
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को स्मरण कराते हैं कि धृष्टद्युम्न वही अग्निज पुत्र है जिसे द्रुपद ने महान् यज्ञ में द्रोण-वध के हेतु पाया था—और अब वही प्रतिज्ञा रणभूमि में साक्षात् रूप लेती है। → धृष्टद्युम्न द्रोण पर टूट पड़ता है, पर आचार्य घायल होकर भी विचलित नहीं होते; वे तीक्ष्ण भल्ल से उसका धनुष काटते हैं और उसके रथ के ईषाबन्ध, चक्रबन्ध, रथबन्ध आदि को नष्ट कर युद्ध-यंत्र को ही अपंग कर देते हैं। साथ ही सात्यकि अपनी शिक्षित चपलता और शस्त्र-कौशल से रण को और उग्र बनाता है। → निकृष्ट/सन्निकट युद्ध में द्रोण का अद्वितीय शर-वर्ष धृष्टद्युम्न की रक्षा-व्यवस्था (ढाल-आदि) को चूर करता है; और जब शिष्य-पुत्रतुल्य धृष्टद्युम्न को मारने की इच्छा से आचार्य धनुष पर परम दृढ़ बाण चढ़ाते हैं, तब गुरु-शिष्य-वध की घड़ी रण के शिखर पर पहुँचती है। → धृष्टद्युम्न और उसके सहायक (विशेषतः सात्यकि) कौशल, निकटता और अवसर-हरण से द्रोण के निर्णायक प्रहार को टालते हैं; युद्ध का परिणाम तत्काल निष्कर्ष पर नहीं आता, पर यह स्पष्ट हो जाता है कि द्रोण की प्रचण्डता के सामने केवल असाधारण वीर ही टिक सकते हैं। → आचार्य का चढ़ा हुआ वह ‘परम सुदृढ़’ बाण—क्या वह शिष्य के प्राण लेगा, या रण-नीति फिर किसी अप्रत्याशित मोड़ पर द्रोण के हाथ बाँध देगी?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ “लोक मिलाकर कुल ५९ ६ “लोक हैं।) एकनवर्त्याधिकशततमो< ध्याय: द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नका युद्ध तथा सात्यकिकी शूरवीरता और प्रशंसा संजय उवाच त॑ दृष्टवा परमोद्धिग्नं शोकोपहतचेतसम् । पाज्चालराजस्य सुतो धृष्टद्युम्न: समाद्रवत्
قال سنجيا: لما رآه في اضطرابٍ بالغ، وقد غلب الحزن على قلبه وعقله، اندفع دِهْرِشْتَديومْنَ—ابن ملك البانچالا—مسرعًا إلى الأمام. تُصوِّر الآية استجابةً في ساحة القتال حيث تنبثق الرحمة والعجلة وسط واجب الحرب، وتُبيّن أن الأسى قد يزعزع رباطة الجأش لحظةً حتى عند المحاربين.
Verse 2
य इष्ट्वा मनुजेन्द्रेण द्रुपदेन महामखे । लब्धो द्रोणविनाशाय समिद्धाद्धव्यवाहनात्
قال سنجيا: «هو الذي، بعد أن أقام الملك دروبادا قربانًا عظيمًا، أُوتي من نار القربان المتّقدة—مقدَّرًا له أن يكون سبب هلاك درونا.»
Verse 3
संजय कहते हैं--राजन! राजा द्रपदने एक महान् यज्ञमें देवाराथन करके द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये प्रज्वलित अग्निसे जिस पुत्रको प्राप्त किया था, उस पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने जब देखा कि आचार्य द्रोण बड़े उद्विग्न हैं और उनका चित्त शोकसे व्याकुल है, तब उन्होंने उनपर धावा कर दिया ।।
قال سنجيا: أيها الملك، إن دِهْرِشْتَديومْنَ—أمير البانچالا المولود من نار قربان دروبادا لغاية إسقاط درونا—لما رأى المُعلِّم درونا مضطربًا شديد الاضطراب، وقد غمر الحزن قلبه، اندفع يهاجمه. وبنية قتل دروناآچاريا، قبض على قوسه السماوي المهيب جالب الظفر، مشدود الوتر، لا يهرم، وصوته كدويّ سحب العاصفة؛ ثم وضع عليه سهمًا مخيفًا كالأفعى السامة، متوهّجًا ببريق كالنار. ويُبرز هذا المشهد توتر الحرب الأخلاقي القاتم: أداة انتقام قدّرها القضاء تواجه مُعلّمًا مُبجّلًا في لحظة انكشاف ضعفه الإنساني.
Verse 4
संदधे कार्मुके तस्मिंस्ततस्तमनलोपमम् | द्रोणं जिघांसु: पाउ्चाल्यो महाज्वालमिवानलम्
قال سنجيا: ثم إن ابن بانچالا، وقد عزم على قتل درونا، وضع على ذلك القوس سهماً متقداً كالنار—كحريق عظيم ذي ألسنة لهب هائلة. ويبرز المشهد اندفاع المعركة الكئيب: فالعزم الشخصي والثأر يقودان رمية المحارب حتى في مواجهة مُعلّم مُهاب، إذ تنكمش أخلاق الحرب إلى منطقٍ قاسٍ للبقاء والقصاص.
