Adhyaya 19
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Adhyaya 19

The Greatness of Devotion to Hari: The Bandit Urvīśu, Naivedya Merit, and What Pleases or Angers Viṣṇu

व्यास जी जैमिनि से कहते हैं कि जो नारायण की शरण लेते हैं, उन्हें कभी अनिष्ट नहीं मिलता; विष्णु की महिमा का वर्णन वैष्णवों के बीच ही करना चाहिए। फिर उदाहरण आता है—उर्वीशु नामक पापाचारी व्यक्ति को कुटुम्बी तिरस्कृत कर देते हैं; वह डाकू बन जाता है। नदी-तट पर वैष्णव ब्राह्मणों को हरि के लिए नैवेद्य-समर्पण की मर्यादा बताते सुनकर उसे स्मरण होता है कि मुरारि को अर्पित वस्तु पवित्र है; इसलिए जिस गुड़ को उसने अर्पण करने का निश्चय किया था, उसे स्वयं नहीं खाता, दान कर देता है। जनार्दन उसके पाप हर लेते हैं; नगरवासी उसे मार भी दें, तो भी वह हरिधाम को ले जाया जाता है। दूसरी कथा में सर्वजनि नामक ब्राह्मण स्वप्न में केशव का दर्शन करता है और पश्चात्ताप-स्तुति करता है। भगवान् विष्णु उसे उसके कर्मों का गुप्त कारण बताते हैं—पूर्वजन्म में पक्षी होकर अनजाने में नैवेद्य-भक्षण से मुक्ति का बीज पड़ा। फिर प्रभु बताते हैं कि कौन-से आचरण उन्हें प्रिय हैं और कौन-से अप्रिय—भक्ति, सेवा, दान, शौच, सत्य और वैष्णवों का सम्मान प्रसन्न करता है; वैष्णव-निन्दा महापाप है। अंत में नित्य वासुदेव-पूजन का उपदेश देते हैं।

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