Adhyaya 208
Vana ParvaAdhyaya 208109 Verses

Adhyaya 208

Adhyāya 208: Aṅgirasī-kanyāḥ (Enumeration of Aṅgiras’ daughters and attribute-names)

Upa-parva: Mārkaṇḍeya-samvāda (Genealogical and Deity-Name Discourse within Āraṇyaka-parva)

Mārkaṇḍeya continues an archival-genealogical narration, referencing Brahmā’s third son and identifying his wife as Apavasutā, then turning to the progeny framework. The chapter proceeds as an enumerative catalog of named feminine figures associated with Aṅgiras: Bhānumatī is presented as foremost in beauty; Rāgā is characterized through the notion of attachment (rāga) arising in beings; Sinīvālī is linked to subtlety/thinness and to being termed ‘seen/unseen’ by embodied beings; Haviṣmatī is described via radiance and sacrificial offering imagery; Mahāmatī is noted in the context of great rites and luminosity; and Kuhū/Ekānaṃśā is associated with the public’s exclamation and a distinctive epithet. The passage is primarily taxonomic rather than plot-driving, encoding attributes, ritual resonances, and mnemonic structure for lineage and cosmological indexing within the epic’s didactic frame.

Chapter Arc: कौशिक (तपोधन ब्राह्मण) अपने ‘स्वधर्म की सूक्ष्म गति’ पर गहन चिन्तन करता है—धर्म का मार्ग जितना उज्ज्वल दिखता है, उतना ही सूक्ष्म और फिसलनभरा भी। → वह सुनता है कि मिथिला में एक ‘कृतात्मा, धर्मवित्’ व्याध रहता है जो कर्म-फल, शिष्टाचार और धर्म के रहस्यों को जानता है; ब्राह्मण-तपस्वी के लिए एक कसाई से धर्म पूछना भीतर-ही-भीतर अहं और वर्ण-गौरव की परीक्षा बन जाता है। → धर्म का सार उद्घाटित होता है: ‘अहिंसा’ और ‘सत्य’ सर्वोपरि हैं—अहिंसा परमो धर्मः, और वह सत्य में प्रतिष्ठित है; साथ ही यह भी कि शास्त्रविहित कर्मों का मूल्य तभी है जब वे पाप-प्रवृत्ति, द्रोह और असत्य से रहित हों। → व्याध-धर्म का प्रतिपादन करता है कि श्रेष्ठ पुरुष तीन पदों को थामते हैं—द्रोह न करना, दान देना, और सदा सत्य बोलना; तथा अनसूया, क्षमा, शान्ति, संतोष, प्रियवादिता, काम-क्रोध-त्याग और शिष्टाचार-सेवन जैसे गुण ही ‘सतां मार्ग’ हैं। → कौशिक के भीतर यह प्रश्न शेष रह जाता है कि तप, जप, यज्ञ जैसे कर्मों का गर्व यदि अहिंसा-सत्य से विहीन हो, तो क्या वह धर्म कहलाएगा—और क्या वह स्वयं इस कसौटी पर खरा उतरता है?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका $ “लोक मिलाकर कुल ४८ ३ “लोक हैं) हू... #&+7 (9) #ध्िजी आल सप्ताधिकदद्विशततमो< ध्याय: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, थधर्मव्याथके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याथके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन मार्कण्डेय उवाच चिन्तयित्वा तदाक्षर्य स्त्रिया प्रोक्तमशेषत: । विनिन्दन्‌ स स्वमात्मानमागस्कृत इवाबभौ,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठि!! उस पतिव्रता देवीकी कही हुई सारी बातोंपर विचार करके कौशिक ब्राह्मणको बड़ा आश्चर्य हुआ। वह अपने-आपको धिक्कारता हुआ अपराधी-सा जान पड़ने लगा

Mārkaṇḍeya berkata: Setelah merenungkan sepenuhnya kata-kata menakjubkan yang diucapkan oleh perempuan itu, brahmin Kauśika dipenuhi keheranan. Sambil mencela dirinya sendiri, ia tampak seolah-olah bersalah atas suatu pelanggaran.

Verse 2

चिन्तयान: स्वधर्मस्य सूक्ष्मां गतिमथाब्रवीत्‌ । श्रद्धधानेन वै भाव्यं गच्छामि मिथिलामहम्‌,फिर अपने धर्मकी सूक्ष्म गतिपर विचार करके वह मन-ही-मन बोला--“मुझे (उस सतीके कथनपर) श्रद्धा और विश्वास करना चाहिये; अतः मैं अवश्य मिथिला जाऊँगा

Lalu, sambil merenungkan jalan dharmanya yang halus, ia berkata dalam hati: “Seseorang harus bertindak dengan śraddhā dan keyakinan; karena itu aku pasti akan pergi ke Mithilā.”

Verse 3

कृतात्मा धर्मवित्‌ तस्यां व्याधो निवसते किल । त॑ गच्छाम्यहमद्यैव धर्म प्रष्ठूं तपोधनम्‌,“कहते हैं, वहाँ एक पुण्यात्मा धर्मज्ञ व्याध निवास करता है। मैं उस तपोधन व्याधसे धर्मकी बात पूछनेके लिये आज ही उसके पास जाऊँगा'

“Konon, di sana tinggal seorang pemburu yang menguasai diri dan memahami dharma. Hari ini juga aku akan pergi kepadanya—kepada orang yang kaya tapa itu—untuk menanyakan perihal dharma.”

Verse 4

इति संचित्य मनसा श्रद्दधानः स्त्रिया वच: । बलाकाप्रत्ययेनासौ धर्म्यैश्व वचनै: शुभै:

Setelah merenung demikian dalam batinnya dan menaruh kepercayaan pada kata-kata perempuan itu, ia—yang telah diyakinkan oleh teladan burung kuntul—disapa dengan nasihat yang suci, benar, dan membawa keberkahan.

Verse 5

अतिक्रामन्तरण्यानि ग्रामांक्ष नगराणि च,वह अनेकानेक जंगलों, गाँवों तथा नगरोंको पार करता हुआ राजा जनकके द्वारा सुरक्षित, धर्मकी मर्यादासे व्याप्त तथा यज्ञसम्बन्धी उत्सवोंसे सुशोभित सुन्दर मिथिलापुरीमें जा पहुँचा

Mārkaṇḍeya berkata: Melampaui hutan, desa, dan kota, ia terus melangkah hingga akhirnya mencapai kota Mithilā yang elok—dilindungi Raja Janaka, dipenuhi batas-batas dharma, dan dihiasi perayaan-perayaan yajña; di sana kebenaran ditegakkan dan kehidupan rakyat tertata oleh kewajiban suci.

Verse 6

ततो जगाम मिथिलां जनकेन सुरक्षिताम्‌ | धर्मसेतुसमाकीर्णा यज्ञोत्सववर्ती शुभाम्‌,वह अनेकानेक जंगलों, गाँवों तथा नगरोंको पार करता हुआ राजा जनकके द्वारा सुरक्षित, धर्मकी मर्यादासे व्याप्त तथा यज्ञसम्बन्धी उत्सवोंसे सुशोभित सुन्दर मिथिलापुरीमें जा पहुँचा

Kemudian ia pergi ke Mithilā yang suci dan mujur—dilindungi oleh Janaka, dipenuhi jembatan-batas dharma, serta semarak oleh perayaan-perayaan yajña.

Verse 7

गोपुराट्टालकवतीं हर्म्यप्राकारशो भनाम्‌ । प्रविश्य नगरीं रम्यां विमानैर्बहुभिर्युताम्‌

Mārkaṇḍeya berkata: Memasuki kota yang memesona itu—berhiaskan gerbang-gerbang tinggi dan menara pengawas, elok oleh istana-istana serta bentengnya, dan dipenuhi banyak vimāna—(aku menyaksikan kemegahannya).

Verse 8

पण्यैश्व बहुभियुक्तां सुविभक्तमहापथाम्‌ । अश्व रथैस्तथा नागैयोचधैश्व बहुभिय्युताम्‌

Mārkaṇḍeya berkata: Kota itu kaya dengan berlimpah barang dagangan, dan jalan-jalan rayanya tertata rapi serta terbagi dengan baik. Ia juga dipadati kuda dan kereta, gajah, serta banyak kesatria.

Verse 9

हृष्टपुष्टजनाकीर्णा नित्योत्सवसमाकुलाम्‌ | सो<पश्यद्‌ बहुवृत्तान्तां ब्राह्मण: समतिक्रमन्‌

Mārkaṇḍeya berkata: Ketika brāhmaṇa itu melanjutkan perjalanannya, ia melihat sebuah kota yang dipadati orang-orang ceria dan sehat, senantiasa riuh oleh perayaan harian, serta penuh dengan beragam peristiwa dan pemandangan.

Verse 10

बहुत-से गोपुर, अट्टालिकाएँ, महल और चहारदीवारियाँ उस नगरकी शोभा बढ़ा रही थीं। वह रमणीय पुरी बहुत-से विमानोंसे युक्त थी तथा बहुत-सी दुकानें उस पुरीका सौन्दर्य बढ़ाती थीं। सुन्दर ढंगसे बनायी हुई बड़ी-बड़ी सड़कें शोभा पा रही थीं। बहुसंख्यक घोड़े, रथ, हाथी और सैनिकोंसे संयुक्त मिथिलापुरी हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई थी। वहाँ नित्य नाना प्रकारके उत्सव होते रहते थे और अनेक प्रकारकी घटनाएँ घटित होती थीं। ब्राह्मणने उस पुरीमें प्रवेश करके सब ओर घूम-घामकर उसे अच्छी तरह देखा ।। धर्मव्याधमपृच्छच्च स चास्य कथितो द्विजै: । अपश्यत्‌ तत्र गत्वा त॑ सूनामध्ये व्यवस्थितम्‌,वहाँ उसने लोगोंसे धर्मव्याधका पता पूछा और ब्राह्मणोंने उसे उसका स्थान बता दिया। कौशिकने वहाँ जाकर देखा कि तपस्वी धर्मव्याध कसाईखानेमें बैठकर सूअर, भैंसे आदि पशुओंका मांस बेच रहा है। वहाँ ग्राहकोंकी भीड़ लगी हुई थी, इसलिये कौशिक एकान्तमें जाकर खड़ा हो गया

Mārkaṇḍeya berkata: Keindahan kota itu ditambah oleh banyak gerbang, menara-menara tinggi, istana, dan tembok yang mengelilinginya. Ibu kota yang elok itu dipenuhi banyak vimāna dan dihiasi beragam pertokoan. Jalan-jalan raya yang lebar, tertata rapi, tampak berkilau. Mithilā, yang penuh orang-orang kuat dan ceria, sesak oleh kuda, kereta, gajah, dan para prajurit. Setiap hari beraneka perayaan berlangsung, dan berbagai peristiwa terus terjadi. Sang brāhmaṇa memasuki kota, berkeliling ke segala arah, dan menelitinya dengan saksama. Lalu ia menanyakan ‘Dharma-vyādha’; para brāhmaṇa memberitahukan tempatnya. Ketika ia tiba, ia melihatnya duduk di tengah rumah jagal, menjual daging babi hutan, kerbau, dan hewan lainnya. Karena para pembeli berdesakan, Kauśika menyingkir dan berdiri di tempat yang sepi.