Verse 5
तस्य रूप॑ शरस्यासीद् धनुरज्यामण्डलान्तरे । द्योततो भास्करस्थेव घनान्ते परिवेषिण:
قال سنجيا: داخل القوس الدائري الذي رسمته الوتر، بدا السهم المتلألئ مشعّاً كالشمس في موسم الأمطار، تحفّ به هالة عند أطراف السحاب—صورة تزيد رهبة القدرة القتالية وتُبرز جمال الحرب الموحش.
Verse 6
पार्षतेन परामृष्टं ज्वलन्तमिव तद् धनु: । अन्तकालमनुप्राप्तं मेनिरे वीक्ष्य सैनिका:
قال سنجيا: فلما رأى الجنود ذلك القوس—وقد قبض عليه بارْشَتَة (دْهْرِشْتَديومنَة)—متوهّجاً كأنه في نار، حسبوه علامةً على أن «ساعتهم الأخيرة قد حلّت».
Verse 7
तमिषुं संहतं तेन भारद्वाज: प्रतापवान् | दृष्टवामन्यत देहस्य कालपर्यायमागतम्,द्रुपदपुत्रके द्वारा उस बाणको धनुषपर रखा गया देख प्रतापी द्रोणने भी यह मान लिया कि “अब इस शरीरका काल आ गया”
قال سنجيا: ولما رأى بهارَدْواجَة الباسل (درونا) السهم وقد ثُبّت بإحكام على القوس على يد ابن دروبادا، خلص إلى أن «دَوْرة الزمان المقرّرة لهذا الجسد قد حضرت»—فأدرك في ذلك الفعل اقتراب الموت وسط مسار الحرب الذي هو عادلٌ ومع ذلك رهيب.
Verse 8
ततः प्रयत्नमातिष्ठदाचार्यस्तस्य वारणे । न चास्यास्त्राणि राजेन्द्र प्रादुगासन्महात्मन:
قال سنجيا: عندئذٍ بذل المُعلّم (درونا) جهده لصدّها؛ غير أنّه، أيها الملك، لم تعد الأسلحة الإلهية تتجلّى في باطن ذلك العظيم النفس كما كانت من قبل. ويُبرز هذا الموقف أنّه في اضطراب الحرب قد تخذل حتى الأسلحة السماوية إذا غابت السكينة الداخلية، أو انقطع التأييد، أو فُقد الشرط الروحي اللازم.
Verse 9
तस्य त्वहानि चत्वारि क्षपा चैकास्थतो गता । तस्य चाह्नस्त्रिभागेन क्षयं जग्मु: पतत्त्रिण:
قال سانجيا: إذ كان يواصل إطلاق سهامه بلا انقطاع، مضت على ذلك الحال أربعة أيام وليلة واحدة. وفي ثلاثة أقسام فقط من خمسة عشر قسماً لذلك اليوم، نفدت كل مقاذيفه المجنّحة—أي سهامه—عن آخرها.
Verse 10
स शरक्षयमासाद्य पुत्रशोकेन चार्दित: । विविधानां च दिव्यानामस्त्राणामप्रसादत:
قال سانجيا: لما بلغ نفاد سهامه، وعُذِّب بحزنٍ على ابنه، فإن درونا—إذ رأى أن شتّى الأسلحة السماوية لم تعد تتجلّى له—تهيّأ لأن يضع السلاح طاعةً لوصية الحكماء من الرِّشي. لذلك، مع أنه كان مفعماً بالبهاء، لم يعد يقاتل كما كان من قبل.
Verse 11
उत्स्रष्टकाम: शस्त्राणि ऋषिवाक्यप्रचोदित: । तेजसा पूर्यमाणश्न युयुधे न यथा पुरा
قال سانجيا: وقد حثّته كلمات الرِّشي، وإذ مالت عزيمته إلى إلقاء السلاح، لم يعد يقاتل كما كان من قبل—وإن كان بهاؤه الباطن ما يزال يتدفّق في داخله.
Verse 12
भूयश्वान्यत् समादाय दिव्यमाज्डिरसं धनु: । शरांश्व ब्रह्म॒दण्डाभान् धृष्टद्युम्नमयोधयत्
قال سانجيا: ثم عاد فأخذ قوساً إلهياً آخر يُدعى «آنغيراسا»، ومعه سهامٌ تشبه في رهبتها عصا براهما، فجدّد درونا القتال ونازل دْهريشتاديومنَ في المعركة.
Verse 13
ततस्तं शरवर्षेण महता समवाकिरत् | व्यशातयच्च संक्रुद्धों धृष्टद्युम्नममर्षणम्,उन्होंने अत्यन्त कुपित होकर अमर्षमें भरे हुए धृष्टद्युम्मको अपनी भारी बाणवर्षासे ढक दिया और उन्हें क्षत-विक्षत कर दिया
قال سانجيا: ثم، في اندفاعة غضب، غطّى دْهريشتاديومنَ—المشتعل بنفاد الصبر والغيظ—بوابلٍ عظيم من السهام، فمزّقه وجرّحه جرحاً بالغاً.
