
Dharma-vyādha’s Analysis of Moral Decline and the Mahābhūta–Guṇa Schema (धर्मव्याधोपदेशः)
Upa-parva: Dharma-vyādha Upākhyāna (The Narrative of the Righteous Hunter-Butcher)
Mārkaṇḍeya introduces the continuation of the dharma-vyādha’s instruction to Yudhiṣṭhira. The vyādha outlines a causal chain in human cognition: mind first engages objects for ‘knowing,’ then attachment forms, followed by desire and anger. From repeated pursuit of pleasing forms and scents arises rāga (attraction) and then dveṣa (aversion), which mature into lobha (greed) and moha (delusion). Under these pressures, one loses clear judgment about dharma, performing ‘righteous’ acts as pretexts (vyāja) for gain; even when restrained by friends and learned persons, the person rationalizes wrongdoing with scriptural-sounding replies. Adharma expands in thought, speech, and action; virtues decay and the person gravitates toward similarly disposed companions, resulting in suffering here and harm beyond. The vyādha then presents the corrective: early recognition of faults through prajñā, skillful composure in pleasure and pain, and service to the virtuous—through which dharmic understanding arises. A brāhmaṇa praises the teaching, calling the speaker rishi-like. The vyādha affirms honoring brāhmaṇas and proceeds to a compact metaphysical account: the five great elements and their qualities, the emergence of mind (manas), intellect (buddhi), ego (ahaṃkāra), the senses, and the three guṇas—summarized as a structured tally culminating in a ‘twenty-four’ analytic frame, before inviting further questions.
Chapter Arc: वनवास में धर्म-जिज्ञासा से उद्वेलित पाण्डुनन्दन (युधिष्ठिर) महर्षि मार्कण्डेय से पूछते हैं—दान किस अवस्था में, किसे, किस प्रकार दिया जाए कि फल शुद्ध और अक्षय हो; और कौन-सा दान निन्दित होकर दाता को ही गिरा देता है। → मार्कण्डेय दान के सूक्ष्म विधान खोलते हैं—निन्दित दान, निन्दित जन्म/अयोग्य पात्र, श्राद्ध में ग्राह्य-अग्राह्य ब्राह्मण, दानपात्र के लक्षण, तथा दान के साथ शौच (वाक्-शौच, कर्म-शौच, जल-शौच) की अनिवार्यता। वे बताते हैं कि दान केवल वस्तु नहीं, दाता की नीयत, पात्र की योग्यता और विधि की शुद्धि का संयुक्त संस्कार है। → उपदेश का शिखर तब आता है जब ऋषि ‘शौच’ को स्वर्ग-मार्ग का निर्णायक घोषित करते हैं—तीन प्रकार के शौच से युक्त व्यक्ति के लिए स्वर्ग निश्चित है; और जो दान/कर्म में अशुद्ध, कपटी या अयोग्य-पात्र-सेवी है, उसे भयावह परिणाम (राक्षसी यातना, दुर्गम शून्य-आकाश-सा मार्ग, श्राद्ध-विधि का विघटन) भोगना पड़ता है। → अध्याय दान के सकारात्मक फल-चित्रों से स्थिर होता है—विशुद्ध सुवर्ण, छत्र, अश्व आदि उत्तम दानों से लोक-प्राप्ति, पथिक-विश्राम, आतप-निवारण जैसे लोकहितकारी दानों की प्रशंसा; साथ ही उपवास/नियमों के फल और इन्द्रिय-त्याग की कठिनता का विवेचन कर यह निष्कर्ष कि धर्म का सार ‘शुद्धि + करुणा + योग्य-पात्र’ है। → युधिष्ठिर के मन में यह प्रश्न शेष रह जाता है कि जब पात्र-निर्णय और विधि इतनी सूक्ष्म है, तब संकट-काल में त्वरित दान/श्राद्ध करते समय त्रुटि से कैसे बचा जाए—और आगे के उपदेश की भूमि बनती है।
Verse 1
#:73:.8 #:23:.7 () हि 2 7 द्विशततमो<्ध्याय: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राहाु और अग्राह्ा ब्राह्मण, दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा 24252 आदि विविध विषयोंका व वैशम्पायन उवाच श्रुत्वा स राजा राजर्षेरिन्द्रद्युम्नस्थ तत् तदा । मार्कण्डेयान्महा भागात् स्वर्गस्य प्रतिपादनम्
Vaiśampāyana berkata: Setelah mendengar dari resi Mārkaṇḍeya yang amat mulia kisah tentang raja-sage Indradyumna dan perolehan surga, sang raja merenungkannya sepenuh makna.
Verse 2
कीदृशीषु हावस्थासु दत्त्वा दानं महामुने
Wahai mahāmuni, dalam keadaan dan kondisi seperti apakah suatu pemberian, setelah diberikan, sungguh dihitung sebagai dāna yang berpahala?
Verse 3
गार्हस्थ्ये5प्यथवा बाल्ये यौवने स्थविरे5पि वा । यथा फलं समश्नाति तथा त्वं कथयस्व मे,“मनुष्य बाल्यावस्था या गृहस्थाश्रममें, जवानीमें अथवा बुढ़ापेमें दान देनेसे जैसा फल पाता है, उसका मुझसे वर्णन कीजिये”
Baik dalam tahap hidup berumah tangga, maupun pada masa kanak-kanak, muda, bahkan tua—katakan kepadaku bagaimana manusia menikmati buah (dari dāna) pada tiap keadaan; jelaskan hasilnya sebagaimana sungguh dialami.
Verse 4
मार्कण्डेय उवाच वृथा जन्मानि चत्वारि वृथा दानानि षोडश । वृथा जन्म ह्[पुत्रस्य ये च धर्मबहिष्कृता:,मार्कण्डेयजीने कहा--(नीचे लिखे अनुसार) चार प्रकारके जीवन व्यर्थ हैं और सोलह प्रकारके दान व्यर्थ हैं। जो पुत्र-हीन हैं, जो धर्मसे बहिष्कृत (भ्रष्ट) हैं, जो सदा दूसरोंकी ही रसोईमें भोजन किया करते हैं तथा जो केवल अपने लिये ही भोजन बनाते एवं देवता और अतिथियोंको न देकर अकेले ही भोजन कर लेते हैं, उनका वह भोजन असत् कहा गया है। अत: उनका जन्म वृथा है (इस प्रकार इन चार प्रकारके मनुष्योंका जन्म व्यर्थ है)
Mārkaṇḍeya berkata: “Empat macam kelahiran adalah sia-sia, dan enam belas macam pemberian adalah sia-sia. Sia-sialah kelahiran orang yang tanpa putra; demikian pula kelahiran mereka yang tersingkir dari dharma.”
Verse 5
परपाकेषु ये5श्रन्ति आत्मार्थ च पचेत् तु यः । पर्यश्नन्ति वृथा ये च तदसत्यं प्रकीर्त्यते,मार्कण्डेयजीने कहा--(नीचे लिखे अनुसार) चार प्रकारके जीवन व्यर्थ हैं और सोलह प्रकारके दान व्यर्थ हैं। जो पुत्र-हीन हैं, जो धर्मसे बहिष्कृत (भ्रष्ट) हैं, जो सदा दूसरोंकी ही रसोईमें भोजन किया करते हैं तथा जो केवल अपने लिये ही भोजन बनाते एवं देवता और अतिथियोंको न देकर अकेले ही भोजन कर लेते हैं, उनका वह भोजन असत् कहा गया है। अत: उनका जन्म वृथा है (इस प्रकार इन चार प्रकारके मनुष्योंका जन्म व्यर्थ है)
Mereka yang bersusah payah di dapur orang lain, dan orang yang memasak hanya demi dirinya sendiri; serta mereka yang makan tanpa tata-aturan yang benar—perilaku demikian dinyatakan sebagai ‘asat’ (hampa, tidak sahih).
Verse 6
आरूढपतिते दत्तमन्यायोपहृतं च यत् । व्यर्थ तु पतिते दान॑ ब्राह्मणे तस्करे तथा,जो वानप्रस्थ या संन्यास-आश्रमसे पुन: गृहस्थ-आश्रममें लौट आया हो, उसे “आरूढ़- पतित' कहते हैं। उसको दिया हुआ दान व्यर्थ होता है। अन्यायसे कमाये हुए धनका दान भी व्यर्थ ही है। पतित ब्राह्मण तथा चोरको दिया हुआ दान भी व्यर्थ होता है
Pemberian kepada ‘ārūḍha-patita’—orang yang telah menempuh laku tinggi namun kemudian jatuh—adalah sia-sia; demikian pula dāna yang berasal dari harta yang diperoleh dengan ketidakadilan. Begitu juga sedekah kepada brāhmaṇa yang jatuh, dan kepada pencuri, menjadi tanpa hasil.
Verse 7
गुरौ चानृतिके पापे कृतघ्ने ग्रामयाजके । वेदविक्रयिणे दत्तं तथा वृषलयाजके
Dāna yang diberikan kepada guru yang licik, berdosa, dan tidak benar; kepada orang yang tidak tahu berterima kasih; kepada grāma-yājaka (pendeta desa yang berupacara demi upah); kepada penjual Veda; dan juga kepada vṛṣala-yājaka (imam yang mengoffisiasi bagi kaum terbuang)—pemberian demikian tidak menghasilkan pahala yang murni.
Verse 8
ब्रह्मबन्धुषु यद् दत्तं यद् दत्तं वृषलीपतौ । स्त्रीजनेषु च यद् दत्तं व्यालग्राहे तथैव च
Mārkaṇḍeya berkata: “Sedekah yang diberikan kepada ‘brahmana hanya dalam nama’ (tanpa laku brahmanis sejati), yang diberikan kepada suami perempuan dari golongan rendah, yang diberikan kepada kaum perempuan sebagai kelompok tanpa pertimbangan, dan pula yang diberikan ketika seseorang sedang dicekam pemangsa—pemberian demikian dinilai cacat secara dharma, sebab dilakukan tanpa menimbang kelayakan, tujuan, dan keadaan yang tepat.”
Verse 9
परिचारकेषु यद् दत्तं वृथा दानानि षोडश । पिता आदि गुरुजन, मिथ्यावादी, पापी, कृतध्न, ग्रामपुरोहित, वेदविक्रय करनेवाले, शूद्रसे यज्ञ करानेवाले, नीच ब्राह्मण, शूद्राके पति ब्राह्मण, साँपको पकड़कर व्यवसाय करनेवाले तथा सेवकों और स्त्री-समूहको दिया हुआ दान व्यर्थ है-। इस प्रकार ये सोलह दान निष्फल बताये गये हैं || ७-८ ई || तमोवृतस्तु यो दद्याद् भयात् क्रोधात् तथैव च,जो तमोगुणसे आवृत हो भय और क्रोधपूर्वक दान देता है, वह मनुष्य वैसे सब प्रकारके दानोंका फल भावी जन्ममें गर्भावस्थामें भोगता है, अर्थात् तामसी दान करनेके कारण वह उसका फल दु:खके रूपमें भोगता है तथा (श्रेष्ठ) ब्राह्मणोंको दान देनेवाला मानव उस दानका फल बड़ा होनेपर (कामनाके अनुसार) भोगता है
Mārkaṇḍeya berkata: “Sedekah yang diberikan kepada penerima tertentu yang tidak layak menjadi sia-sia; ‘sedekah tanpa buah’ itu dikatakan berjumlah enam belas. Dan orang yang diselubungi tamas lalu memberi karena takut atau marah, akan merasakan akibat pemberian itu sebagai penderitaan dalam kelahiran mendatang (bahkan sejak dalam kandungan). Sebaliknya, ia yang memberi kepada brāhmaṇa yang sungguh layak akan menikmati buahnya sepadan dengan besarnya kebajikan.”
Verse 10
भुदुक्ते च दानं तत् सर्व गर्भस्थस्तु नर: सदा । ददद् दान द्विजातिभ्यो वृद्धभावेन मानव:,जो तमोगुणसे आवृत हो भय और क्रोधपूर्वक दान देता है, वह मनुष्य वैसे सब प्रकारके दानोंका फल भावी जन्ममें गर्भावस्थामें भोगता है, अर्थात् तामसी दान करनेके कारण वह उसका फल दु:खके रूपमें भोगता है तथा (श्रेष्ठ) ब्राह्मणोंको दान देनेवाला मानव उस दानका फल बड़ा होनेपर (कामनाके अनुसार) भोगता है
Mārkaṇḍeya berkata: “Bila sedekah diberikan karena takut, gelisah, kegelapan batin, atau amarah, seluruh buahnya dialami seseorang dalam kelahiran mendatang bahkan ketika masih dalam kandungan—yakni derma yang tamasik matang sebagai penderitaan. Namun manusia yang memberi dengan niat matang dan penuh hormat kepada kaum dua-kali-lahir (brāhmaṇa yang layak) menikmati buahnya lebih besar, sepadan dengan keluhuran penerima dan batinnya sendiri.”
Verse 11
राजन! इसीलिये मनुष्यको चाहिये कि वह स्वर्ग-मार्गपर अधिकार पानेकी इच्छासे सभी अवस्थाओंमें (श्रेष्ठ) ब्राह्मणोंको ही सब प्रकारके दान दे
Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Raja, karena itu orang yang menginginkan hak menapaki jalan menuju surga hendaknya, dalam setiap keadaan hidup, memberikan segala jenis sedekah khususnya kepada brāhmaṇa yang benar-benar layak.”
Verse 12
युधिछिर उवाच चातुर्वर्ण्यस्य सर्वस्य वर्तमाना: प्रतिग्रहे । केन विप्रा विशेषेण तारयन्ति तरन्ति च,युधिष्ठिरने पूछा--महामुने! जो ब्राह्मण चारों वर्णोमेंसे सभीके दान ग्रहण करते हैं, वे किस विशेष धर्मका पालन करनेसे दूसरोंको तारते और स्वयं भी तरते हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai maharsi, bila para brāhmaṇa menerima pemberian dari keempat varṇa, dengan laku atau disiplin khusus apakah mereka—secara istimewa—mengangkat orang lain dan juga menyeberangkan diri mereka sendiri?”
