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यह सोपान ‘त्याग-धर्म’ का द्वार है—राज्य, सुख, और लोक-प्रतिष्ठा का स्वेच्छा-परित्याग करके ‘राम-आज्ञा’ को परम सत्य मानना। अयोध्या काण्ड में भक्ति का परिपाक करुण-रस के द्वारा होता है: वियोग, पछितावा, और लोक-हृदय का द्रवण—ये सब साधक को ‘गृह-आसक्ति’ से ‘वन-मार्ग’ (अन्तर्मार्ग) की ओर मोड़ते हैं। यहाँ राम का बनगमन केवल कथा-घटना नहीं; यह जीव का अहं-त्याग और ईश्वर-आदेश-स्वीकृति है—सीढ़ी का वह चरण जहाँ श्रद्धा ‘अनुभव-भक्ति’ बनती है।
アヨーディヤ・カाण्डの रसの中心は悲哀である。されどそれは絶望ではなく、離欲を産む悲哀である。本段(およそドーハー110–119)では、「世の群衆」がラーマ・シーター・ラクシュマナの拝観に身震いして歓喜する。家の務めも忘れ、眼は「眼の果(nayana-phala)」を得る——共同体的信愛の高まりである。 やがて物語は反転する。人々は王妃や王を責め、運命を無慈悲と言う。この人間的反応に、トゥルシーの心理描写の巧みがある。しかしこの揺らぎから原理が立ち上がる。ラーマの出家(森への旅立ち)は「命令遵守(ājñā-pālana)」と「法に定まる智慧(dharma-sthitaprajñatā)」の典型である。ここで有相の美の戯れ(姿の甘美)と、無相の真(命令・規範・離欲)が同一の軸に結ばれる。この階梯で修行者は学ぶ。愛の極致とは「別離においてすら命令に全託すること」である。
Verse 225 (चौपाई)
सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी।। लखन राम सिय सुन्दरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई।। अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं।। जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने।। सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई।। सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं।। तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेजपुंज लघुबयस सुहावा।। कवि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी।।
これを聞いて、森の集落の男たちと女たちは走って来た、自分たちの仕事を忘れて。ラクシュマナ、ラーマ、シーターの美しさを見て、彼らは自分たちの運命を偉大だと数えた。大きな憧れが彼らの心を満たしたが、名前や村を尋ねるのを恥じらった。その中に非常に賢く巧みな者たちがいた。彼らの工夫によってラーマを認めた。彼らはすべての物語を語った、父の命令を得て森に行ったことを。それをすべて聞いて、彼らは皆悲しみ、悔やんだ、王妃たちと王が間違ったことをしたと言った。その時、ある苦行者がやって来た、輝きに満ち、若く美しかった。その道は詩人にのみ知られ、世を捨てた者であった。心、行い、言葉においてラーマに帰依していた。
Verse 226 (दोहा/सोरठा)
सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि। परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि।।110।।
涙に満ちた目で、体は歓喜に震え、彼は自分の選んだ神を認めた。そして杖のように地に倒れた、その状態は言葉では言い表せなかった。
Verse 227 (चौपाई)
राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा।। मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरे तन कह सबु कोऊ।। बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा। लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा।। पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा।। कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही।। पिअत नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा।। ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।। राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी।।
ラーマは愛を込めて彼を抱きしめた、心は喜びに震えた、最高の貧者が賢者の石を得たかのようであった。まるで愛そのものと最高の善が一つであるかのようであった。彼らが出会うと、抱きしめ合い、皆がそれを語った。それからラクシュマナは彼の足元にひれ伏した。愛をもって彼を抱き起こし、ラーマは彼を立ち上がらせた。それからシーターは彼の足の塵を頭に乗せた。母として彼女を知り、彼は彼女に祝福を与えた。ニシャーダは彼に拝礼した。ラーマの愛情を見て、彼は喜びに満ちた。その美しさを蜜のように飲み込み、彼は喜んだ、飢えた者が良い食事を得るように。あの両親は、友よ、どのような人たちだろうか、このような子供たちを森に送ったとは。ラーマ、ラクシュマナ、シーターの美しさを見て、男も女も愛に圧倒された。
Verse 228 (दोहा/सोरठा)
तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह। राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेंइँ कीन्ह।।111।।
