
The Glory of Puruṣottama (Jagannātha’s Sacred Field)
जैमिनि परम तीर्थ के माहात्म्य का संक्षिप्त वर्णन पूछते हैं। व्यास (और आगे पुराणवक्ता) लवण-सागर के तट पर स्थित पुरुषोत्तम-क्षेत्र की स्तुति करते हैं—यह स्वर्ग से भी दुर्लभ और समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ है। वहाँ प्रवेश करने से जीव ‘विष्णु-सदृश’ हो जाते हैं, इसलिए दोष-दर्शन और निन्दा का त्याग करने की शिक्षा दी जाती है। क्षेत्र का प्रसाद-भोजन लक्ष्मी द्वारा सिद्ध और हरि द्वारा भुक्त माना गया है; वह पाप का नाश करता और मुक्ति को सुगम बनाता है। इन्द्रद्युम्न, मार्कण्डेय, रोहिणी, श्वेतगंगा तथा समुद्र आदि पवित्र जलों का उल्लेख करके वहाँ स्नान, पितृ-तर्पण, दान, जप, यज्ञ और विष्णु-पूजा को अक्षय फल देने वाला कहा गया है। जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के दर्शन—विशेषतः गुंडिका-यात्रा और पर्व-काल में—मोक्ष तथा लौकिक वरदान प्रदान करते हैं। अंत में पुरुषोत्तम-क्षेत्र को संसार-तरण हेतु सर्वोत्तम तीर्थ घोषित किया गया है।
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