Verse 13
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु सर्वदानानि पार्थिव | दातव्यानि द्विजातिभ्य: स्वर्गमार्गजिगीषया,मार्कण्डेय उवाच जपैम॑न्त्रैश्न होमैश्व स्वाध्यायाध्ययनेन च । नावं वेदमयीं कृत्वा तारयन्ति तरन्ति च मार्कण्डेयजीने कहा--राजन! ब्राह्मण जप, मन्त्र (पाठ), होम, स्वाध्याय और वेदाध्ययनके द्वारा वेदमयी नौकाका निर्माण करके दूसरोंको भी तारते हैं और स्वयं भी तर जाते हैं
Mārkaṇḍeya berkata: “Karena itu, wahai raja, dalam segala keadaan hidup dan setiap waktu, hendaknya orang yang ingin menaklukkan jalan menuju surga memberikan derma kepada para dwija. Dengan japa, pelafalan mantra, persembahan homa, swādhyāya, dan pengkajian Weda, para brāhmaṇa membentuk ‘perahu yang terbuat dari Weda’; dengannya mereka menyeberangkan orang lain, dan mereka sendiri pun menyeberang.”
Verse 14
ब्राह्मणांस्तोषयेद् यस्तु तुष्यन्ते तस्य देवता: । वचनाच्चापि विप्राणां स्वर्गलोकमवाप्लनुयात्,जो ब्राह्मणोंको संतुष्ट करता है, उसपर सब देवता संतुष्ट रहते हैं। ब्राह्मणोंके वचनसे अर्थात् आशीर्वादसे भी मनुष्य स्वर्गलोक पा सकता है
Mārkaṇḍeya berkata: “Siapa yang menyenangkan para brāhmaṇa, ia pun menyenangkan para dewa. Dan melalui kata-kata para brāhmaṇa—yakni berkat mereka—seseorang dapat mencapai alam surga.”
Verse 15
पितृदैवतपूजाभिर््राह्यिणाभ्यर्चनेन च । अनन्तं पुण्यलोकं तु गन्तासि त्वं न संशय:,राजन! तुम पितरों और देवताओंकी पूजासे तथा ब्राह्मणोंका आदर-सत्कार करनेसे अक्षय पुण्यलोकमें जाओगे, इसमें संशय नहीं है
Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai raja, dengan memuja para Pitṛ dan para dewa, serta menghormati dan melayani para brāhmaṇa dengan takzim, engkau pasti mencapai alam kebajikan yang tak berkesudahan dan tak binasa; tentang ini tiada keraguan.”
Verse 16
युधिष्ठिरो महाराज पुन: पप्रच्छ तं॑ मुनिम् । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! महाभाग मार्कण्डेयजीके मुखसे राजर्षि इन्द्रद्युम्नको पुनः स्वर्गकी प्राप्तिका वृत्तान्त सुनकर राजा युधिष्ठिरने उन मुनीश्वरसे फिर प्रश्न किया,श्लेष्मादिभिव्यप्ततनुर्म्रियमाणो विचेतन: । ब्राह्मणा एव सम्पूज्या: पुण्यं स्वर्गमभीप्सता जिसका शरीर कफ आदिसे भर गया हो, जो मर रहा हो और अचेत हो गया हो, उसे पुण्यमय स्वर्गलोककी प्राप्ति अभीष्ट हो तो ब्राह्मणोंकी पूजा भी करनी चाहिये
Vaiśampāyana berkata: Setelah mendengar dari mulut Mārkaṇḍeya yang mulia kisah bagaimana rājaṛṣi Indradyumna memperoleh kembali surga, Mahārāja Yudhiṣṭhira kembali bertanya kepada sang resi: “Bila tubuh seseorang diliputi dahak dan humor lainnya, ia sedang sekarat dan telah tak sadar—namun ia mendambakan surga yang berbuah kebajikan—maka para brāhmaṇa memang patut dihormati sepenuhnya (sebagai laku dharma dan pahala).”
Verse 17
श्राद्धकाले तु यत्नेन भोक्तव्या हाजुगुप्सिता: । दुर्वर्गः कुनखी कुछी मायावी कुण्डगोलकी,श्राद्धकालमें प्रयत्त करके उत्तम ब्राह्मणोंको ही भोजन कराना चाहिये। जिनके शरीरका रंग घृणाजनक हो, नख काले पड़ गये हों, जो कोढ़ी और धूर्त हो, पिताकी जीवित-अवस्थामें ही माताके व्यभिचारसे जिनका जन्म हुआ हो अथवा जो विधवा माताके पेटसे पैदा हुए हों और जो पीठपर तरकस बाँधे क्षत्रियवृत्तिसे जीविका चलाते हों, ऐसे ब्राह्मणोंको श्राद्धमें प्रयत्नपूर्वक त्याग दे; क्योंकि उनको भोजन करानेसे श्राद्ध निन्दित हो जाता है और निन्दित श्राद्ध यजमानको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे अग्नि काष्ठको जला डालती है
Mārkaṇḍeya berkata: “Pada waktu śrāddha, hendaknya dengan sungguh-sungguh diupayakan agar yang diberi makan hanyalah mereka yang tidak tercela. Mereka yang berperilaku rendah, yang kukunya berpenyakit, yang mengidap penyakit menjijikkan, yang licik dan menipu, serta yang kelahirannya dipandang tercela—hendaknya dihindari dalam śrāddha. Sebab śrāddha yang dilakukan dengan penerima yang tidak patut menjadi śrāddha yang tercela; dan śrāddha yang tercela mencelakakan sang penyelenggara sebagaimana api melahap kayu kering.”
Verse 18
वर्जनीया: प्रयत्नेन काण्डपृष्ठाश्न देहिनः । जुगुप्सितं हि यच्छाद्धं दहत्यग्निरिवेन्धनम्,श्राद्धकालमें प्रयत्त करके उत्तम ब्राह्मणोंको ही भोजन कराना चाहिये। जिनके शरीरका रंग घृणाजनक हो, नख काले पड़ गये हों, जो कोढ़ी और धूर्त हो, पिताकी जीवित-अवस्थामें ही माताके व्यभिचारसे जिनका जन्म हुआ हो अथवा जो विधवा माताके पेटसे पैदा हुए हों और जो पीठपर तरकस बाँधे क्षत्रियवृत्तिसे जीविका चलाते हों, ऐसे ब्राह्मणोंको श्राद्धमें प्रयत्नपूर्वक त्याग दे; क्योंकि उनको भोजन करानेसे श्राद्ध निन्दित हो जाता है और निन्दित श्राद्ध यजमानको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे अग्नि काष्ठको जला डालती है
Dalam upacara śrāddha, hendaknya dengan sungguh-sungguh disingkirkan mereka yang hidup dengan cara hina dan tidak suci—yang seakan memakan sisa-sisa kotor yang melekat di belakang periuk yang pecah. Sebab śrāddha yang menjadi tercela sungguh menjijikkan, dan ia membinasakan sang penyelenggara sebagaimana api melahap bahan bakar.
Verse 19
ये ये श्राद्धे न युज्यन्ते मूकान्धवधिरादय: । तेडपि सर्वे नियोक्तव्या मिश्रिता वेदपारगै:,किंतु अंधे, गूँगे, बहरे आदि जिन-जिन ब्राह्मणोंको श्राद्धमें वर्जित बताया गया है, उन सबको वेदपारंगत ब्राह्मणोंके साथ श्राद्धमें सम्मिलित किया जा सकता है
Para Brahmana yang disebut tidak layak untuk dilibatkan dalam śrāddha—seperti yang bisu, buta, tuli, dan lainnya—tetap dapat diikutsertakan, asalkan mereka duduk dan berperan bersama Brahmana yang mahir dalam Weda.
Verse 20
प्रतिग्रहश्च वै देय: शृणु यस्य युधिष्ठिर । प्रदातारं तथा55त्मानं यस्तारयति शक्तिमान्,युधिष्ठिर! अब मैं तुम्हें यह बताता हूँ कि कैसे व्यक्तिको दान देना चाहिये। जो दाताको और अपने-आपको भी तारनेकी शक्ति रखता हो
Wahai Yudhiṣṭhira, dengarkan—menerima pemberian pun harus dilakukan sebagai kewajiban dharma. Hendaknya seseorang menerima hanya dari pemberi yang mampu, yang melalui pemberiannya dapat mengangkat baik si penerima maupun dirinya sendiri.
Verse 21
तस्मिन् देयं द्विजे दानं सर्वागमविजानता । प्रदातारं यथा55त्मानं तारयेद् यः स शक्तिमान्,सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञाता मानव उसी ब्राह्मणको दान दे, जो दाताका तथा अपना भी संसारसागरसे उद्धार कर सके। वही शक्तिशाली ब्राह्मण है
Karena itu, orang yang sungguh memahami seluruh ajaran suci hendaknya memberi dana kepada brāhmaṇa (dvija) yang memiliki daya untuk menyeberangkan baik sang pemberi maupun dirinya sendiri dari samudra saṃsāra; brāhmaṇa seperti itulah yang benar-benar mampu.
Verse 22
न तथा हविषो होमैर्न पुष्पैननिलेपनै: । अग्नय: पार्थ तुष्यन्ति यथा हृतिथिभोजने,कुन्तीनन्दन! अतिथियोंको भोजन करानेसे अग्निदेव जितने संतुष्ट होते हैं, उतना संतोष उन्हें हविष्यका हवन करने तथा पुष्प और चन्दन चढ़ानेसे भी नहीं होता
Wahai Pārtha, putra Kuntī—Agni tidaklah begitu berkenan oleh homa dengan havis, tidak pula oleh persembahan bunga dan wewangian, sebagaimana ia berkenan ketika para tamu diberi santapan dengan hati yang gembira dan tulus.
Verse 23
तस्मात् त्वं सर्वयत्नेन यतस्वातिथिभोजने । पादोदकं पादघृतं दीपमन्न॑ प्रतिश्रयम्
Karena itu, berusahalah dengan segenap daya untuk memuliakan dan menjamu para tamu. Persembahkan air untuk membasuh kaki, olesan atau ghee bagi kaki, pelita, makanan, dan tempat bernaung yang layak—itulah tata krama dharma bagi seorang grihastha.
Verse 24
देवमाल्यापनयन द्विजोच्छिष्टावमार्जनम्,नृपश्रेष्ठ! देवविग्रहोंपर चढ़े हुए चन्दन-पुष्प आदिको यथासमय उतारना, ब्राह्मणोंकी जूठन साफ करना, उन्हें चन्दन-माला आदिसे अलंकृत करना, उनकी सेवा-पूजा करना और उनके पैर आदि अंगोंको दबाना, इनमेंसे एक-एक कार्य गोदानसे भी अधिक महत्त्व रखता है
Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai raja terbaik, menurunkan pada waktunya cendana, bunga, dan persembahan lain yang diletakkan pada arca dewa; membersihkan sisa setelah para Brahmana makan; menghiasi mereka dengan pasta cendana dan rangkaian bunga; melayani serta memuja mereka; dan memijat lembut kaki serta anggota tubuh mereka—setiap satu perbuatan ini, bahkan sendirian, lebih besar pahalanya daripada sedekah seekor sapi.”
Verse 25
आकल्प: परिचर्या च गात्रसंवाहनानि च । अन्नैकैकं नृपश्रेष्ठ गोदानाद्धयतिरिच्यते,नृपश्रेष्ठ! देवविग्रहोंपर चढ़े हुए चन्दन-पुष्प आदिको यथासमय उतारना, ब्राह्मणोंकी जूठन साफ करना, उन्हें चन्दन-माला आदिसे अलंकृत करना, उनकी सेवा-पूजा करना और उनके पैर आदि अंगोंको दबाना, इनमेंसे एक-एक कार्य गोदानसे भी अधिक महत्त्व रखता है
Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai raja terbaik, satu perbuatan saja—pelayanan yang pantas, perhatian yang tekun, atau memijat anggota tubuh—melampaui pahala sedekah seekor sapi.”
Verse 26
इन्द्रलोक॑ त्वनुभवेत् पुरुषस्तद् ब्रवीहि मे । “महामुने! किन अवस्थाओंमें दान देकर मनुष्य इन्द्रलोकका सुख भोगता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें”,कपिलायाः: प्रदानात् तु मुच्यते नात्र संशय: । तस्मादलंकृतां दद्यात् कपिलां तु द्विजातये कपिला गौका दान करनेसे मनुष्य नि:संदेह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसलिये कपिला गौको अलंकृत करके ब्राह्मणको दान करना चाहिये
Vaiśaṁpāyana berkata: “Katakan kepadaku: dengan sedekah apakah seseorang menikmati dunia Indra? Tidak diragukan, dengan memberikan seekor sapi kapilā (berwarna keemasan-kemerahan) ia terbebas dari dosa. Karena itu, hiasilah sapi kapilā itu dan berikan kepada seorang dvija (Brahmana).”
Verse 27
श्रोत्रियाय दरिद्राय गृहस्थायाग्निहोत्रिणे | पुत्रदाराभिभूताय तथा हानुपकारिणे,दान लेनेवाला ब्राह्मण श्रोत्रिय हो, निर्धन हो, गृहस्थ हो, नित्य अग्निहोत्र करता हो, दरिद्रताके कारण जिसे स्त्री और पुत्रोंके तिरस्कार सहने पड़ते हों तथा दाताने न तो जिससे प्रत्युपकार प्राप्त किया हो और न आगे प्रत्युपकार प्राप्त होनेकी सम्भावना ही हो
Mārkaṇḍeya berkata: “Sedekah hendaknya diberikan kepada seorang Brahmana yang benar-benar śrotriya (menguasai Weda), yang miskin, yang hidup sebagai grihastha dan menunaikan Agnihotra setiap hari; yang terhimpit beban istri dan anak serta, karena kemiskinan, menanggung cela mereka; dan yang darinya sang pemberi tidak pernah menerima balasan, dan tidak pula patut mengharap balasan di kemudian hari.”
Verse 28
एवंविधेषु दातव्या न समृद्धेषु भारत । को गुणो भरतश्रेष्ठ समृद्धेष्वभिवर्जितम्,भारत! ऐसे ही लोगोंको गोदान करना चाहिये, धनवानोंको नहीं। भरतश्रेष्ठ! धनवानोंको देनेसे क्या लाभ है?
Wahai Bhārata! Derma hendaknya diberikan kepada orang-orang seperti ini, bukan kepada mereka yang sudah makmur. Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata! Apa kebajikan sejati yang diperoleh dengan memberi kepada orang kaya yang tak kekurangan apa pun?
Verse 29
एकस्यैका प्रदातव्या न बहूनां कदाचन | सा गौर्विक्रयमापन्ना हन्यात् त्रिपुरुषं कुलम्
Seekor sapi hendaknya diberikan hanya kepada satu penerima yang berhak, jangan sekali-kali kepada banyak orang sekaligus. Jika sapi itu setelah didermakan dijadikan barang dagangan dan dijual, ia dapat mendatangkan kebinasaan bagi keluarga hingga tiga generasi.
Verse 30
सुवर्णस्य विशुद्धस्य सुवर्ण य: प्रयच्छति
Barang siapa mendermakan emas—emas yang murni dan telah dimurnikan—ia memperoleh kebajikan yang besar.
