Rig Veda Sukta 3
Mandala 4Sukta 316 Mantras

Sukta 3

Sukta 4.3

Rishi

Vāmadeva Gautama (traditional attribution for Mandala 4)

Devata

Agni (with Rudra-epithet/force invoked as king and hotṛ)

Chandas

Triṣṭubh (probable for RV 4.3; verse-length and cadence fit the dominant meter of this section)

यह सूक्त अग्नि को यज्ञ का राजा और दोनों लोकों में व्याप्त सच्चा होतृ कहकर आह्वान करता है—रुद्र-सदृश तेज से युक्त, उग्र, शुद्धिकर्ता और कर्मकाण्ड में अधिराज। इसमें अग्नि की ऋत-प्रेरित शक्ति की स्तुति है, जो कच्चे को पका (आमा→पक्व) कर देती है, गुप्त को प्रत्यक्ष बनाती है, और उपासक को गुप्त ‘नीथानि’ (मार्गदर्शक पथों) से आगे ले जाती है। अंत में द्रष्टा अग्नि-विद् के योग्य, रची हुई अंतर्निहित (निण्या) वाणियाँ—गूढ़ वचन और प्रेरित स्तुति—अर्पित करता है।

Mantras

Mantra 1

आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रं होतारं सत्ययजं रोदस्योः । अग्निं पुरा तनयित्नोरचित्ताद्धिरण्यरूपमवसे कृणुध्वम् ॥

तुम्हारे लिए अध्वर (यज्ञ) के राजा—रुद्र-शक्ति—को, दोनों लोकों के सत्ययज् होता के रूप में, आगे लाओ। अग्नि को—प्राचीन, पोषण-शक्तियों से उत्पन्न—स्वर्णरूप बनाकर हमारे अवलम्बन हेतु स्थापित करो; वह सहायता-शक्ति बने, जो अचेत (अदृश्य) को भी जगा दे।

Mantra 2

अयं योनिश्चकृमा यं वयं ते जायेव पत्य उशती सुवासाः । अर्वाचीनः परिवीतो नि षीदेमा उ ते स्वपाक प्रतीचीः ॥

यह योनि-आसन हमने तुम्हारे लिए बनाया है; जैसे पति के लिए पत्नी—आकांक्षी और सु-वस्त्र—वैसे ही हम इसे सजाते हैं। इधर मुड़ो, चारों ओर से आवृत होकर, और बैठो; हे स्वपाक (सु-पाककर्ता), हमारी ये आहुतियाँ तुम्हारी ओर प्रत्यञ्च (प्रतिस्पन्दित) शक्तियों की भाँति लौटती हैं।

Mantra 3

आशृण्वते अदृपिताय मन्म नृचक्षसे सुमृळीकाय वेधः । देवाय शस्तिममृताय शंस ग्रावेव सोता मधुषुद्यमीळे ॥

हे वेधस् (ऋषि/ज्ञानी), जो सुनता है, जो मदोन्मत्त नहीं, जो मनुष्यों का द्रष्टा और सुमृळीका (दयालु‑अनुग्रही) है—उसके लिए यह प्रेरित ‘मन्म’ (वाणी/विचार) उच्चारो। देव के लिए, अमृत (अमर) के लिए स्तुति का घोष करो। जैसे ग्रावा (सोम‑पाषाण) के समान सोता (सोम‑निचोड़ने वाला) मधु उँडेलता है, वैसे ही मैं उसे—जिसे पुकारता हूँ—पूजता/स्तुत करता हूँ।

Mantra 4

त्वं चिन्नः शम्या अग्ने अस्या ऋतस्य बोध्यृतचित्स्वाधीः । कदा त उक्था सधमाद्यानि कदा भवन्ति सख्या गृहे ते ॥

हे अग्नि, शम्या (समिधा/काष्ठ) से भी—हमारे लिए—इस ऋत (ऋतस्य) का बोध करो; हे ऋतचित् (ऋत‑ज्ञ), स्वाधीः (सुसमझ‑सद्भाव) होकर। कब तेरे उक्थ (प्रेरित स्तोत्र) और सधमाद्य (सह‑आनन्द/सह‑पान) हमारे पास होंगे? कब तेरे गृह में सख्य (मैत्री) उत्पन्न होंगे?

