्व माम् | मम चेदं धनं सर्व यच्चान्यदपि पश्यसि,“मैं आपको देखते ही आपके प्रति अनुरक्त हो गयी हूँ; अतः आप मुझ सेविकाको अपनाइये। मेरा यह सारा धन तथा और जो कुछ आप देख रहे हैं, उस सबके तथा मेरे भी आप ही स्वामी हैं--इसमें संशय नहीं है। आप मेरे साथ रमण कीजिये। मैं आपकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करूँगी
Sejak saat pertama melihatmu, aku tertarik kepadamu; maka terimalah aku yang datang memuja dan memohon. Seluruh hartaku ini, dan apa pun yang kau lihat di sini, adalah milikmu semata—bahkan aku pun, tanpa ragu, adalah milikmu. Berkasihlah denganku; akan kupenuhi segala keinginanmu.
Verse 84
प्रभुस्त्वं भव सर्वत्र मयि चैव न संशय: । सर्वान् कामान् विधास्यामि रमस्व सहितो मया,“मैं आपको देखते ही आपके प्रति अनुरक्त हो गयी हूँ; अतः आप मुझ सेविकाको अपनाइये। मेरा यह सारा धन तथा और जो कुछ आप देख रहे हैं, उस सबके तथा मेरे भी आप ही स्वामी हैं--इसमें संशय नहीं है। आप मेरे साथ रमण कीजिये। मैं आपकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करूँगी
Jadilah tuan atas segala sesuatu—atas diriku pun; jangan ragu. Berbahagialah bersamaku; akan kupenuhi semua keinginanmu.
Verse 85
रमणीये वने विप्र सर्वकामफलप्रदे । त्वद्वशाहं भविष्यामि रंस्यसे च मया सह,“ब्रह्मन्! सम्पूर्ण मनोवाज्छित फलको देनेवाले इस रमणीय वनमें मैं आपके अधीन होकर रहूँगी। आप मेरे साथ रमण कीजिये
Wahai brāhmaṇa, di hutan elok yang menganugerahkan buah bagi setiap hasrat ini, aku akan berada di bawah kuasamu. Bersenang-senanglah bersamaku.
Verse 86
सर्वान् कामानुपाश्रीमो ये दिव्या ये च मानुषा: । नात: परं हि नारीणां विद्यते च कदाचन
Aṣṭāvakra said: “We resort to and seek the fulfillment of all desires—whether heavenly or human. Indeed, for women there is nothing beyond this; at no time is anything higher found.”
Verse 87
यथा पुरुषसंसर्ग: परमेतद्धि न: फलम् । “हमलोग यहाँ दिव्य और मनुष्यलोक-सम्बन्धी सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करेंगे। स्त्रियोंके लिये पुरुषसंसर्ग जितना प्रिय है, उससे बढ़कर दूसरा कोई फल कदापि प्रिय नहीं होता। यही हमारे लिये सर्वोत्तम फल है ।। आत्मच्छन्देन वर्तन्ते नायों मन्मथचोदिता:
Ashtavakra said: “For us, the highest ‘fruit’ is association with men. Here we shall enjoy every pleasure—both divine and those connected with the human world. For women, nothing is ever dearer as a reward than union with a man; no other result can surpass it in desirability. This alone is our सर्वोत्तम gain. Women act according to their own inclination, driven by the impulse of desire.”
Verse 88
न च दहान्ति गच्छन्त्य: सुतप्तैरपि पांसुभि: । “कामसे प्रेरित हुई नारियाँ सदा अपनी इच्छाके अनुसार बर्ताव करती हैं। कामसे संतप्त होनेपर वे तपी हुई धूलमें भी चलती हैं; परंतु इससे उनके पैर नहीं जलते हैं” || ८७ >॥ अष्टावक्र उवाच परदारानहं भद्रे न गच्छेयं कथंचन
Verse 89
भद्रे निर्वेष्टकामं मां विद्धि सत्येन वै शपे
O noble lady, know me to be one whose desires are unentangled and free; by truth itself I swear this to you.