Verse 31
अनड्वाहं तु यो दद्याद् बलवन्तं धुरंधरम्
Barang siapa mendermakan seekor lembu jantan penarik bajak yang kuat—yang sanggup memikul kuk dan menanggung beban—ia meraih kebajikan yang besar.
Verse 32
वसुन्धरां तु यो दद्याद् द्विजाय विदुरात्मने
Barang siapa menganugerahkan vasundharā—tanah beserta kekayaannya—kepada seorang dvija (brāhmaṇa) yang layak, berhati jernih dan berdisiplin…
Verse 33
पृच्छन्ति चात्र दातारं वदन्ति पुरुषा भुवि,अन्नदातृसम: सो<पि कीर््यते नात्र संशय: । यदि कोई रास्तेके थके-माँदे, दुबले-पतले पथिक धूलभरे पैरोंसे भूखे-प्यासे आ जाया और पूछें कि क्या यहाँ कोई भोजन देनेवाला है? उस समय उन्हें जो विद्वान् अन्न मिलनेका पता बता देता है, वह भी अन्नदाताके समान ही कहा जाता है, इसमें संशय नहीं है
Di bumi ini orang-orang bertanya tentang seorang dermawan dan memuji pemberi; bahkan orang yang menunjukkan di mana makanan dapat diperoleh pun dipuji setara dengan pemberi makanan—tanpa keraguan.
Verse 34
अध्वनि क्षीणगात्राश्न पांसुपादावगुण्ठिता: । तेषामेव श्रमार्तानां यो हान्न॑ं कथयेद् बुध:
Di jalan, tubuh mereka lemah, kaki tertutup debu, dan mereka tersiksa oleh keletihan; bagi para musafir itulah orang bijak patut menyebutkan (dan mengupayakan) makanan—sebagai penawar derita yang mendesak.
Verse 35
तस्मात् त्वं सर्वदानानि हित्वान्नं सम्प्रयच्छ ह
Karena itu, sisihkanlah segala bentuk pemberian lainnya dan senantiasa berikanlah makanan—berilah pemelihara hidup.
Verse 36
यथाशक्ति च यो दद्यादन्नं विप्रेषु संस्कृतम्
Siapa pun, sesuai kemampuannya, memberikan makanan yang disiapkan dengan layak kepada para Brahmana, ia menegakkan kemurahan hati yang selaras dengan dharma, memuliakan para tamu suci dengan santapan yang pantas.
Verse 37
अन्नमेव विशिष्ट हि तस्मात् परतरं न च,अतः अन्न ही सबसे महत्त्वकी वस्तु है। उससे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है। वेदोंमें अन्नको प्रजापति कहा गया है। प्रजापति संवत्सर माना गया है। संवत्सर यज्ञरूप है और यज्ञमें सबकी स्थिति है
Makananlah yang sungguh paling utama; tiada sesuatu pun melampauinya. Dalam Weda, makanan disebut Prajāpati; Prajāpati dipahami sebagai Tahun (saṁvatsara). Tahun itu sendiri berhakikat yajña, dan di dalam yajña-lah tegak kesejahteraan serta keteguhan seluruh makhluk.
Verse 38
अन्न प्रजापतिश्नोक्त: स च संवत्सरो मतः । संवत्सरस्तु यज्ञोडसौ सर्व यज्ञे प्रतेष्ठितम्,अतः अन्न ही सबसे महत्त्वकी वस्तु है। उससे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है। वेदोंमें अन्नको प्रजापति कहा गया है। प्रजापति संवत्सर माना गया है। संवत्सर यज्ञरूप है और यज्ञमें सबकी स्थिति है
Mārkaṇḍeya berkata: “Dalam Weda, makanan (anna) dinyatakan sebagai Prajāpati; dan Prajāpati dipahami sebagai Saṁvatsara, yakni Tahun. Tahun itu sendiri adalah wujud Yajña, dan pada yajña-lah segala sesuatu berlandaskan. Karena itu, makanan adalah yang paling vital di antara semua hal—tiada yang melampauinya.”
Verse 39
तस्मात् सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च । तस्मादन्नं विशिष्ट हि सर्वेभ्य इति विश्रुतम्,यज्ञसे समस्त चराचर प्राणी उत्पन्न होते हैं। अत: अन्न ही सब पदार्थोसे श्रेष्ठ है। यह बात सर्वत्र प्रसिद्ध है
Mārkaṇḍeya berkata: “Dari makanan (anna) lahir semua makhluk—yang tak bergerak maupun yang bergerak. Karena itu, makanan sungguh lebih utama daripada segala sesuatu; kebenaran ini dikenal luas.”
Verse 40
येषां तटाकानि महोदकानि वाप्यश्च कूपाश्च प्रतिश्रयाश्व अन्नस्य दानं मधुरा च वाणी यमस्य ते निर्वचना भवन्ति,जो लोग अगाध जलसे भरे हुए तालाब और पोखरे खुदवाते हैं, बावली, कुएँ तथा धर्मशालाएँ तैयार कराते हैं, अन्नका दान करते और मीठी बातें बोलते हैं, उन्हें यमराजकी बात भी नहीं सुननी पड़ती है अर्थात् यमराज उसे वचनमात्रसे भी दण्ड नहीं दे सकते
Mārkaṇḍeya berkata: “Mereka yang membuat telaga-telaga dalam berair banyak, juga sumur bertangga, sumur, dan tempat singgah bagi musafir; yang bersedekah makanan dan bertutur kata manis—bagi mereka, wewenang Yama menjadi tak berlaku. Bahkan panggilan Yama pun tak perlu mereka dengar.”
Verse 41
धान्यं श्रमेणार्जितवित्तसंचितं विप्रे सुशीले च प्रयच्छते यः । वसुन्धरा तस्य भवेत् सुतुष्टा धारां वसूनां प्रतिमुज्चतीव,जो अपने परिश्रमसे उपार्जित और संचित किया हुआ धन-धान्य सुशील ब्राह्मणको दान करता है, उसके ऊपर वसुधादेवी अत्यन्त संतुष्ट होती और उसके लिये धनकी धारा- सी बहाती हैं
Mārkaṇḍeya berkata: “Barangsiapa memberikan kepada brāhmaṇa yang berbudi baik, biji-bijian dan harta yang ia peroleh dengan jerih payahnya sendiri dan ia simpan dengan cermat—kepadanya Dewi Bumi (Vasundharā) amat berkenan, seakan-akan melepaskan aliran kekayaan baginya.”
Verse 42
अन्नदा: प्रथमं यान्ति सत्यवाक् तदनन्तरम् | अयाचितप्रदाता च सम॑ यान्ति त्रयो जना:,अन्न-दान करनेवाले पुरुष पहले स्वर्गमें प्रवेश करते हैं। उसके बाद सत्यवादी जाता है। फिर बिना माँगे ही दान करनेवाला पुरुष जाता है। इस प्रकार ये तीनों पुण्यात्मा मानव समान गतिको प्राप्त होते हैं
Mārkaṇḍeya berkata: “Para pemberi makanan mencapai surga terlebih dahulu. Sesudah mereka menyusul orang yang berkata benar. Lalu menyusul pula pemberi yang memberi tanpa diminta. Demikianlah tiga insan berbudi ini mencapai tujuan mulia yang sama.”
Verse 43
वैशम्पायन उवाच कौतूहलसमुत्पन्न: पर्यपृच्छद् युधिष्ठिर: । मार्कण्डेयं महात्मानं पुनरेव सहानुज:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! तदनन्तर भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्छिरके मनमें बड़ा कौतूहल हुआ और उन्होंने महात्मा मार्कण्डेयजीसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया --
Waiśampāyana berkata—“Wahai Janamejaya! Setelah itu, Dharma-raja Yudhiṣṭhira, bersama para saudaranya, diliputi rasa ingin tahu yang besar; maka ia kembali menanyai Mahātma Mārkaṇḍeya demikian.”
Verse 44
यमलोकस्य चाध्वानमन्तरं मानुषस्य च । कीदृशं किम्प्रमाणं वा कथं वा तन्महामुने । तरन्ति पुरुषाश्वैव केनोपायेन शंस मे,“महामुने! इस मनुष्यलोकसे यमलोक कितनी दूर है, कैसा है, कितना बड़ा है? और किस उपायसे मनुष्य वहाँके संकटोंसे पार हो सकते हैं? ये मुझे बतलाइये”
“Wahai Mahāmuni! Seberapa jauh jarak dari dunia manusia ke alam Yama? Bagaimanakah wujudnya, seberapa luas ukurannya? Dan dengan upaya apakah manusia dapat menyeberangi kesukaran di sana? Jelaskan kepadaku.”
Verse 45
मार्कण्डेय उदाच सर्वगुह्मृतमं प्रश्न॑ पवित्रमृषिसंस्तुतम् । कथयिष्यामि ते राजन् धर्म्य धर्मभूतां वर,मार्कण्डेयजीने कहा--धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! तुमने ऐसे विषयके लिये प्रश्न किया है, जो सबसे अधिक गोपनीय, पवित्र, धर्मसम्मत तथा ऋषियोंके लिये भी आदरणीय है। सुनो, मैं इस विषयका वर्णन करता हूँ
Mārkaṇḍeya berkata—“Wahai Raja, yang terbaik di antara para penegak dharma! Pertanyaanmu ini paling rahasia, amat menyucikan, selaras dengan dharma, dan dipuji bahkan oleh para resi. Dengarkan—akan kujelaskan perkara yang dharmis ini kepadamu.”
Verse 46
षडशीतिसहस्तराणि योजनानां नराधिप । यमलोकस्य चाध्वानमन्तरं मानुषस्य च,महाराज! मनुष्यलोक और यमलोकके मार्ममें छियासी हजार योजनोंका अन्तर है
“Wahai penguasa manusia! Jarak antara dunia manusia dan alam Yama adalah delapan puluh enam ribu yojana.”
Verse 47
आकाशं तदपानीयं घोरं कान्तारदर्शनम् । न तत्र वृक्षच्छाया वा पानीयं केतनानि च
“Wilayah itu tanpa air, laksana langit yang hampa; tampaknya seperti belantara yang mengerikan. Di sana tak ada naungan pepohonan, tak ada air minum, dan tak ada tempat tinggal maupun perlindungan.”
Verse 48
नीयते यमदूतैस्तु यमस्याज्ञाकरैर्बलात्
Vaiśampāyana berkata: Ia diseret dengan paksa oleh para utusan Yama—pelaksana titah Sang Penguasa Maut—menunjukkan bahwa ketika saat pengadilan tiba, akibat perbuatan menjadi tak terelakkan.
Verse 49
नरा: स्त्रियस्तथैवान्ये पृथिव्यां जीवसंज्ञिता: । यमराजकी आज्ञाका पालन करनेवाले यमदूत इस पृथ्वीपर आकर यहाँके पुरुषों, स्त्रियों तथा अन्य जीवोंको बलपूर्वक पकड़ ले जाते हैं || ४८ ई ।। ब्राह्मणेभ्य: प्रदानानि नानारूपाणि पार्थिव,राजन! जिनके द्वारा यहाँ ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके अश्व आदि वाहनोंका उत्कृष्ट दान किया गया है, वे उस मार्गपर (उन्हीं वाहनोंद्वारा सुखसे) यात्रा करते हैं। छत्र-दान करनेवाले मनुष्य वहाँ प्राप्त हुए छत्रके द्वारा ही धूपका निवारण करते हुए चलते हैं
Vaiśampāyana berkata: Laki-laki, perempuan, dan semua makhluk lain yang disebut hidup di bumi—mereka direnggut dan dibawa pergi oleh para utusan Yamarāja, yang datang ke dunia ini untuk menegakkan perintahnya. Dan, wahai raja, mereka yang di sini telah memberi kepada para brāhmaṇa aneka derma yang unggul—kuda-kuda pilihan dan sarana angkut lainnya—menempuh jalan sana dengan nyaman, seakan ditopang oleh kendaraan yang sama. Demikian pula para pemberi payung berjalan sambil menahan terik, bernaung dengan payung yang mereka peroleh di sana.
Verse 50
हयादीनां प्रकृष्टानि ते5ध्वानं यान्ति वै नरा: । संनिवार्यातपं यान्ति छत्रेणैव हि छत्रदा:,राजन! जिनके द्वारा यहाँ ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके अश्व आदि वाहनोंका उत्कृष्ट दान किया गया है, वे उस मार्गपर (उन्हीं वाहनोंद्वारा सुखसे) यात्रा करते हैं। छत्र-दान करनेवाले मनुष्य वहाँ प्राप्त हुए छत्रके द्वारा ही धूपका निवारण करते हुए चलते हैं
Vaiśampāyana berkata: Orang-orang yang di dunia ini telah memberikan kepada para brāhmaṇa kuda-kuda terbaik dan sarana angkut lainnya, menempuh perjalanan di jalan sana dengan mudah, seakan ditopang oleh kendaraan yang sama. Demikian pula, wahai raja, para pemberi payung berjalan sambil menahan terik dengan payung yang mereka peroleh di sana.
Verse 51
तृप्ताश्चैवान्नदातारो हातृप्ताश्चाप्यनन्नदा: | वस्त्रिणो वस्त्रदा यान्ति अवस्त्रा यान्त्यवस्त्रदा:,अन्न-दान करनेवाले जीव वहाँ भोजनसे तृप्त होकर यात्रा करते हैं; किंतु जिन्होंने अन्नदान नहीं किया है वे भूखका कष्ट सहते हुए चलते हैं। वस्त्र देनेवाले लोग कपड़े पहनकर जाते हैं और जिन्होंने वस्त्रदान नहीं किया है, उन्हें नंगे होकर जाना पड़ता है
Vaiśampāyana berkata: Para pemberi makanan menempuh perjalanan dengan rasa kenyang; tetapi mereka yang tidak memberi makanan berjalan terus tanpa puas, menanggung pedihnya lapar. Para pemberi pakaian berjalan dengan berpakaian; sedangkan mereka yang tidak memberi pakaian harus berjalan tanpa busana.
Verse 52
हिरण्यदा: सुखं यान्ति पुरुषास्त्वभ्यलंकृता: । भूमिदास्तु सुखं यान्ति सर्वे: कामै: सुतर्पिता:,सुवर्णका दान करनेवाले मनुष्य उस मार्गपर नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो बड़े सुखसे यात्रा करते हैं। भूमिका दान करनेवाले दाता सम्पूर्ण मनोवाजञ्छित भोगोंसे तृप्त हो वहाँ बड़े आनन्दसे जाते हैं
Vaiśampāyana berkata: Mereka yang memberi emas menempuh jalan itu dengan gembira, berhias aneka perhiasan. Tetapi para pemberi tanah pun berjalan dengan bahagia, dipuaskan oleh segala kenikmatan yang diinginkan—mencapai kepenuhan berkat buah kedermawanan mereka.
