Adhyaya 32
Karna ParvaAdhyaya 3277 Versesयह अध्याय प्रत्यक्ष द्वंद्व नहीं, युद्ध-शिविर के भीतर मनोबल/नीति-निर्माण का अंतराल है; पुराण-कथा के माध्यम से कौरव पक्ष अपने ‘उपाय’ और ‘आश्रय’ की मानसिक तैयारी करता है।

Adhyaya 32

Karṇa’s advance against the Pāṇḍava host; Arjuna’s clash with the Saṃśaptakas (कर्णस्य पाण्डवसेनाप्रवेशः—अर्जुनस्य संशप्तकसंप्रहारः)

Upa-parva: Saṃśaptaka–Rādheya Abhiyāna (Strategic engagement around Arjuna and Karṇa’s advance)

Dhṛtarāṣṭra asks Sañjaya how Arjuna confronted the Saṃśaptakas and how Karṇa proceeded against the Pāṇḍavas. Sañjaya reports that Arjuna re-ordered formations against the hostile array, producing a tumultuous engagement marked by rapid destruction of chariots, standards, elephants, and weapon-bearing arms. Parallelly, a broader coalition battle unfolds among Pāñcālas, Cedis, Sṛñjayas, and Kaurava allies (Kṛpa, Kṛtavarman, Śakuni, and others). Dhṛtarāṣṭra then presses for details of Karṇa’s penetration and the defenders who attempted to halt him. Sañjaya describes intense sonic and atmospheric imagery as Karṇa, enraged, employs swift weaponry to cut down numerous rathins and infantry contingents, including notable Pāñcāla figures, while his sons (Suṣeṇa, Satya-sena, Vṛṣasena) and Kaurava protectors form a defensive screen. Counterattacks by Bhīma, Nakula, Sahadeva, Sātyaki, Dhṛṣṭadyumna, Śikhaṇḍin, and others momentarily check Karṇa’s momentum; Satya-sena is felled, and multiple chariot-disablements occur. The chapter closes with both sides regrouping into renewed confrontation: the Pāṇḍavas protect Yudhiṣṭhira from Karṇa’s approach while Kaurava forces protect Karṇa, restoring a balanced but highly volatile battle line.

Chapter Arc: रणभूमि के बीच, दुर्योधन शल्य से कहता है—“हे मद्रराज, अब मैं तुम्हें वही सुनाता हूँ जो महर्षि मार्कण्डेय ने पूर्वकाल में कहा था; बिना संदेह मन लगाकर सुनो।” युद्ध की धूल में अचानक पुराण-कथा का द्वार खुलता है। → दुर्योधन देव-दानव संग्राम की पृष्ठभूमि खींचता है—जिगीषा से भरे देव और असुर, और तीन दैत्यराजों के त्रिपुर (स्वर्ण, रजत, लौह) जिनकी अभेद्यता लोकों पर भय बनकर छा जाती है। मयासुर के आश्रय से वे निर्भय होकर अप्राप्य वस्तुएँ भी पा लेते हैं; देवताओं के लिए यह केवल युद्ध नहीं, व्यवस्था का संकट बन जाता है। → जब त्रिपुरों के कारण समस्त लोक पीड़ित होने लगते हैं, तब इन्द्र सहित देवता चारों ओर से वज्रपात कर आक्रमण करते हैं; पर त्रिपुरों की मायिक-यांत्रिक शक्ति और दैत्यराजों का तेज देव-बल को भी चुनौती देता है। देवता तप-नियम में स्थित होकर ‘सर्वात्मा’ महात्मा (शिव/भव) की शरण लेते हैं और स्तुति करते हैं—यही मोड़ कथा को निर्णायक दिशा देता है। → देवताओं की सामूहिक शरणागति, तप और स्तुति से यह स्थापित होता है कि त्रिपुर-विनाश का उपाय केवल बाहुबल नहीं, दिव्य अनुग्रह और सही साधन-चयन है; दुर्योधन शल्य को संकेत देता है कि जैसे देवता संकट में श्रेष्ठ आश्रय लेते हैं, वैसे ही कौरवों को भी अपने लक्ष्य के लिए कठोरता और नीति साधनी होगी। → देवताओं की स्तुति से प्रसन्न ‘भव’ क्या वर देंगे, और त्रिपुर-वध का वास्तविक उपाय कैसे बनेगा—कथा वहीं अधर में लटकती है, जैसे युद्ध के बीच दुर्योधन का मन भी किसी निर्णायक ‘उपाय’ की खोज में ठहरा हो।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका $ श्लोक मिलाकर कुल ६६ ३ “लोक हैं) शीस्स्न्श्मास्स शत भ्निध्रॉभ्राध्स त्रयस्त्रिंशो5 ध्याय: दुर्योधनका शल्यसे त्रिपुरोंकी उत्पत्तिका वर्णन, त्रिपुरोंसे भयभीत इन्द्र आदि देवताओंका ब्रह्माजीके साथ भगवान्‌ शंकरके पास जाकर उनकि स्तुति करना दुर्योधन उवाच भूय एव तु मद्रेश यत्ते वक्ष्यामि तच्छृणु । यथा पुरावृत्तमिदं युद्धे देवासुरे विभो,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये

Duryodhana said: “O lord of Madra, listen again to what I am about to tell you. O mighty one, I shall relate exactly how this occurred in ancient times during the war between the gods and the demons. Attend to it with a steady mind; you need not entertain any doubt or alternative interpretation about it.”

Verse 2

यदुक्तवान्‌ पितुर्महां मार्कण्डेयो महानृषि: । तदशेषेण ब्रुवतो मम राजर्षिसत्तम,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये

Duryodhana said: “O best of royal sages, listen with a steady mind. I shall recount in full what the great sage Mārkaṇḍeya once told my father—an ancient episode that occurred at the time of the war between the gods and the demons. Attend to it without hesitation or second-guessing, for it bears directly on the matter at hand.”

Verse 3

देवानामसुराणां च परस्परजिगीषया,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये

Duryodhana said: “In the ancient conflict between the gods and the Asuras, each striving to conquer the other—listen to this with a steady mind. Here you should not entertain doubts or second thoughts.”

Verse 4

बभूव प्रथमो राजन्‌ संग्रामस्तारकामय: । राजन! देवताओं और असुरोंमें परस्पर विजय पानेकी इच्छासे सर्वप्रथम तारकामय संग्राम हुआ था ।। निर्जिताश्व तदा दैत्या दैवतैरिति न: श्रुतम्‌,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “O King, the very first great battle was the Tārakāmaya war, fought from the desire of gods and demons to win victory over one another. We have heard that in that conflict the Daityas were defeated by the gods. Therefore, attend to this with a steady mind; you need not entertain doubt or over-deliberation about it.”

Verse 5

निर्जितिषु च दैत्येषु तारकस्य सुतास्त्रय: । ताराक्ष: कमलाक्षश्न विद्युन्माली च पार्थिव,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “When the Daityas had been defeated, O king, there were three sons of Tāraka—Tārākṣa, Kamalākṣa, and Vidyunmālī. Attend to this with a steady mind; you should not entertain doubts about it. Having undertaken fierce austerities, they remained established in the highest discipline of vows.”

