Opening the text
त्याग-दीक्षा का सोपान: राजधर्म, गृहधर्म और व्यक्तिगत आसक्ति का परित्याग करके ‘वन-मार्ग’ को ‘अंतर-मार्ग’ बनाना। इस काण्ड में राम का निष्कासन केवल कथा-घटना नहीं, साधक-चित्त का संस्कार है—जहाँ विरह, करुणा, और शरणागति मिलकर ‘भवसागर-तरन’ की तैयारी कराते हैं।
『アヨーディヤー・カーンダ』のこの段(およそドーハー100–109)は、「離別のカルナー」を「バクティの歓喜」へと転化する。追放の痛みはここで巡礼とシャラナーガティ(帰依)の教えとなる。ラーマがガンガー河畔に至ることは、修行者が我執の岸を離れることに等しい。ケーヴァト(渡し守)の逸話では、民衆語の機知の内に深い原理がある。「御足の塵(パダ・ラジ)」を恐れるのは実は愛の慎みであり、「渡し賃(ウタラーイ)」を拒むことは無欲のダースヤの理想である。プラヤーグ描写では、聖地の外的功徳はラーマ・ダルシャンによって内面化される。ティールタパティ(聖地の主)の果は「ラーマとの邂逅」である。バラドヴァージャのアーシュラムでは、苦行・誦念・捨離の意義が「ダルシャンの獲得」によって証される。本巻の階梯は、修行者を儀礼依存から引き出し、ナーマへの依止と一向専心のバクティの安定へと導く。
Verse 204 (चौपाई)
जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें।। बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए।। मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना।। चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई।। छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई।। तरनिउ मुनि घरिनि होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई।। एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू।। जौ प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू।।
彼との別れで獣さえもこれほど取り乱すなら、民衆、母、父はどのように生きるだろうか。ラーマはスーマントラを強いて帰らせ、それから自らスラサリの岸に来た。彼は船を求めたが、船頭は現れなかった。ある者が言った。「私はあなたの秘密を知っています。すべてのものはあなたの蓮の御足の塵にあります。人間として振る舞うことは愚かです。石は触れると美しい女性になった。木は石に比べて硬くはない。渡し舟は女性となり聖者の家に行った。私の船は旅路に就いた。こうして私は家族全員を養う。他には何も知らない。もしあなた、主よ、渡らねばならないなら、私にあなたの蓮の御足を洗わせてください。」
Verse 205 (छंद)
पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं। मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं।। बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं। तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं।।
私はあなたの蓮の御足を洗い、あなたを船に乗せて渡します。主よ、私は下船したくありません。ラーマよ、私は真実を告げます。ダシャラタを証人に、私は誓います。しかしラクシュマナよ、私が彼の足を洗うまで岸で私を打ってください。それまでトゥルシーダースは、慈悲深き主よ、あなたを渡させません。
Verse 206 (दोहा/सोरठा)
सुनि केबट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे। बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन।।100।।
船頭の言葉を聞いて、それは愛に包まれ素晴らしいものであった。ジャーナキーは微笑み、慈悲の心でラクシュマナの体を見つめた。
Verse 207 (चौपाई)
कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई।। वेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू।। जासु नाम सुमरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा।। सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा।। पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी।। केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा।। अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा।। बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं।।
慈悲の海は微笑んで言った。「あなたの望むようにしなさい。あなたの船は渡れないからです。早く水を持ってきて私の足を洗いなさい。時間がかかるでしょう、それから私はあなたを渡します。」たった一度その御名を思い出すだけで、人々が果てしない世界の海を渡ることができるお方、その慈悲深きお方は船頭の願いを叶えた。世界を藁よりも軽いものとされたお方である。御足と爪を見て、女神ガンガーは喜んだ。主の言葉を聞いて、彼女は愛に満ちた。船頭はラーマの許しを得た。器に水を満たして持ってきた。至福と信仰に圧倒され、蓮の御足を洗い始めた。神々は花を降らせ、すべての者が喜んだ。これほどの功徳の積み重ねはない。
Verse 208 (दोहा/सोरठा)
पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार। पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार।।101।।