Verse 14
शरांश्ष शतधा तस्य द्रोणश्रविच्छेद सायकै: । ध्वजं धनुश्चव निशितै: सारथिं चाप्पपातयत्
قال سَنْجَايَا: بسهامٍ حادّة كالموسى، مُعَدّة لقطع أعواد السهام، قطّع دْرونا مقذوفات دْرِشْتَدْيُومْنَة إلى مئات القطع؛ ثم بسهامٍ نافذة أسقط رايته وقوسه، بل وأردى سائق مركبته الحربية أيضًا.
Verse 15
धृष्टद्युम्न: प्रहस्यान्यत् पुनरादाय कार्मुकम् | शितेन चैनं बाणेन प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे,तब धृष्टद्युम्नने हँसकर फिर दूसरा धनुष उठाया और तीखे बाणद्वारा आचार्यकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी
قال سَنْجَايَا: ضحك دْرِشْتَدْيُومْنَة وأخذ قوسًا آخر من جديد، ثم أصاب دْرونَاآچاريا بسهمٍ حادّ، نافذًا إلى موضع الصدر.
Verse 16
सो35तिविद्धो महेष्वासो5सम्भ्रान्त इव संयुगे । भल्लेन शितधारेण चिच्छेदास्य पुनर्धनु:,युद्धस्थलमें अत्यन्त घायल होकर भी महाथधनुर्धर द्रोणने बिना किसी घबराहटके तीखी धारवाले भल्लसे पुनः उनका धनुष काट दिया
قال سَنْجَايَا: ومع أنه جُرح جرحًا بالغًا، ظلّ الرامي العظيم دْرونا كأنه غير مضطرب في لهيب القتال؛ وبسهم «بهلّا» ذي الحدّ القاطع، قطع قوس خصمه مرة أخرى.
Verse 17
यच्चास्य बाणविकृतं धनूंषि च विशाम्पते । सर्व चिच्छेद दुर्धर्षो गदां खड्गं च वर्जयन्
قال سَنْجَايَا: «يا سيّدَ الناس، كلُّ ما كان من أقواسه قد أفسدته السهام وشوّهته—فقد قطّعه ذلك المحارب الذي لا يُقاوَم قطعًا تامًّا؛ غير أنه تعمّد أن يُبقي على الدبّوس (المِقْمَعَة) والسيف.»
Verse 18
प्रजानाथ! धृष्टद्युम्मके जो-जो बाण, तरकस और धनुष आदि थे, उनमेंसे गदा और खड्गको छोड़कर शेष सारी वस्तुओंको दुर्धर्ष द्रोणाचार्यने काट डाला ।।
قال سَنْجَايَا: يا سيّدَ الرجال، إن كلَّ ما كان لدى دْرِشْتَدْيُومْنَة من سهامٍ وجِعابٍ وأقواسٍ وسائر السلاح—ما عدا الدبّوس والسيف—قد حطّمه الآچاريا دْرونا، العسيرُ المنال. ثم إن دْرونا، مُحْرِقَ الأعداء، ثار غضبًا؛ وبهيئةٍ رهيبة من السخط، طعن دْرِشْتَدْيُومْنَة بتسعة سهامٍ حادّة، كأن كلَّ واحدٍ منها رسولُ موت.
Verse 19
धृष्टद्युम्नो5थ तस्याश्वान् स्वरथाश्वैर्महारथ: । व्यामिश्रयदमेयात्मा ब्राह्ममस्त्रमुदीरयन्
قال سانجايا: عندئذٍ اندفع محارب العربة العظيم دْهْرِشْتَديومْنَ، ذو الروح التي لا تُقاس، فقرّب خيوله حتى اختلطت بخيول درونا في التحامٍ لصيق، وهو يطلق سلاح براهما (براهماسترا). وفي غمرة القتال اختار المواجهة المباشرة، مستدعياً قذيفةً عليا—فزاد ذلك من إلحاح الموقف تكتيكياً، ومن التوتر الأخلاقي في استخدام قوةٍ خارقة ضد مُعلّمٍ مُبجَّل.
Verse 20
ते मिश्रा बह्दशो भन्त जवना वातरंहस: । पारावतसवर्णाशक्ष शोणाश्वा भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! वे वायुके समान वेगशाली, कबूतरके समान रंगवाले और लाल घोड़े परस्पर मिलकर बड़ी शोभा पाने लगे
قال سانجايا: «يا ثورَ آلِ بهاراتا، إن تلك الخيول—مختلطة الأجناس كثيرة الأنواع—كانت تتلألأ: سريعةً كالريح، منها ما هو بلون الحمام، ومنها ما هو أحمر. وحين امتزجت في زحام الحرب بدت أشدَّ بهاءً.»
Verse 21
यथा सविद्युतो मेघा नदन्तो जलदागमे । तथा रेजुर्महाराज मिश्रिता रणमूर्थनि
قال سانجايا: «يا أيها الملك، كما تتلألأ السحب الهادرة المشوبة بالبرق عند إقبال المطر، كذلك كانت تلك الخيول—وقد اختلطت عند مقدّمة المعركة—تبدو بهيّةً مهيبة.»
Verse 22
ईषाबन्धं चक्रबन्धं रथबन्धं तथैव च । प्रणाशयदमेयात्मा धृष्टद्युम्नस्य स द्विज:,उस समय अमेय बलसम्पन्न विप्रवर द्रोणाचार्यने धृष्टद्युम्मके रथके ईषाबन्ध, चक्रबन्ध तथा रथबन्धको नष्ट कर दिया
قال سانجايا: عندئذٍ دمّر البراهمي ذو النفس التي لا تُقاس (دروناآچاريا) عربة دْهْرِشْتَديومْنَ، فقطع رباط عمودها، ورباط عجلاتها، ورباط العربة نفسها كذلك.