Verse 6

तपसा कर्शयामासुर्देहान्‌ स्वान्‌ शत्रुतापन,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “O scorcher of foes, they wasted their own bodies by austerity. Listen to this with a steady mind; you should not entertain doubts or second thoughts about it.”

Verse 7

तेषां पितामह: प्रीतो वरद: प्रददौ बरम्‌,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “Their Grandsire, pleased and ever a giver of boons, granted them a boon. Listen to this with a steady mind; you need not entertain any doubt or second-guessing about it.”

Verse 8

अवध्यत्वं च ते राजन्‌ सर्वभूतस्य सर्वदा । सहिता वरयामासु: सर्वलोकपितामहम्‌,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “O King, they asked for invulnerability at all times against every being. United together, they sought a boon from the Grandsire of all the worlds (Brahmā). Understand this with a steady mind; you should not entertain any doubt about it.”

Verse 9

राजन! उनपर प्रसन्न होकर वरदायक भगवान्‌ ब्रह्मा उन्हें वर देनेको उद्यत हुए। उस समय उन तीनोंने एक साथ होकर सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्मासे यह वर माँगा कि “हम सदा सम्पूर्ण भूतोंसे अवध्य हों” ।। तानब्रवीत्तदा देवो लोकानां प्रभुरी श्वर: । नास्ति सर्वामरत्वं वै निवर्तध्वमितो5सुरा:,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “O king of Madra, listen again to what I say. Long ago, when the gods and the demons fought, Brahmā—the gracious giver of boons—became pleased with those three and prepared to grant them a favor. United together, they asked the Grandfather of all worlds for this boon: ‘May we always be invulnerable to all beings.’ Then the Lord of the worlds replied: ‘Complete immortality for all is not possible. Turn back from this demand, O Asuras. Understand this with a steady mind; there is no need for further argument.’ This is the ancient account that the sage Mārkaṇḍeya once narrated to my father, and I now relate it fully to you. It is said that the gods defeated the Dāityas. After their defeat, Tārakāsura’s three sons—Tārakṣa, Kamalākṣa, and Vidyunmālī—took refuge in fierce austerity and observed the highest disciplines. The episode frames a moral boundary: even divine power does not overturn the cosmic order, and desire for absolute invulnerability must yield to the limits of dharma and reality.”

Verse 10

अन्‍्यं वरं वृणीध्वं वै यादृशं सम्प्ररोचते । तब लोकनाथ भगवान्‌ ब्रह्माने उनसे कहा--“असुरो! सबके लिये अमरत्व सम्भव नहीं है। तुम इस तपस्यासे निवृत्त हो जाओ और दूसरा कोई वर जैसा तुम्हें रुचे माँग लो” ।। ९३ || ततस्ते सहिता राजन्‌ सम्प्रधार्यासकृत्‌ प्रथम्‌,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “O king of Madra, having first reflected on this matter again and again, listen to it with a steady mind; you should not entertain doubt about it. In former times, when the gods had defeated the Daityas, the three sons of Tārakāsura—Tārakākṣa, Kamalākṣa, and Vidyunmālī—undertook fierce austerities and remained established in the highest disciplines.”

Verse 11

सर्वलोकेश्च॒रं वाक्‍्यं प्रणम्येदमथाब्रुवन्‌ । राजन्‌! तब उन सबने एक साथ बारंबार विचार करके सर्वलोकेश्वर भगवान्‌ ब्रह्माको शीश नवाकर उनसे इस प्रकार कहा-- ।। १० $ ।। अस्मथ्यं त्वं वरं देव सम्प्रयच्छ पितामह,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे (वस्तुमिच्छाम नगरं कृत्वा कामगमं शुभम्‌ | सर्वकामसमृद्धार्थमवध्यं देवदानवै: ।। यक्षरक्षोरगगणै्नानाजातिभिरेव च । न कृत्याभिरनन शस्त्रैश्व न शापैर्ब्रह्यवादिनाम्‌ ।। वध्येत त्रिपुरं देव प्रसन्ने त्वयि सादरम्‌ ।। “पितामह! देव! हम सबको आप वर प्रदान कीजिये। हमलोग इच्छानुसार चलनेवाला नगराकार सुन्दर विमान बनाकर उसमें निवास करना चाहते हैं। हमारा वह पुर सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंसे सम्पन्न तथा देवताओं और दानवोंके लिये अवध्य हो। देव! आपके सादर प्रसन्न होनेसे हमारे तीनों पुर यक्ष, राक्षस, नाग तथा नाना जातिके अन्य प्राणियोंद्वारा भी विनष्ट न हों। उन्हें न तो कृत्याएँ नष्ट कर सकें, न शस्त्र छिन्न-भिन्न कर सकें और न ब्रह्मवादियोंके शापोंद्वारा ही इनका विनाश हो”

Duryodhana said: “O King of Madra, listen again to what I submit. O Lord, in the ancient conflict between gods and demons, a certain event occurred—one that the sage Mārkaṇḍeya narrated to my father. I shall recount it fully; attend to it with a steady mind and do not entertain doubt about it. It is heard that the gods defeated the Daityas; and after their defeat, Tārakāsura’s three sons—Tārakṣa, Kamalākṣa, and Vidyunmālī—undertook fierce austerities, firmly established in the highest disciplines.”

Verse 12

ब्रह्मोवाच विलय: समयस्यान्ते मरणं जीवितस्य च । इति वित्त वधोपायं कज्चिदेव निशाम्यत ।।) ब्रह्माजीने कहा--दैत्यो! समय पूरा होनेपर सबका लय होता है। जो आज जीवित है, उसकी भी एक दिन मृत्यु होती है। इस बातको अच्छी तरह समझ लो और इन तीनों पुरोंके वधका कोई निमित्त कह सुनाओ। दैत्या ऊचु: वयं पुराणि त्रीण्येव समास्थाय महीमिमाम्‌ | विचरिष्याम लोके<रस्मिंस्त्वत्प्रसादपुरस्कृता:,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे दैत्य बोले--भगवन्‌! हम तीनों पुरोंमें ही रहकर इस पृथ्वीपर एवं इस जगतमें आपके कृपा-प्रसादसे विचरेंगे

Brahmā said: “At the end of the allotted time, dissolution comes; and for what is alive, death too is certain. Understand this well, and then discern some means—some occasion or instrument—by which the destruction may be brought about.”

Verse 13

ततो वर्षसहस्रे तु समेष्याम: परस्परम्‌ । एकीभावं गमिष्यन्ति पुराण्येतानि चानघ,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे अनघ! तदनन्तर एक हजार वर्ष पूर्ण होनेपर हमलोग एक-दूसरेसे मिलेंगे। भगवन्‌! ये तीनों पुर जब एकत्र होकर एकीभावको प्राप्त हो जाय, उस समय जो एक ही बाणसे इन तीनों पुरोंको नष्ट कर सके, वही देवेश्वर हमारी मृत्युका कारण होगा

Then, after a thousand years, we shall meet one another. And when these ancient cities (the three aerial forts) come together and become one, understand this with a steady mind, O sinless one—there should be no doubt in you about it. (The narrative implies a fated condition: only when the three forts align into a single unity can they be destroyed, and that too by a single arrow.)

