Adhyaya 25
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Adhyaya 25

The Greatness of Tulasī and the Merit of Honoring a Guest (Atithi-dharma)

जैमिनि तुलसी की पाप-नाशिनी शक्ति और अतिथि-सत्कार के माहात्म्य का फिर से विस्तार से वर्णन पूछते हैं। सूत के माध्यम से व्यास बताते हैं कि तुलसी स्वयं महालक्ष्मी-स्वरूपा और परम मंगलमयी हैं; मृत्यु के समय तुलसी का संस्पर्श—तुलसी-पत्र से छना/सुगंधित जल, तुलसी-तिलक, तथा मुख, शिर और कानों पर पत्र रखना—महापापियों को भी हरि के धाम तक पहुँचा देता है। फिर अध्याय अतिथि-धर्म पर आता है। पवित्र और आनपत्य ऋषि लोमश का पूर्ण आदर-सत्कार करते हैं; लोमश कहते हैं कि अतिथि में ब्रह्मा, शिव और विष्णु का वास है। ‘अतिथि’ की परिभाषा और आचार-विधि बताई जाती है—अकस्मात आए किसी भी आगंतुक का, वर्ण-भेद से परे और उपेक्षित वर्गों तक का भी, यथाशक्ति सम्मान महान पुण्य देता है; उपेक्षा से संचित पुण्य नष्ट हो जाता है। अकाल के समय एक निर्धन दंपति अतिथि को भोजन कराकर विष्णु-लोक को प्राप्त होता है। अंत में तुलसी-पत्र के स्पर्श और हरि-नाम से एक मरा हुआ चूहा भी मुक्त हो जाता है—तुलसी की तारक शक्ति पुनः सिद्ध होती है।

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