Verse 90
विषयेष्वनभिशज्ञो5हं धर्मार्थ किल संतति: । एवं लोकान् गमिष्यामि पुत्रैरिति न संशय:
Aṣṭāvakra said: “I am not one who is skilled in, or entangled with, sense-objects; rather, my ‘offspring’ is said to be dharma and artha. Thus I shall attain the higher worlds—through ‘sons’ of this kind—of this there is no doubt.”
Verse 91
भद्रे धर्म विजानीहि ज्ञात्वा चोपरमस्व ह । भद्रे! मैं सत्यकी सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि एक मनोनीत मुनिकुमारीके साथ विवाह करना चाहता हूँ। तुम इसे ठीक समझो। मैं विषयोंसे अनभिज्ञ हूँ। केवल धर्मके लिये संतानकी प्राप्ति मुझे अभीष्ट है; अतः यही मेरे विवाहका उद्देश्य है। ऐसा होनेपर मैं पुत्रोंद्वारा अभीष्ट लोकोंमें जाऊँगा। इसमें संशय नहीं है। भद्रे! तुम धर्मको समझो और उसे समझकर इस स्वेच्छाचारसे निवृत्त हो जाओ ।। ८९-९० $ ।। रूयुवाच नानिलोडउग्निर्न वरुणो न चान्ये त्रिदशा द्विज
Aṣṭāvakra berkata: “Wahai wanita lembut, pahamilah dharma sebagaimana adanya; dan setelah memahaminya, hentikanlah jalan yang kau tempuh atas kehendak sendiri ini.”
Verse 92
प्रिया: स्त्रीणां यथा कामो रतिशीला हि योषित: । सहस्रे किल नारीणां प्राप्पेतेका कदाचन
Aṣṭāvakra berkata: “Sebagaimana hasrat itu dicintai oleh para wanita, dan wanita pada tabiatnya condong pada cinta dan keintiman, demikian pula—di antara ribuan wanita—kadang-kadang hanya satu yang sungguh-sungguh diperoleh, sebagai pendamping yang langka.”
Verse 93
तथा शतसहस्रेषु यदि काचित् पतिव्रता । स्त्री बोली--ब्रह्मन! वायु, अग्नि, वरुण तथा अन्य देवता भी स्त्रियोंको वैसे प्रिय नहीं हैं, जैसा उन्हें काम प्रिय लगता है; क्योंकि स्त्रियाँ स्वभावत: रतिकी इच्छुक होती हैं। सहस्रों नारियोंमें कभी कोई एक ऐसी स्त्री मिलती है जो रतिलोलुप न हो तथा लाखों स्त्रियोंमें शायद ही कोई एक पतिव्रता मिल सके ।। ९१-९२ $ ।। नैता जानन्ति पितरं न कुलं न च मातरम्
Aṣṭāvakra berkata: “Demikian pula, di antara ratusan ribu, bila ada satu saja istri yang sungguh setia kepada suaminya, ia amat langka.”
Verse 94
न भ्रातृनू न च भर्तारें न च पुत्रान् न देवरान् । लीलायन्त्य: कुलं घ्नन्ति कूलानीव सरिद्वरा: । दोषान् सर्वाश्न मत्वा55शु प्रजापतिरभाषत
“Mereka tidak menyisakan saudara, tidak pula suami, tidak anak, tidak ipar. Seakan bermain-main, mereka menghancurkan sebuah keluarga—seperti sungai besar menggerus tebingnya. Melihat sepenuhnya semua cela itu, Prajāpati pun segera bersabda.”