Verse 14

समागतानि चैतानि यो हन्याद्‌ भगवंस्तदा । एकेषुणा देववर: स नो मृत्युर्भविष्यति,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे अनघ! तदनन्तर एक हजार वर्ष पूर्ण होनेपर हमलोग एक-दूसरेसे मिलेंगे। भगवन्‌! ये तीनों पुर जब एकत्र होकर एकीभावको प्राप्त हो जाय, उस समय जो एक ही बाणसे इन तीनों पुरोंको नष्ट कर सके, वही देवेश्वर हमारी मृत्युका कारण होगा

Duryodhana said: “O revered one, when these three come together and become one, whoever then can destroy them with a single arrow—he, the best among the gods, will be the cause of our death. Grasp this with a steady mind; you should not give place to doubt or second thoughts.”

Verse 15

एवमस्त्विति तान्‌ देव: प्रत्युक्त्वा प्राविशद्‌ दिवम्‌ ते तु लब्धवरा: प्रीता: सम्प्रधार्य परस्परम्‌,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे “एवमस्तु” (ऐसा ही हो) यों कहकर भगवान्‌ ब्रह्मा अपने धामको चले गये। वरदान पाकर वे तीनों असुर बड़े प्रसन्न हुए और परस्पर विचार करके उन्होंने दैत्य-दानव-पूजित, अजर-अमर विश्वकर्मा महान्‌ असुर मयका तीन पुरोके निर्माणके लिये वरण किया

“So be it,” replied the divine one; and having granted their request, he departed to heaven. The three Asuras, delighted at obtaining the boon, then consulted among themselves, setting in motion the next phase of their design.

Verse 16

पुरत्रयविसृष्ट्यर्थ मयं वच्रुर्महासुरम्‌ । विश्वकर्माणमजरं दैत्यदानवपूजितम्‌,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे “एवमस्तु” (ऐसा ही हो) यों कहकर भगवान्‌ ब्रह्मा अपने धामको चले गये। वरदान पाकर वे तीनों असुर बड़े प्रसन्न हुए और परस्पर विचार करके उन्होंने दैत्य-दानव-पूजित, अजर-अमर विश्वकर्मा महान्‌ असुर मयका तीन पुरोके निर्माणके लिये वरण किया

Duryodhana said: “For the building of the three cities, they chose Maya—the mighty Asura—Viśvakarman the ageless, revered among the Daityas and Dānavas. Listen with a steady mind; do not doubt this.”

Verse 17

ततो मय: स्वतपसा चक्रे धीमान्‌ पुराणि च | त्रीणि काञ्चनमेकं वै रौप्यं कार्ष्णायसं तथा,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे तब बुद्धिमान्‌ मयासुरने अपनी तपस्याद्वारा तीन पुरोंका निर्माण किया। उनमेंसे एक सोनेका, दूसरा चाँदीका और तीसरा पुर लोहेका बना था

Duryodhana said: “Then the wise Maya, by the power of his own austerities, fashioned three fortified cities: one of gold, one of silver, and one of dark iron. Attend with a steady mind; do not doubt it.”

Verse 18

काज्चनं दिवि तत्रासीदन्तरिक्षे च राजतम्‌ । आयसं चाभवद्‌ भौम॑ चक्रस्थं पृथिवीपते,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “O lord of the earth, in that ancient event the golden city was in heaven and the silver city in mid-air; and on the earth was the iron city, fixed upon a wheel. Grasp this with a steady mind; do not doubt it or imagine otherwise.”

Verse 19

पृथ्वीपते! सोनेका बना हुआ पुर स्वर्गलोकमें स्थित हुआ। चाँदीका अन्तरिक्षलोकमें और लोहेका भूलोकमें स्थित हुआ; जो आज्ञाके अनुसार सर्वत्र विचरनेवाला था ।। एकैकं॑ योजनशतं विस्तारायामत: समम्‌ | गृहाद्टालकसंयुक्तं बहुप्राकारतोरणम्‌,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे प्रत्येक नगरकी लंबाई-चौड़ाई बराबर-बराबर सौ योजनकी थी। सबमें बड़े-बड़े महल और अट्टालिकाएँ थीं। अनेकानेक प्राकार (परकोटे) और तोरण (फाटक) सुशोभित थे

Duryodhana said: “O lord of the earth! One city—made of gold—stood in heaven; another—made of silver—stood in the mid-region; and a third—made of iron—stood on the earth. Moving everywhere in accordance with a granted command, these cities were famed in ancient times. Each city measured a hundred yojanas in both length and breadth, filled with mansions and lofty towers, and adorned with many ramparts and gateways. Attend to this with a steady mind; you need not doubt what I say.”

Verse 20

गृहप्रवरसम्बाधमसम्बाधमहापथम्‌ | प्रासादैर्विविधैश्लापि द्वारैश्नैवोपशोभितम्‌,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे बड़े-बड़े घरोंसे वह नगर भरा था। उसकी विशाल सड़कें संकीर्णतासे रहित एवं विस्तृत थीं। नाना प्रकारके प्रासाद और द्वार उन पुरोंकी शोभा बढ़ाते थे

Duryodhana said: “O king of Madra, grasp this with a steady mind; you need not entertain any doubt about it. That city was crowded with excellent mansions, yet its great roads were broad and unobstructed. It was further adorned by many kinds of palaces and by splendid gateways.”

Verse 21

पुरेषु चाभवन्‌ राजन्‌ राजानो वै पृथक्‌ पृथक्‌ । काज्चनं तारकाक्षस्य चित्रमासीन्महात्मन:,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे राजन्‌! उन तीनों पुरोंके राजा अलग-अलग थे। सुवर्णमय विचित्र पुर महामना तारकाक्षके अधिकारमें था

Duryodhana said: “O King, in those cities there were kings, each ruling separately. The wondrous city made of gold belonged to the great-souled Tārakākṣa. Listen to this with a steady mind; you should not entertain doubts about it.”

Verse 22

राजतं कमलाक्षस्य विद्युन्मालिन आयसम्‌ | त्रयस्ते दैत्यराजानस्त्रींललोकानस्त्रतेजसा,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “(There was) a silver (city) for Kamalākṣa, and an iron one for Vidyunmālin. Those three Daitya-kings, by the power of their weapons, (held sway over) the three worlds. Attend to this with a steady mind; you need not entertain any doubt about it.”

Verse 23

तेषां दानवमुख्यानां प्रयुतान्यर्बुदानि च,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “O foremost among kings of the Dānavas, their forces number in tens of thousands and even in crores. Grasp this here with a steady mind; you need not entertain any doubt or counter-consideration about it.”

Verse 24

कोट्यश्चाप्रतिवीराणां समाजग्मुस्ततस्तत: । उन दानवशिरोमणियोंके पास लाखों, करोड़ों और अरबों अप्रतिम वीर दैत्य इधर- उधरसे आ गये थे ।। मांसाशिन: सुदृप्ताश्च सुरैर्विनिकृता: पुरा,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Then, from every direction, millions upon millions of warriors without equal assembled. Flesh-eating and fiercely exultant, they had once been cut down by the gods. Listen to this with a steady mind; you should not entertain doubt or second thoughts about it here.