御足を洗い、その水を飲み、家族全員とともに主を渡らせた。こうして祖先を渡らせ、主は喜んで旅立った。
Verse 209 (चौपाई)
उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता।। केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा।। पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी।। कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई।। नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा।। बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी।। अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें।। फिरती बार मोहि जे देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा।।
渡って神聖な川の砂の上に立った。シーター、ラーマ、グハ、ラクシュマナが共にいた。船頭は渡って拝礼した。主はこれを恥ずかしく思わず、何も拒まなかった。愛する者の心を知るシーターは、宝石の指輪を外し、喜びの心で渡した。慈悲深きお方は言った。「渡し賃を受けなさい。」船頭は苦悩して御足を抱いた。「主よ、今日私は何を得なかったでしょうか。私の罪、悲しみ、貧困はすべて消えました。長い間働いてきましたが、今日神の恩恵により豊かな幸運を得ました。今、主よ、私は何も求めません。卑しき者の友よ、あなたの恩恵がありますように。戻る時に私に与えてくださるものを、私は頭に戴きます。」
Verse 210 (दोहा/सोरठा)
बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ। बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ।।102।।
主、ラクシュマナ、シーターは多くの贈り物を与えたが、船頭は何も受け取らなかった。慈悲の主は彼に別れを告げ、汚れなき信仰という恵みを与えた。
Verse 211 (चौपाई)
तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा।। सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी।। पति देवर संग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी।। सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी।। सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही।। लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें।। तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई।। तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होपन हित निज बागीसा।।
それからラグの主は沐浴し、大地を礼拝して頭に載せた。シーターは手を合わせて言った。「母よ、私の心の願いを叶えてください。夫と義弟と共に無事に戻り、あなたを礼拝します。」シーターの謙虚な願いを聞き、愛の本質に満ちて、川は澄み、水は清らかで言葉は優しくなった。「聞け、ラグの英雄よ、ヴィデーハの愛する娘よ。あなたの栄光は世界中に知れ渡っている。神々さえもあなたを見つめる。すべての成就者は手を合わせてあなたに仕える。あなたは私に大きな謙虚さを示した。慈悲をかけ、名誉を与えてくれた。しかし、女神よ、私は祝福を与えよう。あなた自身の心の願いが叶いますように。」
Verse 212 (दोहा/सोरठा)
प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ। पूजहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ।।103।।
あなたの主と義弟と共に、無事にコーサラに戻れますように。私を礼拝し、あなたの美しい名声が世界中に永遠に残りますように。
Verse 213 (चौपाई)
गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकुला।। तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू।। दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी।। नाथ साथ रहि पंथु देखाई। करि दिन चारि चरन सेवकाई।। जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई।। तब मोहि कहँ जसि देब रजाई। सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई।। सहज सनेह राम लखि तासु। संग लीन्ह गुह हृदय हुलासू।। पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हे।।
ガンガーの言葉は吉祥の根源であり、それを聞いてシーターは喜び、聖なる川は好意的になった。その時、主はグハに言った、「家に帰りなさい」。これを聞いてグハの顔は悲しげになったが、心の中は燃えていた。グハは手を合わせて謙虚な言葉を語った。「ラグ族の宝石よ、私の嘆願を聞いてください。主よ、私と共にいて道を示してください。四日間、あなたの足に仕えさせてください。ラグ族の主がどの森に留まるとしても、そこで美しい小屋を作ります。そしてあなたが命じることを何でも行います。ラグ族の英雄にかけて誓います」。グハの自然な愛情を見て、ラーマは彼を仲間に迎え、グハの心は喜びで満たされた。それからグハは親族を呼び、全員を連れてきた。彼らを満足させた後、別れを告げて出発した。
Verse 214 (दोहा/सोरठा)
तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ। सखा अनुज सिया सहित बन गवनु कीन्ह रधुनाथ।।104।।
それからラグ族の主は、シヴァを心に念じ、聖なる川に頭を垂れて、友、弟、そしてシーターと共に森へと旅立った。
Verse 215 (चौपाई)
तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू।। प्रात प्रातकृत करि रधुसाई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई।। सचिव सत्य श्रध्दा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी।। चारि पदारथ भरा भँडारु। पुन्य प्रदेस देस अति चारु।। छेत्र अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा।। सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा।। संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा।। चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा।।
その日、彼らは木々や茂みの下で宿った。ラクシュマナは仲間全員のために適切な葉の小屋を作った。夜明けに、朝の儀式を済ませた後、ラグ族の主は行って巡礼地の王を見た。彼の顧問は真理と信仰であり、愛する妻はマーダヴァのように、彼の幸福を願う友であった。彼の宝庫は人生の四つの目的で満たされ、彼の領域は聖なる地であり、極めて美しかった。彼の領域は難攻不落の砦であり、堅固に守られ、美しかった。夢の中でさえ、敵は足を踏み入れることができなかった。彼の軍隊は全ての最高の巡礼地から成り、罪の軍勢を打ち砕く英雄たちで、戦いにおいて揺るがなかった。二川の合流点は彼の玉座であり、最も壮麗に輝いた。不滅のバニヤンの木は彼の王傘であり、聖者たちの心を魅了した。ヤムナーとガンガーの波は彼の払子であり、それらを見ることで悲しみと貧困は破壊される。
Verse 216 (दोहा/सोरठा)
सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम। बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम।।105।।
徳ある者と清らかな者たちは彼に仕え、心の願いを全て得る。ヴェーダ、プラーナ、そして聖者たちは彼の汚れなき徳を豊かに称える。
Verse 217 (चौपाई)
को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।। अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा।। कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई।। करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा।। एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी।। मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पुजि जथाबिधि तीरथ देवा।। तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए।। मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई।।
プラヤーガの栄光を誰が語れるだろうか。それは罪の山のような象に対する獅子である。このような美しい巡礼地の主を見て、喜びの海であるラグ族の主は喜びを得た。彼はシーターとラクシュマナに語り、仲間たちに主自らが語った巡礼地の王の偉大さを伝えた。敬意を表し、森の美しい庭園を眺めながら、深い愛情をもってその偉大さを語った。このようにして彼は合流点に来て、憶える者に全ての吉祥を与える場所を見た。喜んで沐浴し、シヴァの礼拝を行い、規定の儀式に従って巡礼地の神を崇拝した。それから主はバラドヴァージャの元に来た。体を地に投げ出して敬意を表すと、聖者は彼を胸に抱きしめた。聖者の心の喜びは言葉にできない。まるでブラフマーナンダの住処を得たかのようであった。
Verse 218 (दोहा/सोरठा)
दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि। लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि।।106।।
聖者の主は祝福を与えた。心は極めて大きな喜びで満たされ、徳の果実がブラフマーによって自分の目の前に運ばれたかのように知った。
Verse 219 (चौपाई)
कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे।। कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के।। सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाए।। भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरव्दाज मृदु बचन उचारे।। आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू।। सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू।। लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी।। अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू।।
彼は安否を尋ね、座席を提供した。愛をもって彼らを崇拝し、完全に満足させた。彼は根、果実、そして良い新芽を持ってきて与えた。それは聖者の心には甘露のような食物であった。シーター、ラクシュマナ、そして仲間たちは喜んだ。ラーマは根と果実を大いなる味わいをもって食べた。ラーマは疲れから解放され、元気を取り戻した。バラドヴァージャは優しい言葉を語った。「今日、私の苦行は実を結び、今日、私の巡礼は実を結ぶ。今日、私の瞑想、ヨーガ、そして離脱は実を結ぶ。全ての吉祥な努力は今日成就する。なぜなら私はあなたを、ラーマ、見るからである。これ以上の利益や幸福はない。あなたの視線の中で、私の全ての希望は満たされる。今、慈悲を示し、この一つの願いを叶えてください。あなたの蓮の足を愛をもって拝ませてください」。