Verse 95
ये स्त्रियाँ न पिताको जानती हैं न माताको, न कुलको समझती हैं न भाइयोंको। पति, पुत्र तथा देवरोंकी भी ये परवाह नहीं करती हैं। अपने लिये रतिकी इच्छा रखकर ये समस्त कुलकी मर्यादाका नाश कर डालती हैं, ठीक उसी तरह जैसे बड़ी-बड़ी नदियाँ अपने तटोंको ही तोड़-फोड़ देती हैं। इन सब दोषोंको समझकर ही प्रजापतिने स्त्रियोंके विषयमें उपर्युक्त बातें कही हैं ।। भीष्म उवाच ततः स ऋषिरेकाग्रस्तां स्त्रियं प्रत्यभाषत । आस्यतां रुचितश्छन्द: कि च कार्य ब्रवीहि मे,भीष्मजी कहते हैं--राजन! तब ऋषिने एकाग्रचित्त होकर उस स्त्रीसे कहा--“चुप रहो। मनमें भोगकी रुचि होनेपर स्वेच्छाचार होता है। मेरी रुचि नहीं है, अतः मुझसे यह काम नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त यदि मुझसे कोई काम हो तो बताओ'
Bhishma berkata: “Kemudian sang resi, dengan batin yang teguh terpusat, berkata kepada wanita itu: ‘Diamlah. Bila pikiran condong pada kenikmatan, orang bertindak semaunya. Aku tidak memiliki kecenderungan itu; karena itu perbuatan ini tidak dapat kulakukan. Jika ada tugas lain yang kau kehendaki dariku, katakanlah.’”
Verse 96
सा स्त्री प्रोवाच भगवन् द्रक्ष्य्से देशकालत: । वस तावन्महाभाग कृतकृत्यो भविष्यसि,उस स्त्रीने कहा--“भगवन्! महाभाग! देश और कालके अनुसार आपको अनुभव हो जायगा। आप यहाँ रहिये, कृतकृत्य हो जाइयेगा”
Perempuan itu berkata, “Wahai Bhagavan, wahai yang mulia: menurut tempat dan waktu, engkau akan mengetahuinya sendiri. Tinggallah di sini untuk sementara; engkau akan menjadi seseorang yang telah menuntaskan tujuan.”
Verse 97
ब्रह्मर्षिस्तामथोवाच स तथेति युधिष्छिर । वत्स्येडहं यावदुत्साहो भवत्या नात्र संशय:,युधिष्ठिर! तब ब्रह्मर्षिनी उससे कहा--“ठीक है, जबतक मेरे मनमें यहाँ रहनेका उत्साह होगा तबतक आपके साथ रहूँगा, इसमें संशय नहीं है”
Bhīṣma berkata: Lalu sang Brahmarṣi berkata kepadanya, “Demikianlah.” “Wahai Yudhiṣṭhira, selama tekad dan semangat untuk tinggal di sini masih bertahan dalam diriku, selama itu pula aku akan menetap bersamamu; tiada keraguan akan hal ini.”
Verse 98
अथर्षिरभिसप्प्रेक्ष्य स्त्रियं तां जरयार्दिताम् । चिन्तां परमिकां भेजे संतप्त इव चाभवत्,इसके बाद ऋषि उस स्त्रीको जरावस्थासे पीड़ित देख बड़ी चिन्तामें पड़ गये और संतप्त-से हो उठे
Bhīṣma berkata: Kemudian sang resi, melihat perempuan itu dirundung usia tua, diliputi kegelisahan yang amat dalam, dan tampak seakan terbakar oleh duka di dalam batin.
Verse 99
यद् यदज्ूं हि सो5पश्यत् तस्या विप्रर्षभस्तदा । नारमत् तत्र तत्रास्य दृष्टी रूपविरागिता,विप्रवर अष्टावक्र उसका जो-जो अंग देखते थे वहाँ-वहाँ उनकी दृष्टि रमती नहीं थी, अपितु उसके रूपसे विरक्त हो उठती थी
Bhīṣma berkata: “Bagian demi bagian dari tubuhnya yang dilihat oleh sang brahmana utama saat itu, pandangannya tak menemukan kenikmatan; sebaliknya, ia berpaling dengan sikap vairāgya dari keelokan lahiriah.”
Verse 100
देवतेयं गृहस्यास्य शापात् कि नु विरूपिता । अस्याश्न कारण वेत्तुं न युक्ते सहसा मया,वे सोचने लगे “यह नारी तो इस घरकी अधिष्ठात्री देवी है। फिर इसे इतना कुरूप किसने बना दिया? इसकी कुरूपताका कारण क्या है? इसे किसीका शाप तो नहीं लग गया। इसकी कुरूपताका कारण जाननेके लिये सहसा चेष्टा करना मेरे लिये उचित नहीं है!