Verse 25

सर्वेषां च पुनश्नैषां सर्वयोगवहो मय:,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “O king, listen again with a steady mind to what I am about to relate. Here I am conveying the full import of this matter; you should not entertain doubts or alternative speculations about it.”

Verse 26

यो हि यन्मनसा काम दध्यौ त्रिपुरसंश्रय:,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “Whatever desire a being who has taken refuge in Tripura has conceived in his mind—understand it here with a steady mind. You need not entertain any doubt or counter-consideration about it.”

Verse 27

तारकाक्षसुतो वीरो हरिनाम महाबल:,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “We have heard that, at that time, the gods defeated the Daityas. When the Daityas had been overcome, the three sons of Tārakāsura—Tārakākṣa, Kamalākṣa, and Vidyunmālī—took refuge in fierce austerity and steadfastly observed the highest disciplines. Thus, even after defeat, they sought power and purpose through rigorous self-control rather than surrendering to despair.”

Verse 28

संतुष्टमवृणोद्‌ देवं वापी भवतु नः पुरे,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “Having become satisfied, he chose the deity—‘Let there be a well in our city.’ It is heard by us that at that time the gods defeated the Daityas. O King, when the Daityas had been overcome, the three sons of Tārakāsura—Tārakākṣa, Kamalākṣa, and Vidyunmālī—took refuge in fierce austerities and remained steadfast in the highest disciplines of restraint.”

Verse 29

स तु लब्ध्वा वरं वीरस्तारकाक्षसुतो हरि:,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “It is heard that at that time the gods defeated the Daityas. O King, when the Daityas had been overcome, the three sons of Tārakāsura—Tārakākṣa, Kamalākṣa, and Vidyunmālī—took refuge in fierce austerities and remained steadfast in the highest disciplines.”

Verse 30

येन रूपेण दैत्यस्तु येन वेषेण चैव ह,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “In whatever form and in whatever guise the Daityas once stood—so we have heard—when the gods overcame them, the three sons of Tārakāsura, namely Tārakākṣa, Kamalākṣa, and Vidyunmālī, took refuge in fierce austerity and remained steadfast in the highest disciplines of restraint.”

Verse 31

तां प्राप्प ते पुनस्तांस्तु लोकान्‌ सर्वान्‌ बबाधिरे,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे उस वापीमें पहुँच जानेपर नया जीवन धारण करके वे दैत्य पुन: उन सभी लोकोंको बाधा पहुँचाने लगते थे। राजन! वे महान्‌ तपसे सिद्ध हुए असुर देवताओंका भय बढ़ा रहे थे। युद्धमें कभी उनका विनाश नहीं होता था

Duryodhana said: “Having reached those realms again, they began to harass all the worlds anew. Established in the highest restraints and disciplines, they undertook fierce austerities. It is heard by us, O King, that at that time the gods had defeated the Daityas; but when the Daityas were overcome, Tārakāsura’s three sons—Tārakākṣa, Kamalākṣa, and Vidyunmālī—took refuge in severe tapas and observed excellent vows. Regaining life and power, they again became a source of obstruction to all the worlds, increasing the fear of the gods; and in battle they could not be destroyed.”

Verse 32

इस प्रकार श्रीमह्या भारत कर्णपर्वमें शल्यका साराथिकर्मीविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे महता तपसा सिद्धा: सुराणां भयवर्धना: । न तेषामभवद्‌ राजन्‌ क्षयो युद्धे कदाचन उस वापीमें पहुँच जानेपर नया जीवन धारण करके वे दैत्य पुन: उन सभी लोकोंको बाधा पहुँचाने लगते थे। राजन! वे महान्‌ तपसे सिद्ध हुए असुर देवताओंका भय बढ़ा रहे थे। युद्धमें कभी उनका विनाश नहीं होता था

Sanjaya said: “Having undertaken fierce austerities and remaining firmly established in the highest disciplines of restraint, they attained success through great penance and became a source of increasing fear to the gods. O King, in battle their destruction never came about at any time.”

Verse 33

ततस्ते लोभमोहाभ्यामभिभूता विचेतस: । नि््लीका: संस्थिता: सर्वे स्थापिता: समलूलुपन्‌,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे उन पुरोंमें बसाये गये सभी दैत्य लोभ और मोहके वशीभूत हो विवेकहीन और निर्लज्ज होकर सब ओर लूटपाट करने लगे तब भगवान्‌ शंकरने प्रसन्न होकर स्वागत-सत्कारके द्वारा देवताओंको आनन्दित करके कहा--'देवगण! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये; बोलो, मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ?” ।। इति श्रीमहा भारते कर्णपर्वणि त्रिपुराख्याने त्रयस्त्रिंशो 5ध्याय:

Then, overcome by greed and delusion, they became bereft of discernment. Shameless and unrestrained, all of them—settled in their appointed places—turned thoroughly rapacious, given over to plunder on every side. (In the wider Tri-pura narrative, this moral collapse of the Daityas becomes the ground for the gods’ appeal to Śiva for protection and the restoration of order.)

Verse 34

विद्राव्य सगणानू्‌ देवांस्तत्र तत्र तदा तदा । विचेरु: स्वेन कामेन वरदानेन दर्पिता:,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे वरदान पानेके कारण उनका घमंड बढ़ गया था। वे विभिन्न स्थानोंमें देवताओं और उनके गणोंको भगाकर वहाँ अपनी इच्छाके अनुसार विचरते थे

Duryodhana said: “We have heard that at that time the gods routed the Daityas. After their defeat, Tārakāsura’s three sons—Tārākṣa, Kamalākṣa, and Vidyunmālī—took refuge in fierce austerity and remained steadfast in the highest disciplines. Inflated by the boons they obtained, they drove away the gods along with their attendant hosts from place to place, and then roamed wherever they pleased.”

Verse 35

देवोद्यानानि सर्वाणि प्रियाणि च दिवौकसाम्‌ | ऋषीणामाश्रमान्‌ पुण्यान्‌ रम्याज्जनपदांस्तथा,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “(They ranged over) all the divine pleasure-gardens dear to the dwellers of heaven, and the holy hermitages of the seers, and likewise the delightful provinces. Then, taking refuge in fierce austerity and standing firm in the highest disciplines of restraint, (they pursued their vows).”

Verse 36

(निःस्थानाश्न कृता देवा ऋषय: पितृभि: सह । दैत्यैस्त्रिभिस्त्रयो लोका हााक्रान्तास्तै: सुरेतरैः ।।) उन देवविरोधी तीनों दैत्योंने देवताओं, पितरों और ऋषियोंको भी उनके स्थानोंसे हटाकर निराश्रय कर दिया। वे ही नहीं, तीनों लोकोंके निवासी उनके द्वारा पददलित हो रहे थे।। पीड्यमानेषु लोकेषु ततः शक्रो मरुदवृत:,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “Those three anti-god Daityas drove the gods, the seers, and even the Pitṛs from their proper stations, leaving them without refuge. Not only they—indeed the inhabitants of all the three worlds were being trampled down by those non-divine foes. When the worlds were thus oppressed, Indra, surrounded by the Maruts, undertook fierce austerity and stood firm in the highest discipline.”