それからラグフの主は多くの方法で友に教えを与えた。そしてラーマの命令を頭に戴き、彼は家へと向かった。
Verse 229 (चौपाई)
पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी।। चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई।। पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता।। राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारें।। मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ।। अगमु पंथ गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी।। करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहि जो आयसु होई।। जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई।।
それからシーター、ラーマ、ラクシュマナは手を合わせ、再びヤムナーに拝礼した。シーターの二人の兄弟は喜んで出発した、太陽の娘を讃えた。多くの旅人が道で彼らに出会い、二人の兄弟を見て愛を込めて語った。「ラクシュマナ王子、あなたのすべての肢体を見て、私たちの心に大きな悲しみが満ちます。道を注意して歩いてください、一歩一歩。占星術師たちは私たちの目には偽りとなりました。道は通行困難で、大きな山々と密林があります。そしてあなたがたにはか弱い女性が同行しています。あの恐ろしい森に誰が行けるでしょうか。もし許されるなら、私たちはあなたがたと一緒に行きます。私たちはできる限りあなたがたを送り届け、それから戻り、あなたがたに頭を下げます。」
Verse 230 (दोहा/सोरठा)
एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन। कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन।।112।।
このように彼らは尋ねた、愛に圧倒され、体は震え、目は涙で満ちていた。慈悲の海は彼らに向き直り、穏やかで謙虚な言葉を語った。
Verse 231 (चौपाई)
जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं।। केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए।। जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावति नाहीं।। पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी।। जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि।। जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं।। जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई।। परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा।।
道沿いの町や村に住む人々を、神々は天上の都の市民として讃える。ある功徳ある時代に彼らはこれらの家に住まわされた。彼らは祝福されている、功徳に満ち、非常に美しい。ラーマの足が歩くところどこでも、そこに等しい場所はない、アマラーヴァティーさえも。道沿いに住む人々、功徳の山である彼らを、天の都の住人は讃える。ラーマを、シーターとラクシュマナと共に、雲のように黒い姿を、愛に満ちた目で見る人々は祝福されている。ラーマが沐浴する湖や川を、神々は神聖な湖や川として讃える。主が座る木の下で、その木を願を叶える木として讃える。ラーマの蓮の足の花粉に触れて、大地は自らを大いに祝福されたと考える。
Verse 232 (दोहा/सोरठा)
छाँह करहि घन बिबुधगन बरषहि सुमन सिहाहिं। देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं।।113।।
雲は影を落とし、神々の群れは花を降らせ、彼らを讃える。ラーマが道を歩くのを見て、山々、森、鳥、鹿は驚きのまなざしで見つめる。
Verse 233 (चौपाई)
सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई।। सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृहकाजु बिसारी।। राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयनफलु होहिं सुखारी।। सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा।। बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी।। एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं।। रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे।। एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी।।
ラグフの主がシーターとラクシュマナを伴い、村の近くを通り過ぎようとされたとき、これを聞いてすべての子供たち、老人、そして女性たちは家の仕事を忘れ、すぐに駆けつけた。ラーマ、ラクシュマナ、シーターの美しさを眺め、彼らは視覚の実を得て喜びに満たされた。彼らの目は潤み、体は鳥肌で震えた。二人の英雄を見て、すべての人が心奪われた。彼らの状態は言葉で表せない。貧しい人が天界の宝石の山を得たかのようであった。一人がもう一人を呼んで言った。「あなたの目の宝を取りなさい、この瞬間に取りなさい。」ラーマを見て、ある者たちは愛に満たされ、彼を見つめながらついて行った。ある者たちは道の美しさを目を通して心に宿し、体も心もリラックスし、美しい言葉を語った。
Verse 234 (दोहा/सोरठा)
एक देखिं बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात। कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात।।114।।
