
The Glory of the Aśvattha (Sacred Fig) and Month-wise Offerings to Hari
इस अध्याय में फाल्गुन मास के वैष्णव-पूजन का विधान बताया गया है। प्रतिदिन श्रीकृष्ण की भक्ति से आराधना, घृताभिषेक, तथा मिष्ठान्न, शर्करा, फल आदि का नैवेद्य करने से विष्णुलोक-प्राप्ति, दीर्घ स्वर्ग-सुख और अंततः मोक्ष का फल कहा गया है। फिर चैत्र और वैशाख के नियम आते हैं—मधु से अभिषेक, पुष्प-पूजन, आहार-संयम, स्नान-विधि, दान और जल-दान; इन्हें अक्षय पुण्य देने वाला बताया गया है। अध्याय का केंद्र-तत्त्व यह है कि अश्वत्थ (पीपल) स्वयं भगवान् विष्णु का साक्षात् स्वरूप है। उसकी रक्षा और पूजा परम पुण्यकारी है, और उसका काटना या कटवाना अत्यन्त घोर पाप का कारण कहा गया है। त्रेता-युग की कथा में ब्राह्मण भक्त धनञ्जय द्वारा अश्वत्थ पर प्रहार होने पर उसी वृक्ष से भगवान् प्रकट होते हैं, अज्ञान को क्षमा कर वर देते हैं और अश्वत्थ-पूजा को क्रिया-योग का मार्ग बताकर कल्याण तथा मोक्ष-प्रद सिद्ध करते हैं।
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