Verse 37

नाशकत्‌ तान्यभेद्यानि यदा भेत्तुं पुरंदर:,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे शत्रुदमननरेश्वर! जब देवराज इन्द्र ब्रह्माजीका वर पाये हुए उन अभेद्य पुरोंका भेदन न कर सके, तब वे भयभीत हो उन पुरोंको छोड़कर उन्हीं देवताओंके साथ ब्रह्माजीके पास उन दैत्योंका अत्याचार बतानेके लिये गये

Duryodhana said: “When Purandara (Indra) was unable to break those impregnable strongholds—though protected by Brahmā’s boon—he became afraid, withdrew from them, and, together with the gods, went to Brahmā to report the oppression caused by those Dānavas.”

Verse 38

पुराणि वरदत्तानि धात्रा तेन नराधिप । तदा भीत: सुरपतिर्मुक्त्वा तानि पुराण्यथ,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे शत्रुदमननरेश्वर! जब देवराज इन्द्र ब्रह्माजीका वर पाये हुए उन अभेद्य पुरोंका भेदन न कर सके, तब वे भयभीत हो उन पुरोंको छोड़कर उन्हीं देवताओंके साथ ब्रह्माजीके पास उन दैत्योंका अत्याचार बतानेके लिये गये

Duryodhana said: “O king, those ancient, impregnable cities that were granted by the Creator (Brahmā) to him—when the lord of the gods became afraid, he abandoned those cities. Then (the asura lords), taking refuge in fierce austerity, remained steadfast in the highest disciplines.”

Verse 39

तैरेव विबुधै: सार्ध पितामहमरिंदम । जगामाथ तदाख्यातु विप्रकारं सुरेतरै:,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे शत्रुदमननरेश्वर! जब देवराज इन्द्र ब्रह्माजीका वर पाये हुए उन अभेद्य पुरोंका भेदन न कर सके, तब वे भयभीत हो उन पुरोंको छोड़कर उन्हीं देवताओंके साथ ब्रह्माजीके पास उन दैत्योंका अत्याचार बतानेके लिये गये

Duryodhana said: “O subduer of foes, accompanied by those very gods, Indra went to Pitāmaha (Brahmā) to report the oppression committed by the enemies of the gods. For, after the Daityas had been defeated, Tārakāsura’s three sons—Tārākṣa, Kamalākṣa, and Vidyunmālī—undertook fierce austerities and remained steadfast in the highest disciplines. When even Indra, though empowered by Brahmā’s boon, could not pierce their impregnable cities, the gods, alarmed, withdrew from those forts and approached Brahmā to disclose the Daityas’ tyranny.”

Verse 40

ते तत्त्वं सर्वमाख्याय शिरोभि: सम्प्रणम्य च । वधोपायमपृच्छन्त भगवन्तं पितामहम्‌,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे उन्होंने मस्तक झुकाकर भगवान्‌ ब्रह्माजीको प्रणाम किया और सारी बातें ठीक-ठीक बताकर उनसे उन दैत्योंके वधका उपाय पूछा

Having accurately related the whole matter and bowing their heads in reverence, they questioned the Blessed Grandsire Brahmā about the means by which those foes might be slain.

Verse 41

श्रुत्वा तद्‌ भगवान्‌ देवो देवानिदमुवाच ह । ममापि सो5पराध्नोति यो युष्माकमसौम्यकृत्‌,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे वह सब सुनकर भगवान्‌ ब्रह्माने उन देवताओंसे इस प्रकार कहा--'देवगण! जो तुम्हारी बुराई करता है, वह मेरा भी अपराधी है

Having heard that, the Blessed Lord—Brahmā—addressed the gods as follows: “Whoever acts with ill will toward you commits an offence against me as well.”

Verse 42

असुरा हि दुरात्मान: सर्व एव सुरद्विष: । अपराध्यन्ति सतत ये युष्मान्‌ पीडयन्त्युत,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे “वे समस्त देवद्रोही दुरात्मा असुर, जो सदा तुम्हें पीड़ा देते रहते हैं, निश्चय ही मेरा भी महान्‌ अपराध करते हैं

Duryodhana said: “For those Asuras are indeed wicked-souled, every one of them hostile to the gods. Those who continually harass you are, in truth, ever committing an offence.”

Verse 43

अहं हि तुल्य: सर्वेषां भूतानां नात्र संशय: । अधार्मिकास्तु हन्तव्या इति मे वतमाहितम्‌,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे “इसमें संशय नहीं कि समस्त प्राणियोंके प्रति मेरा समान भाव है, तथापि मैंने यह व्रत ले रखा है कि पापात्माओंका वध कर दिया जाय

Duryodhana said: “Indeed, I am impartial toward all beings—of this there is no doubt. Yet I have adopted this vow: that the unrighteous must be slain.”

Verse 44

एकेषुणा विभेद्यानि तानि दुर्गाणि नान्यथा । न च स्थाणुमृते शक्तो भेत्तुमेकेषुणा पुर:,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे *वे तीनों पुर एक ही बाणसे वेध दिये जाय॑ँ तो नष्ट हो सकते हैं, अन्यथा नहीं; परंतु महादेवजीके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो उन तीनोंको एक साथ एक ही बाणसे वेध सके

Duryodhana said: “Those strongholds can be pierced only by a single arrow—by no other means. And except for Sthāṇu (Śiva), no one is capable of piercing the cities with one arrow. Having undertaken fierce austerities, they remained established in the highest discipline.”

Verse 45

ते यूयं स्थाणुमीशानं जिष्णुमक्लिष्टकारिणम्‌ | योद्धारं वृणुतादित्या: स तान्‌ हन्ता सुरेतरान्‌,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे “अत: अदितिकुमारो! तुमलोग अनायास ही महान्‌ कर्म करनेवाले, विजयशील, ईश्वर, महादेवजीका योद्धाके रूपमें वरण करो। वे ही उन दैत्योंको मार सकते हैं!

Duryodhana said: “O sons of Aditi, choose as your champion that Lord—Sthāṇu, Īśāna—ever-victorious and unfailing in action. He alone can slay those foes of the gods. For it is heard that when the Daityas had been overcome, Tārakāsura’s three sons—Tārakākṣa, Kamalākṣa, and Vidyunmālī—took refuge in fierce austerity and stood firm in the highest disciplines. Therefore, appoint Mahādeva as your warrior; only he is capable of destroying such adversaries.”

Verse 46

इति तस्य वच: श्रुत्वा देवा: शक्रपुरोगमा: । ब्रह्माणमग्रत: कृत्वा वृषाड्कं शरणं ययु:,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे उनकी यह बात सुनकर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता ब्रह्माजीको आगे करके महादेवजीकी शरणमें गये

Duryodhana said: “Hearing those words, the gods—led by Śakra (Indra)—placed Brahmā at their head and went for refuge to Vṛṣāṅka (Śiva). Having undertaken fierce austerities, they remained steadfast in the highest disciplines.”

Verse 47

तपो नियममास्थाय गृणन्तो ब्रह्म शाश्वतम्‌ । ऋषिभि: सह धर्मज्ञा भवं सर्वात्मना गता:,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे तप और नियमका आश्रय ले ऋषियोंसहित धर्मज्ञ देवता सनातन ब्रह्मस्वरूप महादेवजीकी स्तुति करते हुए सम्पूर्ण हृदयसे उनकी शरणमें गये

“Having undertaken austerity and strict observances, they praised the eternal Brahman. Those who knew dharma, together with the seers, approached Bhava (Śiva) with their whole being, taking complete refuge in him.”