Verse 11

मार्गमाहिषमांसानि विक्रीणन्तं तपस्विनम्‌ । आकुलत्वाच्च क्रेतृणामेकान्ते संस्थितो द्विज:,वहाँ उसने लोगोंसे धर्मव्याधका पता पूछा और ब्राह्मणोंने उसे उसका स्थान बता दिया। कौशिकने वहाँ जाकर देखा कि तपस्वी धर्मव्याध कसाईखानेमें बैठकर सूअर, भैंसे आदि पशुओंका मांस बेच रहा है। वहाँ ग्राहकोंकी भीड़ लगी हुई थी, इसलिये कौशिक एकान्तमें जाकर खड़ा हो गया

Mārkaṇḍeya berkata: Ia melihat sang pertapa menjual daging babi dan kerbau. Dan karena para pembeli berdesakan dalam hiruk-pikuk, brāhmaṇa itu berdiri menyendiri di tempat yang sepi.

Verse 12

स तु ज्ञात्वा द्विजं प्राप्त सहसा सम्भ्रमोत्थित: । आजगाम यतो विप्र: स्थित एकान्तदर्शने,ब्राह्यमणगको आया हुआ जानकर व्याध सहसा शीघ्रतापूर्वक उठ खड़ा हुआ और उस स्थानपर आ गया जहाँ ब्राह्मण एकान्त स्थानमें खड़ा था

Mārkaṇḍeya berkata: Begitu mengetahui seorang brāhmaṇa telah datang, sang pemburu segera bangkit dengan hormat dan mendatangi tempat sang brāhmaṇa berdiri, menghendaki pertemuan yang tenang tanpa gangguan.

Verse 13

व्याध उवाच अभिवादनये त्वां भगवन्‌ स्वागतं ते द्विजोत्तम । अहं व्याधो हि भद्रं ते किं करोमि प्रशाधि माम्‌,व्याध बोला--भगवन्‌! मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ। द्विजश्रेष्ठल आपका स्वागत है। मैं ही वह व्याध हूँ (जिसकी खोजमें आपने यहाँतक आनेका कष्ट किया है)। आपका भला हो, आज्ञा दीजिये, मैं क्या सेवा करूँ?

Sang pemburu berkata: “Wahai tuan yang mulia, aku bersujud kepadamu. Selamat datang, wahai yang terbaik di antara kaum dwija. Akulah pemburu itu. Semoga kebaikan menyertaimu—perintahkanlah: pelayanan apa yang harus kulakukan?”

Verse 14

एकपत्न्या यदुक्तो5सि गच्छ त्वं मिथिलामिति । जानाम्येतदहं सर्व यदर्थ त्वमिहागत:,उस पतिव्रता देवीने जो आपसे यह कहकर भेजा है कि “तुम मिथिलापुरीको जाओ।!' वह सब मैं जानता हूँ। आप जिस उद्देश्यसे यहाँ पधारे हैं, वह भी मुझे मालूम है

Sang pemburu berkata: “Aku mengetahui semuanya. Aku tahu bahwa istri yang setia itu mengutusmu dengan pesan, ‘Pergilah ke Mithilā.’ Dan aku juga tahu tujuan kedatanganmu ke sini.”

Verse 15

श्रुत्वा च तस्य तद्‌ वाक्‍्यं स विप्रो भूशविस्मित: । द्वितीयमिदमाश्षर्यमित्यचिन्तयत द्विजि:,व्याधकी वह बात सुनकर ब्राह्मणको बड़ा विस्मय हुआ। वह मन-ही-मन सोचने लगा --“यह दूसरा आश्चर्य दृष्टिगोचर हुआ है”

Mendengar kata-katanya itu, sang Brahmana sangat tercengang. Dalam hati ia merenung, “Inilah keajaiban kedua yang tampak di hadapanku.”

Verse 16

अदेशस्थं हि ते स्थानमिति व्याधो<ब्रवीदिदम्‌ । गृहं गच्छाव भगवन्‌ यदि ते रोचतेडनघ,इसके बाद व्याधने कहा--“भगवन्‌! यह स्थान आपके ठहरनेयोग्य नहीं है। अनघ! यदि आपकी रुचि हो तो हम दोनों हमारे घरपर चलें”

Sang pemburu berkata, “Tempat ini tidak layak bagimu untuk tinggal. Wahai yang mulia, wahai yang tak bercela—jika berkenan, marilah kita berdua pergi ke rumahku.”

Verse 17

मार्कण्डेय उवाच बाढमित्येव तं विप्रो हृष्टो वचनमत्रवीत्‌ । अग्रतस्तु द्विजं कृत्वा स जगाम गृहं प्रति,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! यह सुनकर ब्राह्मणको बड़ा हर्ष हुआ। उसने व्याधसे कहा--“बहुत अच्छा, ऐसा ही करो।” तब व्याध ब्राह्मगको आगे करके घरकी ओर चला

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, mendengar itu sang Brahmana sangat bersukacita. Ia berkata kepada si pemburu, ‘Baik, lakukanlah demikian.’ Lalu pemburu itu berjalan menuju rumahnya dengan sang Brahmana di depan.”

Verse 18

प्रविश्य च गृहं रम्यमासनेनाभिपूजित: । अर्घ्येण च स वै तेन व्याधेन द्विजसत्तम:,व्याधका घर बहुत सुन्दर था। वहाँ पहुँचकर उस व्याधने ब्राह्मणको बैठनेके लिये आसन दिया और अर्घ्य देकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणकी आदरसहित पूजा की

Memasuki rumah yang elok itu, sang Brahmana terbaik dihormati dengan dipersilakan duduk. Pemburu itu pun mempersembahkan arghya dan memujanya dengan hormat sebagaimana mestinya.

Verse 19

ततः: सुखोपविष्टस्तं व्याधं वचनमत्रवीत्‌ | कर्मतद्‌ वै न सदृशं॑ भवत: प्रतिभाति मे । अनुतप्ये भृशं तात तव घोरेण कर्मणा,सुखपूर्वक बैठ जानेपर ब्राह्मणने व्याधसे कहा--“तात! यह मांस बेचनेका काम निश्चय ही तुम्हारे योग्य नहीं है। मुझे तो तुम्हारे इस घोर कर्मसे बहुत संताप हो रहा है”

Kemudian, setelah duduk dengan nyaman, sang brāhmaṇa berkata kepada si pemburu: “Wahai anakku, pekerjaan menjual daging ini sungguh tidak tampak pantas bagimu. Aku sangat tersiksa oleh pekerjaanmu yang mengerikan ini.”

Verse 20

व्याध उवाच कुलोचितमिदं कर्म पितृपैतामहं परम्‌ । वर्तमानस्य मे धर्मे स्वे मन्‍्युं मा कृथा द्विज,व्याध बोला--ब्रह्मन! यह काम मेरे बाप-दादोंके समयसे होता चला आ रहा है। मेरे कुलके लिये जो उचित है वही धंधा मैंने भी अपनाया है। मैं अपने धर्मका ही पालन कर रहा हूँ; अत: आप मुझपर क्रोध न करें

Si pemburu berkata, “Wahai brāhmaṇa, pekerjaan ini telah turun-temurun sejak ayah dan kakekku. Aku menempuh mata pencaharian yang layak bagi garis keturunanku. Aku hidup dalam dharmaku sendiri; maka, wahai yang dua kali lahir, jangan marah kepadaku.”

Verse 21

विधात्रा विहितं पूर्व कर्म स्वमनुपालयन्‌ । प्रयत्नाच्च गुरू वृद्धौ शुश्रूषे5हं द्विजोत्तम,द्विजश्रेष्ठ) विधाताने इस कुलमें जन्म देकर मेरे लिये जो कार्य प्रस्तुत किया है, उसका पालन करता हुआ मैं अपने बूढ़े माता-पिताकी बड़े यत्नसे सेवा करता रहता हूँ

Si pemburu berkata, “Wahai yang terbaik di antara kaum dua kali lahir, tugas yang telah ditetapkan Sang Pencipta bagiku—sesuai jejak perbuatan lampau—itulah yang kupegang teguh sebagai kewajibanku. Dan dengan sungguh-sungguh aku melayani orang tuaku yang telah lanjut usia.”

Verse 22

सत्यं वदे नाभ्यसूये यथाशक्ति ददामि च । देवतातिथि भृत्यानामवशिष्टेन वर्तये,सत्य बोलता हूँ। किसीकी निनन्‍दा नहीं करता और अपनी शक्तिके अनुसार दान भी करता हूँ। देवताओं, अतिथियों और भरण-पोषणके योग्य कुटुम्बीजनों तथा सेवकोंको भोजन देकर जो बचता है उसीसे शरीरका निर्वाह करता हूँ

Si pemburu berkata, “Aku berkata benar, tidak mencari-cari cela, dan bersedekah sesuai kemampuanku. Setelah terlebih dahulu mempersembahkan makanan bagi para dewa, menjamu tamu, serta memberi makan mereka yang bergantung padaku—keluarga dan para pelayan—barulah aku hidup dari sisanya.”

Verse 23

न कुत्सयाम्यहं किंचिन्न गहें बलवत्तरम्‌ । कृतमन्वेति कर्तरिं पुरा कर्म द्विजोत्तम,द्विजश्रेष्ठ! किसीके दोषोंकी चर्चा नहीं करता और अपनेसे बलिष्ठ पुरुषकी निन्दा नहीं करता, क्योंकि पहलेके किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम स्वयं कर्ताको ही भोगना पड़ता है

Si pemburu berkata, “Wahai yang terbaik di antara kaum dua kali lahir, aku tidak merendahkan siapa pun, dan tidak pula mencela orang yang lebih kuat dariku. Sebab perbuatan masa lampau—baik maupun buruk—akan mengikuti pelakunya; sang pelaku sendirilah yang harus menanggung buahnya.”

Verse 24

कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यमिह लोकस्य जीवनम्‌ । दण्डनीतिस्त्रयी विद्या तेन लोको भवत्युत,कृषि, गोरक्षा, वाणिज्य, दण्डनीति और त्रयीविद्या--ऋक्‌, यजु, सामके अनुसार यज्ञादिका अनुष्ठान करना और कराना ये लोगोंकी जीविकाके साधन हैं। इनसे ही लौकिक और पारलौकिक उन्नति सम्भव होती है

Pertanian, pemeliharaan sapi, dan perdagangan—itulah penopang hidup manusia di dunia ini. Demikian pula tata-hukum (daṇḍanīti) dan pengetahuan Tiga Veda (Ṛg, Yajur, Sāma) yang menuntun pelaksanaan dan penyelenggaraan yajña serta upacara suci—semuanya menjadi sarana penghidupan; darinya tercapai kemajuan duniawi dan kebajikan akhirat.

