
Mahāviṣṇu as Trimūrti: Creation Schema, Madhu–Kaiṭabha Episode, and the Marks of a Vaiṣṇava
इस अध्याय में कहा गया है कि महाविष्णु ही सृष्टि, पालन और संहार के लिए त्रिमूर्ति-रूप से प्रकट होते हैं; इसलिए देवताओं में भेद करके वैर-भाव रखना उचित नहीं। फिर ब्रह्मा की सृष्टि-रचना का वर्णन आता है—पंचतत्त्व, लोक, पाताल, पर्वत, द्वीप और समुद्रों की व्यवस्था; और विशेष रूप से भारतवर्ष को कर्मभूमि बताकर कहा गया है कि यहाँ धर्म का फल शीघ्र मिलता है। इसके बाद भक्ति की सर्वोच्चता और वैष्णव-संग की तारक शक्ति प्रतिपादित होती है। मधु–कैटभ प्रसंग में योगनिद्रा में स्थित विष्णु की स्तुति करते हुए ब्रह्मा, दैत्यों का मोह, उनका वध, और भक्तों को विपत्तियों से मुक्त रखने का वरदान वर्णित है। अंत में वैष्णव के लक्षण संक्षेप में बताए गए हैं—सदाचार, तुलसी, तिलक, शालग्राम-सेवा, एकादशी-व्रत, मंदिर-सेवा, दान और लोककल्याण; तथा पाठ-श्रवण की फलश्रुति भी कही गई है।
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