Verse 48

तुष्टवुर्वाग्भिरिष्टाभिर्भयेष्वभयदं नृप । सर्वात्मानं महात्मानं येनाप्तं सर्वमात्मना,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे नरेश्वर! जिन्होंने आत्मस्वरूपसे सबको व्याप्त कर रखा है तथा जो भयके अवसरोंपर अभय प्रदान करनेवाले हैं, उन सर्वात्मा, महात्मा भगवान्‌ शिवकी उन देवताओंने अभीष्ट वाणीद्वारा स्तुति की

Duryodhana said: “O king, with words that pleased Him, they praised the great-souled Lord who is the Self of all and who grants fearlessness in times of danger—He by whom the whole universe is pervaded through His own being.”

Verse 49

तपोविशेषैर्विविधैयोंगं यो वेद चात्मन: | यः सांख्यमात्मनो वेत्ति यस्य चात्मा वशे सदा,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे जो नाना प्रकारकी विशेष तपस्याओंद्वारा मनकी सम्पूर्ण वृत्तियोंके निरोधका उपाय जानते हैं, जिन्हें अपनी ज्ञानस्वरूपताका बोध नित्य बना रहता है, जिनका अन्त:ः:करण सदा अपने वशमें रहता है, जगत्‌में जिनकी कहीं भी तुलना नहीं है, उन निष्पाप, तेजोराशि, महेश्वर भगवान्‌ उमापतिका उन देवताओंने दर्शन किया

Duryodhana said: “He who, by many kinds of distinctive austerities, knows the discipline of yoga as it pertains to the self; he who understands Sāṅkhya as it pertains to the self; and he whose inner self is always under control—such a one is established in fierce austerity and in the highest restraints. We have heard that, at that time, the gods defeated the Dānavas. After the Dānavas were overcome, Tārakāsura’s three sons—Tārākṣa, Kamalākṣa, and Vidyunmālī—took refuge in severe penance and began to observe excellent vows. Knowing the means to restrain all the mind’s movements through varied austerities, ever awake to the knowledge of their own true nature, and keeping their inner faculties mastered, they became incomparable in the world. Those sinless, radiant ascetics were then beheld by the gods in the form of Mahādeva, the Lord of Umā.”

Verse 50

त॑ ते ददृशुरीशानं तेजोराशिमुमापतिम्‌ | अनन्यसदृशं लोके भगवन्तमकल्मषम्‌,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे जो नाना प्रकारकी विशेष तपस्याओंद्वारा मनकी सम्पूर्ण वृत्तियोंके निरोधका उपाय जानते हैं, जिन्हें अपनी ज्ञानस्वरूपताका बोध नित्य बना रहता है, जिनका अन्त:ः:करण सदा अपने वशमें रहता है, जगत्‌में जिनकी कहीं भी तुलना नहीं है, उन निष्पाप, तेजोराशि, महेश्वर भगवान्‌ उमापतिका उन देवताओंने दर्शन किया

They beheld Īśāna—Mahādeva, the Lord of Umā—an immeasurable mass of splendor, the Blessed One, stainless and without equal anywhere in the world. Having undertaken fierce austerities and remaining established in the highest disciplines of restraint, they sought him in a spirit of rigorous self-control.

Verse 51

एकं च भगवन्तं ते नानारूपमकल्पयन्‌ । आत्मन: प्रतिरूपाणि रूपाण्यथ महात्मनि,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे परस्परस्य चापश्यन्‌ सर्वे परमविस्मिता: । उन्होंने एक ही भगवान्‌ शिवको अपनी भावनाके अनुसार अनेक रूपोंमें कल्पित किया। उन परमात्मामें अपने तथा दूसरोंके प्रतिबिम्ब देखे। यह सब देखकर परस्पर दृष्टिपात करके वे सब-के-सब अत्यन्त आश्वर्यचकित हो उठे

Duryodhana said: “They conceived that one Blessed Lord (Śiva) in many forms, according to their own imaginings. In that Supreme Great Soul they beheld forms that were reflections of themselves and of one another. Having undertaken fierce austerities and remaining established in the highest disciplines, they looked at each other—and all of them were struck with the greatest astonishment.”

Verse 52

।। सर्वभूतमयं दृष्टवा तमजं जगत: प्रतिम्‌,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “Having beheld Him—the Unborn, the very image of the universe, pervading all beings—they undertook fierce austerities and remained steadfast in the highest disciplines of restraint. We have heard that at that time the gods had defeated the Daityas; and when the Daityas were overcome, Tārakāsura’s three sons—Tārākṣa, Kamalākṣa, and Vidyunmālī—took refuge in severe penance and began to observe excellent vows.”

Verse 53

तान्‌ स्वस्तिवादेनाभ्यर्च्य समुत्थाप्प च शडकर:,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे

Duryodhana said: “Having greeted them with auspicious benedictions and duly honored them, they were then raised up; and, taking refuge in fierce austerity, they remained steadfast in the highest discipline of vows. We have heard that, at that time, the gods defeated the Daityas. O King, when the Daityas had been overcome, the three sons of Tārakāsura—Tārakākṣa, Kamalākṣa, and Vidyunmālī—embraced severe penance and began to observe excellent restraints.”

Verse 54

त्रयम्बकेणा भ्यनुज्ञातास्ततस्ते स्वस्थचेतस:

Having received the sanction of Tryambaka (Śiva), they then became calm and steady-minded—reassured in heart as they proceeded, taking the divine approval as a sign of auspiciousness amid the moral strain of war.

Verse 55

नमो देवाधिदेवाय धन्विने वनमालिने,“आप देवताओंके अधिदेवता, धनुर्थधर और वनमालाधारी हैं। आपको नमस्कार है। आप दक्षप्रजापतिके यज्ञका विध्वंस करनेवाले हैं, प्रजापति भी आपकी स्तुति करते हैं, सबके द्वारा आपकी ही स्तुति की गयी है, आप ही स्तुतिके योग्य हैं तथा सब लोग आपकी ही स्तुति करते हैं। आप कल्याणस्वरूप शम्भुको नमस्कार है

Duryodhana offers reverent homage to Śiva, praising him as the supreme Lord among the gods, the wielder of the bow, and the bearer of a forest-garland. He recalls Śiva’s fearsome power as the one who once shattered Dakṣa Prajāpati’s sacrifice, yet emphasizes that even Prajāpati himself extols him. Declaring that all beings praise Śiva and that he alone is truly worthy of praise, Duryodhana bows to Śambhu as the very embodiment of auspiciousness—seeking divine favor amid the moral strain and peril of war.

