
The Greatness of Worship of the Blessed Lord (Viṣṇu–Lakṣmī Pūjā: Place, Mind, Offerings, and Merit)
इस अध्याय में मार्गशीर्ष मास में अक्षय भगवान विष्णु की महालक्ष्मी सहित वैष्णव-पूजा का माहात्म्य बताया गया है। पूजा के लिए स्थान और संगति की शुद्धि अनिवार्य कही गई है—अशुद्ध भूमि, दुर्गन्धयुक्त स्थान, पतितों के घर, पाखण्डियों या महापापियों की निकटता, तथा रोदन, कलह, उपहास, लोभ और दान-लिप्सा से भरे वातावरण में पूजा निषिद्ध है। फिर मन की भूमिका पर बल दिया गया है—कपट और चित्त-विक्षेप से पूजा निष्फल हो जाती है; समस्त कर्म मन पर आश्रित हैं, और मन की पवित्रता के बिना दीर्घ तप भी व्यर्थ हो जाते हैं। एकाग्र भक्ति, व्यर्थ वाणी से बचना, और यह विश्वास कि पुष्प व ताज़ी सरल सामग्री जैसे छोटे अर्पण भी भगवान स्वीकार करते हैं—ऐसा उपदेश है। उत्तरार्ध में मासानुसार अर्पण और दान का विधान आता है—गन्ने का रस व गन्ने के पदार्थ, दूध/दही सहित अन्न, नये वस्त्रों का दान, तथा मंदिर-सेवा में शंख, घंटा, वाद्य, नृत्य और गीत। इनके फलस्वरूप महान पुण्य, विष्णुधाम की प्राप्ति और अंततः मुक्ति का प्रतिपादन किया गया है।
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