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Sukta 4.26
Vāmadeva Gautama (RV 4.26 is traditionally his)
Indra (hymn context), with a strong self-revelatory (aham) voice; sometimes read as the seer speaking with divine identification
Triṣṭubh
ऋग्वेद 4.26 एक अत्यन्त प्रभावशाली आत्म-प्रकटीकरण (अहम्) वाला सूक्त है, जिसमें ऋषि “मैं हूँ” की वाणी में बोलते हुए आदर्श शक्तियों और पुराख्यात पात्रों से अपनी तादात्म्य-घोषणा करते हैं—मानो इन्द्र की ही चेतना उनके माध्यम से वाणी बनकर प्रकट हो रही हो। इसके बाद सूक्त श्येन (बाज़) की पौराणिक उड़ान की ओर मुड़ता है, जो मनु के लिए सोम लाता है—यह दिव्य आनन्द-रस के विजयी अपहरण तथा शत्रु शक्तियों के परित्याग/निष्कासन का प्रतीक है। इस सूक्त का प्रयोजन इन्द्र/सोम-शक्ति की स्तुति के साथ-साथ ऋषि की प्रेरित पहचान की घोषणा करना है, जो उस दिव्य विजय में सहभागी बनती है।
Mantra 1
अहं मनुरभवं सूर्यश्चाहं कक्षीवाँ ऋषिरस्मि विप्रः । अहं कुत्समार्जुनेयं न्यृञ्जेऽहं कविरुशना पश्यता मा ॥
मैं मनु हुआ, और मैं सूर्य भी हुआ; मैं कक्षीवान् ऋषि हूँ—विप्र (प्रेरित) हूँ। मैं अर्जुन के पुत्र कुत्स को प्रवृत्त करता हूँ; मैं कवि उशना हूँ—मुझे देखो।
Mantra 2
अहं भूमिमददामार्यायाहं वृष्टिं दाशुषे मर्त्याय । अहमपो अनयं वावशाना मम देवासो अनु केतमायन् ॥
मैंने आर्य के लिए विस्तृत पृथ्वी प्रदान की; यज्ञ-दान करने वाले मर्त्य को वर्षा दी। अभिलाषा से प्रवाहित होती हुई अपः (जलधाराएँ) मैंने आगे बढ़ाईं; मेरे केतु (प्रकाश-चिह्न) के अनुसार देवगण पीछे-पीछे चले।
Mantra 3
अहं पुरो मन्दसानो व्यैरं नव साकं नवतीः शम्बरस्य । शततमं वेश्यं सर्वताता दिवोदासमतिथिग्वं यदावम् ॥
मैं, हर्षित होकर, शम्बर के दृढ़ दुर्गों को—नौ और निन्यानवे एक साथ—विध्वंस कर गया। दिवोदास अतिथिग्व को मैंने सहायता दी—उस शततम वेश्यम् (आवास/दुर्ग) में, सर्वतः-विजयी।
Mantra 4
प्र सु ष विभ्यो मरुतो विरस्तु प्र श्येनः श्येनेभ्य आशुपत्वा । अचक्रया यत्स्वधया सुपर्णो हव्यं भरन्मनवे देवजुष्टम् ॥
हे मरुतो, तुमसे पृथक् वह (वीर) आगे बढ़े; बाजों में से वह बाज, शीघ्र-पंखों वाला, आगे निकले। जब चक्र-रहित, अपनी स्वधा (स्वशक्ति) से, सुपर्ण ने मनु के लिए देव-प्रिय हवि को उठाकर लाया।
Mantra 5
भरद्यदि विरतो वेविजानः पथोरुणा मनोजवा असर्जि । तूयं ययौ मधुना सोम्येनोत श्रवो विविदे श्येनो अत्र ॥
जब वह उसे लेकर चला—वेग से काँपता हुआ—तो उसने विस्तृत पथों पर मनोवेग से उसे छोड़ दिया। मधु-रसयुक्त सोम के साथ वह शीघ्र गया; और यहीं उस श्येन (बाज़) ने उस विजयी-आहरण की कीर्ति भी प्राप्त की।
Mantra 6
ऋजीपी श्येनो ददमानो अंशुं परावतः शकुनो मन्द्रं मदम् । सोमं भरद्दादृहाणो देवावान्दिवो अमुष्मादुत्तरादादाय ॥
ऋजीपि—सीधे पंखों वाला श्येन—अंशु अर्पित करता हुआ, परावत् (दूर-पर) से वह मन्द्र मद (आनन्दमय उन्माद) ले आया। देव-आवन् (देव-समर्थ) शक्ति को दृढ़ पकड़े हुए, उसने दिव के उस ऊँचे प्रदेश से सोम को नीचे लाया और परम ऊँचाई से उसे छीन लिया।
Mantra 7
आदाय श्येनो अभरत्सोमं सहस्रं सवाँ अयुतं च साकम् । अत्रा पुरंधिरजहादरातीर्मदे सोमस्य मूरा अमूरः ॥
आदाय श्येन ने सोम को लाकर—सहस्रों सव (दबाव/पान) और अयुतों को भी एक साथ—यहाँ पहुँचा दिया। यहाँ पुरंधि (पूर्णता की शक्ति) ने अरातियों (शत्रु शक्तियों) को त्याग दिया; सोम के मद में मूढ़ करने वाली मूढ़ताएँ अमूढ़ हो जाती हैं, और सत्ता निर्मल हो उठती है।
The hymn uses an “aham” voice to show inspired identity: the seer speaks as if his awakened consciousness participates in divine powers and legendary roles, a hallmark of Vāmadeva’s visionary style.
The Śyena is the swift, superhuman bird-power that seizes and brings Soma to Manu. In ritual and symbolism, it represents the victorious acquisition of divine inspiration/ecstasy for the sacrifice.
It teaches that through right offering and inspired speech, one can gain Soma-like clarity and strength, drive away hostile forces, and move from confusion to a steadier, luminous state of mind.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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