Verse 23
स च्छिन्नधन्वा पाज्चाल्यो निकृत्तध्वजसारथि: । उत्तमामापदं प्राप्य गदां वीर: परामृशत्,धनुष, ध्वज और सारथिके नष्ट हो जानेपर भारी विपत्तिमें पड़कर पांचालराजकुमार वीर धृष्टद्युम्नने गदा उठायी
قال سانجايا: لما قُطع قوسه، وأُسقط لواؤه وسائق عربته، وقع أمير بانچالا—البطل دْهْرِشْتَديومْنَ—في أشدّ المآزق خطراً، فمدّ يده إلى هراوةٍ (مِقْمَعَة) وأمسك بها.
Verse 24
तामस्य विशिखैस्ती&्ष्णै: क्षिप्पमाणां महारथ: । निजघान शरैद्रोण: क्रुद्ध:ः सत्यपराक्रम:,उसके द्वारा चलायी जानेवाली उस गदाको सत्यपराक्रमी महारथी द्रोणने कुपित हो बाणोंद्वारा नष्ट कर दिया
قال سانجيا: حين كانت تلك السلاح تُقذَف، فإنّ درونا، فارس العربة العظيم—غاضبًا غير أنّه ثابتٌ على بأسٍ مُجرَّب—أسقطها في الحال بسهامٍ حادّة. وفي أخلاق الحرب القاسية تجتمع المهارة وضبط النفس: فالمعلّمُ المحارب يُحيّد الهجمة القاتلة سريعًا ليمنع مزيدًا من الأذى، لا ليُمعن في قسوةٍ لا حاجة لها.
Verse 25
तां तु दृष्टवा नरव्याप्रो द्रोणेन निहतां शरै: । विमलं खड्गमादत्त शतचन्द्रं च भानुमत्
قال سانجيا: فلما رأى تلك السلاح وقد حطّمته سهامُ درونا، تناول «نمرَ الرجال» دِهْرِشْتَديومْنَ سيفًا نقيًّا لا شائبة فيه، وترسًا متلألئًا موسومًا بمئةِ هلال. وأمام الخسارة الفادحة شدّ عزيمته ليلاقي العنفَ بحزمٍ منضبط، مجسّدًا واجبَ المحارب القاتم في ساحة القتال لا نزوةَ الهوى الشخصي.
Verse 26
असंशयं तथाभूत: पाउ्चाल्य: साध्वमन्यत । वधमाचार्यमुख्यस्य प्राप्तकालं महात्मन:,उस अवस्थामें पांचालराजकुमारने यह निःसंदेह ठीक मान लिया कि अब आचार्यप्रवर महात्मा द्रोणके वधका समय आ पहुँचा है
قال سانجيا: وفي تلك الحال من النفس حكم أميرُ البانچالا بلا ريبٍ أنّ ذلك هو الصواب—أنّ الوقت قد حان لقتل درونا، العظيم الروح، المتقدّم بين المعلّمين. تُبرز الآية حسابًا كئيبًا للحرب: فالمربّي المُبجَّل يُعامَل كعائقٍ استراتيجي، و«الفعل الحقّ» يُفهم بضغط اللحظة وإلحاحها أكثر مما يُفهم بمجرد التوقير.
Verse 27
ततः स रथनीडस्थं स्वरथस्य रथेषया । अगच्छदसिमुद्यम्य शतचन्द्रं च भानुमत्,उस समय उन्होंने तलवार और सौ चन्द्रचिह्"ोंवाली ढाल लेकर अपने रथकी ईषाके मार्गसे रथकी बैठकमें बैठे हुए द्रोणपर आक्रमण किया
قال سانجيا: ثم تقدّم نحو درونا الجالس في مقعد العشّ من عربته، متحركًا على طول عارضة عربته هو؛ رافعًا سيفه وحاملًا ترسًا متلألئًا موسومًا بمئةِ هلال، فشنّ هجومه. ويُبرز المشهد اندفاع المعركة الذي لا يلين، حيث تدفع الشجاعةُ والقربُ التكتيكي إلى اللقاء حتى في مواجهة معلّمٍ مُبجَّل في ميدان حرب الدharma.
Verse 28
चिकीर्षुर्दुष्करं कर्म धृष्टद्युम्नो महारथ: । इयेष वक्षो भेत्तुं स भारद्वाजस्य संयुगे
قال سانجيا: راغبًا في إنجاز فعلٍ عسير، عزمَ دِهْرِشْتَديومْنَ، فارسُ العربة العظيم، في خضمّ القتال على أن يطعن صدرَ ابنِ بهارادفاجا (درونا) بسيفه. وتعرض الآية قصده بوصفه عملًا جريئًا محفوفًا بالخطر—عزمًا مثقلًا بالتوتر الأخلاقي داخل ضرورات الحرب القاسية وتجاوزاتها.