Verse 53
यान्ति चैवापरिक्लिष्टा नस: सस्यप्रदायका: । नरा: सुखतरं यान्ति विमानेषु गृहप्रदा:,खेतमें लगी हुई खेती दान करनेवाले मनुष्य बिना किसी कष्टके जाते हैं। गृहदान करनेवाले मानव विमानोंपर बैठकर अत्यन्त सुख-सुविधाके साथ जाते हैं
Mereka yang menganugerahkan ladang yang telah digarap dan menghasilkan biji-bijian berangkat dari dunia ini tanpa derita. Adapun mereka yang mendermakan rumah, berangkat dengan kebahagiaan yang lebih besar, diusung oleh wimana surgawi—menikmati kenyamanan dan kemudahan yang unggul.
Verse 54
पानीयदा हाूतृषिता: प्रह्ृष्टमनसो नरा: । पन्थानं द्योतयन्तश्न यान्ति दीपप्रदा: सुखम्,जिन्होंने जल-दान किया है, उन्हें प्यासका कष्ट नहीं भोगना पड़ता, वे लोग प्रसन्नचित्त होकर वहाँ जाते हैं। दीपदान करनेवाले मनुष्य उस मार्गको प्रकाशित करते हुए सुखसे यात्रा करते हैं
Mereka yang telah memberi air minum tidak menanggung siksaan dahaga; dengan hati bersukacita mereka melangkah menuju alam itu. Dan mereka yang mendermakan pelita berjalan dengan bahagia, menerangi jalan sepanjang perjalanan.
Verse 55
गोप्रदास्तु सुखं यान्ति निर्मुक्ता: सर्वपातकै: । विमानै्हससंयुक्तैर्यान्ति मासोपवासिन:,गोदान करनेवाले मनुष्य सब पापोंसे मुक्ता हो सुखपूर्वक जाते हैं। एक मासतक उपवास-व्रत करनेवाले लोग हंसजुते हुए विमानोंद्वारा यात्रा करते हैं
Mereka yang menganugerahkan sapi berangkat dengan bahagia, terbebas dari segala dosa. Dan mereka yang menjalankan puasa selama sebulan melaju dalam wimana surgawi yang ditarik oleh angsa-angsa.
Verse 56
तथा बर्लिप्रयुक्तैश्न षष्ठरात्रोपवासिन: । त्रिरात्र क्षपते यस्तु एकभक्तेन पाण्डव
Demikian pula, wahai Pāṇḍava, mereka yang menjalankan puasa enam malam disertai persembahan bali menurut tata cara, dan ia yang melewati tiga malam dengan ekabhakta (makan sekali sehari)—laku disiplin semacam ini pun dikatakan berdaya guna.
Verse 57
पानीयस्य गुणा दिव्या: प्रेतलोकसुखावहा:,जलदान करनेका प्रभाव अत्यन्त अलौकिक है। वह परलोकमें सुख पहुँचानेवाला है। जो जलदान करते हैं उन पुण्यात्माओंके लिये उस मार्ममें पुष्पोदका नामवाली नदी प्राप्त होती है। वे उसका शीतल और अमृतके समान मधुर जल पीते हैं
Keutamaan memberi air minum bersifat ilahi dan membawa kebahagiaan di alam para arwah. Daya pahala sedekah air sungguh luar biasa; ia menganugerahkan kenyamanan di alam seberang. Bagi jiwa-jiwa saleh yang memberi air, di sepanjang jalan mereka terbentang sungai bernama Puṣpodakā; mereka meminum airnya yang sejuk, manis laksana amerta.
Verse 58
तत्र पुष्योदका नाम नदी तेषां विधीयते | शीतलं सलिल तत्र पिबन्ति हामृतोपमम्,जलदान करनेका प्रभाव अत्यन्त अलौकिक है। वह परलोकमें सुख पहुँचानेवाला है। जो जलदान करते हैं उन पुण्यात्माओंके लिये उस मार्ममें पुष्पोदका नामवाली नदी प्राप्त होती है। वे उसका शीतल और अमृतके समान मधुर जल पीते हैं
Vaiśampāyana berkata: Di sana bagi mereka ditetapkan sebuah sungai bernama Puṣyodakā. Di tempat itu mereka meminum airnya yang sejuk, laksana nektar—ganjaran adikodrati bagi orang saleh yang menunaikan kebajikan sedekah air, yang mendatangkan kenyamanan dan kebahagiaan di alam baka.
Verse 59
ये च दुष्कृतकर्माण: पूय॑ं तेषां विधीयते । एवं नदी महाराज सर्वकामप्रदा हि सा,महाराज! इस प्रकार वह नदी सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली है; किंतु जो पापी जीव हैं उनके लिये उस नदीका जल पीब बन जाता है
Vaiśampāyana berkata: Namun bagi mereka yang berbuat jahat, air yang sama itu ditetapkan menjadi nanah. Demikianlah, wahai raja agung, sungai itu sungguh pemberi segala keinginan—tetapi bagi insan berdosa ia berubah menjadi sesuatu yang menjijikkan.
Verse 60
तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र पूजयैनान् यथाविधि । अध्वनि क्षीणगात्रश्व पथि पांसुसमन्वित:
Karena itu, wahai raja terbaik, engkau pun hendaknya menghormati mereka menurut tata yang semestinya. Dalam perjalanan—ketika tubuh dan kuda-kuda telah letih, dan jalan tertutup debu—maka penghormatan yang patut dan laku dharma menjadi kian diperlukan.
Verse 61
पृच्छते हुन्नदातारं गृहमायाति चाशया । त॑ पूजयाथ यत्नेन सो3तिथित्रद्यमिणश्व॒ सः
Vaiśampāyana berkata: Ia menanyakan siapa pemberi makanan dan datang ke rumah dengan harapan. Maka hormatilah tamu itu dengan sungguh-sungguh; sebab sang atithi adalah perwujudan sekaligus penguji dharma.
Verse 62
अतः राजेन्द्र! तुम भी इन ब्राह्मणोंका विधिपूर्वक पूजन करो। जो रास्ता चलनेसे थककर दुबला हो गया है, जिसका शरीर धूलसे भरा है और जो अन्नदाताका पता पूछता हुआ भोजनकी आशासे घरपर आ जाता है, उसका तुम यत्नपूर्वक सत्कार करो; क्योंकि वह अतिथि है, इसलिये ब्राह्मण ही है। अर्थात् ब्राह्मणके ही तुल्य है ।। त॑ यान्तमनुगच्छन्ति देवा: सर्वे सवासवा: । तस्मिन् सम्पूजिते प्रीता निराशा यान्त्यपूजिते,ऐसा अतिथि जब किसीके घरपर जाता है तब उसके पीछे इन्द्रादि सम्पूर्ण देवता भी वहाँतक जाते हैं। यदि वहाँ उस अतिथिका आदर होता है तो वे देवता भी प्रसन्न होते हैं और यदि आदर नहीं होता, तो वे देवगण भी निराश लौट जाते हैं
Vaiśampāyana berkata: Karena itu, wahai raja terbaik, engkau pun hendaknya memuja para Brahmana ini menurut tata yang semestinya. Siapa pun yang kurus karena perjalanan, tubuhnya berbalut debu, dan datang ke rumah dengan harapan makanan sambil menanyakan sang pemberi sedekah—sambutlah ia dengan penghormatan yang sungguh-sungguh; sebab ia adalah atithi, dan karenanya setara dengan seorang Brahmana. Semua dewa, bersama Indra, mengikuti tamu semacam itu ke mana ia pergi. Bila tamu itu dihormati dengan layak di sebuah rumah, para dewa pun berkenan; tetapi bila ia tidak dihormati, mereka kembali dengan kecewa.
Verse 63
तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र पूजयैनं यथाविधि । एतत् ते शतशः प्रोक्ते कि भूय: श्रोतुमिच्छसि,अतः राजेन्द्र! तुम भी अतिथिका विधिपूर्वक सत्कार करते रहो। यह बात मैं तुमसे कई बार कह चुका हूँ, अब और क्या सुनना चाहते हो!
Karena itu, wahai raja terbaik, engkau pun hendaknya memuliakan tamu ini menurut tata yang semestinya. Hal ini telah kukatakan kepadamu berulang-ulang; apa lagi yang masih ingin kau dengar?
Verse 64
युधिछिर उवाच पुन: पुनरहं श्रीतुं कथां धर्मसमा श्रयाम् । पुण्यामिच्छामि धर्मज्ञ कथ्यमानां त्वया विभो,युधिष्ठिरे कहा--धर्मज्ञ विभो! आपके द्वारा कही हुई पुण्यमय धर्मकी चर्चा मैं बारंबार सुनना चाहता हूँ
Yudhiṣṭhira berkata: “Berulang-ulang aku ingin mendengar kisah yang bersandar pada dharma ini. Wahai yang mengetahui dharma, wahai yang mulia—kisahkanlah kepadaku kembali wejangan suci yang engkau tuturkan.”
Verse 65
मार्कण्डेय उदाच धर्मान्तरं प्रति कथां कथ्यमानां मया नृप । सर्वपापहरां नित्यं शृणुष्वावहितो मम,मार्कण्डेयजी बोले--राजन्! अब मैं धर्मसम्बन्धी दूसरी बातें बता रहा हूँ, जो सदा सब पापोंका नाश करनेवाली हैं। तुम सावधान होकर सुनो
Markandeya berkata: “Wahai raja, kini akan kusampaikan ajaran lain mengenai dharma. Ia senantiasa mampu melenyapkan segala dosa. Dengarkanlah aku dengan penuh perhatian.”
Verse 66
कपिलायां तु दत्तायां यत् फल ज्येष्ठपुष्करे । तत् फलं भरतश्रेष्ठ विप्राणां पादधावने,भरतश्रेष्ठ! ज्येष्ठपुष्करतीर्थमें कपिला गौ दान करनेसे जो फल मिलता है वही ब्राह्मणोंका चरण धोनेसे प्राप्त होता है
Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, pahala yang diperoleh dengan menghadiahkan seekor sapi kapilā di tirtha Jyeṣṭha-Puṣkara—pahala yang sama diperoleh dengan membasuh kaki para brāhmaṇa.
Verse 67
द्विजपादोदकक्लिन्ना यावत् तिष्ठति मेदिनी । तावत् पुष्करपर्णेन पिबन्ति पितरो जलम्,ब्राह्मणोंके चरण पखारनेके जलसे जबतक पृथ्वी भीगी रहती है, तबतक पितरलोग कमलके पत्तेसे जल पीते हैं
Selama bumi masih lembap oleh air yang dipakai membasuh kaki seorang brāhmaṇa, selama itu pula para Pitṛ seakan-akan meminum air tersebut dari sehelai daun teratai.
Verse 68
स्वागतेनाग्नयस्तृप्ता आसनेन शतक्रतुः । पितर: पादशौचेन अन्नाद्येन प्रजापति:,ब्राह्मणका स्वागत करनेसे अग्नि, उसे आसन देनेसे इन्द्र, उसके पैर धोनेसे पितर और उसको भोजनके योग्य अन्न प्रदान करनेसे ब्रह्माजी तृप्त होते हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Dengan menyambut seorang brāhmaṇa, api-api suci menjadi puas; dengan mempersilahkannya duduk, Indra (Śatakratu) menjadi puas; dengan membasuh kakinya, para Pitṛ (roh leluhur) menjadi puas; dan dengan menyediakan makanan yang layak santap, Prajāpati (Brahmā) menjadi puas.”
Verse 69
यावद् वत्सस्य वै पादौ शिरश्रैव प्रदृश्यते । तस्मिन् काले प्रदातव्या प्रयत्नेनान्तरात्मना,गर्भिणी गौ जिस समय बच्चा दे रही हो और उस बछड़ेका केवल मुख तथा दो पैर ही बाहर निकले दिखायी देते हों, उसी समय पवित्रभावसे प्रयत्नपूर्वक उस गौका दान कर देना चाहिये
Ketika sapi bunting sedang melahirkan dan yang tampak keluar hanyalah kepala serta kedua kaki anak sapi, pada saat itulah—dengan batin yang suci dan dengan sungguh-sungguh—sapi itu patut didermakan.
Verse 70
अन्तरिक्षगतो वत्सो यावद् योन्यां प्रदृश्यते । तावत् गौ पृथिवी ज्ञेया यावद् गर्भ न मुडचति,जबतक बछड़ा योनिसे निकलते समय आकाशमें ही लटकता दिखायी दे, जबतक गाय अपने बछड़ेको पूर्णतःयोनिसे अलग न कर दे, तबतक उस गौको पृथ्वीरूप ही समझना चाहिये
Selama anak sapi, pada saat kelahiran, masih tampak di mulut rahim seakan menggantung di udara, dan selama induk sapi belum sepenuhnya melepaskan janin dari tubuhnya, selama itu pula sapi tersebut harus dipandang sebagai perwujudan Bumi sendiri.
Verse 71
यावन्ति तस्या रोमाणि वत्सस्य च युधिष्ठिर । तावद् युगसहस््राणि स्वर्गलोके महीयते,युधिष्ठिर! उसका दान करनेसे उस गौ तथा बछड़ेके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं उतने हजार युगोंतक दाता स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है
Wahai Yudhiṣṭhira, sebanyak rambut pada tubuh sapi itu dan anaknya, sebanyak itu pula ribuan yuga sang pemberi dimuliakan dan ditegakkan kedudukannya di alam surga.
Verse 72
सुवर्णनासां यः कृत्वा सुखुरां कृष्णधेनुकाम् । तिलै: प्रच्छादितां दद्यात् सर्वरत्नैरलंकृताम्,भारत! जो सोनेकी नाक और सुन्दर चाँदीके खुरोंसे विभूषित, सब प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत, काली गौको तिलोंसे प्रच्छादित करके उसका दान करता है और जो उस दानको लेकर पुनः किसी दूसरे श्रेष्ठ पुरुषको अर्पित कर देता है, वह सर्वोत्तम फलका भागी होता है
Wahai Bhārata, siapa yang menyiapkan seekor sapi hitam untuk didermakan—dipasangi perhiasan hidung dari emas, kukunya dihiasi perak yang indah, dihias dengan segala macam permata, serta diselimuti biji wijen—lalu memberikannya sebagai dana; dan siapa yang, setelah menerima dana itu, mempersembahkannya kembali kepada orang lain yang lebih utama dan layak—ia berhak atas buah pahala yang tertinggi.