Mantra 5

कथा ह तद्वरुणाय त्वमग्ने कथा दिवे गर्हसे कन्न आगः । कथा मित्राय मीळ्हुषे पृथिव्यै ब्रवः कदर्यम्णे कद्भगाय ॥

हे अग्नि, वरुण के प्रति तुम कैसे उत्तरदायी ठहरते हो? द्यौ (दिव/स्वर्ग) के सामने तुम कैसे निन्दित होते हो—हमारा कौन‑सा आगस् (अपराध) है? मित्र—जो मीळ्हुष (अनुग्रही) है—और पृथिवी से तुम कैसे बोलोगे? आर्यमन् से क्या कहोगे, और भग से क्या?

Mantra 6

कद्धिष्ण्यासु वृधसानो अग्ने कद्वाताय प्रतवसे शुभंये । परिज्मने नासत्याय क्षे ब्रवः कदग्ने रुद्राय नृघ्ने ॥

हे अग्नि, पवित्र आसनों में वर्धमान होकर तू कौन-सा वचन बोलेगा—वात (वायु) को, जो आगे धकेलने वाला और कल्याणकारी है, क्या कहेगा? दूर तक विचरने वाले नासत्य (अश्विनौ) से—हमारे निवास-कल्याण के लिए—तू क्या कहेगा? और हे अग्नि, शत्रु-हंता रुद्र को तू क्या कहेगा?

Mantra 7

कथा महे पुष्टिम्भराय पूष्णे कद्रुद्राय सुमखाय हविर्दे । कद्विष्णव उरुगायाय रेतो ब्रवः कदग्ने शरवे बृहत्यै ॥

महान्, पुष्टिधारक पूषन् को तू कैसे संबोधित करेगा, और सुमख (सुयज्ञ) रुद्र को—हविर्दे (हवि देने वाले) को—क्या कहेगा? उरुगाय (विस्तृत पदों वाले) विष्णु को तू कौन-सा बीज-वचन बोलेगा? और हे अग्नि, दूर तक उड़ने वाले शर (बाण) को, उस बृहती (विस्तीर्ण) को, तू क्या कहेगा?

Mantra 8

कथा शर्धाय मरुतामृताय कथा सूरे बृहते पृच्छ्यमानः । प्रति ब्रवोऽदितये तुराय साधा दिवो जातवेदश्चिकित्वान् ॥

ऋत में स्थित मरुतों के गण को तू कैसे उत्तर देगा; और पूछे जाने पर महान् सूर्य को कैसे? त्वरित अदिति को प्रत्युत्तर दे; और उसे सिद्ध कर—हे जातवेदस्, चिकीत्त्वान् (ज्ञानी), दिव्य-मार्ग की पूर्ति को दृढ़ कर।

Mantra 9

ऋतेन ऋतं नियतमीळ आ गोरामा सचा मधुमत्पक्वमग्ने । कृष्णा सती रुशता धासिनैषा जामर्येण पयसा पीपाय ॥

ऋत के द्वारा मैं उस ऋत की स्तुति करता हूँ जो दृढ़ता से नियत है; हे अग्नि, गौ के कच्चे और पके मधुर रस के साथ-साथ। यह कृष्णा (अन्धकारमयी) सत्ता, दीप्तिमान पात्र के प्रकाश से उज्ज्वल होकर, पालनकर्ता साथी के दुग्ध से परिपुष्ट की गई है।

Mantra 10

ऋतेन हि ष्मा वृषभश्चिदक्तः पुमाँ अग्निः पयसा पृष्ठ्येन । अस्पन्दमानो अचरद्वयोधा वृषा शुक्रं दुदुहे पृश्निरूधः ॥

क्योंकि ऋत के द्वारा ही निश्चय ही वृषभ भी अभिषिक्त होता है—पुरुष अग्नि, अपनी पीठ पर दुग्ध सहित। वह अचल-सा, कम्पनरहित, चलता है—दोनों प्रकार की समृद्धियों का दाता; वृषभ ने उज्ज्वल रस को दुहा, और पृष्णि (चितकबरी) ने अपने थन से।

Mantra 11

ऋतेनाद्रिं व्यसन्भिदन्तः समङ्गिरसो नवन्त गोभिः । शुनं नरः परि षदन्नुषासमाविः स्वरभवज्जाते अग्नौ ॥