Verse 29
सो&तिष्ठद् युगमध्ये वै युगसन्नहनेषु च । जघनार्थेषु चाश्वानां तत् सैन्या: समपूजयन्
قال سنجيا: لقد ثبت واقفًا في صميم النِّير، مستندًا إلى أشرطة تثبيته، بل غرس قدميه قرب عجيزة الخيل—فعلُ سيطرةٍ جريء وسط زحام المعركة. فلما رأت الجموع تلك الحيلة الباهرة، أكثروا من مدحه، معجبين بمهارته وثباته في الحرب.
Verse 30
तिष्ठतो युगपालीषु शोणानप्यधितिष्ठत: । नापश्यदन्तरं द्रोणस्तदद्भुतमिवाभवत्
قال سنجيا: مع أنهم ثبتوا في صفوفهم القتالية، ومع أن المذبحة القانية كانت تعصف من كل جانب، لم يجد درونا ثغرةً واحدة. بدا الأمر كأنه أعجوبة حقًّا—لحظة استثنائية حين كبح الانضباط والعزم، ولو إلى حين، حتى معلّم السلاح.
Verse 31
जैसे मांसके टुकड़ेके लोभसे विचरते हुए बाजका बड़े वेगसे आक्रमण होता है, उसी प्रकार रणभूमिमें द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नके परस्पर वेगपूर्वक आक्रमण होते थे
قال سنجيا: كما أن الصقر، وهو يجوب طمعًا في قطعة لحم، يهوي بهجومٍ خاطفٍ شديد السرعة، كذلك في ساحة القتال كان دروناآچاريا ودهريشتاديومن يندفعان أحدهما إلى الآخر مرارًا، في صدماتٍ متبادلة عنيفة.
Verse 32
तस्य पारावतानश्चान् रथशक््त्या पराभिनत् | सवनिकैकशो द्रोणो रक्तानश्वान् विवर्जयन्,द्रोणाचार्यने लाल घोड़ोंको बचाते हुए रथशक्तिका प्रहार करके बारी-बारीसे कबूतरके समान रंगवाले सभी घोड़ोंको मार डाला
قال سنجيا: إن درونا، وقد تعمّد أن يُبقي الخيل الحمراء، أخذ يصرع—واحدًا بعد واحد—برمحٍ قُذف من عربته كلَّ الخيل التي كان لونها كلون الحمام.
Verse 33
ते हता न््यपतन् भूमौ धृष्टद्युम्नस्य वाजिन: । शोणास्तु पर्यमुच्यन्त रथबन्धाद् विशाम्पते,प्रजानाथ! धृष्टद्युम्नके वे घोड़े मारे जाकर पृथ्वीपर गिर पड़े और लाल रंगवाले घोड़े रथके बन्धनसे मुक्त हो गये
قال سنجيا: إن خيلَ دهريشتاديومن، وقد ضُربت، سقطت على الأرض. أما الجياد الحمراء فقد أُطلقت من رباط العربة—يا سيّد الشعب وحامي الرعية—فبان أن القدر، في خضم عنف الحرب، يُبقي بعضًا وإن هلك آخرون.
Verse 34
तान् हयान् निहतानू् दृष्टवा द्विजाग्रयेण स पार्षतः । नामृष्यत युधां श्रेष्ठो याज्ञसेनिर्महारथ:
قال سانجيا: لما رأى تلك الخيول قد صُرِعت على يد أكرمِ ذوي الميلادين (درونا)، لم يستطع محاربُ بارشَتا—ياجناسيني ابنُ دروبادا، المقاتلُ العظيمُ على العربة، المشهورُ بين أهل القتال—أن يحتمل ذلك. لقد أوقد منظرُ مطاياه وهي تُقطَع وتتهاوى غضبَه، مُظهِرًا كيف أنّ لهيبَ الحرب يدفع حتى البطلَ المنضبطَ بما جُرح من كبريائه وبما تفرضه ساحةُ المعركة من مطالب عاجلة.
Verse 35
विरथ: स गृहीत्वा तु खड्गं खड्गभृतां वर । द्रोणमभ्यपतद् राजन् वैनतेय इवोरगम्
قال سانجيا: ثم إنّ دِهْرِشْتَديومنَة—وهو أبرعُ حملةِ السيوف—لمّا غدا بلا عربة، قبض على سيفه واندفع مباشرةً نحو درونا، أيها الملك، كما يهوي غارودا (ابن فيناتا) على حيّة. وتُبرز هذه الصورة عزيمةَ المحارب الشرسة: فحتى وهو في موضع نقصٍ لا يكفّ عن الهجوم بعزمٍ واحد، محوِّلًا بسالته الشخصية إلى لحظةٍ حاسمة أخلاقيًّا وتكتيكيًّا في المعركة.
Verse 36
तस्य रूपं बभौ राजन् भारद्वाजं जिघांसत: । यथा रूपं पुरा विष्णोर्हिरण्यकशिपोर्वधे
قال سانجيا: أيها الملك، حين كان يبتغي قتلَ بهارادفاجا (درونا)، تلألأ مظهرُه واشتعل—كهيئةِ فيشنو التي اتخذها قديمًا حين أوقع الموتَ بهيرانياكاشيبو. إنّ هذا التشبيه يُلبس عزيمةَ المحارب مهابةً تكاد تكون إلهية، موحيًا بأن الغضب والغاية في ساحة القتال قد يشبهان جلالَ العدالة الكونية الرهيب.
