
The Greatness of Giving Food and Water (and Honoring Brāhmaṇas)
व्यास जी जैमिनि से कहते हैं कि इस अध्याय में हरिशर्मा ब्रह्मा से पूछते हैं—दान का योग्य पात्र कौन है। ब्रह्मा ब्राह्मणों को ‘प्रत्यक्ष देवता’ मानकर श्रद्धा और आदर सहित दान की प्रतिष्ठा करते हैं। साथ ही ब्राह्मण-सत्कार की मर्यादा बताते हैं और यह भी कहते हैं कि किन अवसरों पर प्रणाम करना अनुचित माना जाता है। फिर अन्न और जल-दान की सर्वोच्च महिमा प्रतिपादित होती है। एक उपाख्यान में बताया गया है कि ब्राह्मण के चरणोदक के संस्पर्श से भी घोर पाप शुद्ध हो जाते हैं; पतित पूर्व-राजा शंख नरक-भोग के बाद उसी पुण्य-प्रभाव से मुक्ति पाता है। दूसरे उपदेश में कहा गया है कि परलोक की भूख कंजूसी और पितरों के लिए अर्पण-तर्पण की उपेक्षा से उत्पन्न होती है; इसलिए पुत्रों को पितृ-समर्थन हेतु अन्न-जल का दान करना चाहिए, जिसका निर्देश स्वप्न के माध्यम से भी दिया गया। अंत में निष्कर्ष है कि अन्न-जल-दान के समान कोई दान नहीं, और इसका फल समय-बंधन या कठोर पात्र-परीक्षा के बिना भी प्राप्त होता है।
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