Bhīṣma berkata: “Perempuan ini adalah dewi pelindung (adhiṣṭhātrī-devī) rumah tangga ini. Mengapa ia menjadi begitu buruk rupa—apakah suatu kutuk menimpanya? Namun tidak patut bagiku tergesa-gesa menyelidiki sebab keburukannya.”
Verse 101
इति चिन्ताविविक्तस्य तमर्थ ज्ञातुमिच्छत: । व्यगच्छत् तदहः:शेषं मनसा व्याकुलेन तु
Demikianlah, ketika ia duduk menyendiri, tenggelam dalam renungan cemas dan ingin memahami perkara itu, sisa hari itu pun berlalu—namun batinnya tetap gelisah.
Verse 102
इस प्रकार व्याकुल चित्तसे एकान्तमें बैठकर चिन्ता करते और उसकी कुरूपताका कारण जाननेकी इच्छा रखते हुए महर्षिका वह सारा दिन बीत चला ।। अथ सा स्त्री तथोवाच भगवन् पश्य वै रवे: । रूप॑ संध्याभ्रसंरक्ते किमुपस्थाप्यतां तव,तब उस स्त्रीने कहा--“भगवन्! देखिये, सूर्यका रूप संध्याकी लालीसे लाल हो गया है। इस समय आपके लिये कौन-सी वस्तु प्रस्तुत की जाय?”
Lalu perempuan itu berkata, “Wahai Bhagawan, lihatlah—wajah matahari memerah oleh awan senja. Pada saat ini, apakah yang harus kupersembahkan untukmu?”
Verse 103
स उवाच ततत्तां स्त्री स्नानोदकमिहानय । उपासिष्ये ततः संध्यां वाग्यतो नियतेन्द्रिय:,तब ऋषिने उस स्त्रीसे कहा--'मेरे नहानेके लिये यहाँ जल ले आओ। स्नानके पश्चात् मैं मौन होकर इन्द्रियसंयमपूर्वक संध्योपासना करूँगा”
Ia berkata kepada perempuan itu, “Bawakan ke sini air untuk mandiku. Setelah mandi, aku akan melakukan sandhyā-upāsanā dengan menahan ucapan dan mengekang indria.”
Verse 573
रमणीयैर्वनोद्देशैस्तत्र तत्र विभूषितम् । आगे जानेपर उन्हें एक दूसरी रमणीय वनस्थली दिखायी दी, जो सभी ऋतुओंके फल- मूलों, पक्षिसमूहों और मनोरम वनप्रान्तोंसे जहाँ-तहाँ शोभासम्पन्न हो रही थी
Tempat itu dihiasi di sana-sini oleh hamparan hutan yang elok menawan.
Verse 706
कौतूहलं समाविष्ट: प्रविवेश गृहं द्विज: । तत्पश्चात् वे सातों तरुणी स्त्रियाँ बोलीं--/भगवन्! आप घरके भीतर प्रवेश करें।' ऋषिके मनमें उन सुन्दरियोंके तथा उस घरके विषयमें कौतूहल पैदा हो गया था; अतः उन्होंने उस घरमें प्रवेश किया
Dikuasai rasa ingin tahu, sang brahmana pun memasuki rumah itu.
Verse 713
वृद्धां पर्यककमासीनां सर्वाभरणभूषिताम् । वहाँ उन्होंने एक जराजीर्ण वृद्धा स्त्रीको देखा, जो निर्मल वस्त्र धारण किये समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो पलँगपर बैठी हुई थी
Di sana ia melihat seorang perempuan tua yang telah dilapukkan usia, duduk di atas ranjang, mengenakan pakaian yang bersih tanpa noda dan berhias dengan segala macam perhiasan.