Verse 37
नरेश्वर! द्रोणके वधकी इच्छा रखनेवाले धृष्टद्युम्नका रूप पूर्वकालमें हिरण्यकशिपुके वधके लिये उद्यत हुए नृसिंहरूपधारी भगवान् विष्णुके समान प्रतीत होता था ।।
قال سانجيا: أيها الملك، إنّ دِهْرِشْتَديومنَة—وقد عزم على قتل درونا—كان يبدو كفيشنو في هيئة نَرَسِمْهَا، الذي نهض قديمًا لإهلاك هيرانياكاشيبو. ثم وهو يجول في ساحة القتال، أظهر ابنُ بريشَتا، يا منحدرَ كورو، إحدى وعشرين طريقةً ممتازةً ومتنوعةً من طرائق السيف.
Verse 38
भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धमाप्लुतं प्रसृतं सृतम् । परिवृत्तं निवृत्तं च खड््गं॑ चर्म च धारयन्
قال سانجيا: وهو يحمل السيفَ والتُّرس، أظهر—بحسب ما تلقّاه من تدريب—طرائقَ كثيرةً مقرّرة للحركة والهجوم: دورانًا والتفافًا، ضربًا ووثبًا، تقدّمًا وتراجعًا، انعطافًا ثم عودة. وهكذا برهن فنَّ القتال المنضبط، حيث تُحكَم المهارة بالمنهج والتعليم حتى في قلب عنف الحرب.
Verse 39
सम्पातं समुदीर्ण च दर्शयामास पार्षत: । भारतं कौशिक चैव सात्वतं चैव शिक्षया
قال سنجيا: إن ابن بْرِشَتَة (دْهْرِشْتَديومنَة)، ملتزماً بانضباط تدريبه، أظهر حركات «سَمْپاتَا» و«سَمُدِيرْنَا»، وكذلك طرائق «بهاراتا» و«كوشيكا» و«ساتْفَتَا»—مُجسِّداً فنَّ السيف والترس المصقول، المقيَّد بالقواعد، حتى تحت وطأة الحرب.
Verse 40
दर्शयन् व्यचरद् युद्धे द्रोणस्यान्तचिकीर्षया । चरतस्तस्य तान् मार्गान् विचित्रान् खड़्गचर्मिण:
قال سنجيا: وهو يُظهر بأسه، كان يتحرّك في ساحة القتال بعزمٍ على أن يُنهي أمر درونا. وبينما كان ذلك المحارب حامل السيف والترس يجوب الميدان، كان يرسم مسالك هجومٍ كثيرة مدهشة ومتنوّعة—مناوراتٍ يقصد بها الاقتراب من درونا وتحقيق غايةٍ قاتمة ضمن مقتضيات الحرب.
Verse 41
व्यस्मयन्त रणे योधा देवताश्न समागता: । वे द्रोणाचार्यका अन्त करनेकी इच्छासे युद्धमें तलवारके उपर्युक्त हाथ दिखाते हुए विचर रहे थे। ढाल-तलवार लेकर विचरते हुए धृष्टद्युम्नके उन विचित्र पैंतरोंको देखकर रणभूमिमें आये हुए योद्धा और देवता आश्वर्यचकित हो उठे थे || ४० ई ।।
قال سنجيا: في ساحة القتال، ذُهل المحاربون—بل حتى الآلهة المجتمعون—دهشةً. وبالسيف والترس في يده كان دْهْرِشْتَديومنَة يروح ويغدو، مستعملاً خدعاً ومناوراتٍ خارقة، عازماً على إنهاء دروناآچاريا. ولمّا رأى المقاتلون الذين حضروا الميدان، ومعهم المتفرجون من أهل السماء، تلك الحركات الغريبة، امتلأوا عجباً. ثم إنه بألف سهمٍ أسقط مئة هدفٍ «كالقمر»—أي حطّم تباعاً الأسلحة اللامعة أو التيجان المتألقة للعدو.
Verse 42
चर्म खड््गं च सम्बाधे धृष्टद्युम्नस्य स द्विज: । ये तु वैतस्तिका नाम शरा आसन्नयोधिन:
قال سنجيا: وفي زحمة القتال المتلاحم، تناول ذلك البراهمن أيضاً ترساً وسيفاً في مواجهة دْهْرِشْتَديومنَة؛ وكانت السهام المسماة «ڤايتَسْتِكَا» قريبة المنال للمقاتلين—أدوات حربٍ تُستعمل في ضيق الاشتباك، حيث تتعلق النجاة بالاستعداد والعزم.
Verse 43
निकृष्टयुद्धे द्रोणस्य नान्येषां सन्ति ते शरा: । तदनन्तर
قال سنجيا: في القتال القريب لم تكن تلك السهام عند أحدٍ سوى درونا. ثم في تلك الشدة من المعركة، قطع دروناآچاريا—وهو خير البراهمة—بألف سهمٍ ترس دْهْرِشْتَديومنَة الموشّى بمئة علامةٍ قمرية، وقطع سيفه أيضاً فألقاه. وأما السهام المسماة «ڤايتَسْتِكَا»—المعدّة للقتال على أقرب مدى، وطولها نحو شِبر—فكانت لدرونا وحده، إذ كان ماهراً حتى في الاشتباك المتلاحم؛ ولم تكن عند سواه.
