
The Slaying of Bhīmanāda and the Teaching on Gaṅgā–Ocean Confluence, Land-Donation Ethics, and Karmic Consequences
राजसभा में रहने वाला एक रक्षक-वीर राजा के आदेश से भयानक खड्गधारी राक्षस भīमनाद का आतंक मिटाने निकलता है, जो प्राणियों को निगलता था। वह गंगा के समुद्र-संगम के निकट उससे युद्ध कर उसे मार देता है। तभी विष्णु के पार्षदों सहित एक तेजस्वी पुरुष प्रकट होकर कथा को कर्मफल-न्याय की ओर मोड़ देता है। धर्मबुद्धि नामक धर्मात्मा राजा अपने पूर्वकर्मों का वृत्तांत सुनाता है—पाखंडियों के बहकावे में आकर उसने द्विज-धर्म का उल्लंघन किया, विशेषतः आजीविका की मर्यादा और भूमि-दान की नीति में दोष किया; उसी ‘छोटे’ अपराध से राज्य-नाश और घोर नरक-फल प्राप्त हुआ। यमराज की व्यवस्था, चित्रगुप्त का लेखा और भास्करी-देव की साक्षी से पाप-पुण्य का निर्णय स्पष्ट किया जाता है। फिर गंगासागर तीर्थ का विधान बताया जाता है—प्रातः स्नान, नारायण-पूजन, गीत-नृत्य सहित भक्ति, तथा तुलसी-सेवा। वहीं लोगों के लोप, शोक-विलाप और आत्मघात की प्रवृत्ति का वर्णन कर मोह और ‘मेरा-मेरे’ के आसक्ति से बचने की शिक्षा दी जाती है; अंत में गृह-प्रसंग में गंधिनी माधव को फटकारती है।
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