Verse 25

कर्म शूद्रे कृषिर्वैंश्ये संग्राम: क्षत्रिये स्मृत: । ब्रह्मचर्य तपो मन्त्रा: सत्यं च ब्राह्मणे सदा,शूद्रका कर्तव्य है सेवा-कर्म, वैश्यका कार्य है खेती और युद्ध करना क्षत्रियका कर्म माना गया है। ब्रह्मचर्य, तपस्या, मन्त्र-जप, वेदाध्ययन तथा सत्यईभाषण--ये सदा ब्राह्मणके पालन करनेयोग्य धर्म हैं

Kerja bagi Śūdra ialah pelayanan dan kerja-keras; bagi Vaiśya ialah bertani dan berdagang; dan bagi Kṣatriya, pertempuran dikenang sebagai kewajiban. Adapun bagi Brāhmaṇa, disiplin yang senantiasa dijaga ialah brahmacarya, tapa, japa mantra, belajar Veda, dan berkata benar.

Verse 26

राजा प्रशास्ति धर्मेण स्वकर्मनिरता: प्रजा: । विकर्माणश्च ये केचित्‌ तान्‌ युनक्ति स्वकर्मसु,राजा अपने-अपने वर्णाश्रमोचित कर्ममें लगी हुई प्रजाका धर्मपूर्वक शासन करता है और जो कोई अपने कर्मोंसे गिरकर विपरीत दिशामें जा रहे हों उन्हें पुनः अपने कर्तव्यके पालनमें लगाता है

Raja memerintah rakyatnya menurut dharma, menjaga agar mereka tekun pada tugas masing-masing. Dan siapa pun yang tergelincir ke perbuatan menyimpang (vikarma), ia mengekang dan mengembalikan mereka ke pekerjaan yang semestinya.

Verse 27

भेतव्यं हि सदा राज्ञ: प्रजानामधिपा हि ते । वारयन्ति विकर्मस्थं तृपा मृगमिवेषुभि:

Raja patut selalu disegani, sebab dialah penguasa rakyat. Mereka yang bertahan dalam perbuatan menyimpang ia menahan—laksana pemburu menghentikan rusa dengan anak panah.

Verse 28

इसलिये राजाओंसे सदा डरते रहना चाहिये; क्योंकि वे प्रजाके स्वामी हैं। जो लोग धर्मके विपरीत कार्य करते हैं, उन्हें राजा दण्डद्वारा उसी प्रकार पापसे रोकते हैं, जैसे बाणोंद्वारा वे हिंसक पशुओंको हिंसासे रोकते हैं ।। जनकस्येह विप्रषषे विकर्मस्थो न विद्यते । स्वकर्मनिरता वर्णा्षृत्वारो5पि द्विजोत्तम,ब्रह्मर्ष] यह राजा जनकका नगर है, यहाँ कोई भी ऐसा नहीं है जो वर्ण-धर्मके विरुद्ध आचरण करे। द्विजश्रेष्ठ) यहाँ चारों वर्गोके लोग अपना-अपना कर्म करते हैं

Karena itu, raja patut selalu disegani, sebab merekalah tuan dan pelindung rakyat. Mereka yang bertindak berlawanan dengan dharma ditahan raja dengan hukuman—sebagaimana binatang buas dicegah dari mencelakai dengan anak panah. Wahai brahmarṣi, inilah kota Raja Janaka: di sini tak seorang pun didapati teguh dalam perbuatan menyimpang. Wahai yang terbaik di antara para dwija, keempat varṇa di sini masing-masing tekun pada tugasnya sendiri.

Verse 29

स एष जनको राजा दुर्वत्तमपि चेत्‌ सुतम्‌ । दण्ड्यं दण्डे निक्षिपति तथा न ग्लाति धार्मिकम्‌,ये राजा जनक दुराचारीको, वह अपना पुत्र ही क्‍यों न हो, दण्डनीय मानकर दण्ड देते ही हैं तथा किसी भी धर्मात्माको कष्ट नहीं पहुँचने देते हैं

Inilah Raja Janaka—sekalipun putranya sendiri berbuat jahat, ia menganggapnya patut dihukum dan menjatuhkan hukuman yang semestinya. Demikian pula, ia tidak membiarkan seorang pun yang saleh disakiti, sebab ia menegakkan keadilan tanpa pilih kasih.

Verse 30

सुयुक्तचारो नृपति: सर्व धर्मेण पश्यति | श्रीक्ष राज्यं च दण्डश्ष क्षत्रियाणां द्विजोत्तम,विप्रवर! राजा जनकने सब ओर गुप्तचर लगा रखे हैं, अतः उनके द्वारा वे धर्मानुसार सबपर दृष्टि रखते हैं। सम्पत्तिका उपार्जन, राज्यकी रक्षा तथा अपराधियोंको दण्ड देना--ये क्षत्रियोंके कर्तव्य हैं

Wahai yang terbaik di antara kaum dwija! Raja Janaka telah menata jaringan pengawasan dan mata-mata dengan baik ke segala penjuru; karena itu ia memerhatikan segala sesuatu menurut dharma. Menghimpun kemakmuran, melindungi kerajaan, dan menjatuhkan hukuman kepada pelaku kejahatan—itulah kewajiban para kṣatriya.

Verse 31

राजानो हि स्वधर्मेण श्रियमिच्छन्ति भूयसीम्‌ । सर्वेषामेव वर्णानां त्राता राजा भवत्युत,राजालोग अपने धर्मका पालन करते हुए ही प्रचुर सम्पत्ति पानेकी इच्छा रखते हैं और राजा सभी वर्णोंका रक्षक होता है

Para raja, dengan berpegang pada svadharma mereka, menginginkan kemakmuran yang lebih besar; dan sungguh, raja menjadi pelindung bagi semua varṇa.

Verse 32

परेण हि हतान्‌ ब्रह्मन्‌ वराहमहिषानहम्‌ । न स्वयं हन्मि विप्र्षे विक्रीणामि सदा त्वहम्‌,ब्रह्मन! मैं स्वयं किसी जीवकी हिंसा नहीं करता। सदा दूसरोंके मारे हुए सूअर और भैसोंका मांस बेचता हूँ

Wahai Brahmana, babi hutan dan kerbau ini telah dibunuh oleh orang lain. Wahai resi yang mulia, aku tidak membunuh makhluk hidup dengan tanganku sendiri; aku hanya selalu menjual daging hewan yang disembelih oleh pihak lain.

Verse 33

न भक्षयामि मांसानि ऋतुगामी तथा हाहम्‌ । सदोपवासी च तथा नक्तभोजी सदा द्विज,मैं स्वयं मांस कभी नहीं खाता। ऋतुकाल प्राप्त होनेपर ही पत्नी-समागम करता हूँ। द्विजप्रवर। मैं दिनमें सदा ही उपवास और रातमें भोजन करता हूँ

Wahai yang terbaik di antara kaum dwija, aku tidak pernah memakan daging. Aku mendatangi istriku hanya ketika musim yang semestinya tiba. Aku berpuasa sepanjang siang dan selalu makan hanya pada malam hari.

Verse 34

अशीलकश्चापि पुरुषो भूत्वा भवति शीलवान्‌ | प्राणिहिंसारतश्चापि भवते धार्मिक: पुन:,शीलसे रहित पुरुष भी कभी शीलवान्‌ हो जाता है। प्राणियोंकी हिंसामें अनुरक्त मनुष्य भी फिर धर्मात्मा हो जाता है

Bahkan seorang yang tanpa tata susila pun, pada waktunya, dapat menjadi berbudi. Demikian pula, orang yang gemar menyakiti makhluk hidup pun dapat kembali menjadi saleh dan menempuh dharma.

Verse 35

व्यभिचाराक्नरेन्द्राणां धर्म: संकीर्यते महान्‌ | अधर्मो वर्धते चापि संकीर्यन्ते ततः प्रजा:,राजाओंके व्यभिचार-दोषसे धर्म अत्यन्त संकीर्ण हो जाता है और अधर्म बढ़ जाता है, इससे प्रजामें वर्णसंकरता आ जाती है

Bila para raja jatuh ke dalam cela perselingkuhan, tatanan dharma yang agung pun menjadi kacau dan tercampur. Adharma lalu menguat, dan akibatnya rakyat menjadi bercampur-baur serta kehilangan keteraturan sosial.

Verse 36

भेरुण्डा वामना: कुब्जा: स्थूलशीर्षास्तथैव च । क्लीबाश्चान्धाश्न बधिरा जायन्ते5त्युच्चलोचना:,उस दशामें भयंकर आकृतिवाले, बौने, कुबड़े, मोटे मस्तकवाले, नपुंसक, अंधे, बहरे और अधिक ऊँचे नेत्रोंवाले मनुष्य उत्पन्न होते हैं

Dalam keadaan demikian, orang-orang terlahir dengan rupa yang mengerikan—kerdil, bungkuk, berkepala besar; juga impoten, buta, tuli, dan bermata sangat menonjol.

Verse 37

पार्थिवानामथधर्मत्वात्‌ प्रजानाम भव: सदा | स एष राजा जनक: प्रजा धर्मेण पश्यति,राजाओंके अधर्मपरायण होनेसे प्रजाकी सदा अवनति होती है। हमारे ये राजा जनक समस्त प्रजाको धर्मपूर्ण दृष्टिसे ही देखते हैं

Ketika para raja berpaling dari dharma, keadaan rakyat niscaya merosot. Namun Raja Janaka ini memandang seluruh rakyatnya dengan pandangan dharma—dengan tata pemerintahan yang benar.

Verse 38

अनुगृह्नत्‌ प्रजा: सर्वा स्वधर्मनिरता: सदा । (पात्येव राजा जनक: पितृवज्जनसत्तम ।) ये चैव मां प्रशंसन्ति ये च निन्दन्ति मानवा:,सर्वान्‌ सुपरिणीतेन कर्मणा तोषयाम्यहम्‌ । नरश्रेष्ठ] राजा जनक सदा स्वथधर्ममें तत्पर रहनेवाली सम्पूर्ण प्रजापर अनुग्रह रखते हुए उसका पिताकी भाँति सदा पालन करते हैं। जो लोग मेरी प्रशंसा करते हैं और जो निन्दा करते हैं, उन सबको अपने सद्व्यवहारसे संतुष्ट रखता हूँ

Raja Janaka, insan utama, senantiasa berkenan kepada seluruh rakyatnya yang teguh pada kewajiban masing-masing, dan melindungi mereka laksana seorang ayah. Demikian pula, entah orang memujiku atau mencelaku, semuanya kujadikan tenteram melalui perilaku yang tertata dan perbuatan yang dijalankan dengan benar.