ऋत के द्वारा उन्होंने अद्रि (शिला) को चीरकर अलग किया; अङ्गिरसगण प्रकाश-किरणों (गोभिः) के साथ मिलकर आगे बढ़े। बलवान नर उषा के चारों ओर शुभ विस्तार में बैठ गए; और जब अग्नि भीतर जन्मा, तब स्वर्ग-प्रकाश (स्वर्) प्रकट हुआ।

Mantra 12

ऋतेन देवीरमृता अमृक्ता अर्णोभिरापो मधुमद्भिरग्ने । वाजी न सर्गेषु प्रस्तुभानः प्र सदमित्स्रवितवे दधन्युः ॥

ऋत के द्वारा, हे अग्नि, दिव्य आपः—अमृत, अविमिश्र—मधुर धाराओं सहित प्रवाहित होती हैं। वे वेगवान अश्व-योद्धा की भाँति आघातों में गूँजती हुई, निरन्तर आगे बढ़ती हैं, ताकि सतत् प्रवाह में बाहर निकलकर बहें।

Mantra 13

मा कस्य यक्षं सदमिद्धुरो गा मा वेशस्य प्रमिनतो मापेः । मा भ्रातुरग्ने अनृजोॠणं वेर्मा सख्युर्दक्षं रिपोर्भुजेम ॥

किसी भी शत्रु-शक्ति के यक्ष में हम क्षणभर भी न जाएँ; कुल-व्यवस्था के विघटन की क्षीण करती शक्ति के अधीन न पड़ें। हे अग्नि, अधिकारहीन भ्राता का ऋण हम पर न आए; न शत्रु की दक्षता के भोगी बनें, न मित्र की क्षमता का दुरुपयोग करें।

Mantra 14

रक्षा णो अग्ने तव रक्षणेभी रारक्षाणः सुमख प्रीणानः । प्रति ष्फुर वि रुज वीड्वंहो जहि रक्षो महि चिद्वावृधानम् ॥

हे अग्नि, अपने रक्षण-बलों से हमारी रक्षा कर; हे सुमुख, रक्षक बनकर, आनन्दित होकर। प्रतिघात कर, चीर दे, घने अंहस् को तोड़; रक्षस् को मार—चाहे वह महान होकर भी बढ़ा-चढ़ा हो।

Mantra 15

एभिर्भव सुमना अग्ने अर्कैरिमान्त्स्पृश मन्मभिः शूर वाजान् । उत ब्रह्माण्यङ्गिरो जुषस्व सं ते शस्तिर्देववाता जरेत ॥

हे अग्नि, इन स्तुतियों (अर्कों) से तुम सुमना—प्रसन्न-चित्त—होओ; हे शूर, हमारे मनोभावों से इन वाजों/समृद्धियों का स्पर्श करो। और हे अङ्गिरस्, इन ब्रह्माणि—पवित्र मन्त्र-रचनाओं—को स्वीकार करो; तब देवों से प्रेरित तुम्हारी शस्ति (प्रेरित स्तुति) तुम्हारे भीतर परिपक्व हो।

Mantra 16

एता विश्वा विदुषे तुभ्यं वेधो नीथान्यग्ने निण्या वचांसि । निवचना कवये काव्यान्यशंसिषं मतिभिर्विप्र उक्थैः ॥

हे वेधस्—विधाता—और सब जानने वाले अग्नि, ये सब नीथानि (मार्गदर्शक प्रेरणाएँ) और वचनों के निण्या (गुप्त) रूप मैंने तुम्हारे लिए रचे हैं। ऋषि-कवि के लिए ये निवचन (गूढ़ उच्चारण) और काव्यानि (काव्य-सत्य) हैं; विप्र मैं इन्हें मतियों और उक्थों—प्रेरित स्तुतियों—से प्रकट करता हूँ।

Frequently Asked Questions

Because Agni governs the whole ritual process: he is invoked first, receives the offerings, and ensures the rite proceeds in right order (ṛta), like a sovereign directing the adhvara.

It highlights Agni’s fierce, purifying power—an awe-inspiring force that burns away impurity and compels truthfulness in the ritual and in the worshipper.

It refers to inward, symbolic or esoteric utterances—carefully crafted poetic formulas and insights offered to Agni, who is praised as the knower able to receive and fulfill them.

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