Verse 723
प्रत्युत्थाय च त॑ं विप्रमास्यतामित्युवाच ह । अष्टावक्रने 'स्वस्ति” कहकर उसे आशीर्वाद दिया। वह स्त्री उनके स्वागतके लिये पलँगसे उठकर खड़ी हो गयी और इस प्रकार बोली--“विप्रवर! बैठिये”
Ia bangkit dari dipan untuk menyambut sang brahmana dan berkata dengan hormat, “Wahai brahmana utama, silakan duduk.” Aṣṭāvakra mengucap “svasti” dan menganugerahinya berkat.
Verse 733
प्रज्ञाता या प्रशान्ता या शेषा गच्छन्तु च्छन्दत: । अष्टावक्रने कहा--'सारी स्त्रियाँ अपने-अपने घरको चली जायाँ। केवल एक ही मेरे पास रह जाय। जो ज्ञानवती तथा मन और इन्द्रियोंको शान्त रखनेवाली हो, उसीको यहाँ रहना चाहिये। शेष स्त्रियाँ अपनी इच्छाके अनुसार जा सकती हैं”
Aṣṭāvakra berkata, “Biarlah semua perempuan kembali ke rumah masing-masing. Hanya satu yang tinggal di sisiku—dia yang berdaya budi dan batinnya tenteram, yang mampu mengekang pikiran serta indria. Yang lain boleh pergi sesuka hati.”
Verse 746
निश्चक्रमुर्गृहात् तस्मात् सा वृद्धाथ व्यतिष्ठत । तदनन्तर वे सब कनन््याएँ उस समय ऋषिकी परिक्रमा करके उस घरसे निकल गयीं। केवल वह वृद्धा ही वहाँ ठहरी रही
Sesudah itu semua gadis mengitari sang resi dengan hormat lalu keluar dari rumah itu; hanya perempuan tua itu yang tetap tinggal di sana.
Verse 756
त्वयापि सुप्यतां भद्ने रजनी ह्ूतिवर्तते । तत्पश्चात् उज्ज्वल एवं प्रकाशमान शय्यापर सोते हुए ऋषिने उस वृद्धासे कहा--“भद्रे! अब तुम भी सो जाओ। रात अधिक बीत चली है'
Kemudian sang resi, berbaring di ranjang yang terang dan berkilau, berkata kepada perempuan tua itu, “Wahai ibu yang lembut, engkau pun tidurlah; malam telah jauh berlalu.”
Verse 763
द्वितीये शयने दिव्ये संविवेश महाप्रभे । बातचीतके प्रसड़में उस ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर वह भी दूसरे अत्यन्त प्रकाशमान दिव्य पलँगपर सो रही
Kemudian, dalam suasana yang mulia itu, ia berbaring di dipan ilahi yang kedua—cemerlang dan bercahaya—sebagai lambang kehormatan dan keramahtamahan, menunjukkan bagaimana seorang tamu patut disambut dengan martabat dan perhatian.
Verse 886
दूषितं धर्मशास्त्रजै: परदाराभिमर्शनम् | अष्टावक्र बोले--भद्रे! मैं परायी स्त्रीके साथ किसी तरह संसर्ग नहीं कर सकता; क्योंकि धर्मशास्त्रके विद्वानोंने परस्त्रीसमागमकी निन््दा की है
Aṣṭāvakra berkata: “Wahai bhadre, berhubungan dengan istri orang lain dinyatakan tercela dan ternoda oleh para ahli Dharmaśāstra; karena itu aku sama sekali tidak dapat melakukan pergaulan semacam itu.”
A situation of intimate hospitality (massage, bathing, bed-preparation) becomes a test of propriety: whether the sage will permit sexual engagement, and how dharma is argued when one party asserts autonomy while the other invokes restrictive social norms.
The chapter models dhṛti as a practiced capacity: comfort, time-disorientation, and persuasion do not negate ethical agency; restraint is portrayed as a deliberate method for preventing harm and preserving vowed conduct.
No explicit phalaśruti is stated in the provided verses; the chapter functions instead as an exemplum within Bhīṣma’s instruction, where interpretive weight lies in the dialogue’s normative claims and the sage’s maintained restraint.