Verse 39

ये जीवन्ति स्वधर्मेण संयुञ्जन्ति च पार्थिवा:

Raja-raja yang hidup selaras dengan dharma mereka sendiri yang telah ditetapkan, dan yang juga menekuni (serta menuntun orang lain) dalam pelaksanaan dharma itu sebagaimana mestinya…

Verse 40

न किंचिदुपजीवन्ति दान्ता उत्थानशीलिन: । जो राजा अपने धर्मका पालन करते हुए जीवन-निर्वाह करते हैं, धर्ममें ही संयुक्त रहते हैं, किसी दूसरेकी कोई वस्तु अपने उपयोगमें नहीं लाते तथा सदा अपनी इन्द्रियोंपर संयम रखते हैं, वे ही उन्नतिशील होते हैं ।। ३९ ई ।। शक्‍्त्यान्नदानं सततं तितिक्षा धर्मनित्यता,अपनी शक्तिके अनुसार सदा दूसरोंको अन्न देना, दूसरोंके अपराध तथा शीत-उष्ण आदि द्वन्दोंको सहन करना, सदा धर्ममें दृढ़तापूर्वक लगे रहना तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें सभी पूजनीय पुरुषोंका यथायोग्य पूजन करना--ये मनुष्योंके सदगुण पुरुषमें स्वार्थत्यागके बिना नहीं रह पाते हैं

Sang resi pemburu berkata: Mereka yang mengekang diri dan senantiasa berusaha naik derajat tidak menopang hidup dengan mengambil milik orang lain. Memberi makanan terus-menerus sesuai kemampuan, menanggung kesukaran dan kesalahan orang lain, tetap teguh berpegang pada dharma, serta menghormati pribadi-pribadi yang patut dihormati di antara semua makhluk sebagaimana layaknya—kebajikan-kebajikan itu tak dapat berdiam dalam diri manusia tanpa pelepasan kepentingan diri.

Verse 41

यथाहं प्रति पूजा च सर्वभूतेषु वै सदा । त्यागान्नान्यत्र मर्त्यानां गणास्तिष्ठन्ति पूरुषे,अपनी शक्तिके अनुसार सदा दूसरोंको अन्न देना, दूसरोंके अपराध तथा शीत-उष्ण आदि द्वन्दोंको सहन करना, सदा धर्ममें दृढ़तापूर्वक लगे रहना तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें सभी पूजनीय पुरुषोंका यथायोग्य पूजन करना--ये मनुष्योंके सदगुण पुरुषमें स्वार्थत्यागके बिना नहीं रह पाते हैं

Sang pemburu berkata: “Adapun penghormatan yang ditujukan kepadaku, dan pemuliaan yang terus-menerus kepada semua makhluk—gugusan kebajikan semacam itu tidak akan tinggal dalam diri manusia di mana pun tanpa pelepasan kepentingan diri. Hanya dengan meninggalkan pamrih, seseorang dapat memberi sesuai kemampuan, menanggung kesalahan orang lain serta pertentangan dingin dan panas, teguh berdiam dalam dharma, dan mempersembahkan hormat yang layak kepada siapa pun yang patut dihormati di antara makhluk.”

Verse 42

मृषा वाद परिहरेत्‌ कुर्यात्‌ प्रियमयाचित: । न च कामाज्न संरम्भान्न द्वेषाद्‌ धर्ममुत्सूजेत्‌,झूठ बोलना छोड़ दे, बिना कहे ही दूसरोंका प्रिय करे, काम, क्रोध तथा द्वेषसे भी कभी धर्मका परित्याग न करे

Sang pemburu berkata: “Tinggalkan ucapan dusta. Tanpa diminta, lakukanlah apa yang menyenangkan dan membawa kebaikan bagi orang lain. Dan jangan pernah meninggalkan dharma—baik karena dorongan nafsu, karena amarah yang meledak dan gelisah, maupun karena kebencian.”

Verse 43

प्रिये नातिभुशं हृष्येदप्रिये न च संज्वरेत्‌ । न मुहोदर्थकृच्छेषु न च धर्म परित्यजेत्‌,प्रिय वस्तुकी प्राप्ति होनेपर हर्षसे फ़ूल न उठे, अपने मनके विपरीत कोई बात हो जाय तो दुःख न माने-चिन्तित न हो, अर्थसंकट आ जाय तो भी मोहके वशीभूत हो घबराये नहीं और किसीभी अवस्थामें अपना धर्म न छोड़े

Sang pemburu berkata: “Ketika sesuatu yang menyenangkan terjadi, jangan bersukacita berlebihan; ketika sesuatu yang tidak menyenangkan terjadi, jangan terbakar oleh duka. Dalam kesempitan harta, jangan jatuh ke dalam kebingungan atau kepanikan; dan dalam keadaan apa pun jangan meninggalkan dharma.”

Verse 44

कर्म चेक्किंचिदन्यत्‌ स्यादितरज्न तदाचरेत्‌ । यत्‌ कल्याणमभिध्यायेत्‌ तत्रात्मानं नियोजयेत्‌,यदि भूलसे कभी कोई निन्दित कर्म बन जाय तो फिर दुबारा वैसा काम न करे। अपने मन और बुद्धिसे विचार करनेपर जो कल्याणकारी प्रतीत हो, उसी कार्यमें अपनेको लगावे

Bila karena kekhilafan seseorang sempat melakukan perbuatan tercela, janganlah ia mengulanginya. Setelah menimbang dengan pikiran dan budi, hendaklah ia mengarahkan dirinya pada tindakan yang tampak membawa kebaikan.

Verse 45

न पापे प्रतिपाप: स्यात्‌ साधुरेव सदा भवेत्‌ | आत्मनैव हतः पापो य: पापं कर्तुमिच्छति,यदि कोई अपने साथ बुरा बर्ताव करे तो स्वयं भी बदलेमें उसके साथ बुराई न करे। सबके साथ सदा सद्व्यवहार ही करे। जो पापी दूसरोंका अहित करना चाहता है वह स्वयं ही नष्ट हो जाता है

Jangan membalas dosa dengan dosa; orang saleh hendaklah senantiasa teguh dalam kebajikan. Siapa yang berniat berbuat jahat dan mencelakai orang lain, sesungguhnya binasa oleh kejahatannya sendiri.

Verse 46

कर्म चैतदसाधूनां वृजिनानामसाधुवत्‌ | न धर्मोउस्तीति मन्वाना: शुचीनवहसन्ति ये,यह (दूसरोंका अहित करना) तो दुराचारीकी भाँति दुर्व्यसनोंमें आसक्त हुए पापी पुरुषोंका ही कार्य है। “धर्म कोई चीज नहीं है” ऐसा मानकर जो शुद्ध आचार-विचारवाले श्रेष्ठ पुरुषोंकी हँसी उड़ाते हैं, वे धर्मपर अश्रद्धा रखनेवाले मनुष्य निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। पापी मनुष्य लुहारकी बड़ी धौंकनीके समान सदा ऊपरसे फूले दिखायी देते हैं (परंतु वास्तवमें सारहीन होते हैं)

Perilaku demikian hanyalah milik orang durjana—para pendosa yang tenggelam dalam kebiasaan buruk. Mereka yang mengira, “Dharma itu tidak ada,” dan yang mengejek orang-orang berperilaku suci, tersesat dari jalan benar.

Verse 47

अश्रद्दधाना धर्मस्य ते नश्यन्ति न संशय: । महादृतिरिवाध्मात: पापो भवति नित्यदा,यह (दूसरोंका अहित करना) तो दुराचारीकी भाँति दुर्व्यसनोंमें आसक्त हुए पापी पुरुषोंका ही कार्य है। “धर्म कोई चीज नहीं है” ऐसा मानकर जो शुद्ध आचार-विचारवाले श्रेष्ठ पुरुषोंकी हँसी उड़ाते हैं, वे धर्मपर अश्रद्धा रखनेवाले मनुष्य निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। पापी मनुष्य लुहारकी बड़ी धौंकनीके समान सदा ऊपरसे फूले दिखायी देते हैं (परंतु वास्तवमें सारहीन होते हैं)

Mereka yang tidak beriman pada dharma pasti binasa—tanpa ragu. Orang berdosa selalu seperti bellow pandai besi yang besar: tampak menggelembung di luar, namun kosong di dalam.

Verse 48

(साधु: सन्नतिमानेव सर्वत्र द्विजसत्तम ।) मूढानामवलिप्तानामसारं भावितं भवेत्‌ । दर्शयत्यन्तरात्मा तं दिवा रूपमिवांशुमान्‌,द्विजश्रेष्ठ! उत्तम पुरुष सर्वत्र विनयशील ही होता है। अहंकारी मूढ़ मनुष्योंकी सोची हुई प्रत्येक बात निःसार होती है। जैसे सूर्य दिनके रूपको प्रकट कर देता है, उसी प्रकार मूर्खोकी अन्तरात्मा ही उनके यथार्थ स्वरूपका दर्शन करा देती है

Wahai yang terbaik di antara para brāhmaṇa, orang baik sejati senantiasa rendah hati di mana pun. Namun apa pun yang dibayangkan dan direncanakan oleh orang dungu dan angkuh akan terbukti hampa. Seperti matahari menyingkap rupa-rupa pada siang hari, demikian pula batin seorang bodoh menelanjangi hakikat dirinya.

Verse 49

न लोके राजते मूर्ख: केवलात्मप्रशंसया । अपि चेह श्रिया हीन:ः कृतविद्यः प्रकाशते,मूर्ख मनुष्य केवल अपनी प्रशंसाके बलसे जगत्‌-में प्रतिष्ठा नहीं पाता है, विद्वान्‌ पुरुष कान्तिहीन हो तो भी संसारमें उसकी ख्माति बढ़ जाती है

Orang bodoh tidak memperoleh penghormatan di dunia hanya dengan memuji dirinya sendiri. Namun orang yang sungguh berilmu tetap bersinar di sini meski tanpa kemakmuran lahiriah; namanya harum oleh kekuatan pengetahuan dan laku bajiknya, bukan oleh pamer.

Verse 50

अब्रुवन्‌ कस्यचिचन्निन्दामात्मपूजामवर्णयन्‌ । न कश्चिद्‌ गुणसम्पन्न: प्रकाशो भुवि दृश्यते,किसी दूसरेकी निन्‍्दा न करे, अपनी मान-प्रतिष्ठाकी प्रशंसा न करे, कोई भी गुणवान्‌ पुरुष पर निन्दा और आत्मप्रशंसाका त्याग किये बिना इस भूमण्डलमें सम्मानित हुआ हो, यह नहीं देखा जाता है

Jangan mencela siapa pun, dan jangan pula mengumandangkan kehormatan serta kebesaran diri. Di dunia ini tidak terlihat bahwa seorang yang benar-benar berbudi menjadi termasyhur sementara ia masih melekat pada celaan terhadap orang lain dan pujian diri.