ある者たちはバニヤンの木陰を見て言った。「ここは良い。柔らかな草と葉を敷こう。しばらく休んで疲れを癒やそう。今すぐ行くべきか、それとも朝に行くべきか。」
Verse 235 (चौपाई)
एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी।। सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी।। जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं।। मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा।। एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा।। तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा।। दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के।। मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलिनि धनु तीरा।।
彼らは水を満たした一つの壺を持って来て、優しい言葉で言った。「主よ、どうぞお飲みください。」その愛の言葉を聞いて、慈悲深く極めて高潔なラーマは深い愛情を感じた。シーターが疲れていることを心で知り、彼はバニヤンの木陰で短い休息をとられた。喜んだ女性と男性たちは彼らの美しさを眺めた。比類なき姿は目も心も魅了した。あちこちで彼らは瞬きもせず見つめた。チャコラ鳥がラーマの顔という月を見るように。彼の体は若いタマラの木のように輝いた。彼を見て、何百万ものマダヴァの心が魅了された。ラクシュマナは青い蓮のように暗く、美しく、頭から足元まで愛らしく、魂に喜びを与えた。行者の腰には矢筒が結ばれ、蓮のような手には弓と矢があった。
Verse 236 (दोहा/सोरठा)
जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल। सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल।।115।।
編み髪を冠として頭は愛らしく、胸と腕と目は広かった。美しい顔は秋の月のように輝き、汗の粒の網が彼の上で光った。
Verse 237 (चौपाई)
बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी।। राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई।। थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से।। सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं।। बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ।। राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं। स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी।। राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने।।
私は彼の魅惑的な美しさを描写できない。その輝きは広大で、私の理解は小さいからだ。すべての人は心と精神と思考をラーマ、ラクシュマナ、シーターの美しさに固定して見つめる。愛に渇いた女性と男性たちは疲れることを知らない。鹿が火を見つめるようである。村の女性たちはシーターの近くに寄り、大きな愛情で尋ねるが、恥じらう。何度も何度も彼らの足元にひれ伏し、優しく素朴な言葉を語る。「王女よ、私たちはお願いします。でも彼女は本質的に何かを尋ねるのを恐れる。主よ、私たちの無礼をお許しください。私たちが素朴な者であることを知って、怒らないでください。」二人の王子は自然に優雅である。彼らからエメラルドと金の輝きが放たれる。
Verse 238 (दोहा/सोरठा)
स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन। सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन।।116।।
暗く白く、若く美しく、その美しさは比類がない。秋の夜の主の顔は秋の蓮のようで、その目は蓮の花のようである。
Verse 239 (चौपाई)
कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे।। सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी।। तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचित बरबरनी।। सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी।। सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे।। बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी।। खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि।। भइ मुदित सब ग्रामबधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं।।
「何百万ものマダヴァを恥じ入らせるあなた、美しい顔の方よ、教えてください、あなたと共にいるのは誰ですか。」その愛に満ちた甘い言葉を聞いて、シーターは恥じらい、心の中で微笑んだ。彼らを見て、彼女は地面を見下ろした。二人とも恥じらい、言葉に詰まった。恥じらいと愛に満ち、若い雌鹿のような目で、彼女はオウムのような声で甘い言葉を語った。「本質的に白く体は愛らしく、ラクシュマナは私の義弟の名前です。」再び彼女は月のような顔を衣で覆った。夫の体を見て、眉を曲げた。美しいカワセミのような目で、彼女は自分の夫に彼らについて語った。すべての村の女性たちは喜んだ。王の財宝を略奪したかのようであった。
Verse 240 (दोहा/सोरठा)
अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस। सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस।।117।।
大きな愛を持ってシーターは彼らの足元にひれ伏し、彼らは多くの方法で彼女を祝福した。「地球がその頭の上に留まる限り、あなたが永遠に既婚の女性であり続けますように。」
Verse 241 (चौपाई)
पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू।। पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी।। दरसनु देब जानि निज दासी। लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी।। मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं।। तबहिं लखन रघुबर रुख जानी। पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी।। सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी।। मिटा मोदु मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने।। समुझि करम गति धीरजु कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा।।
「パールヴァティーのように夫に献身的であってください。女神よ、決して私を捨てないでください。」彼女は折り重ねた手で何度も懇願した。「もしあなたが再びこの道を通るなら...」彼が自分の僕であり、彼に会わせてくれることを知り、シーターは彼女が愛に渇いているのを見た。甘い言葉を何度も語り、彼女を喜ばせた。月光が蓮を育むように。それからラクシュマナはラグフの主の気持ちを理解し、人々に優しく道を尋ねた。これを聞いて、女性たちは悲しみに打たれた。体は震え、目から涙が流れた。喜びは消え、心は暗くなった。創造主が富を与えてから奪い取ったかのようであった。運命の道を理解し、彼らは勇気を得た。尋ねて、彼らに容易な道を示した。
Verse 242 (दोहा/सोरठा)
लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ। फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ।।118।।
それからラクシュマナとジャーナキーを伴い、ラグフの主は出発した。彼はすべての愛の言葉を振り返り、心に留めた。
Verse 243 (चौपाई)
फिरत नारि नर अति पछिताहीं। देअहि दोषु देहिं मन माहीं।। सहित बिषाद परसपर कहहीं। बिधि करतब उलटे सब अहहीं।। निपट निरंकुस निठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू।। रूख कलपतरु सागरु खारा। तेहिं पठए बन राजकुमारा।। जौं पे इन्हहि दीन्ह बनबासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू।। ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना।। ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता।। तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा। धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा।।
女たちが引き返すとき、深い悔恨に満たされ、自らを責め、自分の心を責めました。共に悲しみの中で、互いに語り合いました。「創造主の道はすべて逆さまになっております。」彼は全く制御されず、慈悲がなく、恐れを知らぬお方です。月を斑点で満たし、太陽を闇で満たしたのは彼です。願を叶える木を枯れ木とし、海を塩水としました。そのようなお方のもとに、王子たちを森へ送られたのです。流刑を与えられたそのお方に、創造主はすべての楽しみと喜びを享受させました。これらの方々は靴を履かずに道を歩きます。創造主は彼らを造り、様々な乗り物を用意されました。これらの方々は大地に、草や葉の上に横たわります。創造主はいつ彼らのために美しい寝床をお作りになるのでしょうか。彼らに森を住処として与えられました。彼らは白い宮殿を建て、それを作ることに疲れ果てました。
Verse 244 (दोहा/सोरठा)
जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार। बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार।।119।।
もしもこれらの聖者たちが、樹皮をまとい、美しく結い上げた髪を持つ、かくも美しく繊細なお方たちならば、創造主は彼らを多くの方法で装飾と衣装でお作りになったのです。
परम्परा में इस खंड का फल ‘दर्शन-लालसा से भक्ति-वृद्धि’ माना जाता है: राम-सीता-लखन के रूप-स्मरण से चित्त शीतल होता है, गृहासक्ति ढीली पड़ती है, और ‘आज्ञा-पालन’ की दृढ़ता आती है। विशेषतः दोहा 111–113 के भाव (प्रेम, विनय, चरण-पराग) का पाठ ‘सत्संग-रस’ और करुणा-परिष्कार का साधन कहा जाता है।
सामान्य राम-नाम सम्पुट: “श्रीराम जय राम जय जय राम” (या “राम राम” नाम-जप) का प्रयोग अनेक पाठ-परम्पराओं में किया जाता है। वनगमन-प्रसंग में ‘आज्ञा-समर्पण’ भाव बढ़ाने हेतु “रघुपति राघव राजा राम” भजन-धुन भी कुछ सत्संगों में जोड़ी जाती है (स्थानीय परम्परा-आधारित)।
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