Rig Veda Sukta 45
Mandala 4Sukta 457 Mantras

Sukta 45

Sukta 4.45

Rishi

Vāmadeva Gautama

Devata

Aśvinau (context of adjacent hymns; this sukta continues Aśvin imagery)

Chandas

Jagatī or Triṣṭubh (verse appears longer; exact meter requires scansion—left as probable)

यह सूक्त अश्विनों की स्तुति करता है—वे तेजस्वी, शीघ्र आने वाले दिव्य जुड़वाँ हैं, जिनका स्वर्ग-गामी रथ उषा की किरण-सा उठता है और बिना विलंब सोम-पीड़नों तक पहुँचता है। युग्म अश्वों, स्वर्ण-पंखी हंसों और मधुमक्खियों जैसे सजीव बिंबों के द्वारा उन्हें यज्ञ में आमंत्रित किया गया है, और उनकी जीवनदायिनी, रोगहर, तथा आनंद-प्रद उपस्थिति का गुणगान किया गया है। कवि का उद्देश्य यजमान और यज्ञ के लिए उनकी त्वरित आगमन-प्राप्ति और कल्याणकारी सहायता सुनिश्चित करना है।

Mantras

Mantra 1

एष स्य भानुरुदियर्ति युज्यते रथः परिज्मा दिवो अस्य सानवि । पृक्षासो अस्मिन्मिथुना अधि त्रयो दृतिस्तुरीयो मधुनो वि रप्शते ॥

यह ज्योतिर्मय भानु उदित होता है; सर्वपरिभ्रमणशील रथ स्वर्ग की कगार पर युक्त होता है। यहाँ युगल अश्व नियोजित हैं; तीन चर्म और मधु का चौथा पात्र अपनी पूर्णता में फैलाया जाता है।

Mantra 2

उद्वां पृक्षासो मधुमन्त ईरते रथा अश्वास उषसो व्युष्टिषु । अपोर्णुवन्तस्तम आ परीवृतं स्वर्ण शुक्रं तन्वन्त आ रजः ॥

उषा के प्रकट होने पर तुम्हारे मधुमय पृक्षास (अश्व) और रथ ऊपर की ओर गतिमान होते हैं। वे चारों ओर से छाए अंधकार को उघाड़ देते हैं, और उज्ज्वल स्वर्ण-प्रभा को रजस् (अंतरिक्ष) में तान देते हैं।

Mantra 3

मध्वः पिबतं मधुपेभिरासभिरुत प्रियं मधुने युञ्जाथां रथम् । आ वर्तनिं मधुना जिन्वथस्पथो दृतिं वहेथे मधुमन्तमश्विना ॥

मधु का पान करो—मधुपी मुखों से; और प्रिय मधु के लिए रथ को युक्त करो। मधु से तुम पथों की वर्तनिका (घुमावदार चाल) को स्फूर्त करते हो; हे अश्विनौ, तुम मधुमय दृति (चर्म-पात्र) को वहन करते हो।

Mantra 4

हंसासो ये वां मधुमन्तो अस्रिधो हिरण्यपर्णा उहुव उषर्बुधः । उदप्रुतो मन्दिनो मन्दिनिस्पृशो मध्वो न मक्षः सवनानि गच्छथः ॥

जो हंसों के समान—मधु-परिपूर्ण, अच्युत/अभ्रान्त, स्वर्ण-पंखों वाले—उषा के जागरण में पुकारे गए; जल से उछलते हुए, आनन्दमय, आनन्द को स्पर्श करने वाले—वे तुम (अश्विनौ) मधु की मक्खियों के समान सोम के सवनों की ओर जाते हो।

Mantra 5

स्वध्वरासो मधुमन्तो अग्नय उस्रा जरन्ते प्रति वस्तोरश्विना । यन्निक्तहस्तस्तरणिर्विचक्षणः सोमं सुषाव मधुमन्तमद्रिभिः ॥

हे अश्विनौ, उषा के प्रति—प्रभात के आगमन पर—सुव्यवस्थित अग्नियाँ, मधुमती (आनन्द-रस से युक्त) होकर, जागती और दीप्त होती हैं। तब ही वह विवेकी, शीघ्र-गामी शक्ति—कर्म में निपुण किए हुए हाथों वाली—अद्रि (दबाने के पत्थरों) से मधुमन्त सोम को निचोड़ती है।

Mantra 6

आकेनिपासो अहभिर्दविध्वतः स्वर्ण शुक्रं तन्वन्त आ रजः । सूरश्चिदश्वान्युयुजान ईयते विश्वाँ अनु स्वधया चेतथस्पथः ॥

तीक्ष्ण-अग्र शक्तियों से, दिन-प्रतिदिन, तुम आगे धकेलते हो—अन्तरिक्ष में स्वर्ग-सा उज्ज्वल प्रकाश फैलाते हुए। सूर्य भी अपने अश्वों को जोतकर चलता है; और अपनी स्वधया (स्वाभाविक शक्ति) से तुम समस्त पथों को—गति के मार्गों को—चेतन और सुमार्गी बनाते हो।

Mantra 7

प्र वामवोचमश्विना धियंधा रथः स्वश्वो अजरो यो अस्ति । येन सद्यः परि रजांसि याथो हविष्मन्तं तरणिं भोजमच्छ ॥

हे अश्विनौ, मैंने तुम्हारे लिए प्रकाश-धारिणी धिया का उच्चारण किया है। तुम्हारा रथ सुन्दर अश्वों से युक्त है, अपनी शक्ति में अजर है। उसी से तुम क्षणमात्र में अन्तरिक्ष के रजों को पार करते हुए, हविष्मान्—उस त्वरित तरणि-भोज के पास सीधे आते हो, जो हवि का आस्वादन करता और उसे यथाविधि वितरित करता है।

Frequently Asked Questions

The Aśvins are divine twin helpers who ride a swift chariot, arrive at dawn, and bring healing, protection, and good fortune. The hymn invites them to come quickly to the Soma offering.

Swans suggest graceful dawn-flight and purity, while bees suggest eager movement toward sweetness. Together, the images say the Aśvins awaken with dawn and rush joyfully and surely to the Soma pressings.

Its purpose is invocation: to yoke the Aśvins’ presence to the sacrifice so they attend the morning Soma pressing, accept offerings, and bless the patron with vitality and successful outcomes.

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