Verse 51

विकर्मणा तप्यमान: पापाद विपरिमुच्यते । न तत्‌ कुर्या पुनरिति द्वितीयात्‌ परिमुच्यते,जो मनुष्य पापकर्म बन जानेपर सच्चे हृदयसे पश्चात्ताप करता है, वह उस पापसे छूट जाता है तथा “फिर कभी ऐसा कर्म नहीं करूँगा” ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेनेपर वह भविष्यमें होनेवाले दूसरे पापसे भी बच जाता है

Seseorang yang tersiksa oleh penyesalan setelah melakukan perbuatan salah, terbebas dari dosa itu. Dan ketika ia berketetapan teguh, “Aku tidak akan melakukannya lagi,” ia pun terbebas dari dosa kedua—yakni dosa di masa depan yang timbul bila ia mengulangi kesalahan yang sama.

Verse 52

कर्मणा येन तेनेह पापाद्‌ द्विजवरोत्तम । एवं श्रुतिरियं ब्रह्मन्‌ धर्मेषु प्रतिदृश्यते,विप्रवर! शास्त्रविहित (जप, तप, यज्ञ, दान आदि) किसी भी कर्मका निष्कामभावसे आचरण करनेपर पापसे छुटकारा मिल सकता है। ब्रह्मन! धर्मके विषयमें ऐसी श्रुति देखी जाती है

Wahai yang terbaik di antara para Brahmana, dengan tindakan apa pun yang ditetapkan śāstra dan dilakukan di sini dengan sikap batin yang benar, seseorang dapat dibebaskan dari dosa. Wahai Brahmana, demikianlah ajaran yang tampak dalam śruti mengenai dharma.

Verse 53

पापान्यबुद्धवेह पुरा कृतानि प्राग्‌ धर्मशीलो5पि विहन्ति पश्चात्‌ । धर्मो राजन्‌ नुदते पूरुषाणां यत्‌ कुर्वते पापमिह प्रमादात्‌,पहलेका धर्मशील पुरुष भी यदि अनजानमें यहाँ कोई पाप कर बैठे तो वह पीछे (निष्काम पुण्यकर्मद्वारा) उस पापको नष्ट कर देता है। राजन! मनुष्योंका धर्म ही यहाँ प्रमादवश किये हुए उनके पापोंको दूर कर देता है

Dosa-dosa yang dahulu dilakukan di sini karena ketidaktahuan, kelak dihancurkan bahkan oleh orang yang teguh dalam dharma. Wahai Raja, bila manusia karena lalai berbuat salah di dunia ini, dharma-lah yang mengusir dosanya—oleh kekuatan kebajikan yang menyusul dan kemurnian batin.

Verse 54

पापं कृत्वा हि मन्येत नाहमस्मीति पूरुष: । तं तु देवा: प्रपश्यन्ति स्वस्यैवान्तरपूरुष:,जो मनुष्य पाप करके भी यह मानता है कि “मैं पापी नहीं हूँ।/ वह भूल करता है; क्योंकि देवता उसे और उसके पापको देखते हैं तथा उसीके भीतर बैठा हुआ परमात्मा भी देखता ही है

Seseorang bisa berbuat dosa lalu membayangkan, “Aku bukan pendosa.” Namun itu keliru; para dewa menyaksikan dirinya dan perbuatannya, dan Tuhan yang bersemayam di dalam—Sang Pribadi Batin—juga melihat segalanya.

Verse 55

चिकीर्षेदेव कल्याणं श्रद्धधानोडनसूयक: । वसनस्येव छिद्राणि साधूनां विवृणोति यः,(अपश्यन्नात्मनो दोषान्‌ स पाप: प्रेत्य नश्यति ।।) श्रद्धालु मनुष्य दूसरोंके दोष देखना छोड़कर सदा सबके हितकी ही इच्छा करे। जो पापी अपने दोषोंकी ओरसे आँखें बंद करके सदा दूसरे श्रेष्ठ पुरुषोंके दोषोंको ही कपड़ेके छेदोंकी भाँति अधिकाधिक प्रकट करता और बढ़ाता है, वह मृत्युके पश्चात्‌ नष्ट हो जाता है --परलोकमें उसे कोई सुख नहीं मिलता है

Hendaklah seseorang yang penuh keyakinan dan bebas dari kedengkian senantiasa mengupayakan kebaikan dan kemaslahatan. Tetapi siapa yang, seperti menunjuk-nunjuk lubang pada kain, terus-menerus menyingkap dan membesar-besarkan cela orang saleh—sementara buta terhadap cela dirinya—orang berdosa itu binasa setelah mati; di alam sana ia tak memperoleh kebahagiaan.

Verse 56

पापं चेत्‌ पुरुष: कृत्वा कल्याणमभिपद्यते । मुच्यते सर्वपापेभ्यो महाभ्रेणेव चन्द्रमा:,यदि मनुष्य पाप करके भी कल्याणकारी कर्ममें लग जाता है, तो वह महामेघसे मुत्ह हुए चन्द्रमाकी भाँति सब पापोंसे मुक्त हो जाता है

Jika seseorang, meski telah berbuat dosa, kemudian berpaling kepada perbuatan yang baik dan benar, ia terbebas dari segala dosa—laksana bulan yang lepas dari selubung awan besar.

Verse 57

यथा<5<दित्य: समुद्यन्‌ वै तमः: पूर्व व्यपोहति । एवं कल्याणमातिष्ठन्‌ सर्वपापै: प्रमुच्यते,जैसे सूर्य उदय होनेपर पहलेके अन्धकारको नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार कल्याणकारी शुभ कर्मका निष्कामभावसे अनुष्ठान करनेवाला पुरुष सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है

Sebagaimana matahari yang terbit terlebih dahulu menghalau kegelapan, demikian pula orang yang teguh menapaki perbuatan baik dan luhur—dengan niat tanpa pamrih—terlepas dari segala dosa.

Verse 58

पापानां विद्धयधिष्ठानं लोभमेव द्विजोत्तम । लुब्धा: पापं व्यवस्यन्ति नरा नातिबहुश्रुता:,विप्रवर! लोभको ही पापोंका घर समझो। जिन्होंने अधिकतर शास्त्रोंका श्रवण नहीं किया है, वे लोभी मनुष्य ही पाप करनेका विचार रखते हैं

Ketahuilah, wahai yang terbaik di antara kaum dwija, bahwa keserakahanlah singgasana dan landasan segala dosa. Orang-orang yang serakah—terutama yang tidak terlatih oleh banyak mendengar ajaran suci—menetapkan niat pada keburukan dan memutuskan untuk berbuat dosa.

Verse 59

अधर्मा धर्मरूपेण तृणै: कूपा इवावृता: । तेषां दम: पवित्राणि प्रलापा धर्मसंश्रिता: । सर्व हि विद्यते तेषु शिष्टाचार: सुदुर्लभ:,तिनकेसे ढके हुए कुओंकी भाँति धर्मकी आड़में कितने ही अधर्म चल रहे हैं। धर्मात्माके वेशमें रहनेवाले इन अधार्मिक मनुष्योंमें इन्द्रिय-संयम, पवित्रता और धर्मसम्बन्धी चर्चा आदि सभी गुण तो होते हैं, परंतु उनमें शिष्टाचार (श्रेष्ठ पुरुषोंका-सा आचार-व्यवहार) अत्यन्त दुर्लभ है

Seperti sumur yang tertutup rerumputan, demikian pula banyak perbuatan adharma tersembunyi di balik rupa luar dharma. Pada orang-orang yang mengenakan kedok kebajikan itu, memang tampak pengendalian indria, pertunjukan kesucian, dan bahkan ujaran yang bersandar pada dharma; namun śiṣṭācāra sejati—laku halus para mulia—amat jarang terdapat pada mereka.

Verse 60

मार्कण्डेय उवाच सतु विप्रो महाप्राज्ञो धर्मव्याधमपृच्छत । शिष्टाचारं कथमहं विद्यामिति नरोत्तम,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! तदनन्तर परम बुद्धिमान्‌ कौशिकने धर्मव्याथसे पूछा--“नरश्रेष्ठ! मुझे शिष्टाचारका ज्ञान कैसे हो?

Mārkaṇḍeya berkata: Lalu brāhmaṇa yang sangat bijaksana itu bertanya kepada Dharma-vyādha, “Wahai yang terbaik di antara manusia, bagaimana aku dapat mengetahui śiṣṭācāra?”

Verse 61

एतदिच्छामि भद्र ते श्रोतुं धर्मभूतां वर । त्वत्तो महामते व्याध तद्‌ ब्रवीहि यथातथम्‌,“धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महामते व्याध! तुम्हारा भला हो, मैं ये सब बातें तुमसे सुनना चाहता हूँ। अतः यथार्थ रूपसे इनका वर्णन करो”

“Semoga kebaikan menyertaimu. Wahai yang terbaik di antara para dhārmika, wahai pemburu yang berhikmat—aku ingin mendengarnya darimu. Karena itu, katakanlah sebagaimana adanya, setepat-tepatnya.”

Verse 62

व्याध उवाच यज्ञो दानं॑ तपो वेदा: सत्यं च द्विजसत्तम | पज्चैतानि पवित्राणि शिष्टाचारेषु सर्वदा,व्याधने कहा--द्विजश्रेष्ठ! यज्ञ, दान, तपस्या, वेदोंका स्वाध्याय और सत्यभाषण--ये पाँच पवित्र वस्तुएँ शिष्ट पुरुषोंके आचार-व्यवहारमें सदा देखी गयी हैं

Sang Pemburu berkata: “Wahai yang terbaik di antara kaum dvija, yajña, dāna, tapa, svādhyāya Veda, dan satya—lima hal ini menyucikan. Semuanya senantiasa tampak mewujud dalam laku śiṣṭa.”

Verse 63

कामक्रोधौ वशे कृत्वा दम्भं लोभमनार्जवम्‌ | धर्ममित्येव संतुष्टास्ते शिष्टा: शिष्टसम्मता:,जो काम, क्रोध, लोभ, दम्भ और कुटिलताको वशमें करके केवल धर्मको ही अपनाकर संतुष्ट रहते हैं, वे शिष्ट कहलाते हैं और उन्हींका शिष्ट पुरुष आदर करते हैं

Sang Pemburu berkata: “Mereka yang menundukkan kāma dan krodha, serta menaklukkan kemunafikan, ketamakan, dan kelicikan, dan yang merasa cukup hanya dengan dharma—merekalah yang disebut śiṣṭa; merekalah yang disetujui dan dihormati oleh para śiṣṭa.”

Verse 64

न तेषां विद्यते3वृत्तं यज्ञस्वाध्यायशीलिनाम्‌ । आचारपालनं चैव द्वितीयं शिष्टलक्षणम्‌,वे निरन्तर यज्ञ और स्वाध्यायमें लगे रहते हैं। उनमें स्वेच्छाचार नहीं होता। सदाचारका पालन शिष्ट पुरुषोंका दूसरा लक्षण है

Pada mereka yang teguh dalam yajña dan dalam swādhyāya, tiada ruang bagi tingkah laku sekehendak hati yang menyimpang. Menjaga tata laku yang benar—setia pada perilaku yang patut—itulah tanda kedua orang yang benar-benar berbudaya dan berdisiplin.