Verse 73
प्रतिग्रहं गृहीत्वा यः पुनर्ददति साधवे । फलानां फलमश्नाति तदा दत्त्वा च भारत,भारत! जो सोनेकी नाक और सुन्दर चाँदीके खुरोंसे विभूषित, सब प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत, काली गौको तिलोंसे प्रच्छादित करके उसका दान करता है और जो उस दानको लेकर पुनः किसी दूसरे श्रेष्ठ पुरुषको अर्पित कर देता है, वह सर्वोत्तम फलका भागी होता है
Wahai Bhārata! Barang siapa menerima suatu pemberian lalu memberikannya kembali kepada orang saleh yang layak, ia menikmati “buah dari segala buah”—yakni pahala tertinggi.
Verse 74
ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना । चतुरन्ता भवेद् दत्ता पृथिवी नात्र संशय:,उस गौके दानसे समुद्र, गुफा, पर्वत, वन और काननोंसहित चारों दिशाओंकी भूमिके दानका पुण्य प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है
Dengan sedekah sapi itu, seakan-akan seluruh bumi—berbatas empat penjuru, lengkap dengan samudra, gua, gunung, hutan, dan rimba—telah didermakan; tiada keraguan tentang hal ini.
Verse 75
अन्तर्जानुशयो यस्तु भुड्क्ते संसक्तभाजन: । यो द्विज: शब्दरहितं स क्षमस्तारणाय वै,जो द्विज अपने हाथोंको घुटनोंके भीतर किये मौनभावसे पात्रमें एक हाथ लगाये रखकर भोजन करता है, वह अपनेको और दूसरोंको तारनेमें समर्थ होता है
Brahmana yang makan dalam diam, dengan tangan ditarik ke dalam lingkup lutut dan perhatian terikat pada mangkuknya, sungguh mampu “menyeberangkan”—menyelamatkan diri dan juga menolong orang lain.
Verse 76
अपानपा न गदितास्तथान्ये ये द्विजातय: । जपन्ति संहितां सम्यक ते नित्यं तारणक्षमा:
Mereka yang terlahir dua kali—dan yang lain juga—yang tidak mengucapkan hal yang tak patut serta melantunkan Saṃhitā dengan benar dalam japa, senantiasa mampu menyeberangkan (diri dan sesama).
Verse 77
जो मदिरा नहीं पीते, जिनपर किसी प्रकारका दोष नहीं लगाया गया है तथा जो अन्य द्विज विधिपूर्वक वेदोंकी संहिताका पाठ करते हैं, वे सदा दूसरोंको तारनेमें समर्थ होते हैं ७६ ।। हव्यं कव्यं च यत् किंचित् सर्व तच्छोत्रियो5हति । दत्तं हि श्रोत्रिये साधौ ज्वलितेडग्नौ यथा हुतम्,हव्य (यज्ञ) और कव्य (श्राद्ध)-की जितनी भी वस्तुएँ हैं, श्रोत्रिय ब्राह्मण उन सबको पानेका अधिकारी है। श्रेष्ठ श्रोत्रियको दिया हुआ दान उतना ही सफल होता है, जैसे प्रज्वलित अग्निमें दी हुई आहुति
Mereka yang tidak meminum minuman memabukkan, yang tidak dituduh bercela, dan para dwija lain yang melantunkan Saṃhitā Veda dengan tata cara yang benar—mereka senantiasa mampu menyeberangkan orang lain. Apa pun yang dipersembahkan sebagai havya dalam yajña atau sebagai kavya dalam upacara leluhur, seorang Brahmana śrotriya yang berilmu berhak menerimanya. Pemberian kepada śrotriya yang layak berbuah laksana persembahan yang dicurahkan ke dalam api yang menyala.
Verse 78
मन्युप्रहरणा विप्रा न विप्रा: शस्त्रयोधिन: । निहन्युर्मन्युना विप्रा वजपाणिरिवासुरान्,ब्राह्मणोंका क्रोध ही अस्त्र-शस्त्र है। ब्राह्मण लोहेके हथियारोंसे नहीं लड़ा करते हैं। जैसे हाथमें वच्र लिये हुए इन्द्र असुरोंका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण क्रोधसे ही अपराधीको नष्ट कर देते हैं
Bagi para brāhmaṇa, amarah itulah senjata; brāhmaṇa bukanlah pejuang yang bersandar pada besi dan senjata tajam. Dengan daya murka yang berlandaskan dharma mereka dapat membinasakan yang bersalah—sebagaimana Indra, pemegang vajra, menumbangkan para asura.
Verse 79
धर्मश्रितेयं तु कथा कथितेयं तवानघ । या श्र॒ुत्वा मुनयः प्रीता नैमिषारण्यवासिन:,निष्पाप युधिष्ठिर! यह मैंने धर्मयुक्त कथा कही है। इसे सुनकर नैमिषारण्यनिवासी मुनि बड़े प्रसन्न हुए थे
Wahai yang tanpa noda, kisah ini telah kukatakan kepadamu dengan bersandar pada dharma. Mendengarnya, para resi yang tinggal di Naimiṣāraṇya sangat bersukacita.
Verse 80
वीतशोकभयक्रोधा विपाप्मानस्तथैव च । श्रुत्वेमां तु कथां राजन् न भवन्तीह मानवा:,राजन्! इस कथाको सुनकर मनुष्य शोक, भय, क्रोध और पापसे रहित हो फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेते हैं
Wahai Raja, dengan mendengar kisah ini manusia terbebas dari duka, takut, amarah, dan dosa; dan sungguh, ia tidak lahir kembali di dunia ini.
Verse 81
युधिछिर उवाच कि तच्छौचं भवेद् येन विप्र: शुद्ध: सदा भवेद् | तदिच्छामि महाप्राज्ञ श्रोतुं धर्मभृतां वर,युधिष्ठिरने पूछा--धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाप्राज्ञ महर्ष! वह शौच क्या है जिससे ब्राह्मण सदा शुद्ध बना रहता है? मैं उसे सुनना चाहता हूँ
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Mahāprājña, yang terbaik di antara para penegak dharma, apakah śauca itu sehingga seorang brāhmaṇa senantiasa tetap suci? Aku ingin mendengarnya.”
Verse 82
मार्कण्डेय उदाच वाक्शौचं कर्मशौचं च यच्च शौचं जलात्मकम् | त्रिभि: शौचैरुपेतो यः स स्वर्गी नात्र संशय:,मार्कण्डेयजीने कहा--राजन्! शौच तीन प्रकारका होता है--वाक्शौच (वाणीकी पवित्रता), कर्मशौच (क्रियाकी पवित्रता) तथा जलशौच (जलसे शरीरकी शुद्धि)। जो इस तीन प्रकारके शौचसे सम्पन्न है, वह स्वर्गलोकका अधिकारी है, इसमें संशय नहीं
Markandeya berkata: “Wahai Raja, śauca ada tiga macam—kemurnian ucapan, kemurnian perbuatan, dan kemurnian jasmani yang diwujudkan melalui air. Siapa yang dianugerahi tiga kemurnian ini layak menuju surga; tiada keraguan akan hal itu.”
Verse 83
सायं प्रातश्न संध्यां यो ब्राह्मणो5भ्युपसेवते । प्रजपन् पावनीं देवीं गायत्रीं वेदमातरम्,जो ब्राह्मण प्रातः: और सायं--इन दोनों समयकी संध्या और सबको पवित्र करनेवाली वेदमाता गायत्री देवीके मन्त्रका जप करता है; वह ब्राह्मण उन्हीं गायत्री देवीकी कृपासे परम पवित्र और निष्पाप हो जाता है। वह समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीका भी दान ग्रहण कर ले, तो भी किसी संकटमें नहीं पड़ता
Seorang brāhmaṇa yang dengan setia menjalankan upacara sandhyā pada waktu fajar dan senja, serta melafalkan Dewi Gāyatrī yang menyucikan—Ibu segala Veda—menjadi amat suci dan bebas dari dosa oleh anugerah beliau. Sekalipun ia menerima sebagai pemberian seluruh bumi hingga ke samudra yang mengelilinginya, ia tetap tidak jatuh ke dalam mara bahaya.
Verse 84
स तया पावितो देव्या ब्राह्मणो नष्टकिल्बिष: । न सीदेत् प्रतिगृह्लानो महीमपि ससागराम्,जो ब्राह्मण प्रातः: और सायं--इन दोनों समयकी संध्या और सबको पवित्र करनेवाली वेदमाता गायत्री देवीके मन्त्रका जप करता है; वह ब्राह्मण उन्हीं गायत्री देवीकी कृपासे परम पवित्र और निष्पाप हो जाता है। वह समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीका भी दान ग्रहण कर ले, तो भी किसी संकटमें नहीं पड़ता
Brāhmaṇa yang disucikan oleh Sang Dewi ilahi (Gāyatrī) menjadi lenyap dosanya. Sekalipun ia menerima sebagai pemberian seluruh bumi hingga ke samudra yang mengelilinginya, ia tidak akan jatuh ke dalam kesusahan—demikian agung daya penyucian Dewi Gāyatrī bagi orang yang hidup dalam disiplin suci.
Verse 85
ये चास्य दारुणा: केचिद् ग्रहा: सूर्यादयो दिवि | ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवा: शिवतरा: सदा,इतना ही नहीं, आकाशके सूर्य आदि ग्रहोंमेंसे जो कोई भी उसके लिये भयंकर होते हैं, वे उपर्युक्त गायत्री-झपके प्रभावसे उसके लिये सदा सौम्य, सुखद एवं परम मंगलकारी हो जाते हैं
Bahkan pengaruh langit yang keras—dari benda-benda angkasa seperti Matahari—yang semula menakutkan baginya, oleh daya japa Gāyatrī menjadi lembut; senantiasa membawa ketenteraman, kebahagiaan, dan keberkahan tertinggi.
Verse 86
सर्वे नानुगतं चैनं दारुणा: पिशिताशना: । घोररूपा महाकाया धर्षयन्ति द्विजोत्तमम्,भयंकर रूप और विशाल शरीरवाले, समस्त क्रूरकर्मा, मांसभक्षी राक्षस भी गायत्रीजपपरायण उस श्रेष्ठ द्विजपर आक्रमण नहीं कर सकते
Semua rākṣasa yang buas, pemakan daging, berwujud mengerikan dan bertubuh raksasa, tidak mampu menyerang sang dwija utama yang teguh dalam japa Gāyatrī. Ketekunannya dalam laku suci menjadikannya tak tersentuh.
Verse 87
नाध्यापनाद् याजनाद् वा अन्यस्माद् वा प्रतिग्रहात् | दोषो भवति विप्राणां ज्वलिताग्निसमा द्विजा:,वे संध्योपासक ब्राह्मण प्रज्वयलित अग्निके समान तेजस्वी होते हैं। पढ़ाने, यज्ञ कराने अथवा दूसरेसे दान लेनेके कारण भी उन्हें दोष नहीं छू सकता (क्योंकि वे उनकी जीविकाके कर्म हैं)
Bagi para brāhmaṇa, tidak timbul cela moral dari mengajar, dari memimpin yajña, ataupun dari menerima pemberian dengan cara yang patut. Dwija yang tekun dalam sandhyā itu laksana api yang menyala—bercahaya dan menyucikan—maka kewajiban-kewajiban nafkah tersebut tidak menodai mereka.
Verse 88
दुर्वेदा वा सुवेदा वा प्राकृता: संस्कृतास्तथा । ब्राह्मणा नावमन्तव्या भस्मच्छन्ञा इवाग्नय:,ब्राह्मण अच्छी तरह वेद पढ़े हों या न पढ़े हों, उत्तम संस्कारोंसे युक्त हों या प्राकृत मनुष्योंकी भाँति संस्कारशून्य हों, उनका अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे राखमें छिपी हुई अताके समान हैं
Entah para brāhmaṇa kurang terpelajar dalam Weda atau sangat terpelajar, entah mereka halus oleh laku yang baik atau tampak kasar seperti orang kebanyakan—mereka tidak boleh dihina; sebab mereka laksana api yang tersembunyi di bawah abu.
Verse 89
यथा श्मशाने दीप्तौजा: पावको नैव दुष्यति । एवं विद्वानविद्दान् वा ब्राह्मणो दैवतं महत्,जैसे प्रज्वलित अग्नि श्मशानमें भी दूषित नहीं होती, उसी प्रकार ब्राह्मण विद्वान हो या अविद्दवान, उसे महान् देवता ही मानना चाहिये
Sebagaimana api yang menyala tidak ternoda bahkan di tanah kremasi, demikian pula seorang brāhmaṇa—baik terpelajar maupun tidak—patut dipandang sebagai keilahian yang agung.
Verse 90
प्राकारैश्न पुरद्वारैः प्रासादैश्व पृथग्विधै: । नगराणि न शोभन्ते हीनानि ब्राह्मणोत्तमै:,चहारदीवारियों, नगरद्वारों और भिन्न-भिन्न महलोंसे भी नगरोंकी तबतक शोभा नहीं होती जबतक वहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मण न रहें
Kota tidak sungguh-sungguh bercahaya hanya karena tembok pertahanan, gerbang, dan istana yang beraneka ragam; kota yang kekurangan brāhmaṇa terbaik tak memiliki kemegahan sejati.
Verse 91
वेदाढ्या वृत्तसम्पन्ना ज्ञानवन्तस्तपस्विन: । यत्र तिष्ठन्ति वै विप्रास्तन्नाम नगरं नूप,राजन! वेदज्ञ, सदाचारी, ज्ञानी और तपस्वी ब्राह्मण जहाँ निवास करते हों, उसीका नाम नगर है
Wahai raja Nūpa, hanya tempat di mana para vipra—kaya akan Weda, teguh dalam laku benar, berpengetahuan, dan bertapa—berdiam, itulah yang sungguh layak disebut ‘kota’.
Verse 92
व्रजे वाप्यथवारण्ये यत्र सन्ति बहुश्रुता: । तत् तन्नगरमित्याहु: पार्थ तीर्थ च तद् भवेत्,कुन्तीनन्दन! व्रज (गौओंके रहनेका स्थान) हो या वन, जहाँ बहुश्रुत विद्वान् रहते हों, उसे “नगर” कहा गया है, वह तीर्थ भी माना गया है
Wahai Pārtha, putra Kuntī, entah itu perkampungan para penggembala atau rimba belantara—di mana pun para bijak yang banyak mendengar dan menguasai śruti tinggal, tempat itu disebut ‘kota’; dan tempat itu pun menjadi tīrtha.
