Adhyaya 1
Kriyayoga SaraAdhyaya 10

Adhyaya 1

Invocation, the Naimiṣāraṇya Frame, Kali-yuga’s Problem, and the Glory of Hari-kathā

अध्याय का आरम्भ मंगलाचरण से होता है, जहाँ श्रीविष्णु (वराह सहित) तथा लक्ष्मी-सहित वेदव्यास की स्तुति की जाती है। फिर नैमिषारण्य की सभा का प्रसंग आता है, जहाँ ऋषिगण व्यास के शिष्य सूत का आदर करके धर्मकथा सुनने के लिए बैठते हैं। शौनक पूछते हैं कि कलियुग में आचार-भ्रंश, अल्पायु, दरिद्रता और पुण्य-संचय की शक्ति घट जाने पर भी भक्ति और सच्चा कल्याण कैसे उत्पन्न हो? यहाँ उपदेश के नैतिक भार पर बल दिया गया है—सत्पथ दिखाने वाला पुण्य का भागी होता है और कुमार्ग में लगाने वाला पाप का। करुणामय आचार्य केशव-सदृश कहे गए हैं, और वैष्णव-हरिकथा को रोकने या उसका उपहास करने वालों की निन्दा की गई है। अन्त में सूत प्रमाण-परम्परा स्थापित करते हैं कि वे जैमिनि को व्यास द्वारा कही हुई बात सुनाएँगे—कलियुग में भी मोक्ष क्यों सुलभ होता है। हरिकथा को पाप-नाशिनी और क्रिया-योग का सार बताकर आगे के संवाद की भूमिका बाँधी जाती है।

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