Verse 65

गुरुशुश्रूषणं सत्यमक्रोधो दानमेव च । एतच्चतुष्टयं ब्रह्मन्‌ शिष्टाचारेषु नित्यदा,ब्रह्मन! शिष्टाचारी पुरुषोंमें गुरुकी सेवा, सत्य-भाषण, क्रोधका अभाव तथा दान-ये चार सदगुण सदा रहते हैं

Wahai Brahmana! Pada mereka yang hidup menurut laku para śiṣṭa, senantiasa ada empat kebajikan: berbakti melayani guru, berkata benar, bebas dari amarah, dan kedermawanan.

Verse 66

शिष्टाचारे मन: कृत्वा प्रतिष्ठाप्पय च सर्वश: । यामयं लभते वृत्ति सा न शक्‍्या हाुतो5न्यथा,मनुष्य शिष्ट पुरुषोंके उपर्युक्त आचारमें मनको सब प्रकारसे स्थापित करके जिस उत्तम स्थितिको प्राप्त करता है उसकी उपलब्धि और किसी प्रकारसे नहीं हो सकती

Bila seseorang menambatkan batin sepenuhnya pada laku para śiṣṭa dan menegakkannya di sana dalam segala hal, maka cara hidup yang luhur dan keteguhan batin yang diperolehnya tak dapat diraih dengan jalan lain.

Verse 67

वेदस्योपनिषत्‌ सत्यं सत्यस्योपनिषद्‌ दम: । दमस्योपनिषत्‌ त्याग: शिष्टाचारेषु नित्यदा,वेदका सार है सत्य, सत्यका सार है इन्द्रिय-संयम और इन्द्रिय-सयंमका सार है त्याग। यह त्याग शिष्ट पुरुषोंके आचारमें सदा विद्यमान रहता है

Inti Veda adalah kebenaran; inti kebenaran adalah pengendalian diri; dan inti pengendalian diri adalah pelepasan (tyāga). Pelepasan demikian senantiasa hadir dalam laku para śiṣṭa.

Verse 68

ये तु धर्मानसूयन्ते बुद्धिमोहान्विता नरा: । अपथा गच्छतां तेषामनुयाता च पीड्यते,जो मनुष्य बुद्धिमोहसे युक्त होकर धर्ममें दोष देखते हैं वे स्वयं तो कुमार्गगामी होते ही हैं, उनके पीछे चलनेवाला मनुष्य भी कष्ट पाता है

Namun orang-orang yang, karena kebingungan akal, mencela dharma—mereka sendiri menempuh jalan sesat; dan siapa pun yang mengikuti mereka pun akan tertimpa derita.

Verse 69

ये तु शिष्टा: सुनियता: श्रुतित्यागपरायणा: । धर्मपन्थानमारूढा: सत्यधर्मपरायणा:,जो शिष्ट हैं वे सदा ही नियमित जीवन व्यतीत करते हैं, वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर और त्यागी होते हैं। धर्मके मार्गपर ही चलते हैं और सत्यधर्मको ही अपना परम आश्रय मानते हैं

Mereka yang benar-benar berbudaya dan berdisiplin hidup dalam pengendalian diri yang teguh. Mereka tekun mempelajari Weda dan cenderung pada pelepasan. Setelah menaiki jalan dharma, mereka menjadikan dharma yang berlandaskan kebenaran sebagai perlindungan tertinggi dan ikrar penuntun mereka.

Verse 70

नियच्छन्ति परां बुद्धिं शिष्टाचारान्विता जना: । उपाध्यायमते युक्ता: स्थित्या धर्मार्थदर्शिन:

Orang-orang yang berpegang pada tata laku kaum terpelajar menahan dan meneguhkan pemahaman yang lebih tinggi dalam diri mereka. Selaras dengan nasihat para guru, mereka tetap berdisiplin dalam cara hidupnya, sehingga mampu membedakan mana yang sungguh dharma dan mana yang sungguh membawa maslahat.

Verse 71

शिष्टाचारपरायण मनुष्य अपनी उत्तम बुद्धिको भी संयममें रखते हैं, गुरुके सिद्धान्तके अनुसार चलते हैं और मर्यादामें स्थित होकर धर्म और अर्थपर दृष्टि रखते हैं ।। नास्तिकान्‌ भिजन्नमर्यादान्‌ क्रूरान्‌ पापमतौ स्थितान्‌ | त्यज तान्‌ ज्ञानमश्रित्य धार्मिकानुपसेव्य च,इसलिये तुम नास्तिक, धर्मकी मर्यादा भंग करनेवाले, क्रूर तथा पापपूर्ण विचार रखनेवाले पुरुषोंका साथ छोड़ दो और ज्ञानका आश्रय लेकर धर्मात्मा पुरुषोंकी सेवामें रहो

Mereka yang berpegang pada tata laku kaum bijak mengekang bahkan kecerdasan terbaiknya, berjalan menurut ajaran guru dan para sesepuh, dan tetap berada dalam batas kepatutan sambil memandang dharma serta kemaslahatan duniawi. Karena itu, tinggalkan orang-orang yang menolak iman, yang merobohkan batas tata susila, yang kejam, dan yang pikirannya terpaku pada niat berdosa; berlindunglah pada pengetahuan sejati dan tetaplah dalam pergaulan serta pengabdian kepada orang-orang saleh.

Verse 72

कामलोभग्रहाकीर्णा पड्चेन्द्रियजलां नदीम्‌ । नावं धृतिमयीं कृत्वा जन्मदुर्गाणि संतर,यह शरीर एक नदी है। पाँच इन्द्रियाँ इसमें जल हैं। काम और लोभरूपी मगर इसके भीतर भरे पड़े हैं। जन्म और मृत्युके दुर्गम प्रदेशमें यह नदी बह रही है। तुम धैर्यकी नावपर बैठो और इसके दुर्गम स्थानों--जन्म आदि क्लेशोंको पार कर जाओ

Tubuh ini laksana sungai: airnya adalah lima indra, dan di dalamnya berkerumun buaya-buaya hasrat dan ketamakan. Ia mengalir melalui medan yang sukar diseberangi, yakni putaran kelahiran berulang beserta deritanya. Maka, jadikan keteguhan sebagai perahu dan seberangilah bagian-bagian berbahaya itu—kesengsaraan yang bermula dari kelahiran.

Verse 73

क्रमेण संचितो धर्मो बुद्धियोगमयो महान्‌ | शिष्टाचारे भवेत्‌ साधू राग: शूक्लेव वाससि,जैसे कोई भी रंग सफेद कपड़ेपर ही अच्छी तरह खिलता है, उसी प्रकार शिष्टाचारका पालन करनेवाले पुरुषमें ही क्रमशः संचित किया हुआ बुद्धियोगमय महान्‌ धर्म भलीभाँति प्रकाशित होता है

Sebagaimana warna tampak paling cemerlang pada kain putih, demikian pula pada diri orang yang memelihara tata laku yang luhur, dharma agung yang berjiwa buddhi-yoga terkumpul setahap demi setahap dan memancar dengan jelas.

Verse 74

अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतहितं परम्‌ । अहिंसा परमो धर्म: स च सत्ये प्रतिष्ठित: । सत्ये कृत्वा प्रतिष्ठां तु प्रवर्तन्ते प्रवृत्तय:,अहिंसा और सत्यभाषण--ये समस्त प्राणियोंके लिये अत्यन्त हितकर हैं। अहिंसा सबसे महान्‌ धर्म है, परंतु वह सत्यमें ही प्रतिष्ठित है। सत्यके ही आधारपर श्रेष्ठ पुरुषोंके सभी कार्य आरम्भ होते हैं

Ahimsa (tanpa kekerasan) dan ucapan yang benar adalah kebajikan yang paling membawa manfaat bagi semua makhluk. Ahimsa adalah dharma tertinggi, namun ia tegak kokoh hanya bila berlandaskan satya (kebenaran). Ketika kebenaran dijadikan dasar, para insan mulia memulai segala ikhtiar, dan tindakan mereka berjalan pada jalan yang mantap.

Verse 75

सत्यमेव गरीयस्तु शिष्टाचारनिषेवितम्‌ । आचारक्न सतां धर्म: संतश्षाचारलक्षणा:,अतः शिष्ट पुरुषोंके आचारमें गृहीत सत्य ही सबसे अधिक गौरवकी वस्तु है। सदाचार ही श्रेष्ठ पुरुषोंका धर्म है। सदाचारसे ही संतोंकी पहचान होती है

Kebenaran—bila dipeluk dan dijalankan menurut tata laku orang-orang beradab—adalah nilai yang paling luhur. Keluhuran budi (sadachara) itulah dharma para insan baik; dan melalui keluhuran budi itulah para santa dan orang mulia dikenali.

Verse 76

यो यथाप्रकृतिर्जन्तुः स स्वां प्रकृतिम श्षुते । पापात्मा क्रोधकामादीन्‌ दोषानाप्रोत्यनात्मवान्‌,जिस जीवकी जैसी प्रकृति होती है, वह अपनी प्रकृतिका ही अनुसरण करता है। अपने मनको वशमें न रखनेवाला पापात्मा पुरुष ही काम, क्रोध आदि दोषोंको प्राप्त होता है

Setiap makhluk bertindak menurut tabiat bawaannya; ia niscaya mengikuti kodratnya sendiri. Orang berdosa—yang tidak memiliki penguasaan diri—itulah yang terjerumus ke dalam cela seperti nafsu dan amarah.

Verse 77

आरम्भोन्याययुक्तो य: स हि धर्म इति स्मृत: । अनाचारस्त्वधर्मेति एतच्छिष्टानुशासनम्‌,“जो आरम्भ न्याययुक्त हो, वही धर्म कहा गया है। इसके विपरीत जो अनाचार है, वह अधर्म है'--ऐसा शिष्ट पुरुषोंका कथन है

Suatu ikhtiar yang sejak awal selaras dengan keadilan, itulah yang dikenang sebagai dharma. Sebaliknya, perilaku yang menyimpang dari tata laku benar adalah adharma—demikianlah ajaran para insan berbudaya dan berdisiplin.

Verse 78

अक्कुद्धयन्तो5नसूयन्तो निरहड्कारमत्सरा: । ऋजव: शमसम्पना: शिष्टाचारा भवन्ति ते,जिनमें क्रोधका अभाव है, जो दूसरोंके दोष नहीं देखते, जिनमें अहंकार और ईर्ष्याका अभाव है, जो सरल तथा मनोनिग्रहसे सम्पन्न हैं, वे शिष्टाचारी कहलाते हैं

Mereka yang bebas dari amarah, tidak gemar mencari-cari cela orang lain, tanpa ego dan iri hati, lurus dalam laku, serta kaya akan pengendalian diri—merekalah yang dikenal sebagai insan beradab dan berperilaku mulia.