Verse 56

प्रजापतिमखधघ्नाय प्रजापतिभिरीड्यते । नमः स्तुताय स्तुत्याय स्तूयमानाय शम्भवे,“आप देवताओंके अधिदेवता, धनुर्थधर और वनमालाधारी हैं। आपको नमस्कार है। आप दक्षप्रजापतिके यज्ञका विध्वंस करनेवाले हैं, प्रजापति भी आपकी स्तुति करते हैं, सबके द्वारा आपकी ही स्तुति की गयी है, आप ही स्तुतिके योग्य हैं तथा सब लोग आपकी ही स्तुति करते हैं। आप कल्याणस्वरूप शम्भुको नमस्कार है

Duryodhana offers a hymn of surrender to Śambhu (Śiva): “Salutations to you, the one praised and worthy of praise, ever being praised. You are the destroyer of Dakṣa Prajāpati’s sacrifice, and even the Prajāpatis extol you.” In the war’s moral darkness, the king turns to divine power for protection and legitimacy, revealing how devotion can be invoked to seek strength even when one’s cause is ethically compromised.

Verse 57

विलोहिताय रुद्राय नीलग्रीवाय शूलिने । अमोघाय मृगाक्षाय प्रवरायुधयोधिने,“आप विशेषतः लाल वर्णके हैं, पापियोंको रुलानेवाले रुद्र हैं, नीलकण्ठ और त्रिशूलधारी हैं, आपका दर्शन अमोघ फल देनेवाला है, आपके नेत्र मृगोंके समान हैं तथा आप श्रेष्ठ आयुधोंद्वारा युद्ध करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है

Duryodhana offers a reverential hymn to Rudra-Śiva: “Salutations to you, the crimson-hued Rudra who makes the wicked weep; to you of the blue throat, the trident-bearer. Your very sight is unfailing in its fruit; your eyes are like a deer’s; you are the foremost warrior, fighting with excellent weapons.” In the moral atmosphere of the war, the praise underscores a ruler’s reliance on divine power for victory, while implicitly revealing the tension between devotion and the ethical burden of a violent cause.

Verse 58

अर्हाय चैव शुद्धाय क्षयाय क्रथनाय च । दुर्वारणाय शुक्राय ब्रह्मणे ब्रह्मचारिणे,“आप पूजनीय, शुद्ध, प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाले हैं। आपको रोकना या पराजित करना सर्वथा कठिन है। आप शुक्‍्लवर्ण, ब्रह्म, ब्रह्मचारी, ईशान, अप्रमेय, नियन्ता तथा व्याप्रचर्ममय वस्त्र धारण करनेवाले हैं। आप सदा तपस्यामें तत्पर रहनेवाले, पिंगलवर्ण, व्रतधारी और कृत्तिवासा हैं। आपको नमस्कार है

Duryodhana addresses a supreme, ascetic power with reverence: “Salutations to you—worthy of worship and perfectly pure; to you who are dissolution itself and the force that crushes all resistance; to you who are impossible to ward off or defeat; to you who are radiant and white in splendor; to Brahman, the celibate ascetic.” In the ethical atmosphere of the war, the verse frames victory and destruction as ultimately governed by a higher, austere principle, before which human pride and strategy are fragile.

Verse 59

ईशानायाप्रमेयाय नियन्त्रे चर्मवाससे । तपोरताय पिड्डाय व्रतिने कृत्तिवाससे,“आप पूजनीय, शुद्ध, प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाले हैं। आपको रोकना या पराजित करना सर्वथा कठिन है। आप शुक्‍्लवर्ण, ब्रह्म, ब्रह्मचारी, ईशान, अप्रमेय, नियन्ता तथा व्याप्रचर्ममय वस्त्र धारण करनेवाले हैं। आप सदा तपस्यामें तत्पर रहनेवाले, पिंगलवर्ण, व्रतधारी और कृत्तिवासा हैं। आपको नमस्कार है

Duryodhana offered a reverential hymn to Śiva: “Salutations to you, Īśāna—immeasurable and beyond full comprehension—who governs and restrains all. You are invincible; none can check you or overcome you. Clad in a hide, ever devoted to austerity, tawny-hued, a strict observer of vows, and famed as Kṛttivāsa, the wearer of skins—you are worthy of worship. I bow to you.”

Verse 60

कुमारपित्रे त्रयक्षाय प्रवरायुधधारिणे । प्रपन्नार्तिविनाशाय ब्रह्मद्धिट्संघधातिने,“आप कुमार कार्तिकेयके पिता, नत्रिनेत्रधारी, उत्तम आयुध धारण करनेवाले शरणागतदुःखभंजन तथा ब्रह्मद्रोहियोंके समुदायका विनाश करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है

Duryodhana said: “Salutations to you—father of Kumāra (Kārttikeya), the three-eyed Lord, bearer of the finest weapons; destroyer of the distress of those who seek refuge, and slayer of the host of those hostile to Brahman and the sacred order.”

Verse 61

वनस्पतीनां पतये नराणां पतये नमः । गवां च पतये नित्यं यज्ञानां पतये नमः,“आप वनस्पतियोंके पालक और मनुष्योंके अधिपति हैं। आप ही गौओंके स्वामी और सदा यज्ञोंके अधीश्वर हैं। आपको बारंबार नमस्कार है

Duryodhana offered reverent salutations, praising the deity as the sovereign guardian of vegetation and the lord of humankind, the master of cattle, and the ever-present ruler of sacrificial rites. “Again and again, I bow to you.”

Verse 62

नमोअस्तु ते ससैन्याय >यम्बकायामितौजसे । मनोवाककर्मभिददेव त्वां प्रपन्नानू भजस्व न:,'सेनासहित आप अमिततेजस्वी भगवान्‌ तयम्बकको नमस्कार है। देव! हम मन, वाणी और क्रियाद्वारा आपकी शरणमें आये हैं। आप हमें अपनाइये'

Duryodhana said: “Salutations to you, O Tryambaka (Śiva), of immeasurable might, together with your attendant hosts. O divine Lord, we have taken refuge in you with mind, speech, and deed—accept us and take us under your protection.”

Verse 63

ततः प्रसन्नो भगवान्‌ स्वागतेनाभिनन्द्य च । प्रोवाच व्येतु वस्त्रासो ब्रूत कि करवाणि व:

Then the august one, pleased at heart, welcomed them and expressed his approval. He said, “Let your weariness be dispelled. Tell me—what shall I do for you?”

Verse 66

दमेन तपसा चैव नियमेन समाधिना । शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! उन तीनोंने तपस्याके द्वारा अपने शरीरोंको सुखा दिया। वे इन्द्रिय-संयम, तप, नियम और समाधिसे संयुक्त रहने लगे

Duryodhana said: “O king who brings torment to his enemies! By self-restraint (dama), austerity (tapas), observance (niyama), and deep concentration (samādhi), those three withered their bodies through ascetic practice. They remained steadfast—disciplined in the senses, devoted to tapas, bound by vows, and established in meditative absorption.”

Verse 246

महदैश्वर्यमिच्छन्तस्त्रिपुरं दुर्गमाश्रिता: । वे सब-के-सब मांसभक्षी और अत्यन्त अभिमानी थे। पूर्वकालमें देवताओंने उनके साथ बहुत छल-कपट किया था। अतः वे महान ऐश्वर्यकी इच्छा रखते हुए त्रिपुर-दुर्गके आश्रयमें आये थे

Duryodhana said: “Longing for great sovereignty, they took refuge in the impregnable fortress of Tripura.”