Verse 220 (दोहा/सोरठा)
करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार। तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार।।
行い、言葉、心において欺きを捨て、真にあなたのものになるまで、百万の対策を講じても、夢の中でさえ幸福を見出すことはない。
Verse 221 (चौपाई)
सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने।। तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा।। सो बड सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू।। मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं।। यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी।। भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए।। राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोयन लाहू।। देहिं असीस परम सुखु पाई। फिरे सराहत सुंदरताई।।
聖者の言葉を聞いて、ラーマは謙虚さを感じたが、心は愛、献身、そして至福で満たされた。それから、美しい名声を持つラグ族の主は、百万の方法で全ての物語を聖者に語った。「それは確かに偉大であり、全ての徳があなたの家に宿っています。聖者よ、あなたはそのような敬意を全ての人に示すからです」。聖者とラグ族の主は互いに頭を下げた。彼らは言葉を超えた喜びを経験した。これを知ったプラヤーガの住民、修行者、聖者、そして隠遁者たちは、皆バラドヴァージャのアーシュラマに来て、ダシャラタの美しい息子たちを見た。ラーマは全員に敬意を表した。彼らは喜び、彼を見て目で喜びを得た。彼らは祝福を与え、至高の喜びを得た。そして彼の美しさを称賛しながら帰った。
Verse 222 (दोहा/सोरठा)
राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ। चले सहित सिय लखन जन मुददित मुनिहि सिरु नाइ।।108।।
ラーマは夜、休息した。夜明けにプラヤーガで沐浴し、シーターとラクシュマナと共に出発した。心は喜び、聖者に頭を垂れて。
Verse 223 (चौपाई)
राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।। मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं।। साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए।। सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहि मगु दीख हमारा।। मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे।। करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई।। ग्राम निकट जब निकसहि जाई। देखहि दरसु नारि नर धाई।। होहि सनाथ जनम फलु पाई। फिरहि दुखित मनु संग पठाई।।
ラーマは聖者に愛を込めて尋ねた。「主よ、私たちはどの道を行くべきか教えてください。」聖者は心で微笑み、ラーマに言った。「あなたにとってすべての道は易しいのです。」聖者は弟子たちを呼んだ。それを聞いて五十人が来た、彼らの心は喜びに満ちていた。彼らは皆ラーマへの限りない愛を抱き、それぞれが言った。「ご覧ください、これが私たちの道です。」聖者はそれから四本のバニヤンの木を同行させた、それらの木は多くの生を経て多くの善行を積んでいた。拝礼し、聖者の許しを得て、ラグフの主は出発した、心は喜びに満ちていた。村の近くまで来て進むと、男も女も走って彼を拝しに来た。彼らは祝福され、生の実を得た。しかし彼が彼らを帰らせると、心に悲しみを抱いて戻った。
Verse 224 (दोहा/सोरठा)
बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम। उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम।।109।।
バニヤンの木に謙虚に祈りを捧げて別れを告げ、彼らは戻った、心の願いは満たされた。彼らはヤムナー川を渡り、その水で沐浴し、その体は川のように黒くなった。
परम्परा में केवट-प्रसंग का पाठ ‘दास्य-भाव’ दृढ़ करता है और ‘भवसागर-तरण’ का स्मरण कराता है—विशेषतः नाम-स्मरण के साथ पढ़ने से शरणागति, निष्काम सेवा, और तीर्थ-भाव (अन्तःकरण-शुद्धि) की वृद्धि मानी जाती है।
सामान्य वैष्णव-परम्परा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ नाम-सम्पुट, अथवा ‘राम’ नाम का जप-सम्पुट (प्रत्येक दोहा/चौपाई के पूर्व/पश्चात) प्रचलित है; कुछ पाठ-परम्पराएँ ‘सियाराममय सब जग जानी’ भाव-स्मरण को भी सम्पुट-रूप में रखती हैं।
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.
Read Ramcharitmanas in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.