Verse 79

त्रैविद्यवृद्धा: शुचयो वृत्तवन्तो मनस्विन: । गुरुशुश्रूषवो दान्ता: शिष्टाचारा भवन्त्युत,'जो तीनों वेदोंके विद्वानोंमें श्रेष्ठ, पवित्र, सदाचारी, मनस्वी, गुरुसेवक और जितेन्द्रिय हैं, वे शिष्टाचारी कहे जाते हैं

Mereka yang terunggul di antara para pengenal tiga Weda—suci dalam laku, teguh dalam hidup benar, berjiwa kuat, tekun melayani guru, dan mampu mengekang indria—merekalah yang disebut insan beradab dengan tata laku teladan.

Verse 80

तेषामहीनसत्त्वानां दुष्कराचारकर्मणाम्‌ | स्वै: कर्मभि: सत्कृतानां घोरत्वं सम्प्रणश्यति,जो सत्त्वगुणसे सम्पन्न हैं, जिनके आचार और कर्म पापियोंके लिये कठिन हैं तथा जो संसारमें अपने सत्कमोके द्वारा सत्कृत हैं, उनके हिंसा आदि दोष स्वतः नष्ट हो जाते हैं

Mereka yang kaya akan sifat sattwa, yang laku dan perbuatannya sukar ditiru oleh para pendosa, dan yang dimuliakan di dunia karena kebajikannya—pada diri mereka, kekejaman dan cela-cela yang mengerikan pun lenyap dengan sendirinya.

Verse 81

त॑ सदाचारमाश्चर्य पुराणं शाश्वतं ध्रुवम्‌ । धर्म धर्मेण पश्यन्त: स्वर्ग यान्ति मनीषिण:,जिसका श्रेष्ठ पुरुषोंने पालन किया है, जो अनादि, सनातन और नित्य है, उस धर्मको धर्मदृष्टिसे ही देखनेवाले मनीषी पुरुष स्वर्गलोकमें जाते हैं

Tata laku benar itu sungguh menakjubkan—purba, kekal, dan tak tergoyahkan. Para bijak yang memandang dharma dengan ukuran dharma itu sendiri, mencapai surga.

Verse 82

आस्तिका मानहीनाश्च द्विजातिजनपूजका: । श्रुतवृत्तोपसम्पन्ना: सन्त: स्वर्गनिवासिन:,जो आस्तिक, अहंकारशून्य, ब्राह्मणोंका समादर करनेवाले, विद्वान्‌ और सदाचारसे सम्पन्न हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष स्वर्गमें निवास करते हैं

Mereka yang beriman (āstika), bebas dari kesombongan, menghormati kaum dwija, serta diperkaya oleh pengetahuan śruti dan laku benar—orang-orang saleh demikian berdiam di surga.

Verse 83

धारणं चापि विद्यानां तीर्थानामवगाहनम्‌

Memegang teguh dan mempraktikkan ilmu, serta berendam/mandi dengan hormat di tīrtha (tempat suci)—ini pun patut dilakukan.

Verse 84

सर्वभूतदयावन्तो अहिंसानिरता: सदा

Mereka berbelas kasih kepada semua makhluk hidup dan senantiasa teguh dalam ahimsa (tanpa kekerasan).

Verse 85

शुभानामशुभानां च कर्मणां फलसंचये

Dalam penimbunan buah perbuatan—baik yang mulia maupun yang tercela—

Verse 86

न्यायोपेता गुणोपेता: सर्वलोकहितैषिण:

Mereka yang berpegang pada keadilan dan kelurusan budi, berhias kebajikan mulia, serta menghendaki kesejahteraan semua insan—merekalah tolok ukur untuk mengenali laku yang benar.

Verse 87

दातार: संविभक्तारो दीनानुग्रहकारिण:,जो सबको दान देनेवाले, अपने कुट॒म्बीजनोंमें प्रत्येक वस्तुको समानरूपसे बाँटकर उसका उपयोग करनेवाले, दीनजनोंपर कृपाभाव बनाये रखनेवाले, शास्त्रज्ञानके धनी, सबके लिये समादरणीय, तपस्वी और समस्त प्राणियोंके प्रति दयालु हैं, वे श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सम्मानित शिष्ट कहे गये हैं

Sang pemburu berkata: “Mereka yang dermawan, yang membagi apa yang dimiliki dengan adil di dalam rumah tangganya, yang menaruh belas kasih kepada kaum papa, yang kaya akan pengetahuan śāstra, yang dihormati semua orang, yang teguh dalam tapa, dan yang berwelas asih kepada setiap makhluk—mereka dihormati oleh insan terbaik dan disebut ‘śiṣṭa’, kaum yang berbudaya dan benar.”

Verse 88

सर्वपूज्या: श्रुतधनास्तथैव च तपस्विन: । सर्वभूतदयावन्तस्ते शिष्टा: शिष्टसम्मता:,जो सबको दान देनेवाले, अपने कुट॒म्बीजनोंमें प्रत्येक वस्तुको समानरूपसे बाँटकर उसका उपयोग करनेवाले, दीनजनोंपर कृपाभाव बनाये रखनेवाले, शास्त्रज्ञानके धनी, सबके लिये समादरणीय, तपस्वी और समस्त प्राणियोंके प्रति दयालु हैं, वे श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सम्मानित शिष्ट कहे गये हैं

Sang pemburu berkata: “Mereka yang dipuja oleh semua, kaya akan śruti-dhana (kekayaan ajaran suci: Veda dan śāstra), serta tekun bertapa; dan yang berbelas kasih kepada semua makhluk—merekalah yang disebut ‘śiṣṭa’, dan diakui demikian oleh para śiṣṭa sendiri.”

Verse 89

दानशिष्टा: सुखॉल्लोकानाप्रुवन्तीह च श्रियम्‌ । पीडया च कतलत्रत्रस्य भृत्यानां च समाहिता:,जो दानसे अवशिष्ट वस्तुका उपयोग करनेवाले हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष इस लोकमें सम्पत्ति और परलोकमें सुखमय लोक प्राप्त करते हैं। शिष्ट पुरुषोंक पास जब उत्तम पुरुष कुछ माँगनेके लिये पधारते हैं, उस समय वे अपनी स्त्री तथा कुट॒म्बी जनोंको कष्ट देकर सभी मनोयोगपूर्वक अपनी शक्तिसे अधिक दान देते हैं। न्यायपूर्वक लोकयात्राका निर्वाह कैसे हो? धर्मकी रक्षा और आत्माका कल्याण किस प्रकार हो? इन्हीं बातोंकी ओर उनकी दृष्टि रहती है

Sang pemburu: “Mereka yang hidup dari sisa setelah memberi derma memperoleh kemakmuran di dunia ini dan alam-alam bahagia di kemudian hari. Sekalipun hal itu memberatkan rumah tangga dan para tanggungan, orang-orang yang sungguh berdisiplin tetap tekun dalam memberi—dengan perhatian penuh, bahkan melampaui kemampuan yang tampak. Pandangan mereka tertambat pada bagaimana menegakkan perjalanan hidup dengan keadilan, menjaga dharma, dan mengusahakan kesejahteraan batin.”

Verse 90

अतिशतक्त्या प्रयच्छन्ति सन्त: सद्धि: समागता: । लोकयात्रां च पश्यन्तो धर्ममात्महितानि च,जो दानसे अवशिष्ट वस्तुका उपयोग करनेवाले हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष इस लोकमें सम्पत्ति और परलोकमें सुखमय लोक प्राप्त करते हैं। शिष्ट पुरुषोंक पास जब उत्तम पुरुष कुछ माँगनेके लिये पधारते हैं, उस समय वे अपनी स्त्री तथा कुट॒म्बी जनोंको कष्ट देकर सभी मनोयोगपूर्वक अपनी शक्तिसे अधिक दान देते हैं। न्यायपूर्वक लोकयात्राका निर्वाह कैसे हो? धर्मकी रक्षा और आत्माका कल्याण किस प्रकार हो? इन्हीं बातोंकी ओर उनकी दृष्टि रहती है

Orang-orang baik, ketika didatangi mereka yang patut, memberi bahkan melampaui kemampuan. Dengan memandang pemeliharaan hidup duniawi yang semestinya, penjagaan dharma, dan apa yang menuntun pada kesejahteraan batin, mereka mempersembahkan derma dengan perhatian penuh dan tekad yang teguh.

Verse 91

एवं सन्‍्तो वर्तमानास्त्वेधन्ते शाश्वती: समा: । अहिंसा सत्यवचनमानृशंस्यमथार्जवम्‌

Demikianlah, mereka yang hidup sebagai orang suci dan berbudi terus bertumbuh sepanjang tahun-tahun yang seakan tak berkesudahan. Tanpa kekerasan, tutur yang benar, welas asih (tanpa kekejaman), dan kelurusan yang jujur—itulah sifat-sifat yang menopang dan memakmurkan hidup demikian.

Verse 92

अद्रोहो नाभिमानश्र ह्वीस्तितिक्षा दम: शम: । धीमन्तो धृतिमन्तश्न॒ भूतानामनुकम्पका:

Tanpa permusuhan, bebas dari kesombongan, rasa malu yang luhur, ketabahan, pengendalian diri, dan ketenangan batin—mereka yang bijaksana dan teguh berbelas kasih kepada semua makhluk hidup.

Verse 93

अकामद्वेषसंयुक्तास्ते सन्‍तो लोकसाक्षिण: | ऐसा बर्ताव करनेवाले संत पुरुष अनन्त कालतक उन्नतिकी ओर अग्रसर होते रहते हैं। जो अहिंसा, सत्यभाषण, कोमलता, सरलता, अद्रोह, अहंकारका त्याग, लज्जा, क्षमा, शम, दम--इन गुणोंसे युक्त बुद्धिमान, धैर्यवान्‌ समस्त प्राणियोंपर अनुग्रह करनेवाले तथा राग- द्वेषसे रहित हैं, वे संत सम्पूर्ण लोकोंके लिये प्रमाणभूत हैं ।। त्रीण्येव तु पदान्याहु: सतां व्रतमनुत्तमम्‌

Mereka yang suci, bebas dari hasrat dan kebencian, berdiri sebagai saksi bagi dunia. Dan para bijak menyatakan bahwa laku-ikrar tertinggi kaum berbudi dapat diringkas hanya dalam tiga langkah (tiga prinsip).

Verse 94

सर्वत्र च दयावन्त: सन्त: करुणवेदिन:,जो सर्वत्र दया करते हैं, जिनके हृदयमें करुणाकी अनुभूति होती है, वे श्रेष्ठ पुरुष इस लोकमें अत्यन्त संतुष्ट रहकर धर्मके उत्तम पथपर चलते हैं। जिन्होंने धर्मको अपनाये रखनेका दृढ़ निश्चय कर लिया है, वे ही महात्मा सदाचारी हैं

Sang pemburu berkata: “Mereka yang berbelas kasih di mana-mana—orang-orang baik yang sungguh merasakan derita sesama—hidup di dunia ini dengan kepuasan yang mendalam dan menapaki jalan dharma yang luhur. Hanya mereka yang berketetapan hati untuk menegakkan dharma-lah yang disebut mahatma dan benar-benar berbudi.”