Verse 263

तस्मै काम॑ मयस्तं तै विदधे मायया तदा । उक्त तीनों पुरोंमें निवास करनेवाला जो भी असुर अपने मनसे जिस अभीष्ट भोगका चिन्तन करता था, उसके लिये मयासुर अपनी मायासे वह-वह भोग तत्काल प्रस्तुत कर देता था

Then Maya, by his power of illusion (māyā), provided the desired object at once. Indeed, whichever Asura dwelt in those three famed cities—if he merely conceived in his mind a wished-for enjoyment—Maya-Asura would immediately manifest that very pleasure through his māyā.

Verse 273

तपस्तेपे परमकं येनातुष्यत्‌ पितामह: । तारकाक्षका महाबली वीर पुत्र “हरि” नामसे प्रसिद्ध था, उसने बड़ी भारी तपस्या की, जिससे ब्रह्माजी उसपर संतुष्ट हो गये

Duryodhana said: “There was a mighty hero, famed by the name ‘Hari’, a son of Tārakākṣa. He undertook an exceedingly severe austerity, by which the Grandfather—Brahmā—was pleased with him.”

Verse 283

शस्त्रैविनिहता यत्र क्षिप्ता: स्युर्बलवत्तरा: । संतुष्ट हुए ब्रह्माजीसे उसने यह वर माँगा कि “हमारे पुरोंमें एक-एक ऐसी बावड़ी हो जाय, जिसके भीतर डाल दिये जानेपर शस्त्रोंके आघातसे मरे हुए दैत्य वीर और भी प्रबल होकर जीवित हो उठें”

Duryodhana describes a boon obtained from Brahmā: that within their fortified cities there should be a well-like reservoir such that, if mighty Daitya warriors—slain by the blows of weapons—are cast into it, they would rise again to life, returning even stronger than before.

Verse 293

ससूजे तत्र वापीं तां मृतानां जीविनीं प्रभो । प्रभो! वह वरदान पाकर तारकाक्षके वीर पुत्र हरिने उन पुरोंमें एक-एक बावड़ीका निर्माण किया, जो मृतकोंको जीवन प्रदान करनेवाली थी

Duryodhana said: “O Lord, there he caused a well to be made—one that could restore life even to the dead.”

Verse 306

मृतस्तस्यां परिक्षिप्तस्तादृशेनैव जज्ञिवान्‌ जो दैत्य जिस रूप और जैसे वेषमें रहता था, मरनेपर उस बावड़ीमें डालनेके पश्चात्‌ वैसे ही रूप और वेषसे सम्पन्न होकर प्रकट हो जाता था

Duryodhana said: “Even when he was killed and thrown into that very well, he would be born again in the same form—appearing once more with the identical appearance and disguise in which that demon had lived.”

Verse 353

व्यनाशयजन्नमर्यादा दानवा दुष्टचारिण: । स्वर्गवासियोंके परम प्रिय समस्त देवोद्यानों, ऋषियोंके पवित्र आश्रमों तथा रमणीय जनपदोंको भी वे मर्यादाशून्य दुराचारी दानव नष्ट-भ्रष्ट कर देते थे

Duryodhana said: “Those lawless Dānavas, given to wicked conduct, went about laying waste to everything. Even the celestial gardens so dear to the dwellers of heaven, the holy hermitages of the seers, and the delightful provinces—these boundaryless, depraved Dānavas would ruin and defile them.”

Verse 526

देवा ब्रह्मर्षयश्चैव शिरोभिर्धरणीं गता: । उन सर्वभूतमय अजन्मा जगदीश्वरको देखकर सम्पूर्ण देवताओं तथा ब्रह्मर्षियोंने धरतीपर मस्तक टेक दिये

Duryodhana said: “Even the gods and the Brahmarṣis, bowing with their heads, have touched the earth in reverence.”

Verse 533

ब्रूत ब्रेतेति भगवान्‌ स्मयमानो5 भ्यभाषत । तब भगवान्‌ शंकरने “तुम्हारा कल्याण हो' ऐसा कहकर उनका समादर करते हुए उनको उठाया और मुसकराते हुए कहा--“बोलो, बोलो; क्या है?”

Smiling, the Blessed Lord said, “Speak, speak.” Then the Lord Śaṅkara, honoring them, raised them up and, wishing them well—“May you attain welfare”—smiled and asked, “Speak, speak; what is it?”

Verse 546

नमो नमो नमस्ते>स्तु प्रभो इत्यब्रुवत्‌ वच: । भगवान्‌ त्रिलोचनकी आज्ञा पाकर स्वस्थचित्त हुए वे देवगण इस प्रकार उनकी स्तुति करने लगे--'प्रभो! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है

They bowed again and again, saying, “Homage, homage—salutations to you, O Lord!” Having received the command of the blessed Three‑eyed Lord, the gods grew calm and composed, and then began to praise him thus: “O Lord, we bow to you repeatedly.”

Verse 2236

आक्रम्य तस्थुरूचुश्व कश्व नाम प्रजापति: । चाँदीका बना हुआ पुर कमलाक्षके और लोहेका विद्युन्मालीके अधिकारमें था। वे तीनों दैत्यराज अपने अस्त्रोंके तेजसे तीनों लोकोंको दबाकर रहते और कहते थे कि “प्रजापति कौन है?'

Having overrun their foes, they stood firm and spoke with arrogant contempt: “And who, indeed, is this Prajāpati?” The three cities—one fashioned of silver, another radiant like a lotus, and a third of iron—were held under the dominion of Kamalākṣa and Vidyunmālī. Those three demon-kings, intoxicated by the splendor of their weapons, kept the three worlds pressed down beneath their power and repeatedly proclaimed, “Who is Prajāpati?”

Verse 2536

तमाश्रित्य हि ते सर्वे वर्तयन्तेडकुतो भया: । मयासुर इन सबको सब प्रकारकी अप्राप्त वस्तुएँ प्राप्त कराता था। उसका आश्रय लेकर वे सम्पूर्ण दैत्य निर्भय होकर रहते थे

Duryodhana said: “Relying on him, all of them carried on without fear—where could fear come from? For that Asura, Māya, used to secure for them in every way even things otherwise unattainable; taking refuge in him, the Daityas lived entirely fearless.”

Verse 3636

पुराण्यायोधयांचक्रे वज़पातै: समन्तत: । जब सम्पूर्ण लोकोंके प्राणी पीड़ित होने लगे, तब देवताओंसहित इन्द्र चारों ओरसे वज्रपात करते हुए उन तीनों पुरोंके साथ युद्ध करने लगे

Duryodhana said: “When the beings of the whole world were being tormented, Indra, accompanied by the gods, began to wage war on those ancient strongholds, striking on every side with thunderbolts, the vajra.”

Frequently Asked Questions

The narrative juxtaposes duty to protect one’s leader and formation with the strategic impulse to disable opposing leadership; it raises the question of how far concentrated force and relentless pursuit can be reconciled with ideals of restrained, rule-governed combat.

It illustrates that battlefield outcomes depend on coordinated protection, redundancy of support (rear-guard, wheel-guard, chariot recovery), and adaptive counter-formation—individual prowess is effective only when integrated into collective structure.

No explicit phalaśruti appears in this chapter; its meta-level function is historiographic—Sañjaya’s report to Dhṛtarāṣṭra frames the events as moral and political accounting within the epic’s larger inquiry into consequence (karma) and governance.