Verse 44
अथास्येषुं समाधत्त दृढे परमसम्मतम्
قال سانجيا: ثم ثبّت سهماً على قوسه—ثابتاً، مُجازاً على أكمل وجه لهذه المهمة—مُعلِناً عزماً حاسماً على الضرب بغايةٍ منضبطة، وسط الثقل الأخلاقي للمعركة.
Verse 45
त॑ शरैर्दशभिस्ती &णैश्वचिच्छेद शिनिपुज्रव:
قال سانجيا: عندئذٍ سَاتْيَكِي—أبرزُ الشِّينيين وعظيمُ النفس—وأمام نظرِ كَرْنَةَ وابنك، قطّع ذلك السهم إلى شظايا بعشرِ نبالٍ حادّة. وهكذا أنقذ دِهْرِشْتَديومْنَةَ، وقد أوقعه المعلّمُ الأسمى (دْرونا) في خطرٍ مميت، مُقيمًا واجبَ المحارب في حماية الحليف وسط المعركة.
Verse 46
पश्यतस्तव पुत्रस्य कर्णस्य च महात्मन: । ग्रस्तमाचार्यमुख्येन धृष्टद्युम्मममोचयत्
قال سانجيا: وبينما كان ابنُك وكَرْنَةُ العظيمُ النفس ينظران، أسقط سَاتْيَكِي—أولُ الشِّينيين—ذلك المقذوف بعشرِ نبالٍ حادّة، وحرّر دِهْرِشْتَديومْنَةَ الذي كان قد أمسكه المعلّمُ الأبرز (دْرونا) وساقه إلى خطر الموت.
Verse 47
चरन्तं रथमार्गेषु सात्यकिं सत्यविक्रमम् । द्रोणकर्णान्तरगतं कृपस्थापि च भारत
قال سانجيا: يا بهاراتا، إن ساتْيَكِي—الذي لا يخون بأسُه الصدق—كان يتحرّك في مسالك العجلات، وقد اندفع إلى الفجوة بين دْرونا وكَرْنَة، بل إلى الموضع الذي يشغله كْرِبا أيضاً. إن المشهد يُظهر تقدّمَ محاربٍ بعزمٍ لا يلين عبر أخطر الثغرات في صفّ العدو، حيث يُمتحَن الشجاعةُ أمام الواجب وضرورات الحرب القاسية.
Verse 48
अपश्येतां महात्मानौ विष्वक्सेनधनंजयौ । अपूजयेतां वार्ष्णेयं ब्रवाणी साधु साध्विति
قال سانجيا: إن البطلين العظيمي النفس—فِشْفَكْسِينا ودَهانَنْجَيا—أبصراه، فكرّما فَارْشْنِيَةَ (كِرِشْنَة)، يردّدان: «أحسنت، أحسنت!». وفي خضمّ الحرب يبرز هذا البيت توقيرَ المشورة القويمة، والدافعَ الأخلاقي إلى الإقرار بما هو جديرٌ حقًّا بالثناء.
Verse 49
दिव्यान्यस्त्राणि सर्वेषां युधि निघ्नन्तमच्युतम् भारत! उस समय सत्यपराक्रमी सात्यकि द्रोण
قال سَنجايا: «يا بهاراتا، في ذلك الحين كان ساتْيَكي، الشجاع حقًّا، يجول في مسالك العربات في ساحة القتال، عابرًا بين درونا وكَرْنا وكِرْبا. وفي تلك الحال رآه ذو النفس العظيمة شري كريشنا وأرجونا، فهتفا: “أحسنت! أحسنت!” وأكثرا من الثناء عليه مرارًا. وكان ثابت الجأش في الوغى، يصدّ الأسلحة الإلهية التي يطلقها جميع الخصوم. ثم اندفع فيشفكسينا (كريشنا) ودهانَنْجَيا (أرجونا) على جيش العدو. وقال أرجونا لكريشنا: “يا كيشافا، انظر! إن ساتْيَكي، جوهرة سلالة مَدْهو، كأنه يلهو في قلب صفوة المَهارَثَة، أولئك الذين يقومون بحماية عربة الآتشاريّا.”»
Verse 50
धनंजयस्तत: कृष्णमब्रवीत् पश्य केशव । आचार्यरथमुख्यानां मध्ये क्रीडन् मधूद्गह:
قال سَنجايا: ثم قال دهانَنْجَيا (أرجونا) لكريشنا: «انظر يا كيشافا! هناك، في قلب صفوة فرسان العربات الذين يحرسون عربة المعلّم، يتحرّك ذلك البطل—المولود من سلالة مَدْهو—كأنه يلعب.» وتُبرز هذه الكلمة معًا ضراوة المعركة ودهشة جرأة ساتْيَكي ومهارته إذ اخترق طوق الحماية حول درونا.
Verse 51
आनन्दयति मां भूय: सात्यकि: परवीरहा । माद्रीपुत्रो च भीमं च राजानं च युधिषछ्विरम्
قال سَنجايا: «مرارًا وتكرارًا يملأني ساتْيَكي، قاتل أبطال العدو، فرحًا؛ وهو كذلك يُبهج ابني مادري، وبهيمَ، والملك يودهيشثيرا.»
