Adhyaya 9
Kriyayoga SaraAdhyaya 90

Adhyaya 9

The Glory of the Gaṅgā: Pilgrimage Discipline, Ancestral Rites, and Liberation

अध्याय का आरम्भ जैमिनि के प्रश्न से होता है—वे व्यास से गङ्गा की परम महिमा सुनाना चाहते हैं। फिर स्तुति-रूप वर्णन आता है कि गङ्गा-तट तक चलकर जाना, उसकी लहरों का श्रवण, उसके जल का आस्वादन और गङ्गा-मृत्तिका का तिलक धारण करना—इनसे इन्द्रियाँ और अंग ‘सफल’ हो जाते हैं। इसके बाद तीर्थयात्रा की मर्यादा बताई गई है—तप, संयम, सत्य-वचन, कलह से दूर रहना, भोग-विलास का त्याग और गङ्गा-नाम का निरन्तर जप। गङ्गा के पास जाकर प्रणाम, स्पर्श, स्नान, मृत्तिका-संग्रह, तिलक-विधि, तर्पण-श्राद्ध, गङ्गा तथा विष्णु-पूजन और रात्रि-जागरण का क्रम भी बताया गया है। उत्तरार्ध में कर्मफल का दृष्टान्त है—राजा सत्यधर्म और रानी विजय ने शरणागत मृग की हिंसा की, इसलिए नरक भोगकर पशु-योनि (मेंढक-दम्पति) में जन्म पाया। गङ्गा-तीर्थ की ओर यात्रा करते हुए कालसर्प से सामना और मार्ग में देहान्त होने पर गङ्गा-प्रसाद से उनका उत्कर्ष, स्वर्गारोहण और अन्ततः मुक्ति होती है; इससे गङ्गा की तारिणी शक्ति और अहिंसा की प्रधानता प्रतिपादित होती है।

Shlokas

No shlokas available for this adhyaya yet.