Verse 93
रक्षितारं च राजानं ब्राह्मणं च तपस्विनम् । अभिगम्याभिपूज्याथ सद्यः पापात् प्रमुच्यते,प्रजाकी रक्षा करनेवाले राजा और तपस्वी ब्राह्मणके पास जाकर उनकी सेवा-पूजा करके मनुष्य तत्काल सब पापोंसे मुक्त हो जाता है
Barangsiapa mendatangi raja pelindung rakyat dan brahmana yang tekun bertapa, lalu menghormati serta memujanya dengan semestinya, seketika terbebas dari dosa.
Verse 94
पुण्यतीर्थाभिषेकं च पवित्राणां च कीर्तनम् । सद्धिः सम्भाषणं चैव प्रशस्तं कीर्त्यते बुधै:,पुण्यतीर्थोमें स्नान, पवित्र मन्त्रोंका कीर्तन और श्रेष्ठ पुरुषोंसे वार्तालाप--इन सबको विद्वान पुरुषोंने उत्तम बताया है
Mandi di tirtha yang suci, melantunkan mantra-mantra penyuci, dan berbincang dengan orang-orang saleh dengan penuh hormat—semuanya dipuji para bijak sebagai laku yang utama.
Verse 95
साधुसज्भरमपूतेन वाक्सुभाषितवारिणा | पवित्रीकृतमात्मानं सन््तो मन्यन्ति नित्यश:,सत्संगसे पवित्र किये हुए वाणीके सुन्दर सम्भाषणरूप जलसे अभिकषिक्त श्रेष्ठ पुरुष अपनेको सदा पवित्र हुआ मानते हैं
Dengan “air” tutur kata yang indah—bebas noda dan disucikan oleh pergaulan dengan orang baik—para mulia merasa batinnya tersiram bersih; karena itu mereka memandang diri senantiasa tersucikan.
Verse 96
त्रिदण्डधारणं मौनं जटाभारो5थ मुण्डनम् । वल्कलाजिनसंचवेष्ट ब्रतचर्याभिषेचनम्,त्रिदण्ड धारण करना, मौन रहना, सिरपर जटाका बोझ ढोना, मूँड़ मुँड़ाना, शरीरमें वल्कल और मृगचर्म लपेटे रहना, व्रतका आचरण करना, नहाना, अग्निहोत्र करना, वनमें रहना और शरीरको सुखा देना--ये सभी यदि भाव शुद्ध न हो तो व्यर्थ हैं
Memanggul trisula tongkat tiga (tri-daṇḍa), berdiam dalam tapa-bisu, menanggung beban rambut gimbal atau mencukur kepala, berselimut kain kulit kayu dan kulit rusa, menjalani laku brata serta mandi ritual—semuanya adalah disiplin lahiriah.
Verse 97
अग्निहोत्रं वने वास: शरीरपरिशोषणम् | सर्वाण्येतानि मिथ्या स्युर्यदि भावो न निर्मल:,त्रिदण्ड धारण करना, मौन रहना, सिरपर जटाका बोझ ढोना, मूँड़ मुँड़ाना, शरीरमें वल्कल और मृगचर्म लपेटे रहना, व्रतका आचरण करना, नहाना, अग्निहोत्र करना, वनमें रहना और शरीरको सुखा देना--ये सभी यदि भाव शुद्ध न हो तो व्यर्थ हैं
Melaksanakan agnihotra, tinggal di rimba, dan menyiksa tubuh—semuanya menjadi sia-sia bila batin tidak bening. Tanpa hati yang disucikan, tapa lahiriah hanyalah tampak luar, bukan dharma.
Verse 98
न दुष्करमनाशि त्वं सुकरं हाशनं विना । विशुद्धि चक्षुरादीनां षण्णामिन्द्रियगामिनाम्
Yudhiṣṭhira berkata: “Bagi orang yang tidak makan, tiada sesuatu pun sungguh sulit; bahkan yang lazimnya berat menjadi mudah tanpa santapan. Dan dengan pengekangan demikian, enam indria—bermula dari mata—menjadi suci dan tunduk dalam kendali.”
Verse 99
ये पापानि न कुर्वन्ति मनोवाक्कर्मबुद्धिभि: । ते तपन्ति महात्मानो न शरीरस्य शोषणम्,जो मन, वाणी, क्रिया और बुद्धिके द्वारा कभी पाप नहीं करते हैं, वे ही महात्मा तपस्वी हैं। शरीरको सुखा देना ही तपस्या नहीं है
Yudhiṣṭhira berkata: “Mereka yang tidak berbuat dosa melalui pikiran, ucapan, perbuatan, maupun pengertian—merekalah para mahatma, merekalah pertapa sejati. Tapa bukan sekadar membuat tubuh menyusut kering.”
Verse 100
न ज्ञातिभ्यो दया यस्य शुक्लदेहोडविकल्मष: । हिंसा सा तपसस्तस्य नानाशित्वं तप: स्मृतम्,जिसने व्रत, उपवास आदिके द्वारा शरीरको तो शुद्ध कर लिया और जो नाना प्रकारके पापकर्म भी नहीं करता, किंतु जिसके मनमें अपने कुटुम्बी जनोंके प्रति दया नहीं आती, उसकी वह निर्दयता उसके तपका नाश करनेवाली है; केवल भोजन छोड़ देनेका ही नाम तपस्या नहीं है
Yudhiṣṭhira berkata: “Seseorang boleh saja memurnikan tubuhnya secara lahir lewat kaul dan puasa, serta menjauhi beragam perbuatan dosa; namun bila ia tak menaruh belas kasih kepada sanak keluarganya sendiri, kekerasan hati itu menjadi himsa yang menghancurkan tapanya. Tapa bukan semata meninggalkan makanan.”
Verse 101
तिष्ठन् गृहे चैव मुनिर्नित्यं शुचिरलंकृत: । यावज्जीवं दयावांश्व सर्वपापै: प्रमुच्यते,जो निरन्तर घरपर रहकर भी पवित्रभावसे रहता है, सदगुणोंसे विभूषित होता है और जीवनभर सब प्राणियोंपर दया रखता है, उसे मुनि ही समझना चाहिये; वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्ता हो जाता है
Orang yang tetap tinggal di rumah namun senantiasa suci, berhias oleh kebajikan, dan sepanjang hidup berbelas kasih kepada semua makhluk—dialah yang patut dipandang sebagai muni; ia terbebas dari segala dosa.
Verse 102
न हि पापानि कर्माणि शुद्धयबन्त्यनशनादिभि: । सीदत्यनशनादेव मांसशोणितलेपन:
Yudhiṣṭhira berkata: “Perbuatan dosa tidak menjadi suci hanya dengan puasa dan laku sejenisnya. Orang yang terlumur daging dan darah akan merana oleh puasa semata.”
Verse 103
भोजन छोड़ने आदिसे पापकर्मोंका शोधन हो जाता हो, ऐसी बात नहीं है। हाँ, भोजन त्याग देनेसे यह रक्त-मांससे लिपा हुआ शरीर अवश्य क्षीण हो जाता है ।। अज्ञातं कर्म कृत्वा च क्लेशो नान्यत् प्रहीयते । नान्निर्दहति कर्माणि भावशून्यस्य देहिन:,शास्त्रोंद्वारा जिनका विधान नहीं किया गया है, ऐसे कार्य करनेसे केवल क्लेश ही हाथ लगता है, उनसे पाप नष्ट नहीं किये जा सकते। अग्निहोत्र आदि शुभ कर्म भावशून्य अर्थात् श्रद्धारहित मनुष्यके पापकर्मोंको दग्ध नहीं कर सकते
Yudhiṣṭhira berkata: “Bukanlah dengan sekadar meninggalkan makanan dosa-dosa menjadi tersucikan. Memang, dengan menahan makan, tubuh yang terlumur darah dan daging ini akan melemah. Bila seseorang melakukan perbuatan yang tidak disahkan oleh śāstra, yang diperoleh hanyalah derita; dosa tidaklah lenyap karenanya. Bahkan upacara suci seperti Agnihotra pun tidak membakar habis perbuatan lampau orang yang hampa rasa batin—yakni tanpa śraddhā, tanpa niat yang benar.”
Verse 104
पुण्यादेव प्रव्रजन्ति शुद्धयन्त्यमशनानि च । न मूलफलभभक्षित्वान्न मौनान्नानिलाशनात्,मनुष्य पुण्यके प्रभावसे ही उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं। उपवास भी पुण्यसे अर्थात् निष्कामभावसे ही शुद्धिका कारण होता है। (बिना शुद्धभावके) केवल फल-मूल खाने, मौन रहने, हवा पीने, सिर मुँड़ाने, एक स्थानपर कुटी बनाकर रहने, सिरपर जटा रखाने, वेदीपर सोने, नित्य उपवास, अग्निसेवन, जलप्रवेश तथा भूमिशयन करनेसे भी शुद्धि नहीं होती है
Yudhiṣṭhira berkata: “Dengan kekuatan puṇya sajalah orang sungguh-sungguh menempuh jalan pelepasan (pravrajyā), dan dengan puṇya sajalah puasa menjadi penyuci—yakni bila dilakukan dengan niat tanpa pamrih. Bukan dengan sekadar makan akar dan buah, bukan dengan berdiam diri, dan bukan pula dengan ‘hidup dari udara’ seseorang menjadi suci. Tanpa kemurnian batin, tapa lahiriah tidak membersihkan.”
Verse 105
शिरसो मुण्डनाद् वापि न स्थानकुटिकासनात् । न जटाधारणाद्ू वापि न तु स्थण्डिलशय्यया,मनुष्य पुण्यके प्रभावसे ही उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं। उपवास भी पुण्यसे अर्थात् निष्कामभावसे ही शुद्धिका कारण होता है। (बिना शुद्धभावके) केवल फल-मूल खाने, मौन रहने, हवा पीने, सिर मुँड़ाने, एक स्थानपर कुटी बनाकर रहने, सिरपर जटा रखाने, वेदीपर सोने, नित्य उपवास, अग्निसेवन, जलप्रवेश तथा भूमिशयन करनेसे भी शुद्धि नहीं होती है
Yudhiṣṭhira berkata: “Bukan dengan mencukur kepala, bukan dengan tinggal menetap di sebuah gubuk di satu tempat, bukan dengan sekadar memelihara rambut gimbal, dan bukan pula dengan tidur di tanah kosong seseorang menjadi suci. Kebajikan tertinggi dicapai oleh kekuatan puṇya yang lahir dari kemurnian batin.”
Verse 106
नित्यं हनशनादू् वापि नाग्निशुश्रूषणादपि । न चोदकप्रवेशेन न च क्ष्माशयनादपि,मनुष्य पुण्यके प्रभावसे ही उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं। उपवास भी पुण्यसे अर्थात् निष्कामभावसे ही शुद्धिका कारण होता है। (बिना शुद्धभावके) केवल फल-मूल खाने, मौन रहने, हवा पीने, सिर मुँड़ाने, एक स्थानपर कुटी बनाकर रहने, सिरपर जटा रखाने, वेदीपर सोने, नित्य उपवास, अग्निसेवन, जलप्रवेश तथा भूमिशयन करनेसे भी शुद्धि नहीं होती है
Yudhiṣṭhira berkata: “Bukan dengan puasa terus-menerus, bukan dengan merawat api suci, bukan dengan berendam/menyelam ke dalam air, dan bukan pula dengan tidur di tanah seseorang menjadi suci. Tapa lahiriah yang terpisah dari puṇya batin dan niat tanpa pamrih tidaklah menyucikan.”
Verse 107
ज्ञानेन कर्मणा वापि जरामरणमेव च । व्याधयश्र प्रहीयन्ते प्राप्यते चोत्तमं पदम्,तत्त्वज्ञान या सत्कर्मसे ही जरा, मृत्यु तथा रोगोंका नाश होता है और उत्तम पद (मुक्ति)-की प्राप्ति होती है
Yudhiṣṭhira berkata: “Dengan pengetahuan sejati (tattva-jñāna) atau dengan perbuatan benar (satkarma), usia tua, kematian, dan penyakit pun disingkirkan; dan keadaan tertinggi dicapai.”
Verse 108
बीजानि हाग्निदग्धानि न रोहन्ति पुनर्यथा । ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैरनत्मा संयुज्यते पुन:,जैसे आगमें जले हुए बीज फिर नहीं उगते हैं, उसी प्रकार ज्ञानके द्वारा अविद्या आदि क्लेशोंके नष्ट हो जानेपर आत्माका पुन: उनसे संयोग नहीं होता
Sebagaimana benih yang hangus oleh api tidak akan bertunas kembali, demikian pula ketika klesa seperti kebodohan (avidyā) telah terbakar oleh pengetahuan sejati, anātman—rangkaian batin dan tubuh—tidak lagi bersekutu dengannya.
Verse 109
आत्मना विप्रहीणानि काष्ठकुड्योपमानि च । विनश्यन्ति न संदेह: फेनानीव महार्णवे
Mereka yang tercerabut dari Ātman bagaikan dinding kayu yang hampa; tanpa ragu mereka binasa, lenyap seperti buih di samudra raya.
Verse 110
जीवात्मासे परित्यक्त होनेपर सारे शरीर काठ और दीवारकी भाँति जडवत् होकर महासागरमें उठे हुए फेनोंकी तरह नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है ।। आत्मानं विन्दते येन सर्वभूतगुहाशयम् । श्लोकेन यदि वार्धेन क्षीणं तस्य प्रयोजनम्,एक या आधे श्लोकसे भी यदि सम्पूर्ण भूतोंके हृदयदेशमें शयन करनेवाले परमात्माका ज्ञान हो जाय, तो उसके लिये सम्पूर्ण शास्त्रोंके अध्ययनका प्रयोजन समाप्त हो जाता है
Begitu jīvātman meninggalkan raga, tubuh menjadi beku seperti kayu atau dinding, dan binasa seperti buih yang timbul di samudra besar—tanpa keraguan. Namun bila bahkan melalui satu bait, atau setengah bait, seseorang mengenal Paramātman yang bersemayam tersembunyi di gua-hati semua makhluk, maka baginya tujuan menekuni seluruh śāstra secara panjang lebar telah terpenuhi.
Verse 111
द्वयक्षरादभिसंधाय केचिच्छलोकपदाड्कितै: । शतैरन्यै: सहसैश्न प्रत्ययो मोक्षलक्षणम्,कोई “तत्त्वम्” अथवा राम, कृष्ण, विष्णु, शिव आदि दो अक्षरोंसे ही परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। कोई श्लोक और पदोंसे अंकित अन्य सैकड़ों तथा सहस्ों शास्त्रवाक्योंसे परमात्माके स्वरूपको जानते हैं। जैसे भी हो, बोध ही मोक्षका लक्षण है
Sebagian orang, dengan memusatkan batin pada sebuah ucapan dua suku kata, mengenal Realitas Tertinggi; sebagian lain memahami hakikat Yang Mahatinggi melalui ratusan bahkan ribuan kalimat śāstra yang tersusun dalam bait dan kata. Bagaimanapun dicapai, keyakinan batin yang jernih—kesadaran yang terbangun—itulah tanda mokṣa.