Verse 52
यच्छिक्षयानुद्धत: सन् रणे चरति सात्यकि: । महारथानुपक्रीडन् वृष्णीनां कीर्तिवर्धन:
قال سَنجايا: «مع أنه مُحكَم التدريب، فإن ساتْيَكي يجول في ساحة القتال بلا كِبر. وكأنه يلاعب المَهارَثَة العظام، يزيد مجد آل فريشني. وإذ رأى المحاربون من كلا الفريقين بأسه الذي لا يهاب، هتفوا: “أحسنت!” وأثنوا على مآثره البطولية.»
Verse 53
तमेते प्रतिनन्दन्ति सिद्धा: सैन्याश्न विस्मिता: । अजय्यं समरे दृष्टवा साधु साध्विति सात्यकिम् | योधाश्वो भयत:ः सर्वे कर्मभि: समपूजयन्
قال سَنجايا: «إذ رأى هؤلاء السِّدْهَة والجنود المندهشون ساتْيَكي—الذي لا يُقهَر في القتال—صفّقوا له وأثنوا عليه. وهم ينظرون إليه في لُجّة المعركة هتفوا: “أحسنت! أحسنت!” واحتفلوا بمآثره.»
Verse 190
इस प्रकार श्रीमह्मा भारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें युधिष्ठिरका असत्यभाषणविषयक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ
وهكذا تنتهي الفَصْلُ التاسعُ والتسعون بعد المئة من «دروṇa پرفا» في «المهابهارتا الشريفة»، ضمن قسم «قتل دروṇa»، في شأن قول يودهيشثيرا ما ليس بصدق. وتُشير خاتمةُ الفصل إلى التوتر الأخلاقي الكامن في صميم الحادثة: فحين يشتد ضغطُ الحرب، يُستدرَج حتى الملكُ المشهورُ بالصدق إلى لفظٍ مُساوِمٍ، ويغدو لثقله الأخلاقي أثرٌ في سقوط دروṇa وفي تأمل السرد لمعنى الدارما تحت ضرورةٍ قصوى.
Verse 191
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि संकुलयुद्धे एकनवत्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ
قال سنجيا: هكذا تنتهي الفَصْلُ الحادي والتسعون بعد المئة، المعنون «المعركة المختلطة المضطربة»، ضمن «دروṇa پرفا» من «المهابهارتا الشريفة»، في القسم الفرعي المتعلق بقتل دروṇa. ويُعلن السردُ هنا ختاماً رسمياً لهذه المرحلة من أخبار الحرب، مؤكداً أن الصراع بلغ تشابكاً كثيفاً تُستنزَف فيه وضوحُ النظام وحدودُ الكفّ، ويثقل فيه العبءُ الأخلاقي للقتال على جميع الأطراف.
Verse 331
वे जूएके मध्यभागमें और द्रोणाचार्यके लाल घोड़ोंकी पीठपर पैर रखकर खड़े थे। उस अवस्थामें द्रोणाचार्यको उनके ऊपर प्रहार करनेका कोई अवसर ही नहीं दिखायी देता था, यह एक अदभुत-सी बात हुई ।।
كانوا قائمين في وسط ساحة القتال، وقد وضعوا أقدامهم على ظهور خيول دروṇاچاريا الحمراء. وفي تلك الحال لم يبدُ لدروṇاچاريا أيُّ موضعٍ يتهيأ له فيه أن يضربهم من فوقه—وكان ذلك أمراً عجيباً. ثم كان اندفاعُ دروṇا وابنِ پارṣata في المعركة سريعاً كالصقر إذا انقضّ، كمن يشتدّ شغفُه بالطُّعمة.
Verse 433
प्रद्युम्नयुयुधानाभ्यामभिमन्योश्व॒ भारत । भारत! कृपाचार्य, अर्जुन, अश्वत्थामा, वैकर्तन, कर्ण, प्रद्युम्म, सात्यकि और अभिमन्युको छोड़कर और किसीके पास वैसे बाण नहीं थे
قال سنجيا: يا بهارتا، ما عدا پراديومنّا، ويويودهانا (ساتيكي)، وأبهيمانيو—وما عدا كṛپاتشاريا، وأرجونا، وأشڤتثاما، وڤايكرتانا (كارنا)، وكارنا—فلم يكن لأحدٍ غيرهم سهامٌ بتلك القوة. وبهذا يُبرز الراوي سلّماً في الفروسية والأخلاق: ففي فوضى الحرب لا يجمع المهارةَ والانضباطَ والعزمَ الكافي لحمل السلاح الاستثنائي دون فقدان الكفّ إلا قلةٌ من الأبطال.
Verse 443
अन्तेवासिनमाचार्यों जिघांसु: पुत्रसम्मितम् । तत्पश्चात् पुत्रतुल्य शिष्यको मार डालनेकी इच्छासे आचार्यने धनुषपर परम उत्तम सुदृढ़ बाण रखा
قال سنجيا: إن المعلّم، وقد عزم على قتل تلميذه المقيم عنده—المُعَدّ بمنزلة الابن—ثم، رغبةً في صرع ذلك التلميذ الذي هو كابنٍ له، وضع على قوسه سهماً ممتازاً بالغ الصلابة. وتكشف هذه اللحظة عن صدع الحرب الأخلاقي: فحتى رابطة المعلّم والتلميذ، القريبة من رابطة الأسرة، تُغلبها إرادةُ الإهلاك.
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