
Procedure for the Worship of Hari (Purity, Preparation, Pūjā Sequence, and Prasāda Theology)
इस अध्याय में वैष्णव की प्रातःकालीन पूजा-प्रणाली क्रमबद्ध रूप से बताई गई है। ब्रह्ममुहूर्त में उठना, मलोत्सर्ग के नियम, शौचाचार, मिट्टी और जल से शुद्धि, तथा दंतधावन और जिह्वा-शोधन के समय‑विधि और निषेध वर्णित हैं। इसके बाद रात्रि-वस्त्र त्यागकर नारायण का स्मरण, और लक्ष्मी सहित श्रीकृष्ण के प्रति जागरण व सेवा-भाव के अंग बताए गए हैं। फिर मंदिर-सेवा का विधान आता है—पुराने अवशेष हटाना, झाड़ू देना, मिट्टी/गोबर से लीपना—जिसे अत्यन्त पुण्यदायक कहा गया है। पात्रों और उपकरणों की शुद्धि, स्नान-शिष्टाचार, पाँव धोकर गर्भगृह में प्रवेश, उचित आसन और दिशा-नियम भी बताए गए हैं। शंख और तुलसी सहित देव-स्नान, दिक्बन्धन, संकल्प, न्यास, श्रीकृष्ण-ध्यान, उपचार, मंत्र-जप, नैवेद्य, प्रदक्षिणा और साष्टांग प्रणाम का क्रम दिया गया है। अंत में प्रसाद-तत्त्व प्रतिपादित है—निर्माल्य, तुलसी की सुगंध, विष्णुपादोदक और नैवेद्य पापों का नाश करते हैं; और पूजा के फल का निर्णायक कारण अंततः भक्ति ही घोषित की गई है।
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