Verse 112
नायं लोको<स्ति न परो न सुखं संशयात्मन: । ऊचुर्ज्ञनिविदो वृद्धा: प्रत्ययो मोक्षलक्षणम्,जिसके मनमें संशय भरा हुआ है, उसके लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख ही है। 'ज्ञान ही मोक्षका लक्षण है'--यह वृद्ध, ज्ञानी पुरुषोंका कथन है
Bagi orang yang batinnya dipenuhi keraguan, tiada buah dari dunia ini maupun dunia sana, dan kebahagiaan pun tak terbit. Para sesepuh yang bijak menyatakan: keyakinan batin yang teguh adalah tanda mokṣa.
Verse 113
विदितार्थस्तु वेदानां परिवेद प्रयोजनम् । उद्विजेत् स तु वेदेभ्यो दावाग्नेरिव मानव:,जब मनुष्य वेदोंके वास्तविक प्रयोजनको जान जाता है, तब वह वेदवेत्ता मानव (कर्मविधायक) समस्त वेदोंसे उसी प्रकार उपरत हो जाता है, जैसे मनुष्य दावानलसे हट जाते हैं
Ketika seseorang sungguh memahami makna Weda dan menyingkap tujuan sejatinya, maka sang pemaham Weda berpaling dari bagian Weda yang hanya menetapkan tata-ritus perbuatan—sebagaimana orang-orang menjauh dari kobaran api hutan.
Verse 114
शुष्क॑ तर्क परित्यज्य आश्रयस्व श्रुति स्मृतिम् एकाक्षराभिसम्बद्धं तत्त्वं हेतुभिरिच्छसि । बुद्धिर्न तस्य सिद्धयेत साधनस्य विपर्ययात्,प्रणवसे सम्बन्ध रखनेवाले परमात्मतत्त्वको यदि तुम युक्तिपूर्वक अर्थात् निःसंदेहभावसे समझना चाहते हो तो कोरा तर्कवाद छोड़कर श्रुति तथा स्मृतिके वचनोंका आश्रय लो। क्योंकि जो उपर्युक्त साधनका आश्रय नहीं लेता उसकी बुद्धि तत्त्वका निश्चय करनेमें समर्थ नहीं हो सकती
Tinggalkan perdebatan yang kering dan berlindunglah pada ajaran Śruti dan Smṛti. Jika engkau hendak memahami—dengan nalar yang benar dan tanpa keraguan—Hakikat yang terikat pada satu suku kata (Oṃ), ketahuilah: tanpa menempuh sarana yang tepat, akal tidak akan mencapai kepastian atas kebenaran itu.
Verse 115
वेदपूर्व वेदितव्यं प्रयत्नात् तत् वै वेदस्तस्य वेद: शरीरम् । वेदस्तत्त्वं तत्समासोपलब्धौ क्लीबस्त्वात्मा ततू स वेद्यस्य वेद्यम्
Apa yang berlandaskan Weda harus diketahui dengan sungguh-sungguh; itulah sesungguhnya ‘Weda’. Bagi yang benar-benar mengetahui, Weda sendiri menjadi tubuh (penopang) pengetahuan. Hakikatnya tersingkap ketika dipahami dalam sintesis yang ringkas; namun bila diri jatuh dalam kelemahan batin dan kehilangan kejernihan, maka yang seharusnya diketahui pun tinggal sekadar ‘objek pengetahuan’, bukan realisasi yang dihayati.
Verse 116
इसलिये जाननेयोग्य परमात्मतत्त्वका ज्ञान वेदोंके द्वारा ही यत्नपूर्वक प्राप्त करना चाहिये; क्योंकि वह परमात्मतत्त्व वेदस्वरूप है। वेद उसका शरीर है। उस परमात्मतत्त्वको सहजभावसे प्राप्त करानेमें वेद हेतु है। यह जीवात्मा स्वयं समर्थ नहीं है; क्योंकि वह तत्त्व वेद्यका भी वेद्य है, अर्थात् जाननेमें बड़ा ही गहन है ।। वेदोक्तमायुर्देवानामाशिषश्वैव कर्मणाम् । फलत्यनुयुगं लोके प्रभावश्च शरीरिणाम्,देवताओंकी आयु और कर्मोंका शुभाशुभ फल आदि बातें वेदमें कही गयी हैं। उसके अनुसार ही देहधारियोंका प्रभाव संसारमें प्रत्येक युगमें फलित होता है
Karena itu, pengetahuan tentang Hakikat Tertinggi yang patut diketahui hendaknya diperoleh dengan sungguh-sungguh melalui Weda saja; sebab Hakikat Tertinggi itu bersifat Weda sendiri—Weda bagaikan tubuh-Nya, dan menjadi sarana untuk mencapainya dengan mudah. Jiwa individu tidak memadai dengan kekuatannya sendiri, karena Hakikat itu amat dalam—bahkan menjadi objek pengetahuan melampaui yang lazim diketahui. Weda juga menyatakan usia para dewa serta berkat dan buah perbuatan; sesuai ketetapan itu, pada setiap zaman di dunia, daya dan nasib makhluk berjasad berbuah sebagaimana mestinya.
Verse 117
इन्द्रियाणां प्रसादेन तदेतत् परिवर्जयेत् । तस्मादनशनं दिव्यं निरुद्धेन्द्रियगोचरम्,अतः मनुष्यको इन्द्रियोंकी शुद्धिके द्वारा इन विषयभोगोंको त्याग देना चाहिये। यह इन्द्रियोंकी निर्मलता और निरोधसे होनेवाला अनशन (विषयोंका अग्रहण) दिव्य होता है
Karena itu, melalui kejernihan indria, manusia hendaknya meninggalkan kenikmatan-kenikmatan indriawi ini. ‘Anāśana’—yakni tidak mengambil objek-objek indria—yang lahir dari kemurnian dan pengekangan indria, itulah yang bersifat ilahi.
Verse 118
तपसा स्वर्गगमनं भोगो दानेन जायते | ज्ञानेन मोक्षो विज्ञेयस्तीर्थस्नानादघक्षय:,तपसे स्वर्गलोकमें जानेका सौभाग्य प्राप्त होता है। दानसे भोगोंकी प्राप्ति होती है। ज्ञानसे मोक्ष मिलता है, यह जानना चाहिये तथा तीर्थस्नानसे पापोंका क्षय हो जाता है
Dengan tapa-brata seseorang meraih jalan menuju surga; dengan dana (pemberian) ia memperoleh kenikmatan hidup. Dengan pengetahuan, pembebasan (moksha) patut dipahami sebagai dapat dicapai; dan dengan mandi di tirtha (tempat suci), dosa-dosa berkurang.
Verse 119
वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु राजेन्द्र प्रत्युवाच महायशा: । भगवन् श्रोतुमिच्छामि प्रधानविधिमुत्तमम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! मार्कण्डेयजीके ऐसा कहनेपर महायशस्वी युधिष्ठिर बोले--'भगवन्! अब मैं (दानकी) उत्तम एवं प्रधान विधि सुनना चाहता हूँ”
Vaiśampāyana berkata: Demikian disapa, wahai raja terbaik, Yudhiṣṭhira yang termasyhur menjawab, “Wahai Bhagavan, kini aku ingin mendengar tata-cara yang utama dan paling mulia mengenai dharma pemberian (dana).”
Verse 120
मार्कण्डेय उवाच यत् त्वमिच्छसि राजेन्द्र दानधर्म युधिष्ठिर । इष्ट चेद॑ं सदा महूं राजन् गौरवतस्तथा,मार्कण्डेयजीने कहा--महाराज युधिष्छिर! तुम मुझसे जिस दान-धर्मको सुनना चाहते हो वह गौरवयुक्त होनेके कारण मुझे सदा ही प्रिय है
Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai raja terbaik, Yudhiṣṭhira, dharma dana yang ingin engkau dengar dariku itu selalu kucintai, wahai raja—justru karena ia mulia dan patut dimuliakan.”
Verse 121
शृणु दानरहस्यानि श्रुतिस्मृत्युदितानि च । छायायां करिण: श्राद्ध तत् कर्णपरिवीजिते । दश कल्पायुतानीह न क्षीयेत युधिछ्िर,श्रुतियों और स्मृतियोंमें जो दानके रहस्य बताये गये हैं, उनका वर्णन सुनो--युधिष्छिर! गुरुवारको अमावस्याके योगमें पीपलके वृक्षकी छायाको गजच्छाया-पर्व कहते हैं। गजच्छायामें जहाँ पीपलके पत्तोंकी हवा लगती हो, उस प्रदेशमें जलके समीप जो श्राद्ध किया जाता है, वह एक लाख कल्पों तक नष्ट नहीं होता
Dengarkanlah rahasia-rahasia dana sebagaimana diajarkan dalam Śruti dan Smṛti. Wahai Yudhiṣṭhira, śrāddha yang dilakukan di bawah naungan seekor gajah—di tempat terasa hembusan sejuk seakan dikibaskan oleh gerak telinganya—pahalanya di dunia ini tidak berkurang hingga sepuluh kalpāyuta.
Verse 122
जीवनाय समाक्तलिन्नं वसु दत्त्वा महीयते । वैश्यं तु वासयेद् यस्तु सर्वयज्ञै: स इष्टवान्
Barangsiapa memberikan harta untuk menopang kehidupan orang lain, ia dimuliakan. Dan siapa pun yang menyediakan tempat tinggal serta penopang bagi seorang Vaiśya, ia dipandang seolah telah melaksanakan semua yajña.
Verse 123
जो जीविकाके लिये राँधा हुआ अन्नका दान करता है, वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो आश्रयकी खोज करनेवाले राहगीर-अतिथिको ठहरनेके लिये जगह दे वह सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान पूर्ण कर लेता है ।। प्रतिस्रोतश्रित्रवाहा: पर्जन्योउन्नानुसंचरन् । महाधुरि यथा नावा महापापै: प्रमुच्यते
Mārkaṇḍeya berkata— Barangsiapa, demi penghidupan, bersedekah makanan yang telah dimasak, ia diteguhkan kedudukannya di surga. Dan barangsiapa menyediakan tempat bermalam bagi musafir-tamu yang mencari perlindungan, seakan-akan ia telah menuntaskan pelaksanaan seluruh yajña. Laksana perahu sarat muatan yang tetap melaju meski melawan arus, demikian pula orang itu—ditopang pahala jamuan tamu dan pemberian makanan—terbebas dari dosa-dosa besar.
Verse 124
विप्लवे विप्रदत्तानि दधिमस्त्वक्षयाणि च । पूर्वकी ओर बहनेवाली नदीका प्रवाह जहाँ पश्चिमकी ओर मुड़ गया हो, वह प्रतिस्रोत तीर्थ कहलाता है, उसमें किया हुआ उत्तम अश्वोंका दान अक्षय पुण्यको देनेवाला होता है। अन्नके लिये विचरनेवाले अतिथिरूपी इन्द्रको यदि भोजनसे संतुष्ट किया जाय तो वह भी अक्षयपुण्यका जनक होता है। नदियोंके महान प्रवाहमें ग्रहणके समय ब्राह्मणोंको दिये हुए दधिमण्ड तथा पूर्वोक्त पदार्थ भी अक्षय पुण्यकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं। इसी प्रकार नदियोंके महान् प्रवाहमें स्नान करनेवाला पुरुष बड़े-बड़े पापोंसे मुक्ता हो जाता है ।। १२३ न्।! पर्वसु द्विगुणं दानमृती दशगुणं भवेत्,पर्वके अवसरपर दिया हुआ दान दुगुना तथा ऋतु आरम्भ होनेके समय दिया हुआ दान दस गुना पुण्यदायक होता है। उत्तरायण या दक्षिणायन आरम्भ होनेके दिन, विषुव-योग (तुला और मेषकी संक्रान्ति)-में, मिथुन, कन्या, धनु और मीनकी संक्रान्तियोंमें तथा चन्द्रगरहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर दिया हुआ दान अक्षय बताया गया है
Mārkaṇḍeya berkata— Bahkan pada masa kekacauan, persembahan kepada para Brahmana—seperti dadhi (yoghurt) dan susu olahan lainnya—dinyatakan berbuah pahala yang tak habis. Tempat di mana arus sungai yang semula mengalir ke timur berbelok ke barat disebut tīrtha Pratisrota; di sana, sedekah kuda-kuda unggul memberi pahala yang tak susut. Bila Indra yang menjelma sebagai tamu pengembara pencari makanan dipuaskan dengan jamuan, itu pun melahirkan pahala yang tak habis. Di arus besar sungai, pada waktu gerhana, dadhi-maṇḍa dan pemberian yang disebutkan itu kepada Brahmana menghasilkan pahala yang tak habis; dan orang yang mandi di sana terbebas dari dosa-dosa besar. Sedekah pada hari perayaan berlipat dua, pada awal musim berlipat sepuluh; dan sedekah pada permulaan Uttarāyaṇa atau Dakṣiṇāyaṇa, pada titik ekuinoks, pada saṅkrānti Mithuna–Kanyā–Dhanus–Mīna, serta pada gerhana bulan dan matahari, dipuji sebagai ‘akṣaya’—tak berkurang buahnya.
Verse 125
अयने विषुवे चैव षडशीतिमुखेषु च । चन्द्रसूयोपरागे च दत्तमक्षयमुच्यते,पर्वके अवसरपर दिया हुआ दान दुगुना तथा ऋतु आरम्भ होनेके समय दिया हुआ दान दस गुना पुण्यदायक होता है। उत्तरायण या दक्षिणायन आरम्भ होनेके दिन, विषुव-योग (तुला और मेषकी संक्रान्ति)-में, मिथुन, कन्या, धनु और मीनकी संक्रान्तियोंमें तथा चन्द्रगरहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर दिया हुआ दान अक्षय बताया गया है
Mārkaṇḍeya berkata— Sedekah yang diberikan pada permulaan ayana (Uttarāyaṇa atau Dakṣiṇāyaṇa), pada hari ekuinoks, pada gerbang-gerbang suci yang disebut ṣaḍaśīti-mukha, serta pada saat gerhana bulan dan gerhana matahari, dinyatakan ‘akṣaya’—tak berkurang pahalanya. Sedekah pada hari perayaan berlipat dua, dan pada awal musim berlipat sepuluh; terlebih lagi pada permulaan Uttarāyaṇa/Dakṣiṇāyaṇa, pada ekuinoks, pada saṅkrānti Mithuna–Kanyā–Dhanus–Mīna, dan pada gerhana, sedekah dipuji sebagai abadi buahnya.
