Adhyaya 8
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Adhyaya 8

The Glory of the Gaṅgā: Merit, Purity Laws, and Liberation at Death

इस अध्याय में गङ्गा का परम माहात्म्य और उसके तट पर रहने‑आने वालों के लिए कठोर आचार‑नियम बताए गए हैं। श्रद्धा से गङ्गाजल का स्पर्श, पान या स्नान महायज्ञ के समान पुण्यदायक कहा गया है; तीर्थयात्रियों को रोकना, उन्हें कष्ट देना या अपमान करना नरक का कारण बताया गया है। इसके बाद शौच‑शुद्धि के नियम तीव्र हो जाते हैं—तट या जल में मल‑मूत्र, उच्छिष्ट, कफ आदि डालना अत्यन्त घोर पाप माना गया है, जिसका प्रायश्चित्त भी कठिन बताया गया। गङ्गा‑तट पर किया गया पाप अन्यत्र जाकर नहीं मिटता—ऐसा भी प्रतिपादित है। उत्तरार्ध में इन्द्र‑शची तथा पद्मगन्धा/क्रौञ्ची की कथा देकर यह दिखाया गया है कि गङ्गा में देहत्याग, विशेषतः अस्थियों का जल में बने रहना, दीर्घ स्वर्ग‑सम्मान और विष्णुलोक की निकटता दिलाता है। अंत में कहा गया है कि मृत्यु के समय “गङ्गा” का उच्चारण या उसके माहात्म्य का स्मरण मोक्ष या महान स्वर्गफल प्रदान करता है।

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