
Sukta 4.57
Vāmadeva Gautama (traditional for 4.57)
Kṣetrasya Pati (Lord of the Field); allied with agricultural/cosmic fertility powers
Gāyatrī (probable for several verses in 4.57; requires full scan)
यह सूक्त खेत के स्वामी ‘क्षेत्रस्य पति’ के प्रति कृषि और ब्रह्माण्डीय उर्वरता की प्रार्थना है। इसमें खेती में विजय, गौ-धन तथा अश्वों की समृद्धि, और पोषण के निरन्तर बढ़ते रहने की कामना की गई है। आगे यह शुना-सीरा (मंगलमय समृद्धि और हल-शक्ति) का आवाहन करता है और पर्जन्य की वर्षा को बुलाता है कि पृथ्वी मधुर, फलवती और मानव-परिश्रम तथा आन्तरिक विकास को सहारा देने वाली बने।
Mantra 1
क्षेत्रस्य पतिना वयं हितेनेव जयामसि । गामश्वं पोषयित्न्वा स नो मृळातीदृशे ॥
क्षेत्र के स्वामी के द्वारा हम वैसे ही विजय पाते हैं जैसे सुनिश्चित कल्याण से। जो हमारे भीतर गौ और अश्व—प्रकाश की किरणें और बल—का पोषण करता है, वह हम ऐसे याचकों पर कृपा करे।
Mantra 2
क्षेत्रस्य पते मधुमन्तमूर्मिं धेनुरिव पयो अस्मासु धुक्ष्व । मधुश्चुतं घृतमिव सुपूतमृतस्य नः पतयो मृळयन्तु ॥
हे क्षेत्र-पते, धेनु जैसे अपना दूध दुहती है, वैसे ही मधुमय ऊर्मि (तरंग) को हमारे भीतर दुह दे। वह मधु-च्युत होकर बहे, घृत के समान, भली-भाँति शुद्ध। ऋत के रक्षक हमारे स्वामी हम पर कृपा करें।
Mantra 3
मधुमतीरोषधीर्द्याव आपो मधुमन्नो भवत्वन्तरिक्षम् । क्षेत्रस्य पतिर्मधुमान्नो अस्त्वरिष्यन्तो अन्वेनं चरेम ॥
मधुमयी हों औषधियाँ; मधुमय हों द्यौ और आपः; हमारे लिए अन्तरिक्ष भी मधुमय हो। क्षेत्र का स्वामी हमारे लिए मधुमान हो; अहिंसित, उसके अनुगमन में, हम उसके सुव्यवस्थित क्षेत्र में विचरें।
Mantra 4
शुनं वाहाः शुनं नरः शुनं कृषतु लाङ्गलम् । शुनं वरत्रा बध्यन्तां शुनमष्ट्रामुदिङ्गय ॥
शुभ रूप से वाहक चलें, शुभ रूप से नर (कर्मकर्ता); शुभ रूप से हल (लाङ्गल) भूमि को चीरे। शुभ रूप से वरत्राएँ (लगाम/रस्सियाँ) बाँधी जाएँ; शुभ रूप से अंकुश (अष्ट्रा) उठे और चलाया जाए—ताकि कर्म सुयति से सिद्ध हो।
Mantra 5
शुनासीराविमां वाचं जुषेथां यद्दिवि चक्रथुः पयः । तेनेमामुप सिञ्चतम् ॥
हे शुनासीरा, हमारी इस वाणी को स्वीकार करो; क्योंकि तुमने दिवि में पयः—पोषक रस—रचा है। उसी से इस (क्षेत्र/हमारे) ऊपर सिंचन करो, उसे परिपूर्ण करो।
Mantra 6
अर्वाची सुभगे भव सीते वन्दामहे त्वा । यथा नः सुभगाससि यथा नः सुफलाससि ॥
हे सुभगे सीते, हमारी ओर अभिमुख हो; हम तुम्हें वन्दन करते हैं। जैसे तुम हमारे लिए सुभगा बनो, जैसे तुम हमारे लिए सुफला बनो।
Mantra 7
इन्द्रः सीतां नि गृह्णातु तां पूषानु यच्छतु । सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम् ॥
इन्द्र सीता (हल की रेखा) को थामकर उसे दृढ़ करे; पूषन् उसे उसके सम्यक् पथ पर आगे बढ़ाए। और वह, पोषण-रस से परिपूर्ण, हमारे लिए वर्ष-प्रतिवर्ष उत्तरोत्तर अधिक समृद्धि का दुग्ध-दोहन करे।
Mantra 8
शुनं नः फाला वि कृषन्तु भूमिं शुनं कीनाशा अभि यन्तु वाहैः । शुनं पर्जन्यो मधुना पयोभिः शुनासीरा शुनमस्मासु धत्तम् ॥
हमारे फाल (हल के फाल) मंगल रूप से भूमि को चीरें; कीनाश (कृषक) अपने जुते हुए वाहनों/शक्तियों के साथ कर्म की ओर आएँ। पर्जन्य मधुरता को पोषक धाराओं से बरसाए; हे शुना और सीरा, यह शुभता हमारे भीतर स्थापित करो।
Kṣetrasya Pati means “Lord of the Field.” In this hymn he is the divine guardian of cultivated land who grants success in work, protects the field, and increases nourishment and prosperity.
Śunā-Sīrā are paired fertility powers connected with auspicious increase and ploughing. The hymn asks them to accept the prayer and to “pour” nourishing essence onto the field so that cultivation and harvest succeed.
It is directly about farming—ploughing, workers, tools, and rain—but it also reads symbolically: the “field” can be one’s inner nature, ploughing is disciplined effort, and rain is grace that brings inner growth and well-being.
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