Verse 126
ऋतुषु दशगुणं वदन्ति दत्तं शतगुणमृत्वयनादिदषु ध्रुवम् । भवति सहस्रगुणं दिनस्य राहो- विंषुवति चाक्षयमश्लुते फलम्,विद्वान् पुरुष ऋतु प्रारम्भ होनेके दिन दिये हुए दानको दस गुना तथा अयन आदिके दिन सौ गुना बताते हैं। इसी प्रकार ग्रहणके दिन दिये हुए दानका फल सहखगुना होता है और विषुवयोगमें दान करनेसे मनुष्य उसके अक्षय पुण्य-फलका उपभोग करता है
Mārkaṇḍeya berkata— Mereka menyatakan: sedekah pada awal musim berbuah pahala sepuluh kali lipat; pada hari-hari suci seperti permulaan ayana dan peralihan agung lainnya, berbuah seratus kali lipat dengan pasti. Sedekah pada hari gerhana (hari Rāhu) menghasilkan seribu kali lipat; dan sedekah pada hari ekuinoks menjadi akṣaya—buahnya tak habis.
Verse 127
नाभूमिदो भूमिमश्राति राजन् नायानदो यानमारुह्य याति । यान् यान् कामानू ब्राह्मुणे भ्यो ददाति तांसतान् कामान् जायमान: स भुड्क्ते,राजन्! जिसने भूमिदान नहीं किया है, वह परलोकमें पृथ्वीका उपभोग नहीं कर सकता। जिसने सवारीका दान नहीं किया है, वह सवारीपर चढ़कर नहीं जा सकता। इस जन्ममें मनुष्य जिन-जिन पदार्थोका ब्राह्मणोंको दान करता है, भावी जन्ममें वह उन-उन पदार्थोंकी उपभोगके लिये पाता है
Mārkaṇḍeya berkata— Wahai Raja, siapa yang tidak pernah menghadiahkan tanah sebagai sedekah, ia tidak menikmati bumi di alam seberang; siapa yang tidak pernah menghadiahkan kendaraan, ia tidak dapat menunggang kendaraan di sana. Apa pun kenikmatan yang seseorang sedekahkan kepada para Brahmana dalam hidup ini, kenikmatan itulah yang ia peroleh untuk dinikmati ketika ia terlahir kembali.
Verse 128
अग्नेरपत्यं प्रथम सुवर्ण भूर्वैष्णवी सूर्यसुताश्च॒ गाव: । लोकास्त्रयस्तेन भवन्ति दत्ता यः काज्चनं गाश्न महीं च दद्यात्
Mārkaṇḍeya bersabda: “Emas mula-mula dinyatakan sebagai keturunan Api; bumi adalah Vaiṣṇavī (milik Viṣṇu), dan sapi-sapi disebut putri-putri Surya. Karena itu, siapa yang mendermakan emas, sapi, dan tanah, seakan-akan telah menganugerahkan tiga dunia.”
Verse 129
सुवर्ण अग्निकी प्रथम संतान है। भूमि भगवान् विष्णुकी पत्नी है तथा गौएँ भगवान् सूर्यकी कन्याएँ हैं, अतः जो कोई सुवर्ण, गौ और पृथ्वीका दान करता है, उसके द्वारा तीनों लोकोंका दान सम्पन्न हो जाता है ।। परं हि दानान्न बभूव शाश्रचतं भव्यं त्रिलोके भवते कुतः पुनः । तस्मात् प्रधान परम हि दान वदन्ति लोकेषु विशिष्टबुद्धयः,त्रिलोकीमें दानसे बढ़कर शाश्वत पुण्यदायक कर्म दूसरा पहले कभी नहीं हुआ, अब कैसे हो सकता है? इसीलिये उत्तम बुद्धिवाले पुरुष संसारमें दानको ही सर्वोत्कृष्ट पुण्यकर्म बताते हैं
Mārkaṇḍeya bersabda: “Emas disebut sebagai anak sulung Api; bumi adalah permaisuri Dewa Viṣṇu; dan sapi-sapi adalah putri-putri Dewa Sūrya. Karena itu, siapa yang bersedekah emas, sapi, dan tanah, dipandang seakan-akan telah menghadiahkan tiga dunia. Sungguh, di tiga dunia tak pernah dikenal perbuatan yang memberi pahala lebih kekal daripada memberi—bagaimana mungkin ada yang melampauinya kini? Maka orang-orang berakal tajam menyatakan derma sebagai kebajikan yang paling utama.”
Verse 199
इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपवके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें इन्द्रहुम्नोपाख्यानविषयक एक सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikian berakhir bab ke-199 tentang kisah Indradyumna, dalam bagian Markandeya-samāsya pada Vana Parva dari Mahabharata suci.
Verse 200
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि दानमाहात्म्ये द्विशततमो<5ध्याय:
Demikian, dalam Śrī Mahābhārata pada Vana Parva—bagian Markandeya-samāsya—berakhir bab ke-200 tentang kemuliaan memberi (dāna).
Verse 233
प्रयच्छन्ति तु ये राजन् नोपसर्पन्ति ते समम् | इसलिये तुम सभी उपायोंसे अतिथियोंको भोजन देनेका प्रयत्न करो। राजन्! जो लोग अतिथिको चरण धोनेके लिये जल, पैरमें मलनेके लिये तेल, उजालेके लिये दीपक, भोजनके लिये अन्न तथा रहनेके लिये स्थान देते हैं, वे कभी यमराजके यहाँ नहीं जाते
Mārkaṇḍeya bersabda: “Wahai Raja, mereka yang memberi (kepada tamu) tidak akan memperoleh nasib yang sama dengan mereka yang tidak memberi. Karena itu, berusahalah dengan segala cara untuk menjamu para tamu. Wahai Raja, orang yang memberikan kepada tamu air untuk membasuh kaki, minyak untuk mengurapi kaki, pelita untuk penerangan, makanan untuk santap, dan tempat untuk bermalam—orang demikian tidak pergi ke alam Yama.”
Verse 296
न तारयति दातार ब्राह्मणं नैव नैव तु । एक गौ एक ही ब्राह्मणको देनी चाहिये; बहुतोंको कभी नहीं (क्योंकि एक ही गौ यदि बहुतोंको दी गयी, तो वे उसे बेचकर उसकी कीमत बाँट लेंगे)। दान की हुई गौ यदि बेच दी गयी, तो वह दाताकी तीन पीढ़ियोंको हानि पहुँचाती है। वह न तो दाताको ही पार उतारती है न ब्राह्मणको ही
Mārkaṇḍeya berkata: “Dāna seperti itu tidak menyeberangkan—baik si pemberi maupun brāhmaṇa penerima; sama sekali tidak.” Seekor sapi hendaknya diberikan kepada satu brāhmaṇa saja, bukan kepada banyak orang; sebab bila sapi yang didanakan dijual lalu harganya dibagi-bagi, kesucian dāna itu lenyap. Jika sapi dāna dijual, hal itu mencelakakan tiga generasi garis keturunan si pemberi; ia tidak menyelamatkan pemberi maupun brāhmaṇa penerima.
Verse 303
सुवर्णानां शतं तेन दत्त भवति शाश्वतम् । जो उत्तम वर्णवाले विशुद्ध ब्राह्मणको सुवर्ण-दान करता है उसे निरन्तर सौ स्वर्णमुद्राओंके दानका फल प्राप्त होता है
Mārkaṇḍeya berkata: “Dengan perbuatan itu, dāna menjadi kekal—seakan-akan seratus keping emas telah didanakan.” Siapa yang mempersembahkan emas kepada brāhmaṇa yang suci dan unggul dalam sifat-sifatnya, memperoleh pahala yang menetap, setara dengan dāna seratus keping emas yang terus-menerus.
Verse 316
स निस्तरति दुर्गाणि स्वर्गलोक॑ च गच्छति । जो लोग कंधेपर जुआ उठानेमें समर्थ बलवान बैल ब्राह्मणोंको दान करते हैं, वे दुःख और संकटोंसे पार होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं
Mārkaṇḍeya berkata: “Ia menyeberangi kesukaran-kesukaran yang terjal dan mencapai dunia surga.” Mereka yang mendanakan lembu jantan kuat—yang sanggup memikul kuk—kepada para brāhmaṇa, melampaui duka dan bahaya, lalu meraih svarga.
Verse 326
दातारं हानुगच्छन्ति सर्वे कामाभिवाज्छिता: । जो दिद्वान् ब्राह्मणको भूमिदान करता है, उस दाताके पास सभी मनोवाजञ्छित भोग स्वतः आ जाते हैं
Mārkaṇḍeya berkata: “Segala kenikmatan yang diidamkan mengikuti sang pemberi.” Bagi dermawan yang bijak—terutama yang menganugerahkan tanah kepada brāhmaṇa—segala kemakmuran dan kenyamanan yang diinginkan datang dengan sendirinya.
Verse 343
अन्नदातृसम: सो<पि कीर््यते नात्र संशय: । यदि कोई रास्तेके थके-माँदे, दुबले-पतले पथिक धूलभरे पैरोंसे भूखे-प्यासे आ जाया और पूछें कि क्या यहाँ कोई भोजन देनेवाला है? उस समय उन्हें जो विद्वान् अन्न मिलनेका पता बता देता है, वह भी अन्नदाताके समान ही कहा जाता है, इसमें संशय नहीं है
Mārkaṇḍeya berkata: “Ia pun dipuji setara dengan annadātā—tanpa keraguan.” Bila seorang musafir yang letih di jalan, kurus, kaki berdebu, tersiksa lapar dan dahaga, bertanya, “Adakah di sini pemberi makanan?” maka orang bijak yang menunjukkan tempat makanan dapat diperoleh, juga dipandang sebagai annadātā.
Verse 353
न हीदृशं पुण्यफलं विचित्रमिह विद्यते । अतः युधिष्ठिर! तुम सारे दानोंको छोड़कर केवल अन्नदान करते रहो। इस संसारमें अन्नदानके समान विचित्र एवं पुण्यदायक दूसरा कोई दान नहीं है
Mārkaṇḍeya berkata: “Di dunia ini tiada buah kebajikan yang seajaib ini. Karena itu, wahai Yudhiṣṭhira, sisihkanlah pemberian-pemberian lain dan tekunilah sedekah makanan saja. Dalam hidup manusia, tiada amal yang menyamai memberi makan sesama—tiada yang seajaib pengaruhnya, tiada yang seberlimpah kebajikannya.”
Verse 366
स तेन कर्मणा$5प्रोति प्रजापतिसलोकताम् | जो अपनी शक्तिके अनुसार अच्छे ढंगसे तैयार किया हुआ भोजन ब्राह्मणोंको अर्पित करता है वह उस पुण्यकर्मके प्रभावसे प्रजापतिके लोकमें जाता है
Mārkaṇḍeya berkata: “Dengan kebajikan itu, seseorang memperoleh kediaman di alam yang sama dengan Prajāpati. Barangsiapa—menurut kemampuannya—mempersembahkan makanan yang disiapkan dengan baik kepada para brāhmaṇa, ia akan pergi ke loka Prajāpati oleh daya pahala perbuatan suci itu.”
Verse 4736
विश्रमेद् यत्र वै श्रान्त: पुरुषो5ध्वनि कर्शित: । उसके मार्ममें जलरहित शून्य आकाशमात्र है। वह देखनेमें बड़ा भयानक और दुर्गम है। वहाँ न तो वृक्षोंकी छाया है, न पानी है और न कोई ऐसा स्थान ही है जहाँ रास्तेका थका- माँदा जीव क्षणभर भी विश्राम कर सके
Vaiśampāyana berkata: “Itu tempat di mana seorang lelaki, letih dan remuk oleh perjalanan, ingin beristirahat. Namun di dalamnya tak ada air—hanya hamparan kosong laksana langit. Tampaknya mengerikan dan sukar dilalui: tiada naungan pepohonan, tiada air, dan sama sekali tiada tempat bagi makhluk yang letih di jalan untuk berhenti walau sekejap.”
Verse 5636
अन्तरा चैव नाश्नाति तस्य लोका हानामया: । जो लोग छठी राततक उपवास करते हैं, वे मोर जुते हुए विमानोंद्वारा जाते हैं। पाण्डुनन्दन! जो लोग एक बार भोजन करके उसीपर तीन रात काट ले जाते हैं और बीचमें भोजन नहीं करते, उन्हें रोग-शोकसे रहित पुण्यलोक प्राप्त होते हैं
Vaiśampāyana berkata: “Barangsiapa tidak makan pada sela waktu, ia memperoleh alam-alam yang bebas dari kemerosotan dan penyakit. Mereka yang berpuasa hingga malam keenam dikatakan menempuh perjalanan dengan vimāna yang ditarik merak. Wahai putra Pāṇḍu, mereka yang makan sekali lalu menjalani tiga malam dengan bertahan pada itu saja—tanpa makan di antaranya—mencapai alam kebajikan yang tak tersentuh sakit dan duka.”
Verse 9836
विकारि तेषां राजेन्द्र सुदुष्करकरं मन: । राजेन्द्र! चक्षु आदि इन्द्रियोंके आहारको छोड़ देना कठिन नहीं है; क्योंकि इन्द्रियोंके छहों विषयोंका उपभोग न करनेसे वह अपने-आप सुगमतासे हो जाता है, परंतु उनमेंसे मन बड़ा विकारी है, इस कारण भावकी शुद्धिके बिना उसको वशमें करना अत्यन्त दुष्कर है
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai raja, di antara semuanya, pikiranlah yang paling mudah berubah dan bergolak; karena itulah pengendalian diri menjadi amat sukar. Meninggalkan ‘makanan’ indra—yakni objek-objeknya—tidaklah terlalu sulit; sebab bila enam objek indra tidak dinikmati, penarikan diri dapat terjadi dengan sendirinya. Namun pikiran sangat labil; tanpa pemurnian batin, menaklukkannya sungguh teramat sukar.”
The dilemma is how a person who knows dharma can still drift into wrongdoing by rationalizing greed: performing outwardly ‘righteous’ acts as a pretext for wealth, and defending choices with scriptural rhetoric despite ethical decay.
Ethical failure is processual and preventable: identify faults early with prajñā, cultivate steadiness amid pleasure and pain, and keep sustained company with sādhus—thereby generating stable dharma-buddhi rather than reactive desire-based action.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary appears as the brāhmaṇa’s validation of the teaching’s authority and the chapter’s shift to a structured metaphysical enumeration, positioning ethical discipline within a broader account of mind and constituents.