Verse 95

गच्छन्तीह सुसंतुष्टा धर्मपन्थानमुत्तमम्‌ । शिष्टाचारा महात्मानो येषां धर्म: सुनिश्चित:,जो सर्वत्र दया करते हैं, जिनके हृदयमें करुणाकी अनुभूति होती है, वे श्रेष्ठ पुरुष इस लोकमें अत्यन्त संतुष्ट रहकर धर्मके उत्तम पथपर चलते हैं। जिन्होंने धर्मको अपनाये रखनेका दृढ़ निश्चय कर लिया है, वे ही महात्मा सदाचारी हैं

Di dunia ini, para mahatma yang berdisiplin dalam laku dan teguh dalam dharma berjalan dengan kepuasan yang mendalam, menapaki jalan dharma yang tertinggi. Berwelas asih kepada semua makhluk, merekalah yang sungguh mulia—tak tergoyahkan dalam tekad menegakkan dharma.

Verse 96

अनसूया क्षमा शान्ति: संतोष: प्रियवादिता । कामक्रोधपरित्याग: शिष्टाचारनिषेवणम्‌

Bebas dari iri, pemaaf, tenteram, puas, dan bertutur lembut; meninggalkan nafsu dan amarah; serta tekun mempraktikkan tata laku yang halus dan berdisiplin—itulah sifat-sifat yang patut dibina.

Verse 97

शिष्टाचारं निषेवन्ते नित्यं धर्ममनुव्रता:

Para pengikut dharma yang teguh senantiasa mempraktikkan tata laku yang beradab dan berdisiplin.

Verse 98

प्रज्ञाप्रासादमारुह मुच्यन्ते महतो भयात्‌ | प्रेक्षन्तो लोकवृत्तानि विविधानि द्विजोत्तम

Wahai brahmana terbaik, mereka yang naik ke istana kebijaksanaan terbebas dari ketakutan besar. Dari ketinggian itu mereka memandang jelas beragam laku dunia—melihatnya tanpa terguncang olehnya.

Verse 99

अतिपुण्यानि पापानि तानि द्विजवरोत्तम | द्विजश्रेष्ठ! जो धर्मात्मा पुरुष सदा शिष्टाचारका सेवन करते हैं और प्रज्ञारूपी प्रासादपर आरूढ़ हो भाँति-भाँतिके लोकचरित्रोंका निरीक्षण तथा अत्यन्त पुण्य एवं पापकर्मोंकी समीक्षा करते हैं, वे महान्‌ भयसे मुक्त हो जाते हैं || ९७-९८ $ ।। एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम्‌ । शिष्टाचारगुणं ब्रह्मन्‌ पुरस्कृत्य द्विजर्षभ,ब्रह्मन्‌! विप्रवर! इस प्रकार शिष्टाचारके गुणोंके सम्बन्धमें मैंने जैसा जाना और सुना है, वह सब आपसे कह सुनाया है

Sang pemburu berkata: “Wahai yang terbaik di antara para brahmana, ada perbuatan yang amat luhur pahalanya dan ada pula perbuatan dosa. Namun orang yang berhati dharma, yang senantiasa menempuh tata laku para śiṣṭa (orang beradab), seakan-akan bertakhta di istana kebijaksanaan: ia menilik aneka perilaku dunia dan menimbang dengan saksama mana tindakan yang sungguh bajik dan mana yang patut dicela—ia terbebas dari ketakutan besar. Demikianlah, wahai Brahmana, wahai yang utama di antara kaum dwija, telah kusampaikan kepadamu semuanya, sejauh pengetahuanku dan sebagaimana yang kudengar, dengan menempatkan keunggulan śiṣṭācāra di muka.”

Verse 206

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेययमास्यापर्वमें पतिव्रतोपाख्यानविषयक दो सौ छठाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-206 dalam Vana Parva Śrī Mahābhārata, pada bagian Markandeya-samāsya, yang memuat kisah tentang pativratā (istri yang teguh setia).

Verse 207

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे सप्ताधिकद्धिशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेययमास्यापर्वमें ब्राह्मणव्याधसंवादविषयक दो सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-207 dalam Vana Parva Śrī Mahābhārata, pada bagian Markandeya-samāsya, mengenai dialog antara brahmana dan pemburu.

Verse 436

सम्प्रतस्थे स मिथिलां कौतूहलसमन्वित: । मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके वह कौतूहलवश मिथिलापुरीकी ओर चल दिया। पतिव्रता स्त्री बगुली पक्षीवाली घटना स्वयं जान गयी थी और उसने धर्मानुकूल शुभ वचनोंद्वारा उपदेश दिया था, इन कारणोंसे उसकी बातोंपर कौशिक ब्राह्मणकी बड़ी श्रद्धा हो गयी थी

Markandeya berkata: Kemudian ia berangkat menuju Mithilā, digerakkan oleh rasa ingin tahu. Setelah menetapkan tekad dalam batin, ia melangkah ke arah kota itu. Karena sang pativratā telah memahami sendiri peristiwa tentang burung yang menyerupai bangau dan menasihatinya dengan kata-kata baik yang selaras dengan dharma, maka brāhmaṇa Kauśika menaruh keyakinan yang mendalam pada petuahnya.

Verse 826

वेदोक्त: परमो धर्मो धर्मशास्त्रेषु चापर: । शिष्टाचारश्न शिष्टानां त्रिविधं धर्मलक्षणम्‌ | जिसका वेदोंमें वर्णन है, वह धर्मका पहला लक्षण है। धर्मशास्त्रोंमें जिसका प्रतिपादन किया गया है, वह धर्मका दूसरा लक्षण है और शिष्टाचार धर्मका तीसरा लक्षण है। इस प्रकार शिष्ट पुरुषोंने धर्मके तीन लक्षण स्वीकार किये हैं

Sang pemburu berkata: “Dharma yang diajarkan dalam Veda adalah tanda tertinggi kebenaran. Yang ditetapkan dalam Dharmaśāstra adalah tanda yang lain. Dan śiṣṭācāra—tata laku para śiṣṭa—adalah tanda ketiga. Demikianlah orang bijak mengenali tiga ciri yang menandai dan menegakkan dharma.”

Verse 833

क्षमा सत्यार्जवं शौचं सतामाचारदर्शनम्‌ | सब विद्याओंका अध्ययन, सब तीथोंमें स्नान, क्षमा, सत्य, सरलता और शौच (पवित्रता)--ये श्रेष्ठ पुरुषोंके आचारको लक्षित करानेवाले हैं

Sang pemburu berkata: “Kesabaran memaafkan, kebenaran, kelurusan hati, dan kemurnian—itulah tanda-tanda yang membuat laku para bajik dikenali. Bahkan, mempelajari segala cabang pengetahuan dan mandi di semua tirtha suci, beserta pengampunan, kebenaran, kesederhanaan, dan kebersihan—itulah pertanda yang menyingkap jalan hidup orang-orang yang sungguh mulia.”

Verse 843

परुषं च न भाषन्ते सदा सन्‍्तो द्विजप्रिया: । जो समस्त प्राणियोंपर दया करते, सदा अहिंसा-धर्मके पालनमें तत्पर रहते और कभी किसीसे कटु वचन नहीं बोलते, ऐसे संत सदा समस्त द्विजोंके प्रिय होते हैं

Orang-orang bajik, yang senantiasa dicintai para dvija, tidak berkata kasar. Mereka yang berbelas kasih kepada semua makhluk, teguh dalam dharma ahimsa, dan tak pernah mengucapkan kata pahit—merekalah yang selalu dikasihi kaum terpelajar dan saleh.

Verse 863

सन्त: स्वर्गजित:ः शुक्ला: संनिविष्ट श्च सत्पथे । जो न्यायपरायण, सदगुणसम्पन्न, सब लोगोंका हित चाहनेवाले, हिंसारहित और सन्मार्गपर चलनेवाले हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष स्वर्गलोकपर विजय पाते हैं

Mereka yang benar—murni dalam laku dan teguh di jalan yang mulia—itulah para penakluk surga. Yang berpegang pada keadilan, kaya kebajikan, menghendaki kesejahteraan semua makhluk, bebas dari kekerasan, dan setia pada jalan luhur: orang-orang unggul demikian meraih kemenangan di alam surga.

Verse 933

न चैव द्रह्मेद्‌ दद्याच्च सत्यं चैव सदा वदेत्‌ । श्रेष्ठ पुरुष तीन ही पद बताते हैं--किसीसे द्रोह न करे, दान करे और सदा सत्य ही बोले। यह श्रेष्ठ पुरुषोंका सर्वोत्तम व्रत है

Sang pemburu berkata: “Jangan berkhianat kepada siapa pun; berdermalah; dan ucapkan kebenaran senantiasa. Inilah tiga langkah yang diajarkan para luhur—tanpa pengkhianatan, kedermawanan, dan kejujuran. Inilah nazar tertinggi kaum mulia.”

Verse 966

कर्म च श्रुतसम्पन्नं सतां मार्गमनुत्तमम्‌ | दोषदृष्टिका अभाव, क्षमा, शान्ति, संतोष, प्रियभाषण और काम-क्रोधका त्याग, शिष्टाचारका सेवन और शास्त्रके अनुकूल कर्म करना--यह श्रेष्ठ पुरुषोंका अति उत्तम मार्ग है

Sang pemburu berkata: “Berbuat benar dan diperkaya oleh ajaran suci (śruti-śāstra)—itulah jalan tak tertandingi bagi orang baik. Tidak gemar mencari-cari cela, pemaafan, ketenteraman batin, rasa cukup, tutur kata lembut dan menyenangkan, serta meninggalkan nafsu dan amarah; membiasakan tata krama yang luhur dan bertindak selaras dengan śāstra—itulah jalan tertinggi para mulia.”

Verse 8536

विपाकमभिजानन्ति ते शिष्टा: शिष्टसम्मता: । जो शुभ और अशुभ कर्मोके फलसंचयसे सम्बन्ध रखनेवाले परिणामको जानते हैं, वे शिष्ट कहे गये है और शिष्ट पुरुषोंमें उनका समादर होता है

Mereka yang sungguh memahami pematangan (vipāka) dari perbuatan—bagaimana karma baik dan buruk terhimpun lalu berbuah—disebut ‘śiṣṭa’, orang-orang berbudaya; dan di kalangan para śiṣṭa sendiri mereka dihormati serta diterima.

Frequently Asked Questions

To preserve and transmit a structured mnemonic map in which lineage and named figures are indexed by defining qualities, enabling readers to connect cosmology, ritual vocabulary, and genealogical memory.

Each figure is introduced with a distinguishing semantic cue—beauty, attachment, subtle visibility, sacrificial radiance, greatness in rites, or a marked epithet—so the name operates as an attribute-label rather than merely an identifier.

In the provided passage, no explicit phalaśruti is stated; the meta-function is implicit in the rishi’s cataloging style, which frames knowledge as preservation of order and meaning through enumerative record.